Monday, March 16, 2026

गुरु रविदास

गुरू रविदास

हमारे एक प्रगतिवादी मित्र ने हिन्दू संस्कृति संबंधी एक दूर की बात कही। बोले भारतीय परम्परा में राजा व राजपरिवार ही सर्वोपरि है। वही पूज्य, वही आराध्य। देखिए, वे चश्मा ठीक करते हुए समझाने लगे, राम व कृष्ण इस लिए प्रसिद्ध नहीं हुए क्योंकि उन्होंने बड़ा काम किया। बल्कि वे राज्य परिवार के थे इसलिए मशहूर हो गये। किसी छोटे मोटे, टुटपूजिए के यहा पैदा होते तो कौन उन्हें याद करता और तो और ऐसा नहीं कि भारत में किसी ने साधना नहीं की जैसी भगवान महावीर ने की। लेकिन बड़ी बात यह थी कि वे राजपरिवार से थे। अतः उनका नाम हो गया। बुद्ध इसलिए इतने प्रसिद्ध नहीं हुए कि वे ज्ञानी थे, परंतु इसलिए क्योंकि राजपरिवार के थे - अतः पूज्य हो गये। कितने लोग देश के लिए मर मिटे- गुलामी सल्तनत के खिलाफ लेकिन नाम महाराणा प्रताप व शिवाजी के ही हुए क्योंकि वे राजा थे, महाराज थे। बस फिर क्या था इनके तर्क मुसलाधार बरसने लगे। विश्वामित्र का वर्णन भी उन्होंने संयासी या गुरू के कारण नहीं - पहले राजा थे फिर सन्यासी बने तो याद रह गये, ऐसा सिद्ध किया। बस विक्रमी संवत राजा विक्रमादित्य से थे आदि आदि।
मैं भी एक बार तो प्रभावित हो चला था कि सच में अंग्रेजी राज्य ने हमारे यहां विद्वानों ने दिल्लीश्वर को जगदीश्वर कहा ही है और राजाओं का महिमामंडल सत्य की लगता है। पर अचानक ध्यान गया कि एक व्यक्ति राजा, महाराजा तो दूर की बात, फैक्टरी का मालिक, (हैंडलूम फैक्टरी) का मालिक भी नहीं था, अनपढ़ था, ’’कागज छूओ नहीं, कलम गहयो नहीं हाथ’’ स्वयं कह रहा है। लेकिन उसके श्लोक पढ़कर पंडित भी शरमा जाते है। घर-घर में वह पूज्य है। छोटी सी खड्डी चलाने वाला भक्त कबीर के नाते मान्यता प्राप्त कर गया है, वो क्या राजा था। राजा द्वार पर ज्ञान प्राप्त करने को खड़ा है। लेकिन ग्राहक की हजामत करने के बाद ही बात करने की फुरसत निकालने वाला नाई गुरूग्रंथ साहब में अपना एक पद दर्ज करवा कर सैन भक्त कहलवाता है, तो वो कहां का राजा है। इस प्रकार जुती गाठ कर काम चलाने वाले, बनारस के आस-पास मरे पशुओं का चमड़ा उतारकर व्यवसाय करने वाले चर्मकार परिवार में जन्म लेने वाले व्यक्ति के गुरूग्रंथ साहब की पवित्र वाणी में 41 पद दर्ज करवा कर गुरू रविदास कहलाया, वह कौन से राजा थे। आचार्य रजनीश की दो पुस्तकें उन्हें समर्पित है, यह कोई बड़ी बात नहीं है। लेकिन पुराने समय के संत नेमीदास अपनी कवितामय पुस्तक ‘भक्तमाल’ में उनका विशद्वर्णन करते है - यह तो बड़ी बात है कि नहीं? एक क्रांतिकारी बात यह थी कि उनका सम्मान राजपरिवारों में था, इतना ही नहीं था। मीराबाई, रानी झाला उनकी शिष्या बनी - यह तो बड़ी बात है ना।
