Wednesday, July 1, 2026

पूर्णकालिक कार्यकर्ता - एक संकल्पना*

*पूर्णकालिक कार्यकर्ता - एक संकल्पना*

*प्रस्तावना*

स्वदेशी जागरण मंच में कार्य की तीव्र वृद्धि को देखते हुए पूरा समय देने वाले समर्पित कार्यकर्ताओं की आवश्यकता अनुभव होती है। इस आवश्यकता के समाधान को मूर्तरुप देने हेतु स्वर्णिम भारतवर्ष फाउंडेशन के अंतर्गत ‘पूर्णकालिक कार्यकर्ता योजना’ की प्रक्रिया वर्ष 2020-21 से ही प्रारंभ हुई है। वर्तमान में भारत में लगभग 250 ऐसे कार्यकर्ता स्वदेशी-स्वावलंबन का कार्य कर रहे हैं।

किंतु यह बड़ा प्रश्न है कि यह कार्यकर्ता कैसा है? कैसा होना चाहिए? उसकी संकल्पना क्या है? उसके कार्य क्या-क्या है? उसके मानदेय (अर्थ पूर्ति) के स्रोत क्या है? उसके अंदर किस प्रकार के गुण व्यवहार होना आवश्यक है? उसका प्रशिक्षण किस प्रकार का हो? वह अपने जिले को ही अपना देश मान कर मेरा जिला मेरा देश योजना को कैसे क्रियान्वित करता है, या कर सकता है? इस सारे पर इस लघु पुस्तिका में विस्तार से चर्चा की गई है।

यह सामग्री न केवल स्वर्णिम भारतवर्ष फाउंडेशन के अंतर्गत स्वदेशी व स्वावलंबन के कार्य में लगे कार्यकर्ताओं को उपयोगी होगी बल्कि स्वदेशी जागरण मंच और उसके बाहर के भी स्वदेशी प्रेमी संगठनों तथा अन्य स्वयंसेवी संगठनों को अपने यहाँ कार्यरत पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं की स्पष्ट संकल्पना देगी। इसके अतिरिक्त उनके प्रशिक्षण का भी नक्शा, इसमें से तैयार होगा। पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं का भावनात्मक स्तर क्या हो, प्रेरणा स्त्रोत क्या हो, ऐसे कार्यकर्ताओं के प्राप्ति केंद्र क्या हो, आदि विषय सामग्री हेतु सभी स्वदेशी, राष्ट्र कार्य में समर्पित कार्यकर्ताओं के लिए यह लघु पुस्तिका उपयोगी होगी, ऐसा विश्वास है।

*हमारी प्रेरणा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रचारक पद्धति*

स्वदेशी जागरण मंच, क्योंकि संघ विचार परिवार का ही संगठन है, इसलिए इसके सब कार्यकर्ताओं का मूल प्रेरणा स्रोत स्वाभाविक रूप से संघ ही है।

संघ में राष्ट्रकार्य को समर्पित स्वयंसेवकों के अतिरिक्त वहां बड़ी संख्या में प्रचारक कार्यकर्ता रहते हैं। यह प्रचारक कार्यकर्ता पूर्णतया समर्पित, जहां संगठन कहे वहां जाना, जिस संगठन में कहे, उस संगठन में कार्य करना, ऐसी एक उज्ज्वल परंपरा संघ में गत 100 वर्षों से चल रही है। यह उत्तम प्रचारक परंपरा ही हमारी इस योजना का प्रेरणा का स्रोत है।

ऐसे पूर्ण समर्पित व प्रशिक्षित पूर्णकालिक प्रचारक सभी संगठनों को मिलें, यह सबकी इच्छा रहती है। किंतु यह तो संभव नहीं है, क्योंकि नए प्रचारक कार्यकर्ताओं की एक सीमा रहती है। इसलिए स्वदेशी जागरण मंच ने कुछ मात्रा में उसकी पूर्ति की आवश्यकता को इस योजना से पूरा करने का प्रयास किया है। यद्यपि इसमें कुछ आर्थिक प्रक्रिया को भी समाहित किया गया है। 

*पूर्णकालिक कार्यकर्ता: परिभाषा*

इस विचार को गहन चर्चा के बाद “पूर्णकालिक कार्यकर्ता योजना” की प्रक्रिया के रूप में क्रियान्वित किया है। जैसे कि पूर्व में भी कहा है कि पूर्णकालिक कार्यकर्ता का प्रेरणा स्रोत तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके प्रचारक ही हैं, यद्यपि स्वदेशी पूर्णकालिक परिवार वाले भी हैं और इसलिए उनके मानदेय (आर्थिक सहयोग) की व्यवस्था भी संगठन द्वारा की जाती है। हां! अनेक कार्यकर्ता बिना मानदेय के पूर्ण समर्पित विस्तारक (संगठक) श्रेणी के भी रहते ही हैं। ऐसे दो प्रकार के कार्यकर्ता पूर्णकालिक कार्यकर्ता और विस्तारक (संगठक) कार्यकर्ता, दोनों की काफी बातें सामान ही है। थोड़ा तकनीकी ही अंतर है। अन्यथा भावना, कार्य प्रशिक्षण, कार्य निष्पादन, यह सब तो एक जैसा ही होता है। इसलिए यहां पर इसको एक ही शब्द ‘पूर्णकालिक कार्यकर्ता’ की श्रेणी में रखकर समग्र विचार किया गया है।

*भावनात्मक स्तर आवश्यक*

सबसे पहली बात, कोई भी युवक जब स्वदेशी का पूर्णकालिक बनने को तैयार होता है तो यह देखना आवश्यक है कि उसका भावनात्मक स्तर कैसा है। उसके मन में देश समाज का कार्य करने की प्रबल इच्छा है क्या? वह स्वदेशी को, स्वलंबन को अपने जीवन में उतार कर दूसरों को भी, उसके बारे में प्रेरित और प्रशिक्षित करने की गहरी इच्छा रखता है क्या?

पूर्णकालिक कार्यकर्ता के मन में भारत को पूर्णरोजगारयुक्त, गरीबी मुक्त, समृद्ध और महान भारत बनाने का एक दिव्य स्वप्न होना, पहली अपेक्षा है। वह उसके प्रति ही समर्पित भाव रखकर पूर्णकालिक कार्यकर्ता बनने का निश्चय करता है। उसको या उसके परिवार को मिलने वाला आर्थिक सहयोग (मानदेय) यह विशेष महत्व का नहीं, यद्यपि उसकी आवश्यकता होती है। किन्तु उसके पूर्णकालिक बनने का विचार केवल उसी भावना पर ही टिका है... “तेरा वैभव अमर रहे मां, हम दिन 4 रहे न रहे..”

वैचारिक स्पष्टता चाहिएः पूर्णकालिक कार्यकर्ता के मन में अपने जिले के, देश के बेरोजगारों को देखकर दर्द उठता है कि क्या मैं भारत को बेरोजगारी की इस महामारी से मुक्त कराने में कुछ गिलहरी सहयोग कर सकता हूँ? क्या मैं भारत को पूर्ण रोजगार युक्त करने वाले इस महायज्ञ में अपनी भी कुछ आहुतियाँ डालना चाहता हूँ? क्या स्वदेशी के विचार को,स्वदेशी व्यवहार को घर घर तक पहुंचाने में अपना तन मन लगा सकता हूँ? यही विचार उसके मन मस्तिष्क में हर समय घूमते रहते हैं। “हर घर स्वदेशी, हर युवा उद्यमी के महामंत्र को अपने जिले के एक एक घर और एक एक युवक तक पहुंचाने के लिए वह समर्पित भाव से लगा रहता है। ”मेरा जिला मेरा देश“ इस विचार को मानकर अपने जिले में सब प्रकार के रोजगार सृजन, उद्यमिता, स्वरोजगार की योजनाएं और स्वदेशी का प्रबल भाव जागरण भरपूर हो, इसके लिये वह दिन रात चिंतन करता है। और संगठन से मिली हुई योजनाओं के आलोक में स्वयं होकर दिन रात जुटने की सोच में रहता है, जुटता है। ऐसा ही योग्य कार्यकर्ता पूर्णकालिक कार्यकर्ता कहलाता है।

*कार्यकर्ता प्राप्ति केंद्र, शिक्षा स्तर व अन्य आवश्यकताएं!*

सबसे पहला विषय तो यही आता है कि ऐसे समर्पित कार्यकर्ता कहाँ से मिलते हैं? स्वाभाविक रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनेक स्वयंसेवक, पूर्व में विस्तारक प्रचारक का अनुभव लिये हुए कार्यकर्ता मिल जाते हैं, वे स्वदेशी स्वलंबन के विचार को न केवल जल्दी से समझ जाते हैं बल्कि प्रारंभिक रूप से उनकी शिक्षा दीक्षा इन्ही संस्कारों में ही हुई होती है। इसी प्रकार विद्यार्थी परिषद, युवा मोर्चा व अन्य विचार परिवार के संगठनो से भी इस प्रकार के कार्यकर्ता सम्पर्क करने पर मिल जाते है। स्वदेशी जागरण मंच के और स्वालंबी भारत अभियान के अपने तंत्र से तो आते ही आते हैं। लेकिन समाज जीवन में भी अनेक कार्यकर्ता ऐसे रहते हैं जिनके मन में देशभक्ति, स्वदेश प्रेम और समाज के लिए कुछ कर गुजरने की इच्छा शक्ति रहती है उन्हें चिह्नित करना होता है।

अपने यहाँ अनेक प्रकार के प्रयोग हुए हैं। कई महाविद्यालय, विश्वविद्यालय के अध्यापकों ने ऐसे योग्य छात्रों को इसके लिए प्रेरित किया है तो वहीं सोशल मीडिया में आवश्यकता देने से अनेक युवक मिल जाते हैं, सब प्रकार के प्रयास करना चाहिए। बस एक ही मापदंड होना चाहिए कि वह सुशिक्षित तो हो लेकिन उसने मन में समाज के काम करने की भावना आवश्यक होनी चाहिए कोई कर्मचारी भाव या आर्थिक लालच में न आए।

कुछ मात्रा में प्रारंभ में अर्थिक आवश्यकता हेतु भी आते हैं,फिर भी हम उन्हें योग्य समर्पित कार्यकर्ता बदलने की अपनी प्रक्रिया से समृद्ध कर लेते हैं।

*माननीय मदनदास दैवी जी का मार्गदर्शन*

स्वदेशी जागरण मंच के सह-संयोजक और मार्गदर्शक रहे स्वर्गीय माननीय मदन दास जी देवी जी कहा करते थे, ”।बबमचज ंे पज पे इनज उंाम ंे लवन ूंदज“.हमें भी ऐसे सब प्रकार के युवक-युवतियों को संपर्क करके अपने संगठन में लाना और अपने प्रयास से प्रशिक्षण, संगठन कौशल और कार्यपद्धति का उपयोग कर एक योग्य समर्पित कार्यकर्ता के रूप में तैयार करना चाहिए, करना होता है। यह अपनी कार्यपद्धति है।

सामान्यता वे स्नातक अवश्य हों परासनातक हो तो और भी अच्छा। इकोनॉमिक्स, पॉलिटिकल साइंस या एमएसडब्ल्यू जैसे विषयों के पोस्ट ग्रेजुएट थोड़ा जल्दी से अपने विषयों को पकड़ लेते हैं। फिर यदि उन्हें कुछ सामाजिक कार्य का अनुभव हो और सोच व दृष्टि भी वैसी हो तो स्नातक से कम भी रहा तो भी चल सकता है।

सामान्यतया इस कार्य के लिए युवा काफी उपयुक्त रहते हैं यद्यपि बड़ी उम्र में वरिष्ठ नागरिक कार्यकर्ता भी पूर्णकालिक कार्यकर्ता के रूप में सफलतापूर्वक कार्य कर रहे हैं। एक बार फिर से आवश्यक मापदण्ड में, सात्विक भावना और प्रबल इच्छा शक्ति है कि इस देश को स्वदेशी और स्वावलंबन के मार्ग पर तेजी से आगे बढ़ाना है, वही वास्तव में उसकी अनिवार्य आवश्यकता है। बाकी सभी चीजें दूसरे स्थान पर आती है। अनेक स्तर पर योग्य युवतियां भी इस योजना में कार्यरत हैं।

*प्रशिक्षण व योग्यता क्षमता विकास*

कोई भी कार्यकर्ता घर से इस प्रकार के कार्य के लिए प्रशिक्षित होकर नहीं आता। उसे हमें प्रशिक्षित करना होता है। इसके लिए ऐसे नए बंधुओं/भगनियों हेतु को अनौपचारिक, औपचारिक शिक्षण की लम्बी प्रक्रिया चलानी होती है।

पहला प्रशिक्षण तो प्रत्यक्ष अपने क्षेत्र में ही होता है। इसके लिए सबसे पहले अपने पूर्णकालिक कार्यकर्ता हेतु एक पालक कार्यकर्ता का होना आवश्यक है जो उस जिले या प्रान्त का कोई प्रमुख कार्यकर्ता हो।

