*पूर्णकालिक कार्यकर्ता - एक संकल्पना*
*प्रस्तावना*
स्वदेशी जागरण मंच में कार्य की तीव्र वृद्धि को देखते हुए पूरा समय देने वाले समर्पित कार्यकर्ताओं की आवश्यकता अनुभव होती है। इस आवश्यकता के समाधान को मूर्तरुप देने हेतु स्वर्णिम भारतवर्ष फाउंडेशन के अंतर्गत ‘पूर्णकालिक कार्यकर्ता योजना’ की प्रक्रिया वर्ष 2020-21 से ही प्रारंभ हुई है। वर्तमान में भारत में लगभग 250 ऐसे कार्यकर्ता स्वदेशी-स्वावलंबन का कार्य कर रहे हैं।
किंतु यह बड़ा प्रश्न है कि यह कार्यकर्ता कैसा है? कैसा होना चाहिए? उसकी संकल्पना क्या है? उसके कार्य क्या-क्या है? उसके मानदेय (अर्थ पूर्ति) के स्रोत क्या है? उसके अंदर किस प्रकार के गुण व्यवहार होना आवश्यक है? उसका प्रशिक्षण किस प्रकार का हो? वह अपने जिले को ही अपना देश मान कर मेरा जिला मेरा देश योजना को कैसे क्रियान्वित करता है, या कर सकता है? इस सारे पर इस लघु पुस्तिका में विस्तार से चर्चा की गई है।
यह सामग्री न केवल स्वर्णिम भारतवर्ष फाउंडेशन के अंतर्गत स्वदेशी व स्वावलंबन के कार्य में लगे कार्यकर्ताओं को उपयोगी होगी बल्कि स्वदेशी जागरण मंच और उसके बाहर के भी स्वदेशी प्रेमी संगठनों तथा अन्य स्वयंसेवी संगठनों को अपने यहाँ कार्यरत पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं की स्पष्ट संकल्पना देगी। इसके अतिरिक्त उनके प्रशिक्षण का भी नक्शा, इसमें से तैयार होगा। पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं का भावनात्मक स्तर क्या हो, प्रेरणा स्त्रोत क्या हो, ऐसे कार्यकर्ताओं के प्राप्ति केंद्र क्या हो, आदि विषय सामग्री हेतु सभी स्वदेशी, राष्ट्र कार्य में समर्पित कार्यकर्ताओं के लिए यह लघु पुस्तिका उपयोगी होगी, ऐसा विश्वास है।
*हमारी प्रेरणा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रचारक पद्धति*
स्वदेशी जागरण मंच, क्योंकि संघ विचार परिवार का ही संगठन है, इसलिए इसके सब कार्यकर्ताओं का मूल प्रेरणा स्रोत स्वाभाविक रूप से संघ ही है।
संघ में राष्ट्रकार्य को समर्पित स्वयंसेवकों के अतिरिक्त वहां बड़ी संख्या में प्रचारक कार्यकर्ता रहते हैं। यह प्रचारक कार्यकर्ता पूर्णतया समर्पित, जहां संगठन कहे वहां जाना, जिस संगठन में कहे, उस संगठन में कार्य करना, ऐसी एक उज्ज्वल परंपरा संघ में गत 100 वर्षों से चल रही है। यह उत्तम प्रचारक परंपरा ही हमारी इस योजना का प्रेरणा का स्रोत है।
ऐसे पूर्ण समर्पित व प्रशिक्षित पूर्णकालिक प्रचारक सभी संगठनों को मिलें, यह सबकी इच्छा रहती है। किंतु यह तो संभव नहीं है, क्योंकि नए प्रचारक कार्यकर्ताओं की एक सीमा रहती है। इसलिए स्वदेशी जागरण मंच ने कुछ मात्रा में उसकी पूर्ति की आवश्यकता को इस योजना से पूरा करने का प्रयास किया है। यद्यपि इसमें कुछ आर्थिक प्रक्रिया को भी समाहित किया गया है।
*पूर्णकालिक कार्यकर्ता: परिभाषा*
इस विचार को गहन चर्चा के बाद “पूर्णकालिक कार्यकर्ता योजना” की प्रक्रिया के रूप में क्रियान्वित किया है। जैसे कि पूर्व में भी कहा है कि पूर्णकालिक कार्यकर्ता का प्रेरणा स्रोत तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके प्रचारक ही हैं, यद्यपि स्वदेशी पूर्णकालिक परिवार वाले भी हैं और इसलिए उनके मानदेय (आर्थिक सहयोग) की व्यवस्था भी संगठन द्वारा की जाती है। हां! अनेक कार्यकर्ता बिना मानदेय के पूर्ण समर्पित विस्तारक (संगठक) श्रेणी के भी रहते ही हैं। ऐसे दो प्रकार के कार्यकर्ता पूर्णकालिक कार्यकर्ता और विस्तारक (संगठक) कार्यकर्ता, दोनों की काफी बातें सामान ही है। थोड़ा तकनीकी ही अंतर है। अन्यथा भावना, कार्य प्रशिक्षण, कार्य निष्पादन, यह सब तो एक जैसा ही होता है। इसलिए यहां पर इसको एक ही शब्द ‘पूर्णकालिक कार्यकर्ता’ की श्रेणी में रखकर समग्र विचार किया गया है।
*भावनात्मक स्तर आवश्यक*
सबसे पहली बात, कोई भी युवक जब स्वदेशी का पूर्णकालिक बनने को तैयार होता है तो यह देखना आवश्यक है कि उसका भावनात्मक स्तर कैसा है। उसके मन में देश समाज का कार्य करने की प्रबल इच्छा है क्या? वह स्वदेशी को, स्वलंबन को अपने जीवन में उतार कर दूसरों को भी, उसके बारे में प्रेरित और प्रशिक्षित करने की गहरी इच्छा रखता है क्या?