जूती गांठते वक्त जिस पात्र यानि कठौती में वे जूती डूबोकर नर्म करते, उसमें ब्राह्मणों को गंगा दर्शन करवा देंगे - यह बाते लोग किवदंती, कपोल कल्पना कर टाल देंगे। शायद उन्हें छोटी बात लग सकती है। लेकिन जूतियां गांठते-गांठते, हथौड़ी-रम्बी के सुरताल पर जो कुछ भजन उन्होंने बोला वह आज के विश्वविद्यालयों में कोई स्थान रख सकता है - यह आपकी जिज्ञासा का विषय हो सकता है। श्री गुरू रविदास पर पी.एच.डी.? कितनों ने की यह कहना जरा मुश्किल है लेकिन नेशनल बुक ट्रस्ट के सम्पादक की पुस्तक में वर्णन पढ़कर हैरान हुआ कि जिस व्यक्ति से उन्हांने पी.एच.डी. की है, उसने कईयों को गुरू रविदास पर पी.एच.डी. करवाई है। मैने उस विद्वान से संपर्क किया और जिज्ञासावश पूछा कि क्या यह सच है, जैसा आपके बारे में लिखा है कि आप गुरू रविदास पर 25 लोगों की पी.एच.डी. करवाई है और 12 पुस्तकें लिखी है। उन्होंने विन्रमता से कहा - ’’नहीं यह गलत है, मैने 12 नहीं 20 पुस्तकें लिखी है, और 25 नहीं 30 लोगों को पी.एच.डी. गुरू रविदास पर करवाई है। यह व्यक्ति 14 वर्षों तक पंजाब यूनिवर्सिटी में स्थापित रविदास पीठ या चेयर के पीठाधीश या चेयरमेन रहे हैं।
ऐसे विद्वान से मैंने पूछा कि देश भर के कार्यकर्ता तृतीय वर्ष में नागपूर आ रहे हैं, उनके सामने मुझे गुरू रविदास के जीवन चरित्र पर बोलना है। मैं पी.एस.डी. करना तो दूर की बात है, यदि 30 थिसीस को पढ़ने भी लगा तो एक दो वर्ष लगेंगे। अतः आप ही बताईये कि आपका कुल मिलाकर इस सारे का सार क्या है। उन्होंने बड़ी सहजता से कहा - गुरू रविदास भारतीय संस्कृति की साक्षात् मूरत थे, प्रखर राष्ट्रवादी थे, अंतिम सत्य का साक्षात्मकार करके अत्यंत सरल भाषा में उसका वर्णन अपनी वाणी में करने वाले श्रेष्ठतम संत थे। मैं अत्यंत थोडे में उनके बारे में जो मुझे अत्यंत प्रेरणादायी लगा वह कह रहा हूं। स्थान-स्थान पर आपने भी उसे सुनाना होगा, समय-समय पर प्रेरणा लेनी होगी। अतः उनके जीवन के पांच प्रेरणादायी प्रसंग आपको सुना रहा हूं।
‘‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’’ ऐसी कहावत जिस प्रसंग में से पैदा हुई, वह प्रसंग मैं आपको सुनाने जा रहा हूं। - संत रविदास जी का जन्म बनारस के निकट आज से 636 वर्ष पूर्व (अर्थात जब 25 फरवरी 2013 को उनका जन्म दिन मनाया गया। ) 1376 ई. में माघ पूर्णिमा के दिन हुआ। रविदास घर के बाहर जूतियां गांठ रहे थे। एक ब्राह्मण बोलता है - अच्छी तरह गांठना, हरिद्वार तक जाना है भई, बीच में दगा न दे जाए। जूती ठीक से गांठना। लेकिन युवा चर्मकार उसको गुदगुदाने वाला था एक छोटी से भेट देकर। कि भई पैसे रहने दो गठाई के बस थोड़ा हमारा काम कर दो। यह ‘दमड़ी’ (भेट) हमारी भी गंगा मईया को कर देना। ठीक है, ठीक है पंडित जी ने बड़े ही मशीनी ढंग से कहा। चढ़ा देंगे भईया, आधे गांव की भेंट चढ़ाने जा रहा हूं। तेरी भी चढ़ा दूंगा। ला दे दे। लेकिन महापुरूष किसी को मशीनी नही होने देते, यांत्रिकता उनको सुहाती नहीं। थोड़ा झटका दिया पंडित जी को। - भई, देखो हमारी भेंट तभी चढ़ाना जब गंगा मैया हाथ बहार करके स्वीकार करें। ‘‘हूं, क्या कहने तेरे !’’ पंडित जी, व्यंग्यपूर्ण ढंग से बुदबुदाये। पर आप कहानी जानते हैं, सबकी भेंट चढ़ाने के बाद उसने रैदास का नाम लिया। माता गंगा यह भक्त रविदास की भेंट है और यह क्या, तुरन्त गंगा मैया ने हाथ पसारा, भेट स्वीकार की, पंडित जी हडबड़ा गए और ज्यादा हडबडाये यह सुनकर कि रूक जा भगत जी के लिए हमारी भेंट भी लेते जाना। आंखे चुंधियाने वाला, हीरो से जड़ा, एक कंगन थमा दिया। आप जानते हैं कि वह उसने राजा को बेच दिया। रानी ने वैसा और मांगकर आफत खड़ी कर दी। पंडित जी कहां से लाए। गिडगिडाये फिर रविदास जी के पास आए तो उन्होंने कोई एफ.आई.आर दर्ज नही करवाई, उसकी बेईमानी के खिलाफ, पंचायत नहीं बुलाई। और उसी कठौती में गंगा से कहा, निकाल लो, जितने कंगन चाहिए। मेरा मन तो कहता है पंडित जी सीधे नहीं आये होंगे दूसरा कंगन लेने। पहले खुद रविदास का नाम लेकर गंगा के एटीएम से कंगन निकालने की कोशिश की होगी लेकिन रविदास जी का पासवर्ड नहीं जानते होंगे। रविदास जी के जीवन से जुड़ा यह पहला चमत्कारिक प्रसंग नहीं था। इससे पूर्व भी गंगा का प्रवाह बदलकर उन्होंने नाम की महिमा उन्होंने सिद्ध की थी। ऐसा खा जाता है।
2. विनम्रता : लेकिन जो दूसरा प्रसंग है वह भी बड़ा चमत्कारी है। जिसका वर्णन श्री गुरूग्रंथ साहब में है। काशी नरेश को उलाहना दिया स्थानीय विद्वानों ने कि एक शूद्र को बेवजह आप इतना सम्मान देते है। कहा कि विद्वान, कहां का ज्ञानी और कहां का चमत्कारी। गंगा के दूसरी ओर ठाकुर जी की प्रतिमा को वह क्या इधर ला सकता है।  रविदास जी ने कहा, अच्छा पहले आप प्रयास कर लो ! टस से मस नहीं हुई मूर्ति। पर अब बात तो रविदास जी की थी - बड़ी श्रद्धा से रविदास आंखे बंद करके आराधना करते हैं और मूर्ति रविदास जी की गोदी में विराजती है। और धन्यवाद की मुद्रा में जब रविदास के हाथ उठते है, तो गुरूवाणी के ये शब्द जिव्हा पर आते है -
ऐसी लाल तुझ बिन कौन करे, गरीब निवाज गुसैया मेरा, माथे छत्र घरे। जा कि छोत जगत को लागे, ता पर तूही ढरै। नीच हूं उच करे मेरा गोविंद, काहु ते ने डरै।। (गुरू ग्रंथ साहिब पन्ना 1106)
संत श्रेष्ठ रविदास के जीवन के साथ ऐसे प्रसंगों को जुडना मायने रखता है। कभी राजा पीपा प्रसाद को आते है तो जूते गांठने वाली कठौती से चरणामु लेना उन्हें कठिन लगा। अतः कपड़ों में वह पवित्र जल समाता है और धोबी की बेटी का ज्ञान जब सबको हत प्रभ करता है तो राजा पश्चाताप करता है।
3. त्याग भाव : लेकिन तीसरे किस्म का प्रसंग अनूठा है। आज भी इन विरादरियों को देखेंगे तो सत्य लगेगा। ब्राह्मण वेश में भगवान का आना और पारसमणि देना। मना किया कि हमें नहीं चाहिए। जो ध्यान देना चाहिए भगवान के नाम पर उस सोने पर ध्यान देना पड़ेगा। लेकिन ब्राह्मण पोटली बांध रख गया। दरवाजे पर बांध कर टांग गया ताकि आते जाते जब जरूरत पड़े, वह पारसमणि का प्रयोग कर ले। कई दिन बाद भी देखा तो कुछ उपयोग नहीं  - ‘‘साधो पारसमणि ले जाओ।’’ - मोहे सोने का नहीं चाओ।
यहां एक और ध्यान देने की बात है। जब करोड़ों को मालिक कुछ लाख छोड़ देता है तो इतनी बड़ी बात नहीं  होती। रविदास जी तो आर्थिक दृष्टि से अत्यन्त दरिद्र अवस्था में थे। हर कोई उनकी मुफलसी, कंगाली को देख हंसता था। उन्होंने स्वयं गुरूवाणी में लिखा है।
दारिद देख सबको हंसे, ऐसी दशा हमार ! 