उसके साथ चर्चा, दैनिक अभ्यास, जिसमें विद्यालय, महाविद्यालयों में संपर्क, वहां जाकर स्वदेशी और स्वावलंबन के बारे में बताना, भाषण करना, प्रशिक्षण देना, वहां पर स्वावलंबन केन्द्र बनवाने का आग्रह करना शामिल है। फिर पहले से चल रहे वहां कौशल विकास केंद्र, अटल टिंकरिंग लैब या उद्यमिता सेन्टर, एम्प्लॉयमेंट सेल आदि का अध्ययन करना, चर्चा करना प्रशिक्षण का हिस्सा होता है। इसके अलावा भी अपने वरिष्ठ और सहयोगी कार्यकर्ताओं के साथ चर्चा करके, स्वदेशी और स्वावलंबन के विषय को समझना चाहिए।

वह जब प्रत्यक्ष स्थान स्थान पर जाता है,बोलता है तो उसका प्रशिक्षण सबसे अधिक गति से होता है। अनौपचारिक चर्चा और वरिष्ठ कार्यकर्ताओं से संवाद और व्यवहार से भी यह कार्यकर्ता सीखने लगता है।

इसके अतिरिक्त प्रत्येक प्रांत को अपने यहाँ पर एक मास से लेकर दो मास के बीच में इन कार्यकर्ताओं का दो दिवसीय प्रशिक्षण वर्ग की प्रक्रिया चलाते रहना चाहिए। ताकि बैठकें, कार्यक्रम व प्रशिक्षण एक साथ चलता रहे।

केन्द्र स्तर पर भी वर्ष में एक बार कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाती है। किन्तु सबसे प्रमुख प्रशिक्षण तो अपने प्रांत और क्षेत्र में ही होता है।

*शिक्षण-प्रशिक्षण के विषय* 

शिक्षण के विषयों में स्वदेशी पर बहुत अच्छा वक्ता होना, प्रवक्ता होना चाहिए. अपने जिले, अपने प्रांत के आंकड़े जुटाना, उसके अनुसार बोलना, बीच-बीच में उदाहरण देना, इसका भी अभ्यास करना होता है।

जन अभियान के लिए अनिवार्य शर्त होती है - अच्छे प्रबल प्रवक्ता। उदाहरण के तौर पर राम जन्म भूमि आंदोलन को फैलाने में जिन 2-3 बड़े संतों का योगदान रहा, वे हैं दीदी रितम्बरा, साध्वी उमा भारती, आचार्य धर्मेन्द्र.. वे बहुत ही प्रबल प्रवक्ता रहे। उनको सुनने के लिए हजारों लोग स्वयं  पहुंच जाते थे जिससे जन अभियान को नीचे तक पहुँचाने में, जन आंदोलन बनाने में बहुत सुविधा हुई। उस अभियान में ऐसे सैकड़ों प्रबल प्रवक्ता लगे थे।

हमें भी अगर स्वदेशी को एक जन अभियान बनाना है तो हमारे पूर्णकालिकों को, अन्य कार्यकर्ताओं को भी स्वदेशी पर बहुत अच्छा वक्ता और प्रवक्ता बनना चाहिए। फिर स्वदेशी की समग्र अवधारणा को समझाना, आर्थिक शब्दावली से लेकर विभिन्न आर्थिक विषयों, जैसे- एफडीआई, व्यापार समझौते, एफटीए आदि का हमारे देश को लाभ-हानि आदि पर गहन अध्ययन करना होता है। स्वदेशी की विकास यात्रा से लेकर भविष्य उन्मुखी युगानुकूल स्वदेशी का भी गहन अध्ययन आवश्यक है। स्वदेशी के विभिन्न क्षेत्रों में बढ़ते आयाम, स्वदेशी-विदेशी की सूची से लेकर, विकास के भारतीय प्रतिमान तक अध्ययन, चिंतन, क्रिया करनी होगी।

*प्रशिक्षण के दूसरे विषय में है स्वावलंबन*

क्योंकि हमारा बेरोजगारी दूर करने और पूर्ण रोजगार युक्त भारत बनाने का मंत्र ही है कि ”मुझे नौकरी लेने वाला नहीं, देने वाला बनना है।“ वैसे भी नौकरियां तो 10-12 प्रतिशत से ऊपर होती ही नहीं। इसलिए स्वरोज़गार और उद्यमिता की तरफ देश के समस्त युवाओं को मोड़ना है।

यह पहली दृष्टि में उन्हें कठिन लगता है किन्तु हमने जो स्वरोजगार और उद्यमिता का, जैविक उद्यमिता का सिद्धान्त निकाला है, जिस पर प्रोफेसर राजकुमार मित्तल जी की पुस्तक श्जैविक उद्यमिताः 37 करोड़ स्टार्टअप्स का देशश् पुस्तक भी है उसका गहन अध्ययन व अभ्यास करने से हमारे पूर्णकालिक बहुत अच्छे प्रशिक्षित होंगे। उस पुस्तक में 25 सफल गाथाओं सहित, ऐसे सिद्धांत दिए हैं जिससे सामान्य गाँव शहर का व्यक्ति 18..20 साल की उम्र में बिना कोई बहुत बड़ी राशि या संसाधनों के भी अच्छा स्वरोजगार और उद्यमिता में आगे बढ़ सकता है। वह पुस्तक अपने आप में उद्यमिता का एक बड़ा प्रशिक्षण ग्रंथ हैं।

*तत्काल समाधान*

जैविक उद्यमिता के 5 सिद्धांतों को लेकर जब अपने कार्यकर्ता विद्यालय, महाविद्यालय या युवाओं के समूह में जाएंगे तो स्वाभाविक रूप से वे आकर्षित होंगे और अपने अभियान से जुड़ सकेंगे। फिर आपस में चर्चा करवाना, स्वदेशी के विषय विशेषज्ञों को, अपने पूर्णकालिकों के साथ समय समय पर चर्चा करना करवाना यह भी प्रशिक्षण का ही हिस्सा है। उद्यमिता, स्टार्ट-अप्स पर विभिन्न प्रकार की कार्यशालाएं, गट चर्चा, सरकारी योजनाओं की जानकारी एकत्र, करना कैसे, यह भी प्रशिक्षण लेना होगा।

*प्रतिदिन के कार्य और प्रवास*

जिला प्रशिक्षकों एवं पूर्णकालिक को सबसे बड़ी बात समझनी होती है कि वह प्रतिदिन 8-10 घंटे किस प्रकार स्वदेशी व स्वावलंबन का कार्य करें।

मुख्यतः दिन के दो भाग करने होते हैं। एक में किसी विद्यालय, महाविद्यालय में जाना, वहां पर विषय रखना और फिर वहां के प्रतिष्ठित व्यक्तियों, सफल उद्यमियों, सरकारी अधिकारियों, संघ व विचार परिवार के प्रमुख कार्यकर्ताओं से संपर्क संबंध बनाना शामिल है।

दूसरे भाग में स्वावलंबन केंद्र पर बैठकर,सोशल मीडिया व अन्य मीडिया प्रचार तंत्र का अधिकतम उपयोग करना चाहिए। कैसे नए वीडियो, नए पोस्टर बनाए जाते हैं, इसका प्रशिक्षण प्राप्त करना। आवश्यकता पडऩे पर केंद्र से आए हुए समाचारों, वीडियो, पोस्टर का उपयोग करना अपने व्हाट्सऐप ग्रुप बनाना और सब प्रकार का प्रचार प्रसार करना।

फिर 2-3 घंटे जिला स्वावलंबन केंद्र में बैठकर कार्यकर्ताओं से बातचीत, साप्ताहिक,पाक्षिक या मासिक बैठकों का आयोजन करना। तरंग बैठकों का आयोजन, युवाओं को वहां बुलाना आदि भी कार्य हैं।

प्रतिदिन सुबह निश्चय ही हम किसी न किसी विद्यालय महाविद्यालय या जहां भी युवक युवती उपलब्ध हैं वहां जाकर स्वदेशी विषय को प्रखरता से रखना। और रोजगार का विषय, स्वरोजगार उद्यमिता का महत्व और प्रशिक्षण करना यह प्रत्येक पूर्णकालिक का प्रथम कार्य है।

उन विद्यालयों में उद्यमिता स्वावलंबन केंद्र खड़े करना, पहले से वहां पर यदि कौशल विकास के कोई उपक्रम है,तो उन्हें अध्ययन करना, प्रधानाचार्य या मैनेजमेंट को वहां स्वावलमन केंद्र खोलने के लिए प्रोत्साहित करना, यह प्रतिदिन 2-3 घंटे का काम है।

फिर वहां के पुराने कार्यकर्ताओं से विद्यालय के प्रधानाचार्य या प्रबंध समिति को पहले फ़ोन करवाकर जाना काफी उपयोगी रहता है और जब जाएं तो सहज एक कक्षा में विषय रखने का आग्रह करना। वहां के किसी अध्यापक को स्वदेशी स्वावलंबन प्रमुख बनवाने का भी प्रयास करना चाहिए। ध्यान रखना चाहिए कि हम विद्यालय में इन विषयों को प्रोत्साहित और सहयोग करने के लिए गए हैं। वहां पर निरीक्षण करने या उन्हें समझाने,भाषण देने नहीं। विशेष कर वरिष्ठ अध्यापक, प्रधानाचार्य आदि को समझाने की जगह सहज चर्चा करना अधिक उपयोगी रहता है।

*प्रवास*

प्रत्येक कार्यकर्ता, चाहे जिला, विभाग अथवा प्रान्त.. क्षेत्र का हो, उसकी सबसे बड़ी आवश्यकता होती है कि वह सतत प्रवास करे। जिला केंद्र पर कार्य होने के बाद खंडों में और छोटे नगरों में व्यापक प्रवास सबको करना चाहिए। यहां तक कि उपनगरों में और गाँव बस्तियों तक में भी प्रवास करना संगठन की आवश्यकता है।

अगर ग्रामीण क्षेत्र है तो 5-6 बंधुओं की स्वदेशी पंचायत बनायंे और यदि नगरीय क्षेत्र है तो 5-6 बंधुओं की स्वदेशी टीम बनाएं। ताकि वे आगे भी इस कार्य को करते रहें। इससे संगठन तंत्र का निर्माण होता है। प्रवास में जाते हुए कुछ पत्रक, पुस्तिकाएं साथ लेकर जाना उपयोगी है। कुछ सोशल मीडिया का कंटेंट, उनसे मित्रतावत बातचीत और जिला स्वावलंबन केंद्र का उपयोग उन्हें बताकर आना चाहिए।

वास्तव में स्वावलंबन केंद्र,स्वदेशी स्वावलंबन,और उससे जुड़ी हुई सब गतिविधियों का एक जिला कार्यालय भी   होता है।उसको सक्रिय रखना, वहां पर कार्यकर्ताओं का आना जाना, बैठकें करना अपेक्षित है। अपना यह केंद्र कार्यक्रमों का, रचनाओं का, केंद्र होना, यह स्वाभाविक रूप से होना चाहिए। और पूर्णकालिक यदि प्रतिदिन वहां 2-3 घंटे बैठेंगे तभी यह नियमित व सक्रिय रहेगा।

प्रवास तो किसी भी संगठन का प्राण होता है। प्रांतीय कार्यकर्ताओं को अनेक को हम जानते हैं जो 18-20 दिन का भी प्रवास करते हैं। जिले वालों ने भी सप्ताह में 3 दिन कम से कम प्रवास पर जरूर जाना चाहिए।

वहाँ इकाइयाँ स्थापित करना, कार्यकर्ताओं से सम्बन्ध बनाना, बढ़ाना आगामी कार्यक्रमों की चर्चा करना, आदि। धीरे-धीरे व सहज रूप से अपने कार्यक्रम स्वयं करने लग जाएं। ऐसी वहां की स्वावलंबी टीम विकसित करना।जिले भर में फ़ोन इत्यादि से हमारा नियमित व सहज संवाद बना रहना चाहिए।

*जिला स्वावलंबन केंद्र*

पंडित दीनदयाल उपाध्याय कहा करते थे कि भारत की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए दो ही शब्दों का प्रयोग करना हो तो वे हैं स्वदेशी और विकेन्द्रीकरण। वास्तव में इस विकेन्द्रीकरण का व्यवहारिक अर्थ है - जिला केंद्रित होना। वैसे अब सरकारें भी इसको मान्य करने लगी हैं और हर जिले की जीडीपी की मैपिंग करवाई जा रही है। हमें भी ज़िला को ही सब प्रकार के रोजगार व अर्थ सृजन कि गतिविधियों का केंद्र बनाना है। उसके लिए एक कार्यालय की आवश्यकता होती है, उसे ही हम जिला स्वावलंबन केंद्र कहते हैं। यह किसी भी अपने संगठनों के भवन, सरकारी  महाविद्यालय,सरकार के उद्यमिता केंद्र में  हम शुरू कर सकते हैं। जहां पर कार्यकर्ताओं को सामान्य जन को आने जाने में सहज सुविधा हो, पार्किंग की व्यवस्था हो, वहां पर बैठने की सामान्य व्यवस्थाएं हों, पीने का पानी लघु शंका इत्यादि का भी साफ सुथरा स्थान हो। सब प्रकार का साहित्य, कंप्यूटर अलमारी आदि वहां पर उपलब्ध रहे। जिले के बारे में सब प्रकार की जानकारियां भी वहां पर उपलब्ध रहें। धीरे-धीरे करके वहां उद्यमियों का, युवाओं का, यहां तक कि सरकारी अधिकारियों के भी आवागमन व सक्रियता का केंद्र रहे। यदि वहां कोई कौशल विकास केंद्र या उद्यमिता केंद्र भी बन जाता है तो अच्छा है। परंतु अनिवार्य शर्त है कि वह प्रति दिन 3-4 घंटे के लिए खुलना चाहिए। टीम-11 के कार्यकर्ता वहां नियमित आते-जाते हैं। जिला स्वावलंबन केंद्र, हर जिला केंद्र पर होना यह बहुत आवश्यक और उपयोगी है।