पूर्णकालिक कार्यकर्ता के मन में भारत को पूर्णरोजगारयुक्त, गरीबी मुक्त, समृद्ध और महान भारत बनाने का एक दिव्य स्वप्न होना, पहली अपेक्षा है। वह उसके प्रति ही समर्पित भाव रखकर पूर्णकालिक कार्यकर्ता बनने का निश्चय करता है। उसको या उसके परिवार को मिलने वाला आर्थिक सहयोग (मानदेय) यह विशेष महत्व का नहीं, यद्यपि उसकी आवश्यकता होती है। किन्तु उसके पूर्णकालिक बनने का विचार केवल उसी भावना पर ही टिका है... “तेरा वैभव अमर रहे मां, हम दिन 4 रहे न रहे..”
वैचारिक स्पष्टता चाहिएः पूर्णकालिक कार्यकर्ता के मन में अपने जिले के, देश के बेरोजगारों को देखकर दर्द उठता है कि क्या मैं भारत को बेरोजगारी की इस महामारी से मुक्त कराने में कुछ गिलहरी सहयोग कर सकता हूँ? क्या मैं भारत को पूर्ण रोजगार युक्त करने वाले इस महायज्ञ में अपनी भी कुछ आहुतियाँ डालना चाहता हूँ? क्या स्वदेशी के विचार को,स्वदेशी व्यवहार को घर घर तक पहुंचाने में अपना तन मन लगा सकता हूँ? यही विचार उसके मन मस्तिष्क में हर समय घूमते रहते हैं। “हर घर स्वदेशी, हर युवा उद्यमी के महामंत्र को अपने जिले के एक एक घर और एक एक युवक तक पहुंचाने के लिए वह समर्पित भाव से लगा रहता है। ”मेरा जिला मेरा देश“ इस विचार को मानकर अपने जिले में सब प्रकार के रोजगार सृजन, उद्यमिता, स्वरोजगार की योजनाएं और स्वदेशी का प्रबल भाव जागरण भरपूर हो, इसके लिये वह दिन रात चिंतन करता है। और संगठन से मिली हुई योजनाओं के आलोक में स्वयं होकर दिन रात जुटने की सोच में रहता है, जुटता है। ऐसा ही योग्य कार्यकर्ता पूर्णकालिक कार्यकर्ता कहलाता है।
*कार्यकर्ता प्राप्ति केंद्र, शिक्षा स्तर व अन्य आवश्यकताएं!*
सबसे पहला विषय तो यही आता है कि ऐसे समर्पित कार्यकर्ता कहाँ से मिलते हैं? स्वाभाविक रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनेक स्वयंसेवक, पूर्व में विस्तारक प्रचारक का अनुभव लिये हुए कार्यकर्ता मिल जाते हैं, वे स्वदेशी स्वलंबन के विचार को न केवल जल्दी से समझ जाते हैं बल्कि प्रारंभिक रूप से उनकी शिक्षा दीक्षा इन्ही संस्कारों में ही हुई होती है। इसी प्रकार विद्यार्थी परिषद, युवा मोर्चा व अन्य विचार परिवार के संगठनो से भी इस प्रकार के कार्यकर्ता सम्पर्क करने पर मिल जाते है। स्वदेशी जागरण मंच के और स्वालंबी भारत अभियान के अपने तंत्र से तो आते ही आते हैं। लेकिन समाज जीवन में भी अनेक कार्यकर्ता ऐसे रहते हैं जिनके मन में देशभक्ति, स्वदेश प्रेम और समाज के लिए कुछ कर गुजरने की इच्छा शक्ति रहती है उन्हें चिह्नित करना होता है।
अपने यहाँ अनेक प्रकार के प्रयोग हुए हैं। कई महाविद्यालय, विश्वविद्यालय के अध्यापकों ने ऐसे योग्य छात्रों को इसके लिए प्रेरित किया है तो वहीं सोशल मीडिया में आवश्यकता देने से अनेक युवक मिल जाते हैं, सब प्रकार के प्रयास करना चाहिए। बस एक ही मापदंड होना चाहिए कि वह सुशिक्षित तो हो लेकिन उसने मन में समाज के काम करने की भावना आवश्यक होनी चाहिए कोई कर्मचारी भाव या आर्थिक लालच में न आए।
कुछ मात्रा में प्रारंभ में अर्थिक आवश्यकता हेतु भी आते हैं,फिर भी हम उन्हें योग्य समर्पित कार्यकर्ता बदलने की अपनी प्रक्रिया से समृद्ध कर लेते हैं।
*माननीय मदनदास दैवी जी का मार्गदर्शन*
स्वदेशी जागरण मंच के सह-संयोजक और मार्गदर्शक रहे स्वर्गीय माननीय मदन दास जी देवी जी कहा करते थे, ”।बबमचज ंे पज पे इनज उंाम ंे लवन ूंदज“.हमें भी ऐसे सब प्रकार के युवक-युवतियों को संपर्क करके अपने संगठन में लाना और अपने प्रयास से प्रशिक्षण, संगठन कौशल और कार्यपद्धति का उपयोग कर एक योग्य समर्पित कार्यकर्ता के रूप में तैयार करना चाहिए, करना होता है। यह अपनी कार्यपद्धति है।
सामान्यता वे स्नातक अवश्य हों परासनातक हो तो और भी अच्छा। इकोनॉमिक्स, पॉलिटिकल साइंस या एमएसडब्ल्यू जैसे विषयों के पोस्ट ग्रेजुएट थोड़ा जल्दी से अपने विषयों को पकड़ लेते हैं। फिर यदि उन्हें कुछ सामाजिक कार्य का अनुभव हो और सोच व दृष्टि भी वैसी हो तो स्नातक से कम भी रहा तो भी चल सकता है।
सामान्यतया इस कार्य के लिए युवा काफी उपयुक्त रहते हैं यद्यपि बड़ी उम्र में वरिष्ठ नागरिक कार्यकर्ता भी पूर्णकालिक कार्यकर्ता के रूप में सफलतापूर्वक कार्य कर रहे हैं। एक बार फिर से आवश्यक मापदण्ड में, सात्विक भावना और प्रबल इच्छा शक्ति है कि इस देश को स्वदेशी और स्वावलंबन के मार्ग पर तेजी से आगे बढ़ाना है, वही वास्तव में उसकी अनिवार्य आवश्यकता है। बाकी सभी चीजें दूसरे स्थान पर आती है। अनेक स्तर पर योग्य युवतियां भी इस योजना में कार्यरत हैं।