अष्ट दसा सब कर तले, सब कृपा तुम्हार ।। (श्री गुरूगं्रथ साहिब में पन्ना नं. 858)
और यह गरीबी का वर्णन श्रीगुरूग्रंथ साहिब में पन्ना नं. 858 पर दर्ज है। दारिद्र देख सबको हसै, ऐसी दशा हमारी। इसीलिए रविदास का पारसमणि को ठुकरानी बहुत बड़ी बात है। उन्होंने सोना नहीं ठुकराया, बल्कि सोना बनाने वाली फेक्टरी को लेने से इंकार कर दिया - गाय नहीं कपिला गाय का त्याग, वृक्ष नहीं कल्पवृक्ष को त्यागा। इसके आज भी बड़े गहरे अर्थ है। जब एक व्यक्ति नवाब हैदराबाद के अरबो रूपयों के आश्वासन को ठुकराकर इस्लाम स्वीकार करने से इंकार करता है तो वहां बाबा साहब अंबेडकर नहीं, रविदास महाराज की वही मूर्ति बोल रही होती है - 
साधो ! पारसमणि ले जाओ ....
खैर बाबा साहेब तो बहुत बड़े आदमी थे लेकिन बहुत वर्ष पूर्व एक बोधकथा में पढ़ा था। मीनाक्षीपुरम् की घटना के बाद का दृश्य। गांव को धर्मान्तरित करने के बाद उपहार भेंट देने का मोलवियों की तरफ से कार्यक्रम चल रहा था। गांव से दूर एक बूढ़ी, अनुसूचित जाति की महिला से पत्रकार ने पूछा ‘‘तुम नहीं गई सामान लेने।’’ नहीं मैं मुसलमान थोड़े बनी हूं और क्यों बनूं, मेरा नाम और यहां की देवी का नाम एक हैं, भूखी नंगी रह सकती हूं पर धर्म बदलकर अपने नाम को लजा नहीं सकती। हमारे मन की अन्तस्थली में मधुर संगीत बज रहा था -
साधो, पारसमणि ले जाओ ....
4. स्वाभिमान : चौथा प्रसंग कुछ भिन्न है, समय की दीवारों पर चोट ही नहीं करता बल्कि विस्फोट करता है। दरार नहीं डालता, धराशायी करता है। आप जानते है मीराबाई, गुरू रविदास की शिष्या बनी। वैसे तो कई राजघराने के लोग रविदास का सम्मान करते थे, लेकिन मीराबाई तो उनकी शिष्या बनी।
मीरा को गोविन्द मिला जी, गुरू मिलिया रैदास,
गुरू मिलिया रैदास जी, दीन्ही ज्ञान की गुटकी ...
गुरू रैदास मिले मोहि पूरे, धुर से कलम भिड़ी।
देखिए, जब ऐसा माना जाता हो कि इस समाज के छुने से अपवित्रता आती हो उस विरादरी के व्यक्ति को गुरू धारण और चरण छू कर पवित्र होना, बड़ा क्रांतिकारी कदम था। मीरा का मजाक उड़ा और समाज ने उपेक्षा की।
वैसे अगर इस घटना का निहितार्थ समझना हो तो बाबा साहेब अम्बेडकर के जीवन से समझा जा सकता है। पूज्य बालगंगाधर तिलक के एक बेटे ने अम्बेडकर साहब की केवल प्रशंसा ही नहीं, बल्कि उनकी पार्टी की पूना जिला की अध्यक्षकता की। अच्छा काम किया लेकिन जानते है क्या कीमत अदा करनी पड़ी इस सामाजिक क्रांति की। उनकी ऐसी थू-थू हुई, ऐसी किरकिरी हुई। जगह-जगह से परेशान होकर उन्होंने आत्महत्या ही कर ली। आप उसकी मनोदशा समझ सकते है और कुछ समझ में न आए तो उसके हाथ का लिखा (सूसाईड नोट) आत्महत्या का संदेश पत्र पढ़ लेना चाहिए। उन्होंने मरते समय यह लेख बाबा साहेब अम्बेडकर को संबोधित कर लिखा था, ‘‘दलितों की सामाजिक दुरावस्था की साक्षी लेकर मैं स्वयं भगवान के चरणों में जा रहा हूं।’’ तो ऐसे में मीराबाई डट कर खड़ी हुई यह बड़ी बात है।