*कुशल संघटक*

अपना पूर्णकालिक कार्यकर्ता, नए व्यक्तियों को संपर्क करने में उनको स्वदेशी व स्वावलंबी भारत अभियान के साथ सक्रिय रूप से जोड़ने में कुशल रहता है।

वह सब प्रकार के योग्य कार्यकर्ताओं को, लोगों को, समाज जीवन में से संपर्क करके अपने विनम्र और प्रेम पूर्ण व्यवहार के माध्यम से, उनको भी इस देश कार्य, याने स्वदेशी कार्य में लगा लेता है। 

वह सब प्रकार की योजनाएं जो कार्य वृद्धि के लिए आवश्यक हों वह करने में कुशल रहता है।

वह बैठकें, कार्यक्रम, वर्ग आदि करने में निपुण है। थोड़े संसाधनों और छोटी टीम से भी चरणबद्ध तरीके से अच्छे परिणाम लाए जा सकते हैं। इसके अनेक उदाहरण उपलब्ध है। अभी दो महीने पहले ही छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में जहां पहले नक्सलवादियों का आतंक रहता था, वहां अब परिस्थिति अनुकूल होने पर अपने कार्यकर्ताओं ने वहाँ के विश्वविद्यालय के साथ मिलकर दो ही दिन में 1500 से अधिक युवाओं को, उद्यमिता में, प्रोत्साहित और प्रशिक्षित किया। इसमें अपने पूर्णकालिकों की प्रमुख भूमिका रही।

*निधि संग्रह कुशलताः एक आवश्यक अंग*

पूर्णकालिक कार्यकर्ता सब प्रकार के कार्यों के लिए आवश्यक, निधि संग्रह भी कर लेता है। उसकी योजना बना लेता है।

अनेक कार्यकर्ताओं को पैसा मांगने में बहुत संकोच रहता है। शर्म लगती है, वे हिम्मत ही नहीं कर पाते, किसी से 500 रूपये मांगने में भी। 

किंतु अपने पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं को ध्यान रखना होगा कि अपने लिए मांगना तो उचित नहीं है किंतु समाज कार्य के लिये, देश कार्य के लिए, स्वदेशी अभियान के लिए, स्वदेशी स्वावलंबन के कार्यक्रमों के लिए समाज से मांगना, यह बिल्कुल भी संकोच का विषय नहीं होना चाहिए। समाज का काम करने के लिए समाज से मांगना सर्वथा उचित है। वैसे कबीर जी ने कहा है ”मर जाऊँ मांगू नहीं अपने तन के काज, परमारथ के कारने मोहे ना आवत लाज“।

परमार्थ के लिए यानी दूसरों के लिए, समाज के लिए मांगने में किसी प्रकार का संकोच, शर्म नहीं करना चाहिए। हाँ यह बात अलग है,कि कभी अकेले मांगने नहीं जाना। जब भी जाएं, दो, तीन या चार लोगों को एक साथ जाना चाहिए। तो वह उत्तम रहता है. उससे राशि तो अधिक मिलती ही है। यह विश्वसनीयता पारदर्शिता और आर्थिक शुचिता के लिए भी आवश्यक रहता है।

मार्च-अप्रैल में होने वाले नियमित निधि संग्रह अभियान के अतिरिक्त भी व डिजिटल मोड से उलेइंण्बवण्पद का उपयोग करते हुए, कभी भोजन के नाम पर, कभी कार्यक्रम के नाम पर वह समाज जीवन में से पैसा जुटाने में सफल रहता है। यहाँ पंडित मदन मोहन मालवीय जी के नाम भी स्मरण करना भी उपयोगी होगा कि कैसे उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय निर्माण किया। उस समय आज की तरह फ़ोन आदि संसाधन नहीं थे तब भी समाज से ही संपर्क करके करोड़ों रुपये इकट्ठा किया और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना की। हम पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं को भी ऐसे ही समाज जीवन में से निधि संग्रह का आग्रह करना, संग्रह करना यह अपेक्षा है। हां, इसमें आर्थिक स्वच्छता और परिपक्वता का ध्यान रखना। जैसे पहले भी कहा है कि कभी भी अकेले निजी संग्रह की बात नहीं करना। नकद राशि लेने से हरदम बचना। अभी डिजिटल मोड का समय है। उसका उपयोग कर पारदर्शी तरीके से निधि संग्रह अभियान को हम प्रतिवर्ष करने का अपना बहुत सफल प्रयोग चल ही रहा है।

*मेरा जिला, मेरा देश*

जैसा कि पहले भी विषय आया है कि हम विकेन्द्रीकरण के विचार के तहत, ज़िला केन्द्रित सब प्रकार की योजनाएं करें। इसी संदर्भ में एक समग्र विचार योजना है - ‘मेरा जिला, मेरा देश’। 

संघ के सरकार्यवाह हुए माननीय हो.वे. शेषाद्री जी, एक बार जब उनसे चर्चा हुई, तो उन्होंने कहा ”थवत ंसस चतंबजपबंस चनतचवेमेए उल  भ्पदकन त्ंेीजत पे उल ांतलोीमजतं“

अर्थात सब प्रकार के प्रयोग करने के लिए मेरा कार्यक्षेत्र ही मेरा राष्ट्र(देश)है। उसी विचार पर आगे बढ़ते हुए हम कह सकते हैं कि मेरा जिला ही मेरा देश है। और मैं इस देश (जिला) की आर्थिक व रोजगार की रचनाएं करने वाला, सचिव  कार्यकर्ता।

मुझे इस दृष्टि से अपने मन मस्तिष्क को न केवल पूरी तरह तैयार करना होगा बल्कि मुझे इसकी बड़ी कल्पनाएं भी संजोनी होंगे। आए हुए कार्यक्रमों को क्रियान्वयन करना यह एक बात है किन्तु स्वयं से कार्यक्रम की योजना करना, रचना करना उसके लिये आवश्यक कल्पना संजोना, यह बड़ी प्रमुख बात है। हम क्या अपने जिले को पूर्ण रोजगारयुक्त, समृद्धियुक्त जिला बना सकते हैं? सोचें! 

लक्ष्य वही वाला है - पूर्ण रोजगार युक्त और समृद्धि युक्त भारत और इस योजना में मेरा भारत, मेरा जिला ही है। इसलिए प्रत्येक पूर्णकालिक कार्यकर्ता को अपने जिले की टीम के साथ इस विषय पर गहराई से विचार मंथन करना होगा। और, क्या क्या हम योजनाएं तुरंत कर सकते हैं? केंद्र के दिशा निर्देश व मार्गदर्शन में।

*जिले का गहन अध्ययन करना*

हमारे जिले की आबादी कितनी है? युवा आबादी कितनी है? शिक्षण संस्थान कैसे है? छोटे बड़े उद्योग कैसे है? कृषि में क्या क्या विशेष है? जिले से पलायन होता है क्या? जिले की अन्य ऐसी सामाजिक, शैक्षिण, आर्थिक या राजनैतिक परिस्थिति, जो वहां के आर्थिक उठाव में रोड़ा बन रही है? इन सबका, सब प्रकार से अध्ययन करना चाहिए। फिर यह अपने जिले की टोली के साथ मिलकर एक अच्छा बड़ा प्रकल्प,योजना करने का विचार करें। परामर्श सबसे करना। उस जिले में कोई अच्छे अर्थशास्त्री भी रहते होंगे, कोई सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी भी रहते होंगे या अन्य जो सफल उद्यमी हैं अर्थ और रोजगार सृजन करना जानते हैं,इसमें रुचि है। ऐसे सब प्रकार के लोगों की एक वहां समिति बनाकर प्रत्येक जिले को हम, पूर्ण रोजगार युक्त व समृद्धि युक्त बनाने के लिए सब प्रकार के प्रयत्न करेंगे, एसा निश्चय करें। जिला स्वावलंबन केंद्र इस सबका स्वाभाविक केन्द्र बिन्दु बनेगा।

ऐसे सब प्रकार के लोगों के साथ चर्चा विमर्श करके, फिर नियमित रूप से बैठकें इत्यादि करके, निर्णय करने होंगे और क्षेत्र में उस प्रकार के परिवर्तन आये। सब प्रकार के स्वदेशी स्वावलंबन को,उद्यमिता के प्रयोगों को भी हम प्रारंभ करें।

फिर संगठनात्मक कार्यक्रमों का भी ध्यान रखें। उन्हें पूरी तरह से व प्रभावी तरीके से वहां पर लागू करना होगा।

*सरकार की योजनाएंः कितना उपयोग?*

एक बड़ा विषय रहेगा। क्या हमें सरकारी योजनाओं में पड़ना? यहां एक बात को स्पष्ट रखें, की सरकारी योजनाओं में जाना और राजनीतिक प्रक्रिया में जाना ये दोनों अलग-अलग बातें हैं। राजनीति में कभी नहीं जाना, पर सरकारी योजनाओं की पूरी जानकारी लेना। उनको सहयोग देना और सहयोग लेना। यह दोनों करना। क्योंकि यह सच है कि सरकारी योजनाएं होती तो बहुत अच्छी हैं किन्तु वे जमीन पर नहीं उतर पाती और हमारे पास उतने संसाधन नहीं होते। इसलिए यदि स्वावलंबी भारत अभियान के कार्यकर्ता, स्वदेशी के कार्यकर्ता ऐसे उस जिले के लिए अपेक्षित, सब प्रकार की सरकारी योजनाओं का अध्ययन करें। सरकार के अधिकारियों से चर्चा करें और उनमें जो गैप है, अन्तर है, उसको पूरा करने का प्रयत्न करें। इससे बहुत बड़ा काम होने की संभावना होती है। हां यह अवश्य ध्यान करना चाहिए, सरकारी प्रकल्पों, योजनाओं से लाभ लेना और उनको उनके साथ तालमेल बिठाना तो ठीक है किन्तु उसी में ही उलझ कर नहीं रह जाना। हम असरकारी सामाजिक आर्थिक अभियान चला रहे हैं। इसको हमेशा स्मरण में रखें।

*जो असरकारी है, वही असरकारी है*

विनोबा भावे जी कहा करते थे, जो असरकारी है, वही असरकारी है। हमारा यह सामाजिक आर्थिक अभियान क्योंकि ध्येय निष्ठा से चल रहा है। इच्छा शक्ति से चल रहा है। संगठन की ताकत के आधार पर चल रहा है। इसलिए इसी का अधिक व्यापक उपयोग होगा। हाँ सरकारी योजनाओं से तालमेल करने और लेनदेन करने में, किसी प्रकार की कठिनाई नहीं है। बस राजनीतिज्ञों के, मंत्रियों, विधायकों आदि के चक्कर काटना, ये हमारी कार्य पद्धति में नहीं है। इसका ध्यान अपने कार्यकर्ता रखते ही हैं।

*पूर्णकालिक द्वारा स्व विकास प्रक्रिया।*

महात्मा बुद्ध ने कहा है - ‘आत्म दीपो भव’ अर्थात स्वयं को ही प्रकाशमान बनाओ, स्वयं का विकास, स्वयं द्वारा।

पूर्णकालिकों का यह प्रश्न होता है कि हमारा मार्गदर्शन कौन करे? हमारी सहायता कौन करे? यह ठीक है कि अपने क्षेत्र में वरिष्ठ कार्यकर्ता होते हैं, पालक होते हैं। किंतु वास्तव में प्रत्येक कार्यकर्ता/व्यक्ति को सबसे अधिक स्व-विकास, स्वयं से करना होता है। ऐसा वे सकारात्मक चिंतन के द्वारा कर सकते हैं, अध्ययन के द्वारा, वरिष्ठ लोगों से चर्चा के द्वारा कर सकते हैं।

जब हम सकारात्मक रहते हैं शांत रहते हैं और उस समय पर अपने विकास के बारे में सोचते हैं। अपने जीवन के सात्विक बड़े लक्ष्यों के बारे में सोचते हैं। तो प्रकृति हमें ऐसे विचार भेजती है कि जिससे हम अपने व्यवहार को, गुणों को योजनाओं को स्वयं दिशा देने लगते हैं इस प्रकार स्वयं अपना विकास करते रहते हैं।