*प्रशिक्षण व योग्यता क्षमता विकास*
कोई भी कार्यकर्ता घर से इस प्रकार के कार्य के लिए प्रशिक्षित होकर नहीं आता। उसे हमें प्रशिक्षित करना होता है। इसके लिए ऐसे नए बंधुओं/भगनियों हेतु को अनौपचारिक, औपचारिक शिक्षण की लम्बी प्रक्रिया चलानी होती है।
पहला प्रशिक्षण तो प्रत्यक्ष अपने क्षेत्र में ही होता है। इसके लिए सबसे पहले अपने पूर्णकालिक कार्यकर्ता हेतु एक पालक कार्यकर्ता का होना आवश्यक है जो उस जिले या प्रान्त का कोई प्रमुख कार्यकर्ता हो।
उसके साथ चर्चा, दैनिक अभ्यास, जिसमें विद्यालय, महाविद्यालयों में संपर्क, वहां जाकर स्वदेशी और स्वावलंबन के बारे में बताना, भाषण करना, प्रशिक्षण देना, वहां पर स्वावलंबन केन्द्र बनवाने का आग्रह करना शामिल है। फिर पहले से चल रहे वहां कौशल विकास केंद्र, अटल टिंकरिंग लैब या उद्यमिता सेन्टर, एम्प्लॉयमेंट सेल आदि का अध्ययन करना, चर्चा करना प्रशिक्षण का हिस्सा होता है। इसके अलावा भी अपने वरिष्ठ और सहयोगी कार्यकर्ताओं के साथ चर्चा करके, स्वदेशी और स्वावलंबन के विषय को समझना चाहिए।
वह जब प्रत्यक्ष स्थान स्थान पर जाता है,बोलता है तो उसका प्रशिक्षण सबसे अधिक गति से होता है। अनौपचारिक चर्चा और वरिष्ठ कार्यकर्ताओं से संवाद और व्यवहार से भी यह कार्यकर्ता सीखने लगता है।
इसके अतिरिक्त प्रत्येक प्रांत को अपने यहाँ पर एक मास से लेकर दो मास के बीच में इन कार्यकर्ताओं का दो दिवसीय प्रशिक्षण वर्ग की प्रक्रिया चलाते रहना चाहिए। ताकि बैठकें, कार्यक्रम व प्रशिक्षण एक साथ चलता रहे।
केन्द्र स्तर पर भी वर्ष में एक बार कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाती है। किन्तु सबसे प्रमुख प्रशिक्षण तो अपने प्रांत और क्षेत्र में ही होता है।
*शिक्षण-प्रशिक्षण के विषय*
शिक्षण के विषयों में स्वदेशी पर बहुत अच्छा वक्ता होना, प्रवक्ता होना चाहिए. अपने जिले, अपने प्रांत के आंकड़े जुटाना, उसके अनुसार बोलना, बीच-बीच में उदाहरण देना, इसका भी अभ्यास करना होता है।
जन अभियान के लिए अनिवार्य शर्त होती है - अच्छे प्रबल प्रवक्ता। उदाहरण के तौर पर राम जन्म भूमि आंदोलन को फैलाने में जिन 2-3 बड़े संतों का योगदान रहा, वे हैं दीदी रितम्बरा, साध्वी उमा भारती, आचार्य धर्मेन्द्र.. वे बहुत ही प्रबल प्रवक्ता रहे। उनको सुनने के लिए हजारों लोग स्वयं पहुंच जाते थे जिससे जन अभियान को नीचे तक पहुँचाने में, जन आंदोलन बनाने में बहुत सुविधा हुई। उस अभियान में ऐसे सैकड़ों प्रबल प्रवक्ता लगे थे।
हमें भी अगर स्वदेशी को एक जन अभियान बनाना है तो हमारे पूर्णकालिकों को, अन्य कार्यकर्ताओं को भी स्वदेशी पर बहुत अच्छा वक्ता और प्रवक्ता बनना चाहिए। फिर स्वदेशी की समग्र अवधारणा को समझाना, आर्थिक शब्दावली से लेकर विभिन्न आर्थिक विषयों, जैसे- एफडीआई, व्यापार समझौते, एफटीए आदि का हमारे देश को लाभ-हानि आदि पर गहन अध्ययन करना होता है। स्वदेशी की विकास यात्रा से लेकर भविष्य उन्मुखी युगानुकूल स्वदेशी का भी गहन अध्ययन आवश्यक है। स्वदेशी के विभिन्न क्षेत्रों में बढ़ते आयाम, स्वदेशी-विदेशी की सूची से लेकर, विकास के भारतीय प्रतिमान तक अध्ययन, चिंतन, क्रिया करनी होगी।
*प्रशिक्षण के दूसरे विषय में है स्वावलंबन*
क्योंकि हमारा बेरोजगारी दूर करने और पूर्ण रोजगार युक्त भारत बनाने का मंत्र ही है कि ”मुझे नौकरी लेने वाला नहीं, देने वाला बनना है।“ वैसे भी नौकरियां तो 10-12 प्रतिशत से ऊपर होती ही नहीं। इसलिए स्वरोज़गार और उद्यमिता की तरफ देश के समस्त युवाओं को मोड़ना है।
यह पहली दृष्टि में उन्हें कठिन लगता है किन्तु हमने जो स्वरोजगार और उद्यमिता का, जैविक उद्यमिता का सिद्धान्त निकाला है, जिस पर प्रोफेसर राजकुमार मित्तल जी की पुस्तक श्जैविक उद्यमिताः 37 करोड़ स्टार्टअप्स का देशश् पुस्तक भी है उसका गहन अध्ययन व अभ्यास करने से हमारे पूर्णकालिक बहुत अच्छे प्रशिक्षित होंगे। उस पुस्तक में 25 सफल गाथाओं सहित, ऐसे सिद्धांत दिए हैं जिससे सामान्य गाँव शहर का व्यक्ति 18..20 साल की उम्र में बिना कोई बहुत बड़ी राशि या संसाधनों के भी अच्छा स्वरोजगार और उद्यमिता में आगे बढ़ सकता है। वह पुस्तक अपने आप में उद्यमिता का एक बड़ा प्रशिक्षण ग्रंथ हैं।
