Friday, February 8, 2013

वैश्विक अर्थव्यवस्था में यूरोजोन के धराशायी होने की और मोदी जी


कई देश दिवालिया होने के कगार पर

अब सुना हे कि योरोपेअन युनिअन ने मोदी जी से दुबारा हाथ मिलाया हे, पर किस मजबूरी मे मिलाया हे इस्को भी समझना भी ज्रूरी हे।
वैश्विक अर्थव्यवस्था में यूरोजोन की हिस्सेदारी महत्वपूर्ण है. यूरोजोन 17 देशों का समूह है. इन देशों के नाम हैं- ऑस्ट्रिया, बेल्जियम, साइप्रस, इस्टोनिया, फिनलैंड, फ्रांस, जर्मनी, ग्रीस, आयरलैंड, इटली, लक्जमबर्ग, माल्टा, नीदरलैंड, पूर्तगाल, स्लोवाकिया, स्लोवानिया और स्पेन. ये सभी देश साझा मुद्रा ‘यूरो’ में व्यापार करते हैं.
इससे सबकी अर्थव्यवस्था एक-दूसरे से जुड़ी हुई है. इनकी मौद्रिक नीति भी साझी है. यूरोपियन सेंट्रल बैंक इनकी मौद्रिक नीति की देखरेख करता है. किस देश को मदद देनी है, इसका निर्णय यह बैंक करता है.
वैश्विक आयात-निर्यात में यूरोजोन की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा (आयात- 20 फीसदी और निर्यात 21 फीसदी) है. यूरोपियन यूनियन और अमेरिका के बाद ग्लोबल अर्थव्यवस्था में इसका योगदान सबसे ज्यादा 14 फीसदी है. इसका जीडीपी भी अमेरिका के बाद सबसे ज्यादा (8 ट्रिलियल डॉलर) है.
इसलिए अमेरिकी अर्थव्यवस्था के टूटने से दुनिया में जिस प्रकार हाहाकार मच जाता है, उसी प्रकार यूरोजोन के धराशायी होने से भी दुनिया की अर्थव्यवस्था कराह रही है. खर्चो में कटौती से उत्पादन और सेवाओं की खपत कम हो गयी है, जिससे ज्यादातर देशों का व्यापार प्रभावित हुआ है. वर्तमान आर्थिक संकट यूरोजोन पर छाये ऋण संकट की वजह से है.
यूरोजोन में मंदी की शुरुआत ग्रीस से हुई. इसने धीरे-धीरे समूचे यूरो जोन को और बाद में पूरी दुनिया को चपेट में ले लिया है. 2007 के सबप्राइम संकट से दुनिया पूरी तरह उबरी भी नहीं थी कि यूरोजोन के ऋण संकट ने दुनिया को दोबारा मंदी में धकेल दिया है. यूरोपीय संघ में शामिल होने से पहले ग्रीस का सरकारी खर्च और उपलब्ध संसाधनों में बड़ा अंतर इसकी बड़ी वजहों में एक है.
सिंगल करेंसी के तौर पर यूरो को अपनाने के बाद इसका सरकारी खर्च और बढ़ गया. 2007 तक यह खर्च यूरोपीय संघ के अन्य देशों की तुलना में लगभग 50 फीसदी अधिक था. वहीं, सरकार को टैक्स से आमदनी कम हो रही थी. इससे बजट घाटा लगातार बढ़ता गया. सरकारी खर्च इतना अधिक बढ़ गया कि खर्च और आय का आंकड़ा नियंत्रण से पूरी तरह बाहर हो गया.
इसके बाद, जब 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी ने दुनिया को अपनी चपेट में लेना शुरू किया, तो ग्रीस उसके लिए तैयार नहीं था. इसका नकारात्मक असर उसकी अर्थव्यवस्था पर पड़ा. वह कर्ज लेकर काम चलाता रहा और इस तरह कर्ज भी बढ़ता गया. उस पर कर्ज इतना अधिक हो गया, जिसे वह चुकाने में समर्थ नहीं था. मजबूरन, उसे यूरोपीय संघ के सहयोगी देशों और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से विशाल कर्ज लेना पड़ा. ग्रीस हमेशा ही एक गंभीर डिफॉल्टर रहा है.
1830 में आधुनिक ग्रीस की स्थापना से ही हर दूसरे साल यह सरकारी कजरे के मामले में डिफॉल्टर रहा है. बेलआउट पैकेज के नाम पर भारी-भरकम वित्तीय मदद का भार ने यूरोजोन के अन्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर विपरीत प्रभाव डाला. ग्रीस को ऋण संकट से बचाने के लिए 130 अरब यूरो की मदद दी गयी थी, जबकि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) ने भी 28 अरब यूरो की मदद दी. इसके बावजूद उसकी अर्थव्यवस्था की हालत नाजुक बनी रही. ग्रीस के वित्तीय कुप्रबंधन का असर फ्रांस और जर्मनी जैसे देशों पर भी पड़ा है. निवेशक उन देशों में पैसा लगाने से कतराने लगे.
आज आलम यह है कि यूरोजोन के सभी देश कर्ज संकट में फंस गये हैं. उन पर बैंकों के भारी कर्ज हैं. वे कर्ज चुकाने में असफल हो रहे हैं. इससे इन देशों के बैंकों की आर्थिक हालत नाजुक हो गयी है.
वैल्यू रिसर्च के सीइओ धीरेंद्र कुमार कहते हैं कि यूरोपीय ऋण संकट 2010 में ग्रीस से शुरू हुआ और एक के बाद दूसरे यूरोपीय देशों को अपनी चपेट में ले रहा है. इन देशों का बजट घाटा बेलगाम बढ़ रहा है. शुरू में सरकार कर्ज लेकर योजनाओं को पूरा करती रही, लेकिन इसे चुकाने में असमर्थ होने की वजह से कई देश दिवालिया होने की कगार पर खड़े हैं.
ग्रीस, स्पेन, पुर्तगाल, आयरलैंड, स्लोवेनिया, मलयेशिया, फिनलैंड और इटली आदि सभी में सार्वजनिक कर्ज एवं घाटों की स्थिति बेहद खराब बनी हुई है. ग्रीस को संकट से उबारने के लिए यूरोजोन के देशों और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने उसे लगभग एक खरब डॉलर का बेलआउट पैकेज भी दिया. इसके बावजूद संकट बरकरार है.
यूरोजोन में चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था वाला स्पेन भी अब ग्रीस, आयरलैंड और पूर्तगाल की तरह संकटग्रस्त हो गया है. हालांकि इन तीनों देशों को इसीबी और आइएमएफ की ओर से बेल आइट पैकेज दिये गये हैं. लेकिन अर्थव्यवस्था पटरी पर आने की बजाय और खस्ता हो गयी है.
ग्रीस की स्थिति सबस नाजुक बनी हुई है. इसकी जीडीपी की विकास दर 4 फीसदी से नीचे आ गयी है. पुर्तगाल की जीडीपी की विकास दर 3 फीसदी हो गयी है. स्पेन से निवेशकों का विश्वास कम हो गया है. कर्ज संकट के दौर में जर्मनी और फ्रांस ही अपनी आर्थिक विकास की दर को कुछ हद तक बरकरार रख पाये हैं. स्पेन और ग्रीस में बेरोजगारी की दर 20 फीसदी हो गयी है. हालांकि जर्मनी में यह दर 6 फीसदी है. वहीं युवाओं में बेरोजगारी की दर जर्मनी व ऑस्ट्रिया में 10 फीसदी, स्पेन व ग्रीस में 50 फीसदी और पुर्तगाल में 35 फीसदी तक पहुंच गयी है