सुबह के समय अथवा एकान्त के समय जब आप शांत होते हैं,किसी के प्रति रिएक्शन में नहीं होते किसी नकारात्मक सोच में न हो उस समय पर सकारात्मक  रूप से अपने मन के अंदर बड़े विचार के बारे में सोचिए। वर्तमान में चिंतन करिए.आप देखेंगे कि आपके अन्दर ही सात्विक ऊर्जा खड़ी होने लगेगी। फिर जब हम श्रेष्ठ साहित्य को पढ़ते हैं, सफल महापुरुषों की कहानियों को पढ़ते हैं और सफल व्यक्तियों को पढ़ते हैं, केवल उन्हें नहीं जो अधिक पैसा कमाते हैं, उन्हें भी जो जीवन की किसी भी विधा में अच्छे सफल हुए हैं उन्हें पढ़ते हैं तो हमें भी सफलता के मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है, सोच मिलती है।

फिर एक बड़ा तरीका अपने वरिष्ठ कार्यकर्ताओं से खुली चर्चा, संवाद भी है। वरिष्ठ कार्यकर्ताओं  को समझने की कोशिश करना। स्वयं को विनम्रता और शिष्य भाव में रखना, बहुत उपयोगी होता है। स्व-विकास की अनिवार्य शर्त भी है।

वास्तव में जब हम अनुभवी कार्यकर्ताओं से सीखते हैं,समझते हैं तो  स्व विकास का मार्ग स्वयं बनाते हैं।  

*टीम वर्क व संवाद*

सफलता का मार्ग, आधार होता है - टीम वर्क। हम जब कार्य करने को चलते हैं तो बड़ी आवश्यकता होती है टीम वर्क की, सिनर्जी की। जब हम अपने संगठन में खुला संवाद करते हैं अपनी टीम के बंधुओं से बातचीत करते हैं चीजों को छिपाते नहीं, तो एक सिनरजी व टीम वर्क पैदा होता है फिर हमें,अपने पालक कार्यकर्ता से अच्छा संवाद रखना हर विषय  बता देना। अपने से कोई गलती हुई तो भी उन्हें बताना। इससे न केवल आपसी विश्वास बढ़ता है बल्कि हमारे।

विकास का मार्ग भी प्रशस्त होता है। टीम वर्क से विजय का बड़ा सुन्दर छायांकन ‘चक दे इण्डिया’ फिल्म में किया गया है। जहां हॉकी की खिलाड़ी लड़कियां तभी गोल कर विजय पा जाती है, जब वे टीम वर्क कर एक दूसरे को पास देती हैं। स्वदेशी में भी हमें एक दूसरे का सहयोग करना होता है, एक-दूसरे की गलतियां नहीं निकालनी होती। 

जब हम उत्तम टीम वर्क या सिनर्जी से काम करते है तो हम निश्चित होकर, अधिक ऊर्जा और शक्ति के साथ अधिक स्वदेशी व स्वलंबन का कार्य कर पाते हैं।

*मानदेय स्थानांतरण और केंद्र*

पूर्ण कालिक कार्यकर्ता के मन में अनेक विषय आते होंगे जिनमें से एक विषय है कि मुझे कितना और दूसरों को कितना मानदेय मिलता है?

इसमें एक बात तो स्पष्ट है यह कोई सैलरी नहीं होती या वेतन नहीं होता। पूर्णकालिक कार्यकर्ता समर्पित भाव से स्वदेशी के लिए कार्य करता है समाज देश के लिए कार्य करता है तो उसकी और उसके परिवार की कुछ आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए समाज (संगठन) उसकी चिंता करता है। इसका निर्धारण किसी निश्चित राशि के रूप में नहीं रहता। बल्कि प्रत्येक कार्यकर्ता से व्यक्तिगत चर्चा के आधार पर, उसके परिवार की स्थिति के आधार पर,उसकी योग्यता क्षमता व अनुभव के आधार पर यह संगठन द्वारा तय किया जाता है। यह अधिकार नहीं है। यह वास्तव में उसे और उसके परिवार को मिलने वाला समाज की तरफ से सामान्य सहयोग है। इस में स्थिति अनुसार परिवर्तन भी होता रहता है। अनुभव, क्षमता और परिणाम देखते हुए पहले की अपेक्षा वह बढ़ाई भी जा सकती है। बढ़ाते ही है, लेकिन अपवाद स्वरूप घटाई भी जा सकती है।

इसलिए इस विषय की सार्वजनिक चर्चा नहीं की जाती। यह मानदेय जो प्रतिवर्ष निधि संग्रह अभियान होता है व अन्य समाज के बंधु मंच को और अभियान को सहयोग करते रहते हैं उसमें से इसकी व्यवस्था की जाती है।

अनेक कार्यकर्ता ऐसे भी हैं जो शुरू में मानदेय लेते हैं लेकिन बाद में वे उसे बंद कर देते हैं और विस्तारक संगठन की श्रेणी में चले जाते हैं और यह अच्छी सोच भी है। कार्यकर्ता के विकास की दिशा भी होती है।

*कार्यकर्ता का केंद्र स्थानान्तरण*

एक और विषय है कार्यकर्ता का केंद्र कहां रहना चाहिए? काफी कार्यकर्ताओं का तो केन्द्र उनका परिवार ही होता है किन्तु पूर्णकालिक कार्यकर्ता सदा ही संगठन द्वारा निर्धारित किसी भी कार्यालय पर, स्थान और जिले में जाता है। वहीं रहकर प्रवास व कार्य करना है। संगठन की आवश्यकतानुसार उसका स्थानांतरण किया जा सकता है। उसे सदा इस मानसिकता में ही रहना चाहिए। और यह प्रसन्नता का विषय रहना चाहिए न कि मजबूरी का।

प्रसन्नता इसलिए है कि वह संगठन की आवश्यकतानुसार अपने आपको ढालने में सहज महसूस करता है। और वहाँ जाता है जहां पर आवश्यकता होती है। यह उसके सफल व पूर्ण समर्पण का प्रतीक भी होता है।

अनेक बंधु दूसरे प्रांत में जाकर भी पूर्णकालिक कार्यकर्ता का कार्य कर रहे हैं। जैसा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में भी होता है।

फिर पूर्णकालिक योजना यह ज़िला प्रान्त की नहीं ब्लकि केंद्रीय योजना है। सभी स्तर के पूर्णकालिक कार्यकर्ता केंद्र की योजना अनुसार ही तय स्थान पर जाते हैं। तय दायित्व को स्वीकार करते हैं, तय संगठन में जाते हैं। यद्यपि व्यवहारिक रूप से प्रांत इस विषय में प्रमुख भूमिका निभाता है।

*अब एक ही धुन, जय-जय भारत!*

सब प्रकार से प्रशिक्षित होकर प्रेरणा से भर कर स्वर्णिम भारतवर्ष फाउंडेशन द्वारा की गई प्रशिक्षण प्रक्रिया से निकलकर यह पूर्णकालिक कार्यकर्ता समाज जीवन में उतरा है।

फिर केवल स्वदेशी ही नहीं, बल्कि सब सामाजिक, धार्मिक संगठनों में पूर्णकालिक समर्पित कार्यकर्ताओं के निकलने की भारत में लंबी परंपरा है।

इस्कॉन के, स्वामीनारायण मंदिर के सन्यासी हों, जग्गी वासुदेव व श्री श्री रविशंकर जी महाराज... आदि के साधक हों या बाबा रामदेव के योग प्रशिक्षक, भारत में यह परंपरा अति प्राचीन है।

संघ परिवार के संगठनों में भी चाहे विद्यार्थि पारिषद हो, विवेकानंद केंद्र हो, वनवासी कल्याण आश्रम हो, सेवा भारती हो, भारतीय मजदूर संघ हो या फिर अनेक अन्य संगठन... पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं की एक लंबी परंपरा है ही। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रचारक पद्धति तो सर्वश्रेष्ठ और सर्वोच्च है ही। अपने मन में ”हर घर स्वदेशी, हर युवा उद्यमी“ का सन्देश वास्तव में हर घर तक व हर युवक तक पहुंचाने के लिए बड़ी मात्रा में देशव्यापी ऐसे पूर्णकालिक समर्पित कार्यकर्ताओं के तंत्र की आवश्यकता है और स्वदेशी जागरण मंच की यह पूर्णकालिक योजना उसी निमित्त बनी है।

पूर्व में भी कहा है - इस कार्यकर्ता की प्रेरणा एक ही है ”तेरा वैभव अमर रहे मां, हम दिन चार रहें न रहें।“

या फिर गीत की पंक्तियाँ... ”साधन की ओर न ताकेंगे... कांटों की राह हमारी है... मनमस्त फकीरी धारी है, अब एक ही धुन... जय-जय भारत।“

इस विचार को साकार करने के लिए पूर्णकालिक कार्यकर्ता का समय व जीवन लगाने को उद्यत हुआ है, उसमें वह सफल हो, यही मनोकामना। 

*”जय स्वदेशी.. जय भारत“*

Sunday, June 28, 2026

The Margo soap story

https://youtu.be/yBpWaCah3ck?si=YrE7ClV4wFVCyEhD

By Sanjay Arora 

You were looking at the thorn in the side of the British Empire. The empire that ruled India, controlled everything. The banks, the ports, the works, everything except one small green ugly bar of soap. Lever Brothers, the makers of Lifebuoy, Pears, etc. were giants then. But India's heat, humidity, tropical infections, British [soaps were meant for British skins. India then needed something else entirely. For years they tried to make the neem soap but failed completely. Enters a Bengali chemist named K.C. Das, Stanford educated, who turned down MNC offers. Spent years cracking a formula no colonial lab could solve. How to extract neem's full medicinal properties without losing them in the soap making process. He cracked it in 1920 in a small factory in Tiljala, Calcutta. And then he did something absolutely brilliant with the name. Wait, stay with me for the story. The British had given neem a colonial name, margosa. Das took the word, shortened it, called his soap Margo. It sounded European, premium, modern. British educated Indians bought it immediately thinking they were buying something very sophisticated. They were actually choosing the soil over crown. The green color became a silent Swadeshi symbol. No slogan needed, no protest, just a bar of soap. And then British ended up buying it too because then their own soaps were failing in India's humidity. The irony, the soap manufactured as a Swadeshi protest against the monopoly of British brands became so popular that companies in Britain started imitations and manufactured neem scented soaps in Manchester. That's not history, that's humbling. Today almost every multinational brand is selling you something neem extract as if it's a breakthrough discovery. It's not, it's a formula from 1920, K.C. Das, Calcutta. Did you know about the Margo story? Give me yes in the comments below if you did and then share it with every nation loving Indian.

Wiki  

Margo (soap)

Al


Margo is a brand of soap manufactured in India. The soap has margosa as its main ingredient.[1] The soap was created and manufactured by the Calcutta Chemical Company[2] under the stewardship of its founder, K.C. Das, and was launched in 1920.[3] In 1988, the soap was among the top five-selling brands in India, with a market share of 8.9%.[4] As of 2001, the brand was worth ₹75 crores and belonged to Henkel-SPIC. (A German company )As of 2003, the brand was relaunching new products focused on the younger demographic, and had a market share of close to 2% of the premium-soaps segment in India. In 2011, Jyothy Laboratories acquired the rights to the brand following the acquisition of controlling stake in Henkel India.[5]

Pic of an Advertisement for Margo soap in Indian express newspaper dated April 5, 1939

Core Ingredients: 100% pure neem extract (equivalent to about 1,000 neem leaves per bar) and Vitamin E.