लेकिन इससे बड़ी बात है गुरू रविदास की मनोदशा। मीराबाई गुरूजी की दरिद्रता देख व्यथित हुई और कहा गुरू महाराज एक कीमती हीरा ले लो ताकि अच्छा महल बनाकर आप रह सकें। मेरा भी मजाक उड़ता है कि तुम्हारा गुरू तो पुरानी जूतियां गांठता है... इसलिए यह ले लीजिए। गुरू रविदास की सोच बड़ी थी, और इसे अस्वीकार कर  दिया। बोले जरा समझो राजकुमारी। मैंने जो कुछ पाया है जूतियां गांठकर ही पाया है, मैं इसे छोड़ता हूं तो आस-पड़ोस में भी इस काम का सम्मान कम होगा। हां, तुझे मेरे गुरू बनाने में यदि शर्म आती है तो तुम गुरू बदल लो, मैं अपना धंधा नहीं बदलूंगा।
एक रूसी विद्वान है जिन्होंने भक्तिकाल के कवियों का गहरा अध्ययन किया है। उनका नाम है सरवरीऑकोव। उनका निष्कर्ष बड़ा मायने रखता है कि उत्तरी भारत में कुटरी उद्योगों को (कॉटेज इन्डस्ट्रीज) को बढ़ावा देने में संतों का बड़ा योगदान है - कबीरदास ने खड्डी उद्योग को प्रोत्साहन दिया तो गुरू रविदास ने जूता उद्योग को सम्मान दिलवाया। ऐसा सरवरीऑकोव का कहना है।
दारिद देख सबको हसै, ऐसी दसा हमारी,
अष्ट दसा सब कर तले, सभ कृपा तुम्हारी (पन्ना 858)
यहां यह भी ध्यान देने की बात है कि मेवाड़ के महाराणा सांगा और उनकी धर्मपत्नि रत्नकुंवरी झाली रानी जब गंगा स्नान के लिए काशी आए तो वे भी गुरू रविदास की कीर्ति व भक्ति से मुग्ध होकर उनके शिष्य बने। उन्होंने चितौड़ आने का निमंत्रण दिया और सचमुच बड़ी आयु में रविदास वहां गये और उनका शाही स्वागत हुआ। वहां की विचित्र घटना है। विद्वानों, पुरोहितों ने रविदास के साथ बैठकर खाने से मना किया और अपना-अपना भोजन लेकर अलग बैठकर खाने लगे। चमत्कार यह हुआ कि वे जहां भी बैठे दो ब्राह्मणों को अपने बीच एक-एक रविदास बैठे दिखाई दिए।
भक्त रत्नावली कहती है - 
दरपन येक बहुत ही छाई, यूं बहेद तन सब ही ढॉई।
सबकौ अचित भयौ तमासा, जेते विप्र ते ते रैदासा।।
इसी प्रकार की एक ओर घटना चित्तौड की प्रसिद्ध है। जब पुरोहितों और विद्वानों ने उनके जनेऊ के बारे में प्रश्न किया तो रविदास जी ने अपनी छाती में से दिव्य जनेऊ को दर्शाया। इस घटना की अभिप्राय यह है कि बाहरी लक्षण की बजाए आन्तरिक गुणवत्ता ज्यादा महत्वपूर्ण है।
5. राष्ट्रभाव : अंतिम घटना और पांचवी मुख्य घटना उस समय के बादशाह सिकन्दर लोधी के साथ घटित है। एक सदना मौलवी से रैदास जी के शास्त्रार्थ का वर्णन आता है। सदना इस शास्त्रार्थ में परास्त होकर नियमनानुसार  रैदास जी का शिष्य बन गया। इस इस्लामी शासनकाल में किसी मुस्लमान मौलवी की शास्त्रार्थ द्वारा हिन्दू धर्म धर्मान्त्रण की यह बहुत बड़ी घटना थी। जब इसकी खबर नमक-मिर्च लगाकर सिकन्दर लोधी के पास पहुंची तो वह बहुत आग-बबूला हुआ। रैदास जी को गिरफ्तार कर दरबार में लाया गया। जुर्म सुनाया गया और सजा भी। या तो वह इस्लाम स्वीकार करें या मौत। बादशाह ने पूछा इस्लाम चाहते हो या मौत। हां एक बात और सुन लो, यदि इस्लाम स्वीकार करोगे तो साथ में पांच गांव भी जागीर में मिलेंगे। आरम से जीना।’’ वाह ! जिसने पैसे बनाने वाली टक्साल यानि पारसमणि को फैंक दिया हो, मीरा के अमूल्य हीरे को ठुकरा दिया हो - उसके लिए यह लालच ? क्या कोई मायने रखता है। बिल्कुल नहीं। खैर सिकन्दर लोधी ने कहा अभी यह अकड़ में है, जंजीर बांधकर जेलखाने में डाल दो और गले में तौक डाल दो। जब तक अपनी मर्जी से नमाज पढ़ना शुरू न करे तब तक दाना पानी न दिया।’’