Monday, December 17, 2012

Yamuna polution - latest initiative by Apex Court

Yamuna polution - latest initiative by Apex Court
Yamuna River in Delhi carries drains not water: SC
Posted on: 04 Dec 2012,

We all know that Yamuna pollution is one of the biggest problems of Delhi. Every time there is an initiative by Delhi government to clean it, some more pollution is visible in reality. We have seen so many public initiatives also but without any results. We also saw for days or months together Jalpurush Rajindra Singh and his team camping at its banks, but nothing but frustration emerged.
Now there is a fresh initiative by SC. "It is a sorry state of affairs," the Supreme Court remarked today over failure of the project to clean Yamuna despite over Rs.12,000 crore being spent on it and suggested that the routing drainages of NCR region to a place outside Delhi be explored to stop release of waste in the river.
Observing that Yamuna in Delhi carries not water but drains, a bench of justices Swatanter Kumar and Madan B Lokur rapped the government authorities for not being able to clean the river despite spending thousands of crore of common man's money.
"Can we take these drains 30-40 Km outside Delhi to get it recycled by removing solid waste. It should be routed in a closed drain to a place where government gets sufficient land for the project," the bench said.
Around Rs 12,000 crore has so far been spent by all the stakeholders for cleaning the river.
The bench also said that there is a lack of co-ordination and co-operation among various government departments involved in the Yamuna cleaning project.
"It is a sorry state of affairs and Yamuna cannot be cleaned with such attitude," the bench remarked when the counsel appearing for Central Pollution Control Board (CPCB) and Delhi Jal Board (DJB) made allegations against each other.
"There is lack of cooperation among public authorities and the situation of Yamuna has become worse," the bench said and called for assistance from Directors of IIT Delhi and Roorkee for the project. The Apex Court asked the Directors to be personally present on the next date of hearing on Tuesday to assist the court for proper implementation of the project.
It also asked the authorities to be concerned not only about the quality of water but also about the quantity of water flowing in the river. The bench had earlier asked the CPCB and DJB to conduct a joint inspection on rising pollution level of the river in the national capital.
The court said that it is important to take the matter to a logical end as it has been pending before it for so many years.