*तत्काल समाधान*
जैविक उद्यमिता के 5 सिद्धांतों को लेकर जब अपने कार्यकर्ता विद्यालय, महाविद्यालय या युवाओं के समूह में जाएंगे तो स्वाभाविक रूप से वे आकर्षित होंगे और अपने अभियान से जुड़ सकेंगे। फिर आपस में चर्चा करवाना, स्वदेशी के विषय विशेषज्ञों को, अपने पूर्णकालिकों के साथ समय समय पर चर्चा करना करवाना यह भी प्रशिक्षण का ही हिस्सा है। उद्यमिता, स्टार्ट-अप्स पर विभिन्न प्रकार की कार्यशालाएं, गट चर्चा, सरकारी योजनाओं की जानकारी एकत्र, करना कैसे, यह भी प्रशिक्षण लेना होगा।
*प्रतिदिन के कार्य और प्रवास*
जिला प्रशिक्षकों एवं पूर्णकालिक को सबसे बड़ी बात समझनी होती है कि वह प्रतिदिन 8-10 घंटे किस प्रकार स्वदेशी व स्वावलंबन का कार्य करें।
मुख्यतः दिन के दो भाग करने होते हैं। एक में किसी विद्यालय, महाविद्यालय में जाना, वहां पर विषय रखना और फिर वहां के प्रतिष्ठित व्यक्तियों, सफल उद्यमियों, सरकारी अधिकारियों, संघ व विचार परिवार के प्रमुख कार्यकर्ताओं से संपर्क संबंध बनाना शामिल है।
दूसरे भाग में स्वावलंबन केंद्र पर बैठकर,सोशल मीडिया व अन्य मीडिया प्रचार तंत्र का अधिकतम उपयोग करना चाहिए। कैसे नए वीडियो, नए पोस्टर बनाए जाते हैं, इसका प्रशिक्षण प्राप्त करना। आवश्यकता पडऩे पर केंद्र से आए हुए समाचारों, वीडियो, पोस्टर का उपयोग करना अपने व्हाट्सऐप ग्रुप बनाना और सब प्रकार का प्रचार प्रसार करना।
फिर 2-3 घंटे जिला स्वावलंबन केंद्र में बैठकर कार्यकर्ताओं से बातचीत, साप्ताहिक,पाक्षिक या मासिक बैठकों का आयोजन करना। तरंग बैठकों का आयोजन, युवाओं को वहां बुलाना आदि भी कार्य हैं।
प्रतिदिन सुबह निश्चय ही हम किसी न किसी विद्यालय महाविद्यालय या जहां भी युवक युवती उपलब्ध हैं वहां जाकर स्वदेशी विषय को प्रखरता से रखना। और रोजगार का विषय, स्वरोजगार उद्यमिता का महत्व और प्रशिक्षण करना यह प्रत्येक पूर्णकालिक का प्रथम कार्य है।
उन विद्यालयों में उद्यमिता स्वावलंबन केंद्र खड़े करना, पहले से वहां पर यदि कौशल विकास के कोई उपक्रम है,तो उन्हें अध्ययन करना, प्रधानाचार्य या मैनेजमेंट को वहां स्वावलमन केंद्र खोलने के लिए प्रोत्साहित करना, यह प्रतिदिन 2-3 घंटे का काम है।
फिर वहां के पुराने कार्यकर्ताओं से विद्यालय के प्रधानाचार्य या प्रबंध समिति को पहले फ़ोन करवाकर जाना काफी उपयोगी रहता है और जब जाएं तो सहज एक कक्षा में विषय रखने का आग्रह करना। वहां के किसी अध्यापक को स्वदेशी स्वावलंबन प्रमुख बनवाने का भी प्रयास करना चाहिए। ध्यान रखना चाहिए कि हम विद्यालय में इन विषयों को प्रोत्साहित और सहयोग करने के लिए गए हैं। वहां पर निरीक्षण करने या उन्हें समझाने,भाषण देने नहीं। विशेष कर वरिष्ठ अध्यापक, प्रधानाचार्य आदि को समझाने की जगह सहज चर्चा करना अधिक उपयोगी रहता है।
*प्रवास*
प्रत्येक कार्यकर्ता, चाहे जिला, विभाग अथवा प्रान्त.. क्षेत्र का हो, उसकी सबसे बड़ी आवश्यकता होती है कि वह सतत प्रवास करे। जिला केंद्र पर कार्य होने के बाद खंडों में और छोटे नगरों में व्यापक प्रवास सबको करना चाहिए। यहां तक कि उपनगरों में और गाँव बस्तियों तक में भी प्रवास करना संगठन की आवश्यकता है।
अगर ग्रामीण क्षेत्र है तो 5-6 बंधुओं की स्वदेशी पंचायत बनायंे और यदि नगरीय क्षेत्र है तो 5-6 बंधुओं की स्वदेशी टीम बनाएं। ताकि वे आगे भी इस कार्य को करते रहें। इससे संगठन तंत्र का निर्माण होता है। प्रवास में जाते हुए कुछ पत्रक, पुस्तिकाएं साथ लेकर जाना उपयोगी है। कुछ सोशल मीडिया का कंटेंट, उनसे मित्रतावत बातचीत और जिला स्वावलंबन केंद्र का उपयोग उन्हें बताकर आना चाहिए।
वास्तव में स्वावलंबन केंद्र,स्वदेशी स्वावलंबन,और उससे जुड़ी हुई सब गतिविधियों का एक जिला कार्यालय भी होता है।उसको सक्रिय रखना, वहां पर कार्यकर्ताओं का आना जाना, बैठकें करना अपेक्षित है। अपना यह केंद्र कार्यक्रमों का, रचनाओं का, केंद्र होना, यह स्वाभाविक रूप से होना चाहिए। और पूर्णकालिक यदि प्रतिदिन वहां 2-3 घंटे बैठेंगे तभी यह नियमित व सक्रिय रहेगा।
प्रवास तो किसी भी संगठन का प्राण होता है। प्रांतीय कार्यकर्ताओं को अनेक को हम जानते हैं जो 18-20 दिन का भी प्रवास करते हैं। जिले वालों ने भी सप्ताह में 3 दिन कम से कम प्रवास पर जरूर जाना चाहिए।