कहते है एक अजीब चमत्कार हुआ। जब लोधी नमाज पढ़ने लगा तो सामने रैदास मुस्कराते नजर आए। महल में दरबार में जहां भी कहीं जाता उसे रैदास सामने दिखाई देते। खैर, बैचेनी बढ़ने लगी और सादर रविदास जी को मुक्त किया, भूल स्वीकार की और क्षमा मांगी।
देख करिश्मा भक्त का, सब अचरज को जान,
बादशाह कॉपन लगा, यह महिमा पहचान।
बादशाह देखे भय खाई चहुं दिस रविदास दिखलाई
एक बेर कलमा ध्वनि छाई, बीस बेर दे ओम सुनाई।
(रविदास रामायण, महाकवि बक्शी दास कृत पन्ना 139)
रैदास का राष्ट्रवादी दृष्टिकोण और काफिरवाद के विरूद्ध आवाज उन्हीं के शब्दों में गूंजती है -
‘‘पराधीनता पाप है, जान लेहू र मीत।
रविदास दास पराधीन सौ, कोन करे है प्रीत ।।
यदि प्रथम घटना कठौती वाली उनकी मानसिक उदारता दिखाती है तो दूसरी ठाकुर जी को गोद में बिठाना मन की विनम्रता दिखाती है। तीसरी व चौथी घटना मीरा का हीरा स्वीकारना व धंधा न छोडना स्वाभिमान प्रदर्शित करता है और अंतिम पांचवी घटना उनका राष्ट्रीय भाव व स्वधर्म का आग्रह दर्शाता है।
रैदास संबंधी कई घटनाओं को कुछ लोग किवदन्ती कहकर उड़ाने का प्रयास करते हैं। लेकिन किवदन्तियों का  भी अपना आधार होता है। कल्पना के लिए भी कोई न कोई सत्य होता है। कोई किवदन्ती छोड़ सकता है कि एक बारात का खाना अकेले खा गये परन्तु यह बात महात्मा गांधी के बारे में कोई नहीं कहेगा। महाबली के बारे में किवदन्ती हो सकती है कि उन्हांने पीतल की परात को मोडकर बेलन बना दिया। लेकिन यह कोई देवानंद के बारे में नहीं कहेगा। शाहरूख खान के बारे में कोई किवदन्ती बन सकती है कि जब वह कमीज उतार कर नाचता है तो उसके पेट में छः नहीं 12 कट दिखते है, हालांकि 12 कट की जगह भी नहीं होती परंतु कह सकते है, लेकिन शाहरूख के बारे में कोई यह नहीं कहेगा कि उसे क्रमिका 3 आती है, वाम दिगन्तर वाम वृत आता है यानि किवदन्ती का आधार होता है। रविदास पर लिखने वाले प्रसिद्ध विद्वान डॉ. वेणी प्रसाद शर्मा की यह टिप्पणी महत्वपूर्ण है जो उन्होंने अपनी पुस्तक की भूमिका में लिखी है। संतों महापुरूषों का उस समय इस प्रकार का प्रचार समाज रक्षा के लिए जरूरी था मुस्लिम शासकों द्वारा अत्याचारी व जेहादों के विरूद्ध आत्मरक्षा के लिए भी जरूरी था। रविदास जी के गुरू रामानंद जी के बारे में प्रसिद्ध था कि गिरधार पर्वत पर सिद्धि करके आने पर वे श्राप देकर किसी को भी भस्म कर सकते हैं। यही कारण था उन्होंने अधोध्या में शिविर लगाकर विधर्मी बन हिन्दुओं को स्वधर्म में प्रवेश दिलाया तो कोई चूं तक नहीं कर सका। अतः कहीं अतिशियोक्ति थी भी तो वह बड़ी जरूरी थी, समाज रक्षा के लिए थी, ऐसा डॉ. वेणी प्रसाद का कहना है वैसे भी श्री गुरूग्रंथ साहब में पिछले 400 सालों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। उसमें जो लिखा है बाबा नामदेव ही मुगल बादशाह ने उन्हें मरी गाय जीवित करने को कहा तो रामकृपा से नामदेव ने लोगों को कहा चलो गाय का बछ़डा लगाओ और दूध दोह लो। पृष्ठ 1165-66