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सजय अरोड़ा द्वारा


आप ब्रिटिश साम्राज्य के काँटे को देख रहे थे। वह साम्राज्य जिसने भारत पर राज किया और सब कुछ नियंत्रित किया—बैंक, बंदरगाह, कारखाने, सब कुछ, बस एक छोटी सी बदसूरत हरी साबुन की टिकिया को छोड़कर। लीवर ब्रदर्स, जो लाइफबॉय और पियर्स जैसे साबुन बनाते थे, उस समय के दिग्गज थे। लेकिन भारत की गर्मी, नमी और उष्णकटिबंधीय संक्रमणों के सामने ब्रिटिश साबुन—जो ब्रिटिश त्वचा के लिए बने थे—यहाँ बेकार साबित हो रहे थे। भारत को कुछ बिल्कुल अलग चाहिए था।


वर्षों तक उन्होंने नीम का साबुन बनाने की कोशिश की, लेकिन पूरी तरह विफल रहे। तब आए एक बंगाली रसायनज्ञ, के.सी. दास, जिन्होंने स्टैनफोर्ड से शिक्षा प्राप्त की थी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के ऑफर ठुकरा दिए। उन्होंने वर्षों उस फॉर्मूले को सुलझाने में लगाए जिसे कोई भी औपनिवेशिक प्रयोगशाला नहीं सुलझा पाई थी—साबुन बनाने की प्रक्रिया के दौरान नीम के संपूर्ण औषधीय गुणों को बिना खोए उसे कैसे निकाला जाए। उन्होंने यह सफलता 1920 में कोलकाता के तिलजाला में एक छोटी सी फैक्ट्री में हासिल की।

और फिर उन्होंने नाम को लेकर एक शानदार दांव खेला। ब्रिटिशों ने नीम को एक औपनिवेशिक नाम दिया था—'मार्गोसा' (Margosa)। दास ने इस शब्द को छोटा किया और अपने साबुन का नाम रखा 'मार्गो' (Margo)। यह नाम यूरोपीय, प्रीमियम और आधुनिक लगता था। अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त भारतीयों ने इसे तुरंत खरीदा, यह सोचकर कि वे बहुत ही परिष्कृत चीज़ खरीद रहे हैं—जबकि वास्तव में वे ताज (ब्रिटिश शासन) की बजाय अपनी मिट्टी (स्वदेशी) का साथ चुन रहे थे। हरा रंग एक मूक स्वदेशी प्रतीक बन गया। ना कोई नारा, ना कोई आंदोलन—बस साबुन की एक टिकिया।

और अंततः ब्रिटिश लोग भी इसे खरीदने लगे, क्योंकि उनके अपने साबुन भारत की नमी में फेल हो रहे थे। विडंबना देखिए—ब्रिटिश ब्रांडों के एकाधिकार के खिलाफ स्वदेशी विरोध के रूप में निर्मित यह साबुन इतना लोकप्रिय हो गया कि ब्रिटेन की कंपनियों ने इसकी नकल करना शुरू कर दिया और मैनचेस्टर में नीम-सुगंधित साबुन बनाने लगीं। यह सिर्फ इतिहास नहीं है—यह हमें नम्र बनाने वाला किस्सा है।

आज लगभग हर बहुराष्ट्रीय ब्रांड आपको नीम के अर्क वाला कुछ न कुछ बेच रहा है, मानो यह कोई नई खोज हो। जबकि यह कोई नई खोज नहीं है, बल्कि 1920 का वही फॉर्मूला है—के.सी. दास, कोलकाता।

आजकल मार्गो (Margo) साबुन Jyothy Laboratories Ltd. बनाती है। के.सी. दास ने 1920 में 'कलकत्ता केमिकल कंपनी' के तहत यह साबुन बनाया था, जो बाद में हेंकेल इंडिया के पास गया और 2011 में ज्योति लैब्स ने इसे खरीद लिया।


मार्गो के अलावा बाजार में कई अन्य नीम साबुन भी उपलब्ध हैं:

 पतंजलि नीम कांति साबुन (Patanjali Neem Kanti Soap) - बाबा रामदेव की कंपनी

· मेडिमिक्स (Medimix) - चोलयिल कंपनी

· चंद्रिका (Chandrika) - विप्रो

· हमाम (Hamam) - हिंदुस्तान यूनिलीवर

· नीम एक्टिव (Neem Active) - ज्योति लैब्स

आजकल मार्गो (Margo) साबुन Jyothy Laboratories Ltd. बनाती है। के.सी. दास ने 1920 में 'कलकत्ता केमिकल कंपनी' के तहत यह साबुन बनाया था, जो बाद में हेंकेल इंडिया के पास गया और 2011 में ज्योति लैब्स ने इसे खरीद लिया।

मार्गो के अलावा बाजार में कई अन्य नीम साबुन भी उपलब्ध हैं:

· पतंजलि नीम कांति साबुन (Patanjali Neem Kanti Soap) - बाबा रामदेव की कंपनी
· मेडिमिक्स (Medimix) - चोलयिल कंपनी
· चंद्रिका (Chandrika) - विप्रो
· हमाम (Hamam) - हिंदुस्तान यूनिलीवर
· नीम एक्टिव (Neem Active) - ज्योति लैब्स


Wednesday, June 10, 2026

अत्यंत प्रभावशाली लोगों की सात आदतें – एक परिष्कृत सारांश

अत्यंत प्रभावशाली लोगों की सात आदतें – एक परिष्कृत सारांश

प्रस्तावना

क्या आपने स्टीफन कोवे की विश्वविख्यात पुस्तक "द सेवन हैबिट्स ऑफ़ हाइली इफेक्टिव पीपल" पढ़ी है? यदि नहीं, तो आपने इसके बारे में अवश्य सुना होगा। यह पुस्तक आत्म-विकास साहित्य की धरोहर है। राष्ट्रऋषि दत्तोपंत ठेंगड़ी जी ने भी एक भाषण में इसकी प्रशंसा की थी। कोवे का कथन है – “You can't change your future, but you can change your habits, and surely your habits will change your future.” अर्थात, आप अपना भविष्य तो नहीं बदल सकते, लेकिन अपनी आदतें बदल सकते हैं – और आदतें ही भविष्य बदल देती हैं।

इस लेख का उद्देश्य पुस्तक का एक क्रमबद्ध, प्रयोगात्मक सारांश प्रस्तुत करना है। प्रत्येक आदत के साथ एक उदाहरण और कुछ व्यावहारिक अभ्यास दिए गए हैं। पुस्तक को समझने के लिए दो आधारभूत बातें पहले समझ लेना आवश्यक है –

1. जैसी दृष्टि, वैसी सृष्टि – हम दुनिया को वैसा ही देखते हैं जैसी हमारी धारणाएँ (paradigms) हैं। परिस्थिति बदलनी है तो स्वयं को बदलना होगा।

2. चारित्रिक नीति बनाम व्यक्तित्व नीति – 1920 से पहले सफलता का आधार चरित्र (ईमानदारी, धैर्य, संयम) था। बाद में लोगों ने शॉर्टकट, त्वरित समाधान (personality ethics) पर ध्यान देना शुरू कर दिया। कोवे के अनुसार स्थायी सफलता चरित्र से ही आती है।

अब सीधे सात आदतों पर आते हैं। पहली तीन आदतें निर्भरता से स्वतंत्रता (dependence → independence) की ओर ले जाती हैं। अगली तीन स्वतंत्रता से परस्परनिर्भरता (independence → interdependence) के लिए हैं। सातवीं आदत सतत सुधार की है।

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आदत 1 – सक्रिय बनें (Be Proactive)

सारांश: हम अपने जीवन के स्वामी हैं। प्रतिक्रिया करने के बजाय सोच-समझकर उत्तर देना सीखें। जिम्मेदारी का अर्थ है – response-ability (प्रतिक्रिया करने की क्षमता)। स्वामी विवेकानंद ने कहा – “हम जो कुछ भी हैं, उसके लिए स्वयं जिम्मेदार हैं।”

उदाहरण: एक रेस्तराँ में तिलचट्टा (कॉकरोच) एक महिला पर गिरता है। वह घबराकर चिल्लाने लगती है। तिलचट्टा दूसरी महिला पर जाता है, वह भी वैसा ही करती है। परन्तु वेटर शांत रहता है, देखता है, और फिर तिलचट्टे को पकड़कर बाहर फेंक देता है। यहाँ महिलाएँ प्रतिक्रियाशील (reactive) थीं, वेटर सक्रिय (proactive) था।

दो महत्त्वपूर्ण वृत्त:

· चिंता का वृत्त (Circle of Concern) – जिन चीज़ों की हमें चिंता है लेकिन हम उन्हें नियंत्रित नहीं कर सकते।
· प्रभाव का वृत्त (Circle of Influence) – जिन चीज़ों को हम बदल सकते हैं।

सक्रिय व्यक्ति प्रभाव वाले वृत्त पर ध्यान केंद्रित करता है, जिससे वह बढ़ता जाता है। प्रतिक्रियाशील व्यक्ति चिंता वाले वृत्त में उलझा रहता है।

अभ्यास:

1. “उसने मुझे गुस्सा दिलाया” के स्थान पर कहें – “मैं अपने गुस्से को नियंत्रित करना चुनता हूँ।”
2. अपने प्रभाव वाले वृत्त के पाँच काम लिखें और उन्हें करना शुरू करें।

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आदत 2 – अंत को ध्यान में रखकर शुरू करें (Begin with the End in Mind)

सारांश: अपनी कल्पना का उपयोग करें कि आप जीवन में क्या बनना चाहते हैं। फिर विवेक से तय करें कि उस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए कौन से मूल्य ज़रूरी हैं।

उदाहरण (अर्थी वाला): कल्पना करें कि आपकी ही अर्थी उठ रही है। लोग आपके बारे में क्या कहेंगे? “बहुत ईमानदार थे”, “परिवार के प्रति समर्पित थे” – जो भी आप सुनना चाहते हैं, वही बनने की कोशिश आज से शुरू करें।

कोवे कहते हैं – “It’s incredibly easy to get busy climbing the ladder of success only to discover it’s leaning against the wrong wall.” (सीढ़ी चढ़ना आसान है, पर गलत दीवार पर चढ़ गए तो?)

नेतृत्व (leadership) यह तय करता है कि सीढ़ी सही दीवार पर लगी है या नहीं। प्रबंधन (management) उस पर चढ़ने की कला है। पहले नेतृत्व करें, फिर प्रबंधन।

अभ्यास:

1. अपनी अर्थी के दृश्य को लिखें – कौन-कौन है, क्या कह रहे हैं?
2. अपने जीवन की विभिन्न भूमिकाओं (व्यावसायिक, पारिवारिक, सामुदायिक) के लिए एक-एक मिशन स्टेटमेंट लिखें।
3. सबसे बड़े डर को पहचानें, उसके बुरे से बुरे परिणाम की कल्पना करें और फिर उससे निपटने का उपाय लिखें।

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आदत 3 – पहले प्राथमिकताएँ रखें (Put First Things First)

सारांश: जो सबसे महत्वपूर्ण है, उसे पहले करें – भले ही वह अत्यावश्यक (urgent) न हो। अपने समय का प्रबंधन नहीं, स्वयं का प्रबंधन करें।

प्रमुख उपकरण – चार चतुर्थांश (Quadrants):

 अत्यावश्यक (Urgent) अनावश्यक (Not Urgent)
महत्वपूर्ण (Important) I – संकट, डेडलाइन (यहाँ कम समय बिताएँ) II – योजना, रिश्ते, व्यायाम (यहाँ अधिकतम समय दें)
अमहत्वपूर्ण (Not Important) III – कुछ फ़ोन, मीटिंग (कम करें) IV – समय बर्बादी (बंद करें)

उदाहरण (बड़ी चट्टानें): एक जार में पहले बड़े पत्थर (महत्वपूर्ण काम), फिर कंकड़, फिर रेत, फिर पानी डालो – सब आ जाता है। यदि पहले रेत डालोगे तो बड़े पत्थर नहीं आएँगे।

प्रेरक कथन: “The key is not to prioritize what’s on your schedule, but to schedule your priorities.”

अभ्यास:

1. उन महत्वपूर्ण कार्यों की सूची बनाएँ जिन्हें आप टाल रहे हैं (जैसे – व्यायाम, रिश्तों पर समय, स्वास्थ्य जाँच)।
2. एक सप्ताह के लिए अपने समय को चार चतुर्थांशों में विभाजित करें। देखें कि कितना समय चतुर्थांश II में बीता। अगले सप्ताह उसे बढ़ाने का प्रयास करें।

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आदत 4 – जीत-जीत (Win-Win)

सारांश: यह मानसिकता कि “तुम हारो तभी मैं जीतूँ” – अभाव की मनोवृत्ति (scarcity mentality) है। प्रचुरता की मनोवृत्ति (abundance mentality) कहती है – सबके लिए पर्याप्त है। ऐसा समाधान ढूँढ़ो जिससे सभी को लाभ हो।

उदाहरण: एक पादरी ने बच्चों से कहा – “दौड़ो, जो पहले आएगा, उसे मिठाई मिलेगी।” ‘एक, दो, तीन’ कहने पर सभी बच्चे हाथ मिलाकर एक साथ गंतव्य पर पहुँचे और मिठाई बाँट ली। यह जीत-जीत का व्यावहारिक उदाहरण है।

विन-विन के लिए तीन गुण आवश्यक हैं:

· प्रामाणिकता (integrity)
· परिपक्वता (maturity) – अपनी बात कहने का साहस और दूसरे को समझने का ध्यान, दोनों संतुलित हों।
· प्रचुरता की मानसिकता (abundance mentality)

अभ्यास:

1. किसी भी बातचीत से पहले पूछें – “दूसरा व्यक्ति क्या चाहता है? मैं उसकी सहायता कैसे कर सकता हूँ?” ऐसे दस बिंदु लिखें।
2. अपने तीन करीबी रिश्तों का विश्लेषण करें – क्या संतुलन है? आप कैसे अधिक दे सकते हैं?