वहाँ इकाइयाँ स्थापित करना, कार्यकर्ताओं से सम्बन्ध बनाना, बढ़ाना आगामी कार्यक्रमों की चर्चा करना, आदि। धीरे-धीरे व सहज रूप से अपने कार्यक्रम स्वयं करने लग जाएं। ऐसी वहां की स्वावलंबी टीम विकसित करना।जिले भर में फ़ोन इत्यादि से हमारा नियमित व सहज संवाद बना रहना चाहिए।
*जिला स्वावलंबन केंद्र*
पंडित दीनदयाल उपाध्याय कहा करते थे कि भारत की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए दो ही शब्दों का प्रयोग करना हो तो वे हैं स्वदेशी और विकेन्द्रीकरण। वास्तव में इस विकेन्द्रीकरण का व्यवहारिक अर्थ है - जिला केंद्रित होना। वैसे अब सरकारें भी इसको मान्य करने लगी हैं और हर जिले की जीडीपी की मैपिंग करवाई जा रही है। हमें भी ज़िला को ही सब प्रकार के रोजगार व अर्थ सृजन कि गतिविधियों का केंद्र बनाना है। उसके लिए एक कार्यालय की आवश्यकता होती है, उसे ही हम जिला स्वावलंबन केंद्र कहते हैं। यह किसी भी अपने संगठनों के भवन, सरकारी महाविद्यालय,सरकार के उद्यमिता केंद्र में हम शुरू कर सकते हैं। जहां पर कार्यकर्ताओं को सामान्य जन को आने जाने में सहज सुविधा हो, पार्किंग की व्यवस्था हो, वहां पर बैठने की सामान्य व्यवस्थाएं हों, पीने का पानी लघु शंका इत्यादि का भी साफ सुथरा स्थान हो। सब प्रकार का साहित्य, कंप्यूटर अलमारी आदि वहां पर उपलब्ध रहे। जिले के बारे में सब प्रकार की जानकारियां भी वहां पर उपलब्ध रहें। धीरे-धीरे करके वहां उद्यमियों का, युवाओं का, यहां तक कि सरकारी अधिकारियों के भी आवागमन व सक्रियता का केंद्र रहे। यदि वहां कोई कौशल विकास केंद्र या उद्यमिता केंद्र भी बन जाता है तो अच्छा है। परंतु अनिवार्य शर्त है कि वह प्रति दिन 3-4 घंटे के लिए खुलना चाहिए। टीम-11 के कार्यकर्ता वहां नियमित आते-जाते हैं। जिला स्वावलंबन केंद्र, हर जिला केंद्र पर होना यह बहुत आवश्यक और उपयोगी है।
*कुशल संघटक*
अपना पूर्णकालिक कार्यकर्ता, नए व्यक्तियों को संपर्क करने में उनको स्वदेशी व स्वावलंबी भारत अभियान के साथ सक्रिय रूप से जोड़ने में कुशल रहता है।
वह सब प्रकार के योग्य कार्यकर्ताओं को, लोगों को, समाज जीवन में से संपर्क करके अपने विनम्र और प्रेम पूर्ण व्यवहार के माध्यम से, उनको भी इस देश कार्य, याने स्वदेशी कार्य में लगा लेता है।
वह सब प्रकार की योजनाएं जो कार्य वृद्धि के लिए आवश्यक हों वह करने में कुशल रहता है।
वह बैठकें, कार्यक्रम, वर्ग आदि करने में निपुण है। थोड़े संसाधनों और छोटी टीम से भी चरणबद्ध तरीके से अच्छे परिणाम लाए जा सकते हैं। इसके अनेक उदाहरण उपलब्ध है। अभी दो महीने पहले ही छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में जहां पहले नक्सलवादियों का आतंक रहता था, वहां अब परिस्थिति अनुकूल होने पर अपने कार्यकर्ताओं ने वहाँ के विश्वविद्यालय के साथ मिलकर दो ही दिन में 1500 से अधिक युवाओं को, उद्यमिता में, प्रोत्साहित और प्रशिक्षित किया। इसमें अपने पूर्णकालिकों की प्रमुख भूमिका रही।
*निधि संग्रह कुशलताः एक आवश्यक अंग*
पूर्णकालिक कार्यकर्ता सब प्रकार के कार्यों के लिए आवश्यक, निधि संग्रह भी कर लेता है। उसकी योजना बना लेता है।
अनेक कार्यकर्ताओं को पैसा मांगने में बहुत संकोच रहता है। शर्म लगती है, वे हिम्मत ही नहीं कर पाते, किसी से 500 रूपये मांगने में भी।
किंतु अपने पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं को ध्यान रखना होगा कि अपने लिए मांगना तो उचित नहीं है किंतु समाज कार्य के लिये, देश कार्य के लिए, स्वदेशी अभियान के लिए, स्वदेशी स्वावलंबन के कार्यक्रमों के लिए समाज से मांगना, यह बिल्कुल भी संकोच का विषय नहीं होना चाहिए। समाज का काम करने के लिए समाज से मांगना सर्वथा उचित है। वैसे कबीर जी ने कहा है ”मर जाऊँ मांगू नहीं अपने तन के काज, परमारथ के कारने मोहे ना आवत लाज“।
परमार्थ के लिए यानी दूसरों के लिए, समाज के लिए मांगने में किसी प्रकार का संकोच, शर्म नहीं करना चाहिए। हाँ यह बात अलग है,कि कभी अकेले मांगने नहीं जाना। जब भी जाएं, दो, तीन या चार लोगों को एक साथ जाना चाहिए। तो वह उत्तम रहता है. उससे राशि तो अधिक मिलती ही है। यह विश्वसनीयता पारदर्शिता और आर्थिक शुचिता के लिए भी आवश्यक रहता है।