दुधहि दुहि जब मटुकी भरी, ले बादशाह के आगे धरी ।
बादशाह महल माहि आऊ, अउघट की घट लगी जाई।
काजी मुल्ला विनती फुरभाई, बखस हिन्दू मैं तेरी गाई।।22।।
(गुरू ग्रंथ साहिब पन्ना 1165-66)
भक्त कबीर जी को तीन प्रकार से मारने का यत्न किया - हाथी के नीचे कुचलवा कर, अग्नि में जलाकर और गंगा में डुबोकर। अग्नि में जलाने का वर्णन छोड़ शेष दोनों अत्याचारों के वर्णन श्री गुरूगं्रथ साहब पन्ना 871 और 1162 में है।
गंग गुसाइनि गहिर गम्भीर, जंजीर बांधकर खरे कबीर।
मनु न डिगै जनु काहै कऊ डराइ, चरन कमला चित रिउओ समाई।।
गंगा की लहरि मेरी टुटी जंजीर।। म्रिगछाला पर बैठे कबीर।।
कहि कबीर कोऊ संग न साथ।। जल थल राखन है रघुनाथ।।
(गुरूगं्रथ साहिब पन्ना 1162)
आपने वह घटना शायद कई बार सुनी होगी कि एक लड़की अपने भाई को उठाये पसीना-पसीना हुए पहाड़ पर चढ़ रही थी। किसी ने पूछा इतना भार छोटी सी लडकी ने उठा रखा है। वह बच्ची छोटी थी पर दृष्टि बड़ी थी। तुरंत उसके मुहं से निकला - भारी यह भार नहीं भाई है। नुकते के हेरफेर में उससे जुदा हुआ, नुकता बदल के रख दियाए वहीं खुदा हुआ। दृष्टिकोण, बदलता है तो दृश्य बदलता है, नजर बदलती है तो नजारे बदलते है। दबे-बुचलों में गुरूरविदास की दृष्टि रखने पर सामाजिक समरसत्ता अपने आप आ जायेगी। सामाजिक न्याय आजकल बड़ा चालू शब्द है। जितना समाज में शब्द का चलन है उतना ही सच्चाई में दुलर्भ है।
मैनें एक पुस्तक पढ़ी, एक स्वेच्छा से सामाजिक कामों के लिए सेवानिवृत्ति लेने वाले आईएस. अधिकारी की पुस्तक। उसने पांच, जीती जागती कहानिया दी है। सभी समाज के दबे-कुचले लोगों की कहानियां, अनसुनी आवाजें है - जिसे पढ़न पर बेचैनी होती है, घबराहट होती है। यह याद करके ये सच्ची है - वे शर्मिंदा होने पर मजबूर करती है। मैं थोडा संकेत कर रहा हूं। पहली कहानी एक बंधुआ की है, विलासनी नामक जनजातीय युवती की है जो भट्टे पर काम करने अपने बच्चों व पति के साथ आती है। गाड़ी का दमघौटू जीवन, जंगल की उस हिरणी का टीन की बोनी छत्तों में तपती कोठड़ी का जीवन बैचेनी तो पैदा करता है, परन्तु असली दुःखांत आगे है। अचानक उसके पति को हस्पताल ले जाते है ठेकेदार, साथ बच्चा जाता है और खबर मिलती है कि पति मर गया। लाश के पेट पर दो चीरे देखकर वह हैरान। कोई बताता है कि आजकल पेट चीर कर किडनी निकालने के लिए मजदूरों को ऐसे की फांसा जाता है। फिर मरा घोषित करते है। बच्चा कहां गया ? शायद उसने यह सब होते देखने का पाप किया था। वह गायब कर दिया गया। घटना 1999 फरवरी की है, रिपोर्ट हैदराबाद थाने में नहीं लिखी जाती। किस किस के पास वह नहीं गयी, फिर सूखी काया, अस्थिपिंजर हुए बच्चों को चिपकाए फिरती है।