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आदत 5 – पहले समझने का प्रयास करें, फिर समझाने का (Seek First to Understand, Then to Be Understood)

सारांश: अधिकतर लोग उत्तर देने के लिए सुनते हैं, समझने के लिए नहीं। सहानुभूति (empathy) से सुनना सीखें। कोवे के अनुसार संचार का 10% शब्द, 30% ध्वनियाँ, 60% शारीरिक भाषा होती है।

उदाहरण (चश्मे वाला डॉक्टर): आप एक डॉक्टर के पास जाते हैं और कहते हैं – “मुझे दो दिन से ठीक से दिखाई नहीं दे रहा।” डॉक्टर तुरंत अपना चश्मा उतारकर आपको दे देता है – “यह मेरे लिए वर्षों से ठीक काम कर रहा है।” आप पहनते हैं और और भी बुरा दिखता है। क्या आप फिर उस डॉक्टर के पास जाएँगे? नहीं। लेकिन हम अक्सर दूसरों की समस्या को बिना समझे तुरंत समाधान देने लगते हैं – यही चश्मे वाले डॉक्टर वाली भूल है।

अभ्यास:

1. अगली बार जब कोई बात करे, तो बीच में न टोकें। उसके भावों, हावभाव पर ध्यान दें। फिर उसकी बात को अपने शब्दों में दोहराएँ – “क्या आप यह कहना चाह रहे हैं कि…”
2. किसी विषय पर बोलने से पहले श्रोताओं के दृष्टिकोण को स्पष्ट करें – “मैं समझता हूँ कि आपकी मुख्य चिंताएँ ये हैं…” – इससे आपकी बात का प्रभाव बढ़ जाता है।

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आदत 6 – तालमेल (Synergy)

सारांश: तालमेल का अर्थ है – एक साथ मिलकर अधिक उपलब्धि प्राप्त करना जितना अकेले-अकेले संभव नहीं। 1 + 1 = 3 या उससे अधिक। यह मतभेदों का सम्मान करने से आता है।

उदाहरण:

· दो पौधे पास-पास लगे हों तो उनकी जड़ें मिलकर मिट्टी की गुणवत्ता बढ़ाती हैं।
· दो व्यक्ति एक पेड़ के ऊँचे सेब तोड़ने के लिए – एक दूसरे के कंधे पर चढ़ता है, सारे सेब तोड़ लेते हैं, फिर बाँट लेते हैं।
· एक पुरुष और एक स्त्री मिलकर संतान पैदा करते हैं – जो शताब्दियों तक जीवित रहती है, जबकि व्यक्ति 100 वर्ष भी नहीं जी सकता।

तालमेल के लिए आवश्यक है कि हम मतभेदों को सहन ही न करें, बल्कि उनका स्वागत करें। “यदि दो लोग हर बात पर एकमत हैं, तो एक व्यक्ति व्यर्थ है।”

अभ्यास:

1. उन लोगों की सूची बनाएँ जिनसे आप चिढ़ते हैं। उनकी चिंताओं को समझने का प्रयास करें।
2. किसी ऐसे व्यक्ति को चुनें जिसके विचार आपसे भिन्न हों। एक ऐसा लक्ष्य निर्धारित करें जिसे मिलकर बेहतर ढंग से प्राप्त किया जा सके।

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आदत 7 – आरी को पैना करना (Sharpen the Saw)

सारांश: अपने सबसे मूल्यवान उपकरण – स्वयं – का नियमित नवीनीकरण करें। चार आयामों में संतुलन बनाएँ:

आयाम क्रियाएँ
शारीरिक व्यायाम, योग, पौष्टिक भोजन, पर्याप्त नींद
मानसिक पढ़ना, नया कौशल सीखना, लिखना
सामाजिक/भावनात्मक सार्थक संबंध बनाना, दूसरों की मदद करना
आध्यात्मिक ध्यान, प्रार्थना, प्रकृति में समय बिताना, मूल्यों पर चिंतन

उदाहरण: एक व्यक्ति पूरे जोर से पेड़ काट रहा है, पसीने-पसीने हो रहा है। कोई कहता है – “तुम अपनी आरी क्यों नहीं पैना लेते?” वह कहता है – “मेरे पास समय ही नहीं, पेड़ काटना है!” यह हास्यास्पद है। हम भी प्रायः यही करते हैं – आराम, अध्ययन, ध्यान के लिए “समय नहीं” कहते हैं, और फिर अक्षमता से जूझते रहते हैं।

अभ्यास:

1. हर आयाम के लिए एक-एक गतिविधि चुनें (जैसे – सोमवार सुबह दौड़ना, मंगलवार को 20 पृष्ठ पढ़ना, बुधवार को किसी मित्र से मिलना, गुरुवार को 10 मिनट ध्यान)।
2. सप्ताह के अंत में मूल्यांकन करें – कहाँ प्रगति हुई, कहाँ कमी रही।

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समारोप

यह पुस्तक गीता के उस श्लोक का ही विस्तार है –

धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायाम्, महाजनो येन गतः सः पन्थाः।
धर्म का मर्म गुफा में छिपा है (गूढ़ है), समाज के प्रतिष्ठित लोग जिस मार्ग पर चलते हैं, वही अनुकरणीय है।

स्टीफन कोवे ने सचमुच प्रभावशाली लोगों की सात आदतों को उदाहरण सहित समझाया है। यह पुस्तक 1989 में लिखी गई थी, किंतु आज भी (37 वर्ष बाद भी) अत्यधिक प्रासंगिक है। इसकी 40 भाषाओं में 2.5 करोड़ से अधिक प्रतियाँ बिक चुकी हैं। फॉर्च्यून 500 की अधिकांश कंपनियों ने इसे प्रशिक्षण के लिए अपनाया था।

परन्तु पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता इसका अभ्यास है। प्रत्येक अध्याय के अंत में दिए गए अभ्यासों को केवल पढ़ना नहीं, बल्कि करना ही वास्तविक परिवर्तन लाता है। एक बार पढ़ने के बाद इसे जीवन में उतारने का साहस रखिए।


Monday, March 16, 2026

गुरु रविदास

गुरू रविदास

हमारे एक प्रगतिवादी मित्र ने हिन्दू संस्कृति संबंधी एक दूर की बात कही। बोले भारतीय परम्परा में राजा व राजपरिवार ही सर्वोपरि है। वही पूज्य, वही आराध्य। देखिए, वे चश्मा ठीक करते हुए समझाने लगे, राम व कृष्ण इस लिए प्रसिद्ध नहीं हुए क्योंकि उन्होंने बड़ा काम किया। बल्कि वे राज्य परिवार के थे इसलिए मशहूर हो गये। किसी छोटे मोटे, टुटपूजिए के यहा पैदा होते तो कौन उन्हें याद करता और तो और ऐसा नहीं कि भारत में किसी ने साधना नहीं की जैसी भगवान महावीर ने की। लेकिन बड़ी बात यह थी कि वे राजपरिवार से थे। अतः उनका नाम हो गया। बुद्ध इसलिए इतने प्रसिद्ध नहीं हुए कि वे ज्ञानी थे, परंतु इसलिए क्योंकि राजपरिवार के थे - अतः पूज्य हो गये। कितने लोग देश के लिए मर मिटे- गुलामी सल्तनत के खिलाफ लेकिन नाम महाराणा प्रताप व शिवाजी के ही हुए क्योंकि वे राजा थे, महाराज थे। बस फिर क्या था इनके तर्क मुसलाधार बरसने लगे। विश्वामित्र का वर्णन भी उन्होंने संयासी या गुरू के कारण नहीं - पहले राजा थे फिर सन्यासी बने तो याद रह गये, ऐसा सिद्ध किया। बस विक्रमी संवत राजा विक्रमादित्य से थे आदि आदि।
मैं भी एक बार तो प्रभावित हो चला था कि सच में अंग्रेजी राज्य ने हमारे यहां कुछ विद्वानों ने दिल्लीश्वर को जगदीश्वर कहा ही है और राजाओं का महिमामंडल सत्य की लगता है। पर अचानक ध्यान गया कि एक व्यक्ति राजा, महाराजा तो दूर की बात, फैक्टरी का मालिक, (हैंडलूम फैक्टरी) का मालिक भी नहीं था, अनपढ़ था, ’’कागज छूओ नहीं, कलम गहयो नहीं हाथ’’ स्वयं कह रहा है। लेकिन उसके श्लोक पढ़कर पंडित भी शरमा जाते है। घर-घर में वह पूज्य है। छोटी सी खड्डी चलाने वाला भक्त कबीर के नाते मान्यता प्राप्त कर गया है, वो क्या राजा था। राजा द्वार पर ज्ञान प्राप्त करने को खड़ा है। लेकिन ग्राहक की हजामत करने के बाद ही बात करने की फुरसत निकालने वाला नाई गुरूग्रंथ साहब में अपना एक पद दर्ज करवा कर सैन भक्त कहलवाता है, तो वो कहां का राजा है। इस प्रकार जुती गाठ कर काम चलाने वाले, बनारस के आस-पास मरे पशुओं का चमड़ा उतारकर व्यवसाय करने वाले चर्मकार परिवार में जन्म लेने वाले व्यक्ति के गुरूग्रंथ साहब की पवित्र वाणी में 41 पद दर्ज करवा कर गुरू रविदास कहलाया, वह कौन से राजा थे। आचार्य रजनीश की दो पुस्तकें उन्हें समर्पित है, यह कोई बड़ी बात नहीं है। लेकिन पुराने समय के संत नेमीदास अपनी कवितामय पुस्तक ‘भक्तमाल’ में उनका विशद्वर्णन करते है - यह तो बड़ी बात है कि नहीं? एक क्रांतिकारी बात यह थी कि उनका सम्मान राजपरिवारों में था, इतना ही नहीं था। मीराबाई, रानी झाला उनकी शिष्या बनी - यह तो बड़ी बात है ना।
जूती गांठते वक्त जिस पात्र यानि कठौती में वे जूती डूबोकर नर्म करते, उसमें ब्राह्मणों को गंगा दर्शन करवा देंगे - यह बाते लोग किवदंती, कपोल कल्पना कर टाल देंगे। शायद उन्हें छोटी बात लग सकती है। लेकिन जूतियां गांठते-गांठते, हथौड़ी-रम्बी के सुरताल पर जो कुछ भजन उन्होंने बोला वह आज के विश्वविद्यालयों में कोई स्थान रख सकता है - यह आपकी जिज्ञासा का विषय हो सकता है। श्री गुरू रविदास पर पी.एच.डी.? कितनों ने की यह कहना जरा मुश्किल है लेकिन नेशनल बुक ट्रस्ट के सम्पादक की पुस्तक में वर्णन पढ़कर हैरान हुआ कि जिस व्यक्ति से उन्हांने पी.एच.डी. की है, उसने कईयों को गुरू रविदास पर पी.एच.डी. करवाई है। मैने उस विद्वान से संपर्क किया और जिज्ञासावश पूछा कि क्या यह सच है, जैसा आपके बारे में लिखा है कि आप गुरू रविदास पर 25 लोगों की पी.एच.डी. करवाई है और 12 पुस्तकें लिखी है। उन्होंने विन्रमता से कहा - ’’नहीं यह गलत है, मैने 12 नहीं 20 पुस्तकें लिखी है, और 25 नहीं 30 लोगों को पी.एच.डी. गुरू रविदास पर करवाई है। यह व्यक्ति 14 वर्षों तक पंजाब यूनिवर्सिटी में स्थापित रविदास पीठ या चेयर के पीठाधीश या चेयरमेन रहे हैं।
ऐसे विद्वान से मैंने पूछा कि देश भर के कार्यकर्ता तृतीय वर्ष में नागपूर आ रहे हैं, उनके सामने मुझे गुरू रविदास के जीवन चरित्र पर बोलना है। मैं पी.एस.डी. करना तो दूर की बात है, यदि 30 थिसीस को पढ़ने भी लगा तो एक दो वर्ष लगेंगे। अतः आप ही बताईये कि आपका कुल मिलाकर इस सारे का सार क्या है। उन्होंने बड़ी सहजता से कहा - गुरू रविदास भारतीय संस्कृति की साक्षात् मूरत थे, प्रखर राष्ट्रवादी थे, अंतिम सत्य का साक्षात्मकार करके अत्यंत सरल भाषा में उसका वर्णन अपनी वाणी में करने वाले श्रेष्ठतम संत थे। मैं अत्यंत थोडे में उनके बारे में जो मुझे अत्यंत प्रेरणादायी लगा वह कह रहा हूं। स्थान-स्थान पर आपने भी उसे सुनाना होगा, समय-समय पर प्रेरणा लेनी होगी। अतः उनके जीवन के पांच प्रेरणादायी प्रसंग आपको सुना रहा हूं।