मार्च-अप्रैल में होने वाले नियमित निधि संग्रह अभियान के अतिरिक्त भी व डिजिटल मोड से उलेइंण्बवण्पद का उपयोग करते हुए, कभी भोजन के नाम पर, कभी कार्यक्रम के नाम पर वह समाज जीवन में से पैसा जुटाने में सफल रहता है। यहाँ पंडित मदन मोहन मालवीय जी के नाम भी स्मरण करना भी उपयोगी होगा कि कैसे उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय निर्माण किया। उस समय आज की तरह फ़ोन आदि संसाधन नहीं थे तब भी समाज से ही संपर्क करके करोड़ों रुपये इकट्ठा किया और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना की। हम पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं को भी ऐसे ही समाज जीवन में से निधि संग्रह का आग्रह करना, संग्रह करना यह अपेक्षा है। हां, इसमें आर्थिक स्वच्छता और परिपक्वता का ध्यान रखना। जैसे पहले भी कहा है कि कभी भी अकेले निजी संग्रह की बात नहीं करना। नकद राशि लेने से हरदम बचना। अभी डिजिटल मोड का समय है। उसका उपयोग कर पारदर्शी तरीके से निधि संग्रह अभियान को हम प्रतिवर्ष करने का अपना बहुत सफल प्रयोग चल ही रहा है।
*मेरा जिला, मेरा देश*
जैसा कि पहले भी विषय आया है कि हम विकेन्द्रीकरण के विचार के तहत, ज़िला केन्द्रित सब प्रकार की योजनाएं करें। इसी संदर्भ में एक समग्र विचार योजना है - ‘मेरा जिला, मेरा देश’।
संघ के सरकार्यवाह हुए माननीय हो.वे. शेषाद्री जी, एक बार जब उनसे चर्चा हुई, तो उन्होंने कहा ”थवत ंसस चतंबजपबंस चनतचवेमेए उल भ्पदकन त्ंेीजत पे उल ांतलोीमजतं“
अर्थात सब प्रकार के प्रयोग करने के लिए मेरा कार्यक्षेत्र ही मेरा राष्ट्र(देश)है। उसी विचार पर आगे बढ़ते हुए हम कह सकते हैं कि मेरा जिला ही मेरा देश है। और मैं इस देश (जिला) की आर्थिक व रोजगार की रचनाएं करने वाला, सचिव कार्यकर्ता।
मुझे इस दृष्टि से अपने मन मस्तिष्क को न केवल पूरी तरह तैयार करना होगा बल्कि मुझे इसकी बड़ी कल्पनाएं भी संजोनी होंगे। आए हुए कार्यक्रमों को क्रियान्वयन करना यह एक बात है किन्तु स्वयं से कार्यक्रम की योजना करना, रचना करना उसके लिये आवश्यक कल्पना संजोना, यह बड़ी प्रमुख बात है। हम क्या अपने जिले को पूर्ण रोजगारयुक्त, समृद्धियुक्त जिला बना सकते हैं? सोचें!
लक्ष्य वही वाला है - पूर्ण रोजगार युक्त और समृद्धि युक्त भारत और इस योजना में मेरा भारत, मेरा जिला ही है। इसलिए प्रत्येक पूर्णकालिक कार्यकर्ता को अपने जिले की टीम के साथ इस विषय पर गहराई से विचार मंथन करना होगा। और, क्या क्या हम योजनाएं तुरंत कर सकते हैं? केंद्र के दिशा निर्देश व मार्गदर्शन में।
*जिले का गहन अध्ययन करना*
हमारे जिले की आबादी कितनी है? युवा आबादी कितनी है? शिक्षण संस्थान कैसे है? छोटे बड़े उद्योग कैसे है? कृषि में क्या क्या विशेष है? जिले से पलायन होता है क्या? जिले की अन्य ऐसी सामाजिक, शैक्षिण, आर्थिक या राजनैतिक परिस्थिति, जो वहां के आर्थिक उठाव में रोड़ा बन रही है? इन सबका, सब प्रकार से अध्ययन करना चाहिए। फिर यह अपने जिले की टोली के साथ मिलकर एक अच्छा बड़ा प्रकल्प,योजना करने का विचार करें। परामर्श सबसे करना। उस जिले में कोई अच्छे अर्थशास्त्री भी रहते होंगे, कोई सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी भी रहते होंगे या अन्य जो सफल उद्यमी हैं अर्थ और रोजगार सृजन करना जानते हैं,इसमें रुचि है। ऐसे सब प्रकार के लोगों की एक वहां समिति बनाकर प्रत्येक जिले को हम, पूर्ण रोजगार युक्त व समृद्धि युक्त बनाने के लिए सब प्रकार के प्रयत्न करेंगे, एसा निश्चय करें। जिला स्वावलंबन केंद्र इस सबका स्वाभाविक केन्द्र बिन्दु बनेगा।
ऐसे सब प्रकार के लोगों के साथ चर्चा विमर्श करके, फिर नियमित रूप से बैठकें इत्यादि करके, निर्णय करने होंगे और क्षेत्र में उस प्रकार के परिवर्तन आये। सब प्रकार के स्वदेशी स्वावलंबन को,उद्यमिता के प्रयोगों को भी हम प्रारंभ करें।
फिर संगठनात्मक कार्यक्रमों का भी ध्यान रखें। उन्हें पूरी तरह से व प्रभावी तरीके से वहां पर लागू करना होगा।
*सरकार की योजनाएंः कितना उपयोग?*
एक बड़ा विषय रहेगा। क्या हमें सरकारी योजनाओं में पड़ना? यहां एक बात को स्पष्ट रखें, की सरकारी योजनाओं में जाना और राजनीतिक प्रक्रिया में जाना ये दोनों अलग-अलग बातें हैं। राजनीति में कभी नहीं जाना, पर सरकारी योजनाओं की पूरी जानकारी लेना। उनको सहयोग देना और सहयोग लेना। यह दोनों करना। क्योंकि यह सच है कि सरकारी योजनाएं होती तो बहुत अच्छी हैं किन्तु वे जमीन पर नहीं उतर पाती और हमारे पास उतने संसाधन नहीं होते। इसलिए यदि स्वावलंबी भारत अभियान के कार्यकर्ता, स्वदेशी के कार्यकर्ता ऐसे उस जिले के लिए अपेक्षित, सब प्रकार की सरकारी योजनाओं का अध्ययन करें। सरकार के अधिकारियों से चर्चा करें और उनमें जो गैप है, अन्तर है, उसको पूरा करने का प्रयत्न करें। इससे बहुत बड़ा काम होने की संभावना होती है। हां यह अवश्य ध्यान करना चाहिए, सरकारी प्रकल्पों, योजनाओं से लाभ लेना और उनको उनके साथ तालमेल बिठाना तो ठीक है किन्तु उसी में ही उलझ कर नहीं रह जाना। हम असरकारी सामाजिक आर्थिक अभियान चला रहे हैं। इसको हमेशा स्मरण में रखें।