दारिद देख सबको हसै, ऐसी दसा हमार। इसे देखकर हंसता भी कोई नहीं, सुनता भी कोई नहीं । गुरूरविदास की संतानों के साथ कैसा सामाजिक न्याय। आज कुल समाज का छटा हिस्सा दलित है और ज्यादातर मुसीबतें उन्हीं के गले पड़ी है। केवल दो साल 1994 से 1996 के बीच देशभर के थानों में दलितों के खिलाफ उत्पीडन के 98349 मामले दर्ज हुए। ग्रामों में दलितों किसानों का हिस्सा 23.6 प्रतिशत है। लेकिन उनमें से भी 71.8 प्रतिशत के पास केवल एक एकड़ से कम जमीन है या वे बंटाईदार है। पांच करोड़ लोग बेघर हो गये विकास के नाम पर। उजड़े, निवार्सित, बेघर लोग। जबर्दस्ती उजाडे गए लोग। इनमें किसी ने रविदास के दर्शन नहीं किए। वास्तव में बाबा रविदास ने बेगमपुरा राज की कल्पना की भविष्यवाणी की थी -
बेगमपुरा शहर को नाऊ, दुख अंदोह नहीं तिहि ठाऊ।।
ना तसवीस, खिराज न माल, खौफ न खता, न तरस जवाल।।
अब हम खूब वतन-गह पाई, ऊहां खैर सदा मेरे भाई।
काइम-दाइम सदा पातिशाही, दोम न सेम एक सो आही।
आबादाना सदा मशहूर, ऊहां गनि बसे मामूर।।
तिऊ तिऊ सैल करहि जिऊ भावै महरम महल न को अटकावै।
कह रैदास - खलास चमारा, जो हम शहरी सो मीतु हमारा।।
(श्री गुरूग्रंथ साहिब पन्ना 345)
नागर जनां मेरी जाति विख्यात चमारं, हृदय राम गोविन्द गुण सारं।
सुरसरि जल कृत वारूनि रे, संतजन नहीं करत पानं।।
सुरा अपवित्र गंगा जल आनिय, सुरसरि मिल होय न भानं।
तडतारी अपवित्र कर भाविसे - जैसे कागरा करत दिखारं।।
भमति भागवत लिखिये, तिहं ऊपर, तब पूजिये करि नमस्कारं।
अनेक अधम जीव नाम गुन उधरे, पतित-पावन भये परसि सारं।।
‘भने रैदास’ ररंकार गुनवती, संत-साधु भये सहज पारं।।
(श्री गुरूग्रंथ साहिब पन्ना 1293)
सरदार भगत सिंह ने अपने जीवन के अंतिम दिन जेल सुपरिडेंट द्वारा अंतिम इच्छा पूछने पर बड़ी ही विचित्र मनोइच्छा बताई। उन्होंने अपनी बेबे (माता) द्वारा बनी हुई रोटी खाने की इच्छा प्रकट की। समय कम था और जेल से बाहर फांसी के समय की जानकारी भी नहीं देनी थी अतः अधीक्षक ने असमर्थता दिखाई। ऐसे में भगत सिंह ने स्पष्ट की उनकी इच्छी जन्म देने वाली माता नहीं अपितु तो जेल में पालन पोषण करने वाली और शौच साफ करने वाली माता द्वारा रोटी खाने की इच्छा प्रकट की। उसका इशारा जेल के जमादार श्री तेलूराम की ओर था। और वह भावुक क्षण जब भगतसिंह फांसी लगने से पहले उस सफाई कर्मचारी के हाथों बना खाना खुशी-खुशी खा रहे थे, यह एक संकेत था कि आजादी आने के बाद छुआछुत बिल्कुल नहीं रहेगी और कोई छोटा-बड़ा नहीं होगा। श्री रविदास का जन्मदिन सारा समाज मनाएगा और हर घर में महापुरूषों के चित्रों के साथ गुरू रविदास का चित्र भी सुशोभित होगा। श्री गुरूजी जन्मशताब्दी का सारतत्त्व भी यहीं था, समाजिक समरसत्ता यानि हिन्दवः सौदरा सर्वे।
जिव्हा से औकांर जप
हत्थन से कर कार
राम मिलंहि घर आईके
कह रविदास विचार
रविदास जनम के कारने
होत ने कोई नीच
कर को नीच कर डारि है
औछे करम की कीच
कश्मीरी लाल, मोबाईल - 9868271424, ईमेल - kashmirilalkamail@gmail.com

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