1. ‘‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’’ ऐसी कहावत जिस प्रसंग में से पैदा हुई, वह प्रसंग मैं आपको सुनाने जा रहा हूं। - संत रविदास जी का जन्म बनारस के निकट आज से 636 वर्ष पूर्व (अर्थात जब 25 फरवरी 2013 को उनका जन्म दिन मनाया गया। ) 1376 ई. में माघ पूर्णिमा के दिन हुआ। रविदास घर के बाहर जूतियां गांठ रहे थे। एक ब्राह्मण बोलता है - अच्छी तरह गांठना, हरिद्वार तक जाना है भई, बीच में दगा न दे जाए। जूती ठीक से गांठना। लेकिन युवा चर्मकार उसको गुदगुदाने वाला था एक छोटी से भेट देकर। कि भई पैसे रहने दो गठाई के बस थोड़ा हमारा काम कर दो। यह ‘दमड़ी’ (भेट) हमारी भी गंगा मईया को कर देना। ठीक है, ठीक है पंडित जी ने बड़े ही मशीनी ढंग से कहा। चढ़ा देंगे भईया, आधे गांव की भेंट चढ़ाने जा रहा हूं। तेरी भी चढ़ा दूंगा। ला दे दे। लेकिन महापुरूष किसी को मशीनी नही होने देते, यांत्रिकता उनको सुहाती नहीं। थोड़ा झटका दिया पंडित जी को। - भई, देखो हमारी भेंट तभी चढ़ाना जब गंगा मैया हाथ बहार करके स्वीकार करें। ‘‘हूं, क्या कहने तेरे !’’ पंडित जी, व्यंग्यपूर्ण ढंग से बुदबुदाये। पर आप कहानी जानते हैं, सबकी भेंट चढ़ाने के बाद उसने रैदास का नाम लिया। माता गंगा यह भक्त रविदास की भेंट है और यह क्या, तुरन्त गंगा मैया ने हाथ पसारा, भेट स्वीकार की, पंडित जी हडबड़ा गए और ज्यादा हडबडाये यह सुनकर कि रूक जा भगत जी के लिए हमारी भेंट भी लेते जाना। आंखे चुंधियाने वाला, हीरो से जड़ा, एक कंगन थमा दिया। आप जानते हैं कि वह उसने राजा को बेच दिया। रानी ने वैसा और मांगकर आफत खड़ी कर दी। पंडित जी कहां से लाए। गिडगिडाये फिर रविदास जी के पास आए तो उन्होंने कोई एफ.आई.आर दर्ज नही करवाई, उसकी बेईमानी के खिलाफ, पंचायत नहीं बुलाई। और उसी कठौती में गंगा से कहा, निकाल लो, जितने कंगन चाहिए। मेरा मन तो कहता है पंडित जी सीधे नहीं आये होंगे दूसरा कंगन लेने। पहले खुद रविदास का नाम लेकर गंगा के एटीएम से कंगन निकालने की कोशिश की होगी लेकिन रविदास जी का पासवर्ड नहीं जानते होंगे। रविदास जी के जीवन से जुड़ा यह पहला चमत्कारिक प्रसंग नहीं था। इससे पूर्व भी गंगा का प्रवाह बदलकर उन्होंने नाम की महिमा उन्होंने सिद्ध की थी। ऐसा कहा जाता है।
2. विनम्रता : लेकिन जो दूसरा प्रसंग है वह भी बड़ा चमत्कारी है। जिसका वर्णन श्री गुरूग्रंथ साहब में है। काशी नरेश को उलाहना दिया स्थानीय विद्वानों ने कि एक शूद्र को बेवजह आप इतना सम्मान देते है। कहा कि विद्वान, कहां का ज्ञानी और कहां का चमत्कारी। गंगा के दूसरी ओर ठाकुर जी की प्रतिमा को वह क्या इधर ला सकता है।  रविदास जी ने कहा, अच्छा पहले आप प्रयास कर लो ! टस से मस नहीं हुई मूर्ति। पर अब बात तो रविदास जी की थी - बड़ी श्रद्धा से रविदास आंखे बंद करके आराधना करते हैं और मूर्ति रविदास जी की गोदी में विराजती है। और धन्यवाद की मुद्रा में जब रविदास के हाथ उठते है, तो गुरूवाणी के ये शब्द जिव्हा पर आते है -
ऐसी लाल तुझ बिन कौन करे, गरीब निवाज गुसैया मेरा, माथे छत्र घरे। जा कि छोत जगत को लागे, ता पर तूही ढरै। नीच हूं उच करे मेरा गोविंद, काहु ते ने डरै।। (गुरू ग्रंथ साहिब पन्ना 1106)
संत श्रेष्ठ रविदास के जीवन के साथ ऐसे प्रसंगों को जुडना मायने रखता है। कभी राजा पीपा प्रसाद को आते है तो जूते गांठने वाली कठौती से चरणामृत लेना उन्हें कठिन लगा। अतः कपड़ों में वह पवित्र जल समाता है और धोबी की बेटी का ज्ञान जब सबको हत प्रभ करता है तो राजा पश्चाताप करता है।
3. त्याग भाव : लेकिन तीसरे किस्म का प्रसंग अनूठा है। आज भी इन विरादरियों को देखेंगे तो सत्य लगेगा। ब्राह्मण वेश में भगवान का आना और पारसमणि देना। मना किया कि हमें नहीं चाहिए। जो ध्यान देना चाहिए भगवान के नाम पर उस सोने पर ध्यान देना पड़ेगा। लेकिन ब्राह्मण पोटली बांध रख गया। दरवाजे पर बांध कर टांग गया ताकि आते जाते जब जरूरत पड़े, वह पारसमणि का प्रयोग कर ले। कई दिन बाद भी देखा तो कुछ उपयोग नहीं  - ‘‘साधो पारसमणि ले जाओ।’’ - मोहे सोने का नहीं चाओ।
यहां एक और ध्यान देने की बात है। जब करोड़ों को मालिक कुछ लाख छोड़ देता है तो इतनी बड़ी बात नहीं  होती। रविदास जी तो आर्थिक दृष्टि से अत्यन्त दरिद्र अवस्था में थे। हर कोई उनकी मुफलसी, कंगाली को देख हंसता था। उन्होंने स्वयं गुरूवाणी में लिखा है।
दारिद देख सबको हंसे, ऐसी दशा हमार ! 
अष्ट दसा सब कर तले, सब कृपा तुम्हार ।। (श्री गुरूगं्रथ साहिब में पन्ना नं. 858)
और यह गरीबी का वर्णन श्रीगुरूग्रंथ साहिब में पन्ना नं. 858 पर दर्ज है। दारिद्र देख सबको हसै, ऐसी दशा हमारी। इसीलिए रविदास का पारसमणि को ठुकरानी बहुत बड़ी बात है। उन्होंने सोना नहीं ठुकराया, बल्कि सोना बनाने वाली फेक्टरी को लेने से इंकार कर दिया - गाय नहीं कपिला गाय का त्याग किया, वृक्ष नहीं कल्पवृक्ष को त्यागा। इसके आज भी बड़े गहरे अर्थ है। जब एक व्यक्ति नवाब हैदराबाद के अरबो रूपयों के आश्वासन को ठुकराकर इस्लाम स्वीकार करने से इंकार करता है तो वहां बाबा साहब अंबेडकर नहीं, रविदास महाराज की वही मूर्ति बोल रही होती है - 
साधो ! पारसमणि ले जाओ ....
खैर बाबा साहेब तो बहुत बड़े आदमी थे लेकिन बहुत वर्ष पूर्व एक बोधकथा में पढ़ा था। मीनाक्षीपुरम् की घटना के बाद का दृश्य। गांव को धर्मान्तरित करने के बाद उपहार भेंट देने का मोलवियों की तरफ से कार्यक्रम चल रहा था। गांव से दूर एक बूढ़ी, अनुसूचित जाति की महिला से पत्रकार ने पूछा ‘‘तुम नहीं गई सामान लेने।’’ नहीं, मैं मुसलमान थोड़े बनी हूं और क्यों बनूं, मेरा नाम और यहां की देवी का नाम एक हैं, भूखी नंगी रह सकती हूं पर धर्म बदलकर अपने नाम को लजा नहीं सकती। हमारे मन की अन्तस्थली में मधुर संगीत बज रहा था -
साधो, पारसमणि ले जाओ ....
4. स्वाभिमान : चौथा प्रसंग कुछ भिन्न है, समय की दीवारों पर चोट ही नहीं करता बल्कि विस्फोट करता है। दरार नहीं डालता, धराशायी करता है। आप जानते है मीराबाई, गुरू रविदास की शिष्या बनी। वैसे तो कई राजघराने के लोग रविदास का सम्मान करते थे, लेकिन मीराबाई तो उनकी शिष्या बनी।
मीरा को गोविन्द मिला जी, गुरू मिलिया रैदास,
गुरू मिलिया रैदास जी, दीन्ही ज्ञान की गुटकी ...
गुरू रैदास मिले मोहि पूरे, धुर से कलम भिड़ी।
देखिए, जब ऐसा माना जाता हो कि इस समाज के छुने से अपवित्रता आती हो उस विरादरी के व्यक्ति को गुरू धारण और चरण छू कर पवित्र होना, बड़ा क्रांतिकारी कदम था। मीरा का मजाक उड़ा और समाज ने उपेक्षा की।
वैसे अगर इस घटना का निहितार्थ समझना हो तो बाबा साहेब अम्बेडकर के जीवन से समझा जा सकता है। पूज्य बालगंगाधर तिलक के एक बेटे ने अम्बेडकर साहब की केवल प्रशंसा ही नहीं, बल्कि उनकी पार्टी की पूना जिला की अध्यक्षता की। अच्छा काम किया लेकिन जानते है क्या कीमत अदा करनी पड़ी इस सामाजिक क्रांति की। उनकी ऐसी थू-थू हुई, ऐसी किरकिरी हुई। जगह-जगह से परेशान होकर उन्होंने आत्महत्या ही कर ली। आप उसकी मनोदशा समझ सकते है और कुछ समझ में न आए तो उसके हाथ का लिखा (सूसाईड नोट) आत्महत्या का संदेश पत्र पढ़ लेना चाहिए। उन्होंने मरते समय यह लेख बाबा साहेब अम्बेडकर को संबोधित कर लिखा था, ‘‘दलितों की सामाजिक दुरावस्था की साक्षी लेकर मैं स्वयं भगवान के चरणों में जा रहा हूं।’’ तो ऐसे में मीराबाई डट कर खड़ी हुई यह बड़ी बात है।
लेकिन इससे बड़ी बात है गुरू रविदास की मनोदशा। मीराबाई गुरूजी की दरिद्रता देख व्यथित हुई और कहा गुरू महाराज एक कीमती हीरा ले लो ताकि अच्छा महल बनाकर आप रह सकें। मेरा भी मजाक उड़ता है कि तुम्हारा गुरू तो पुरानी जूतियां गांठता है... इसलिए यह ले लीजिए। गुरू रविदास की सोच बड़ी थी, और इसे अस्वीकार कर  दिया। बोले जरा समझो राजकुमारी। मैंने जो कुछ पाया है जूतियां गांठकर ही पाया है, मैं इसे छोड़ता हूं तो आस-पड़ोस में भी इस काम का सम्मान कम होगा। हां, तुझे मेरे गुरू बनाने में यदि शर्म आती है तो तुम गुरू बदल लो, मैं अपना धंधा नहीं बदलूंगा।
एक रूसी विद्वान है जिन्होंने भक्तिकाल के कवियों का गहरा अध्ययन किया है। उनका नाम है सरवरीऑकोव। उनका निष्कर्ष बड़ा मायने रखता है कि उत्तरी भारत में कुटरी उद्योगों को (कॉटेज इन्डस्ट्रीज) को बढ़ावा देने में संतों का बड़ा योगदान है - कबीरदास ने खड्डी उद्योग को प्रोत्साहन दिया तो गुरू रविदास ने जूता उद्योग को सम्मान दिलवाया। ऐसा सरवरीऑकोव का कहना है।
दारिद देख सबको हसै, ऐसी दसा हमारी,
अष्ट दसा सब कर तले, सभ कृपा तुम्हारी (पन्ना 858)
यहां यह भी ध्यान देने की बात है कि मेवाड़ के महाराणा सांगा और उनकी धर्मपत्नि रत्नकुंवरी झाली रानी जब गंगा स्नान के लिए काशी आए तो वे भी गुरू रविदास की कीर्ति व भक्ति से मुग्ध होकर उनके शिष्य बने। उन्होंने चितौड़ आने का निमंत्रण दिया और सचमुच बड़ी आयु में रविदास वहां गये और उनका शाही स्वागत हुआ। वहां की विचित्र घटना है। विद्वानों, पुरोहितों ने रविदास के साथ बैठकर खाने से मना किया और अपना-अपना भोजन लेकर अलग बैठकर खाने लगे। चमत्कार यह हुआ कि वे जहां भी बैठे दो ब्राह्मणों को अपने बीच एक-एक रविदास बैठे दिखाई दिए।
भक्त रत्नावली कहती है - 
दरपन येक बहुत ही छाई, यूं बहेद तन सब ही ढॉई।
सबकौ अचित भयौ तमासा, जेते विप्र ते ते रैदासा।।
इसी प्रकार की एक ओर घटना चित्तौड की प्रसिद्ध है। जब पुरोहितों और विद्वानों ने उनके जनेऊ के बारे में प्रश्न किया तो रविदास जी ने अपनी छाती में से दिव्य जनेऊ को दर्शाया। इस घटना की अभिप्राय यह है कि बाहरी लक्षण की बजाए आन्तरिक गुणवत्ता ज्यादा महत्वपूर्ण है।