*जो असरकारी है, वही असरकारी है*
विनोबा भावे जी कहा करते थे, जो असरकारी है, वही असरकारी है। हमारा यह सामाजिक आर्थिक अभियान क्योंकि ध्येय निष्ठा से चल रहा है। इच्छा शक्ति से चल रहा है। संगठन की ताकत के आधार पर चल रहा है। इसलिए इसी का अधिक व्यापक उपयोग होगा। हाँ सरकारी योजनाओं से तालमेल करने और लेनदेन करने में, किसी प्रकार की कठिनाई नहीं है। बस राजनीतिज्ञों के, मंत्रियों, विधायकों आदि के चक्कर काटना, ये हमारी कार्य पद्धति में नहीं है। इसका ध्यान अपने कार्यकर्ता रखते ही हैं।
*पूर्णकालिक द्वारा स्व विकास प्रक्रिया।*
महात्मा बुद्ध ने कहा है - ‘आत्म दीपो भव’ अर्थात स्वयं को ही प्रकाशमान बनाओ, स्वयं का विकास, स्वयं द्वारा।
पूर्णकालिकों का यह प्रश्न होता है कि हमारा मार्गदर्शन कौन करे? हमारी सहायता कौन करे? यह ठीक है कि अपने क्षेत्र में वरिष्ठ कार्यकर्ता होते हैं, पालक होते हैं। किंतु वास्तव में प्रत्येक कार्यकर्ता/व्यक्ति को सबसे अधिक स्व-विकास, स्वयं से करना होता है। ऐसा वे सकारात्मक चिंतन के द्वारा कर सकते हैं, अध्ययन के द्वारा, वरिष्ठ लोगों से चर्चा के द्वारा कर सकते हैं।
जब हम सकारात्मक रहते हैं शांत रहते हैं और उस समय पर अपने विकास के बारे में सोचते हैं। अपने जीवन के सात्विक बड़े लक्ष्यों के बारे में सोचते हैं। तो प्रकृति हमें ऐसे विचार भेजती है कि जिससे हम अपने व्यवहार को, गुणों को योजनाओं को स्वयं दिशा देने लगते हैं इस प्रकार स्वयं अपना विकास करते रहते हैं।
सुबह के समय अथवा एकान्त के समय जब आप शांत होते हैं,किसी के प्रति रिएक्शन में नहीं होते किसी नकारात्मक सोच में न हो उस समय पर सकारात्मक रूप से अपने मन के अंदर बड़े विचार के बारे में सोचिए। वर्तमान में चिंतन करिए.आप देखेंगे कि आपके अन्दर ही सात्विक ऊर्जा खड़ी होने लगेगी। फिर जब हम श्रेष्ठ साहित्य को पढ़ते हैं, सफल महापुरुषों की कहानियों को पढ़ते हैं और सफल व्यक्तियों को पढ़ते हैं, केवल उन्हें नहीं जो अधिक पैसा कमाते हैं, उन्हें भी जो जीवन की किसी भी विधा में अच्छे सफल हुए हैं उन्हें पढ़ते हैं तो हमें भी सफलता के मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है, सोच मिलती है।
फिर एक बड़ा तरीका अपने वरिष्ठ कार्यकर्ताओं से खुली चर्चा, संवाद भी है। वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को समझने की कोशिश करना। स्वयं को विनम्रता और शिष्य भाव में रखना, बहुत उपयोगी होता है। स्व-विकास की अनिवार्य शर्त भी है।
वास्तव में जब हम अनुभवी कार्यकर्ताओं से सीखते हैं,समझते हैं तो स्व विकास का मार्ग स्वयं बनाते हैं।
*टीम वर्क व संवाद*
सफलता का मार्ग, आधार होता है - टीम वर्क। हम जब कार्य करने को चलते हैं तो बड़ी आवश्यकता होती है टीम वर्क की, सिनर्जी की। जब हम अपने संगठन में खुला संवाद करते हैं अपनी टीम के बंधुओं से बातचीत करते हैं चीजों को छिपाते नहीं, तो एक सिनरजी व टीम वर्क पैदा होता है फिर हमें,अपने पालक कार्यकर्ता से अच्छा संवाद रखना हर विषय बता देना। अपने से कोई गलती हुई तो भी उन्हें बताना। इससे न केवल आपसी विश्वास बढ़ता है बल्कि हमारे।
विकास का मार्ग भी प्रशस्त होता है। टीम वर्क से विजय का बड़ा सुन्दर छायांकन ‘चक दे इण्डिया’ फिल्म में किया गया है। जहां हॉकी की खिलाड़ी लड़कियां तभी गोल कर विजय पा जाती है, जब वे टीम वर्क कर एक दूसरे को पास देती हैं। स्वदेशी में भी हमें एक दूसरे का सहयोग करना होता है, एक-दूसरे की गलतियां नहीं निकालनी होती।
जब हम उत्तम टीम वर्क या सिनर्जी से काम करते है तो हम निश्चित होकर, अधिक ऊर्जा और शक्ति के साथ अधिक स्वदेशी व स्वलंबन का कार्य कर पाते हैं।
*मानदेय स्थानांतरण और केंद्र*
पूर्ण कालिक कार्यकर्ता के मन में अनेक विषय आते होंगे जिनमें से एक विषय है कि मुझे कितना और दूसरों को कितना मानदेय मिलता है?