5. राष्ट्रभाव : अंतिम घटना और पांचवी मुख्य घटना उस समय के बादशाह सिकन्दर लोधी के साथ घटित है। एक सदना मौलवी से रैदास जी के शास्त्रार्थ का वर्णन आता है। सदना इस शास्त्रार्थ में परास्त होकर नियमनानुसार  रैदास जी का शिष्य बन गया। इस इस्लामी शासनकाल में किसी मुस्लमान मौलवी की शास्त्रार्थ द्वारा हिन्दू धर्म धर्मान्त्रण की यह बहुत बड़ी घटना थी। जब इसकी खबर नमक-मिर्च लगाकर सिकन्दर लोधी के पास पहुंची तो वह बहुत आग-बबूला हुआ। रैदास जी को गिरफ्तार कर दरबार में लाया गया। जुर्म सुनाया गया और सजा भी। या तो वह इस्लाम स्वीकार करें या मौत। बादशाह ने पूछा इस्लाम चाहते हो या मौत। हां एक बात और सुन लो, यदि इस्लाम स्वीकार करोगे तो साथ में पांच गांव भी जागीर में मिलेंगे। आराम से जीना।’’ वाह ! जिसने पैसे बनाने वाली टक्साल यानि पारसमणि को फैंक दिया हो, मीरा के अमूल्य हीरे को ठुकरा दिया हो - उसके लिए यह लालच ? क्या कोई मायने रखता है। बिल्कुल नहीं। खैर सिकन्दर लोधी ने कहा अभी यह अकड़ में है, जंजीर बांधकर जेलखाने में डाल दो और गले में तौक डाल दो। जब तक अपनी मर्जी से नमाज पढ़ना शुरू न करे तब तक दाना पानी न दिया।’’
कहते है एक अजीब चमत्कार हुआ। जब लोधी नमाज पढ़ने लगा तो सामने रैदास मुस्कराते नजर आए। महल में दरबार में जहां भी कहीं जाता उसे रैदास सामने दिखाई देते। खैर, बैचेनी बढ़ने लगी और सादर रविदास जी को मुक्त किया, भूल स्वीकार की और क्षमा मांगी।
देख करिश्मा भक्त का, सब अचरज को जान,
बादशाह कॉपन लगा, यह महिमा पहचान।
बादशाह देखे भय खाई चहुं दिस रविदास दिखलाई
एक बेर कलमा ध्वनि छाई, बीस बेर दे ओम सुनाई।
(रविदास रामायण, महाकवि बक्शी दास कृत पन्ना 139)
रैदास का राष्ट्रवादी दृष्टिकोण और काफिरवाद के विरूद्ध आवाज उन्हीं के शब्दों में गूंजती है -
‘‘पराधीनता पाप है, जान लेहू र मीत।
रविदास दास पराधीन सौ, कोन करे है प्रीत ।।
यदि प्रथम घटना कठौती वाली उनकी मानसिक उदारता दिखाती है तो दूसरी ठाकुर जी को गोद में बिठाना मन की विनम्रता दिखाती है। तीसरी व चौथी घटना मीरा का हीरा स्वीकारना व धंधा न छोडना स्वाभिमान प्रदर्शित करता है और अंतिम पांचवी घटना उनका राष्ट्रीय भाव व स्वधर्म का आग्रह दर्शाता है।
रैदास संबंधी कई घटनाओं को कुछ लोग किवदन्ती कहकर उड़ाने का प्रयास करते हैं। लेकिन किवदन्तियों का  भी अपना आधार होता है। कल्पना के लिए भी कोई न कोई सत्य होता है। कोई किवदन्ती छोड़ सकता है कि एक बारात का खाना अकेले खा गये परन्तु यह बात महात्मा गांधी के बारे में कोई नहीं कहेगा। महाबली के बारे में किवदन्ती हो सकती है कि उन्हांने पीतल की परात को मोडकर बेलन बना दिया। लेकिन यह कोई देवानंद के बारे में नहीं कहेगा। शाहरूख खान के बारे में कोई किवदन्ती बन सकती है कि जब वह कमीज उतार कर नाचता है तो उसके पेट में छः नहीं 12 कट दिखते है, हालांकि 12 कट की जगह भी नहीं होती परंतु कह सकते है, लेकिन शाहरूख के बारे में कोई यह नहीं कहेगा कि उसे क्रमिका 3 आती है, वाम दिगन्तर वाम वृत आता है। यानि किवदन्ती का आधार होता है। रविदास पर लिखने वाले प्रसिद्ध विद्वान डॉ. वेणी प्रसाद शर्मा की यह टिप्पणी महत्वपूर्ण है जो उन्होंने अपनी पुस्तक की भूमिका में लिखी है। संतों महापुरूषों का उस समय इस प्रकार का प्रचार समाज रक्षा के लिए जरूरी था, मुस्लिम शासकों द्वारा अत्याचारी व जेहादों के विरूद्ध आत्मरक्षा के लिए भी जरूरी था। रविदास जी के गुरू रामानंद जी के बारे में प्रसिद्ध था कि गिरनार पर्वत पर सिद्धि करके आने पर वे श्राप देकर किसी को भी भस्म कर सकते हैं। यही कारण था उन्होंने अधोध्या में शिविर लगाकर विधर्मी बन हिन्दुओं को स्वधर्म में प्रवेश दिलाया तो कोई चूं तक नहीं कर सका। अतः कहीं अतिशियोक्ति थी भी तो वह बड़ी जरूरी थी, समाज रक्षा के लिए थी, ऐसा डॉ. वेणी प्रसाद का कहना है। वैसे भी श्री गुरूग्रंथ साहब में पिछले 400 सालों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। उसमें जो लिखा है बाबा नामदेव ही मुगल बादशाह ने उन्हें मरी गाय जीवित करने को कहा तो रामकृपा से नामदेव ने लोगों को कहा चलो गाय का बछ़डा लगाओ और दूध दोह लो। पृष्ठ 1165-66
दुधहि दुहि जब मटुकी भरी, ले बादशाह के आगे धरी ।
बादशाह महल माहि आऊ, अउघट की घट लगी जाई।
काजी मुल्ला विनती फुरभाई, बखस हिन्दू मैं तेरी गाई।।22।।
(गुरू ग्रंथ साहिब पन्ना 1165-66)
भक्त कबीर जी को तीन प्रकार से मारने का यत्न किया - हाथी के नीचे कुचलवा कर, अग्नि में जलाकर और गंगा में डुबोकर। अग्नि में जलाने का वर्णन छोड़ शेष दोनों अत्याचारों के वर्णन श्री गुरूगं्रथ साहब पन्ना 871 और 1162 में है।
गंग गुसाइनि गहिर गम्भीर, जंजीर बांधकर खरे कबीर।
मनु न डिगै जनु काहै कऊ डराइ, चरन कमला चित रिउओ समाई।।
गंगा की लहरि मेरी टुटी जंजीर।। म्रिगछाला पर बैठे कबीर।।
कहि कबीर कोऊ संग न साथ।। जल थल राखन है रघुनाथ।।
(गुरूगं्रथ साहिब पन्ना 1162)
आपने वह घटना शायद कई बार सुनी होगी कि एक लड़की अपने भाई को उठाये पसीना-पसीना हुए पहाड़ पर चढ़ रही थी। किसी ने पूछा इतना भार छोटी सी लडकी ने उठा रखा है। वह बच्ची छोटी थी पर दृष्टि बड़ी थी। तुरंत उसके मुहं से निकला - भारी यह भार नहीं भाई है। नुकते के हेरफेर में उससे जुदा हुआ, नुकता बदल के रख दियाए वहीं खुदा हुआ। दृष्टिकोण, बदलता है तो दृश्य बदलता है, नजर बदलती है तो नजारे बदलते है। दबे-बुचलों में गुरूरविदास की दृष्टि रखने पर सामाजिक समरसत्ता अपने आप आ जायेगी। सामाजिक न्याय आजकल बड़ा चालू शब्द है। जितना समाज में शब्द का चलन है उतना ही सच्चाई में दुलर्भ है।
मैनें एक पुस्तक पढ़ी, एक स्वेच्छा से सामाजिक कामों के लिए सेवानिवृत्ति लेने वाले आईएस. अधिकारी की पुस्तक। उसने पांच, जीती जागती कहानिया दी है। सभी समाज के दबे-कुचले लोगों की कहानियां, अनसुनी आवाजें है - जिसे पढ़न पर बेचैनी होती है, घबराहट होती है। यह याद करके ये सच्ची है - वे शर्मिंदा होने पर मजबूर करती है। मैं थोडा संकेत कर रहा हूं। पहली कहानी एक बंधुआ की है, विलासनी नामक जनजातीय युवती की है जो भट्टे पर काम करने अपने बच्चों व पति के साथ आती है। गाड़ी का दमघौटू जीवन, जंगल की उस हिरणी का टीन की बोनी छत्तों में तपती कोठड़ी का जीवन बैचेनी तो पैदा करता है, परन्तु असली दुःखांत आगे है। अचानक उसके पति को हस्पताल ले जाते है ठेकेदार, साथ बच्चा जाता है और खबर मिलती है कि पति मर गया। लाश के पेट पर दो चीरे देखकर वह हैरान। कोई बताता है कि आजकल पेट चीर कर किडनी निकालने के लिए मजदूरों को ऐसे की फांसा जाता है। फिर मरा घोषित करते है। बच्चा कहां गया ? शायद उसने यह सब होते देखने का पाप किया था। वह गायब कर दिया गया। घटना 1999 फरवरी की है, रिपोर्ट हैदराबाद थाने में नहीं लिखी जाती। किस किस के पास वह नहीं गयी, फिर सूखी काया, अस्थिपिंजर हुए बच्चों को चिपकाए फिरती है।
दारिद देख सबको हसै, ऐसी दसा हमार। इसे देखकर हंसता भी कोई नहीं, सुनता भी कोई नहीं । गुरूरविदास की संतानों के साथ कैसा सामाजिक न्याय। आज कुल समाज का छटा हिस्सा दलित है और ज्यादातर मुसीबतें उन्हीं के गले पड़ी है। केवल दो साल 1994 से 1996 के बीच देशभर के थानों में दलितों के खिलाफ उत्पीडन के 98349 मामले दर्ज हुए। ग्रामों में दलितों किसानों का हिस्सा 23.6 प्रतिशत है। लेकिन उनमें से भी 71.8 प्रतिशत के पास केवल एक एकड़ से कम जमीन है या वे बंटाईदार है। पांच करोड़ लोग बेघर हो गये विकास के नाम पर। उजड़े, निवार्सित, बेघर लोग। जबर्दस्ती उजाडे गए लोग। इनमें किसी ने रविदास के दर्शन नहीं किए। वास्तव में बाबा रविदास ने बेगमपुरा राज की कल्पना की भविष्यवाणी की थी -
बेगमपुरा शहर को नाऊ, दुख अंदोह नहीं तिहि ठाऊ।।
ना तसवीस, खिराज न माल, खौफ न खता, न तरस जवाल।।
अब हम खूब वतन-गह पाई, ऊहां खैर सदा मेरे भाई।
काइम-दाइम सदा पातिशाही, दोम न सेम एक सो आही।
आबादाना सदा मशहूर, ऊहां गनि बसे मामूर।।
तिऊ तिऊ सैल करहि जिऊ भावै महरम महल न को अटकावै।
कह रैदास - खलास चमारा, जो हम शहरी सो मीतु हमारा।।
(श्री गुरूग्रंथ साहिब पन्ना 345)
नागर जनां मेरी जाति विख्यात चमारं, हृदय राम गोविन्द गुण सारं।
सुरसरि जल कृत वारूनि रे, संतजन नहीं करत पानं।।
सुरा अपवित्र गंगा जल आनिय, सुरसरि मिल होय न भानं।
तडतारी अपवित्र कर भाविसे - जैसे कागरा करत दिखारं।।
भमति भागवत लिखिये, तिहं ऊपर, तब पूजिये करि नमस्कारं।
अनेक अधम जीव नाम गुन उधरे, पतित-पावन भये परसि सारं।।
‘भने रैदास’ ररंकार गुनवती, संत-साधु भये सहज पारं।।
(श्री गुरूग्रंथ साहिब पन्ना 1293)
सरदार भगत सिंह ने अपने जीवन के अंतिम दिन जेल सुपरिडेंट द्वारा अंतिम इच्छा पूछने पर बड़ी ही विचित्र मनोइच्छा बताई। उन्होंने अपनी बेबे (माता) द्वारा बनी हुई रोटी खाने की इच्छा प्रकट की। समय कम था और जेल से बाहर फांसी के समय की जानकारी भी नहीं देनी थी अतः अधीक्षक ने असमर्थता दिखाई। ऐसे में भगत सिंह ने स्पष्ट की उनकी इच्छी जन्म देने वाली माता नहीं अपितु तो जेल में पालन पोषण करने वाली और शौच साफ करने वाली माता द्वारा रोटी खाने की इच्छा प्रकट की। उसका इशारा जेल के जमादार श्री तेलूराम की ओर था। और वह भावुक क्षण जब भगतसिंह फांसी लगने से पहले उस सफाई कर्मचारी के हाथों बना खाना खुशी-खुशी खा रहे थे, यह एक संकेत था कि आजादी आने के बाद छुआछुत बिल्कुल नहीं रहेगी और कोई छोटा-बड़ा नहीं होगा। श्री रविदास का जन्मदिन सारा समाज मनाएगा और हर घर में महापुरूषों के चित्रों के साथ गुरू रविदास का चित्र भी सुशोभित होगा। श्री गुरूजी जन्मशताब्दी का सारतत्त्व भी यहीं था, समाजिक समरसत्ता यानि हिन्दवः सौदरा सर्वे।
जिव्हा से औकांर जप
हत्थन से कर कार
राम मिलंहि घर आईके
कह रविदास विचार
रविदास जनम के कारने
होत ने कोई नीच
कर को नीच कर डारि है
औछे करम की कीच
।।।।।।
राजा पीपा भक्त बना रविदास का
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