इसमें एक बात तो स्पष्ट है यह कोई सैलरी नहीं होती या वेतन नहीं होता। पूर्णकालिक कार्यकर्ता समर्पित भाव से स्वदेशी के लिए कार्य करता है समाज देश के लिए कार्य करता है तो उसकी और उसके परिवार की कुछ आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए समाज (संगठन) उसकी चिंता करता है। इसका निर्धारण किसी निश्चित राशि के रूप में नहीं रहता। बल्कि प्रत्येक कार्यकर्ता से व्यक्तिगत चर्चा के आधार पर, उसके परिवार की स्थिति के आधार पर,उसकी योग्यता क्षमता व अनुभव के आधार पर यह संगठन द्वारा तय किया जाता है। यह अधिकार नहीं है। यह वास्तव में उसे और उसके परिवार को मिलने वाला समाज की तरफ से सामान्य सहयोग है। इस में स्थिति अनुसार परिवर्तन भी होता रहता है। अनुभव, क्षमता और परिणाम देखते हुए पहले की अपेक्षा वह बढ़ाई भी जा सकती है। बढ़ाते ही है, लेकिन अपवाद स्वरूप घटाई भी जा सकती है।
इसलिए इस विषय की सार्वजनिक चर्चा नहीं की जाती। यह मानदेय जो प्रतिवर्ष निधि संग्रह अभियान होता है व अन्य समाज के बंधु मंच को और अभियान को सहयोग करते रहते हैं उसमें से इसकी व्यवस्था की जाती है।
अनेक कार्यकर्ता ऐसे भी हैं जो शुरू में मानदेय लेते हैं लेकिन बाद में वे उसे बंद कर देते हैं और विस्तारक संगठन की श्रेणी में चले जाते हैं और यह अच्छी सोच भी है। कार्यकर्ता के विकास की दिशा भी होती है।
*कार्यकर्ता का केंद्र स्थानान्तरण*
एक और विषय है कार्यकर्ता का केंद्र कहां रहना चाहिए? काफी कार्यकर्ताओं का तो केन्द्र उनका परिवार ही होता है किन्तु पूर्णकालिक कार्यकर्ता सदा ही संगठन द्वारा निर्धारित किसी भी कार्यालय पर, स्थान और जिले में जाता है। वहीं रहकर प्रवास व कार्य करना है। संगठन की आवश्यकतानुसार उसका स्थानांतरण किया जा सकता है। उसे सदा इस मानसिकता में ही रहना चाहिए। और यह प्रसन्नता का विषय रहना चाहिए न कि मजबूरी का।
प्रसन्नता इसलिए है कि वह संगठन की आवश्यकतानुसार अपने आपको ढालने में सहज महसूस करता है। और वहाँ जाता है जहां पर आवश्यकता होती है। यह उसके सफल व पूर्ण समर्पण का प्रतीक भी होता है।
अनेक बंधु दूसरे प्रांत में जाकर भी पूर्णकालिक कार्यकर्ता का कार्य कर रहे हैं। जैसा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में भी होता है।
फिर पूर्णकालिक योजना यह ज़िला प्रान्त की नहीं ब्लकि केंद्रीय योजना है। सभी स्तर के पूर्णकालिक कार्यकर्ता केंद्र की योजना अनुसार ही तय स्थान पर जाते हैं। तय दायित्व को स्वीकार करते हैं, तय संगठन में जाते हैं। यद्यपि व्यवहारिक रूप से प्रांत इस विषय में प्रमुख भूमिका निभाता है।
*अब एक ही धुन, जय-जय भारत!*
सब प्रकार से प्रशिक्षित होकर प्रेरणा से भर कर स्वर्णिम भारतवर्ष फाउंडेशन द्वारा की गई प्रशिक्षण प्रक्रिया से निकलकर यह पूर्णकालिक कार्यकर्ता समाज जीवन में उतरा है।
फिर केवल स्वदेशी ही नहीं, बल्कि सब सामाजिक, धार्मिक संगठनों में पूर्णकालिक समर्पित कार्यकर्ताओं के निकलने की भारत में लंबी परंपरा है।
इस्कॉन के, स्वामीनारायण मंदिर के सन्यासी हों, जग्गी वासुदेव व श्री श्री रविशंकर जी महाराज... आदि के साधक हों या बाबा रामदेव के योग प्रशिक्षक, भारत में यह परंपरा अति प्राचीन है।
संघ परिवार के संगठनों में भी चाहे विद्यार्थि पारिषद हो, विवेकानंद केंद्र हो, वनवासी कल्याण आश्रम हो, सेवा भारती हो, भारतीय मजदूर संघ हो या फिर अनेक अन्य संगठन... पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं की एक लंबी परंपरा है ही। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रचारक पद्धति तो सर्वश्रेष्ठ और सर्वोच्च है ही। अपने मन में ”हर घर स्वदेशी, हर युवा उद्यमी“ का सन्देश वास्तव में हर घर तक व हर युवक तक पहुंचाने के लिए बड़ी मात्रा में देशव्यापी ऐसे पूर्णकालिक समर्पित कार्यकर्ताओं के तंत्र की आवश्यकता है और स्वदेशी जागरण मंच की यह पूर्णकालिक योजना उसी निमित्त बनी है।
पूर्व में भी कहा है - इस कार्यकर्ता की प्रेरणा एक ही है ”तेरा वैभव अमर रहे मां, हम दिन चार रहें न रहें।“
या फिर गीत की पंक्तियाँ... ”साधन की ओर न ताकेंगे... कांटों की राह हमारी है... मनमस्त फकीरी धारी है, अब एक ही धुन... जय-जय भारत।“
इस विचार को साकार करने के लिए पूर्णकालिक कार्यकर्ता का समय व जीवन लगाने को उद्यत हुआ है, उसमें वह सफल हो, यही मनोकामना।
*”जय स्वदेशी.. जय भारत“*