There are some facts which we should keep in mind. For many years now, the citizens of Delhi have been drinking a concoction of chemicals in thebelief that it was,safe and clean drinking water that was being supplied to them by the DELHI JAl BAOARD75% of Delhi's water is being supplied from the Yamuna. Delhi contributes 3,538 million liters of wastewater, mostly polluted, to the river everyday.Nearly Rs.378 crores have been spent by the government, in the last 5 years, to clean up the river. But where has the money gone? Environmentalists continue describing the Yamuna as nothing more than a drain, a "clogged sewer". Only 5% (figures submitted to the supreme court) of Delhi's waste water is treated before being released into the river. The law says all the water must be treated. The 19 major drains of Delhi contribute to 96% of the rivers pollution. Delhi constitutes only 2% of the total catchment of the yamuna basin, but contributes to 80% of the pollution load, 90% of which is domestic sewer waste. The new barrage below Okhla, discharges no water into the river bed between the nine months of October to June, and only during the monsoon is there an overflow into the main channel. All fishes have been killed in the stretch from Delhi to Hamirpur, where the Chambal flows into the Yamuna bed. The river is virtually dead on this stretch, and only drains flow into it giving off a stench as would a corpse · The river, which has mention in the Rig Veda (Mandala V Hymn 52-17) and in which thousand used to bath at Mathura on sacred occasions, now lies as a helpless relic of its past glory. The river is part of our national ethos, and is proudly mentioned in the national anthem, To kill such a pristine natural inheritance of this county is surely a grave crime. The average flow in the river has been reduced, the quality of water is now totally degraded on account of pollution and discharge of industrial and trade effluents, domestic sewage, poisonous, noxious or polluting matter to the extent that it can support no animal life and only reduced amount of plankton. Thousands of people living on the banks of the river in jhuggi colonies, who are deprived of civic amenities, are compelled to use the polluted waters of the river for domestic and drinking purposes.

River Yamuna
India consumes about 86,311 tonnes (t) of technical-grade insecticides annually to cover 182.5 million hectare of its land. Most Indian rivers pass through agricultural areas that use pesticides. This makes leaching from agricultural fields the most serious non-point — unspecified, and therefore, not measurable accurately — source of pollution to the aquatic environment. And now there’s a 1995 study that’s found traces of isomers (a carcinogenic organochlorine) in Indian rivers, including the Yamuna.

About 57 million people depend on Yamuna waters. With an annual flow of about 10,000 cubic metres (cum) and usage of 4,400 cum (of which irrigation constitutes 96 per cent), the river accounts for more than 70 per cent of Delhi’s water supplies. Available water treatment facilities are not capable of removing the pesticide traces. Waterworks laboratories cannot even detect them. Worse, Yamuna leaves Delhi as a sewer, laden with the city’s biological and chemical wastes. Downstream, at Agra, this becomes the main municipal drinking water source. Here too, existing treatment facilities are no match for the poisons. Thus, consumers in Delhi and Agra ingest unknown amounts of toxic pesticide residues each time they drink water.

The Central Pollution Control Board (CPCB), on its part, had found endosulphan residues — alpha and beta isomers — in the Yamuna in 1991. An earlier study by H C Agarwal (Delhi University) had traced ddt residues amounting to 3,400 nanogram per litre (ng/l). However, later cpcb studies showed reduced ddt levels. To gauge the immensity of the threat, it is necessary to trace the river’s flow — divided in five segments on the basis of hydro-geomorphological and ecological characteristics — down to its final reaches.

Delhi : Biggest Culprit
Yamuna enters Delhi at Palla village 15 km upstream of Wazirabad barrage, which acts as a reservoir for Delhi. Delhi generates 1,900 million litre per day (mld) of sewage, against an installed wastewater treatment capacity of 1,270 mld. Thus, 630 mld of untreated and a significant amount of partially treated sewage enter the river every day. The Wazirabad barrage lets out very little water into the river. In summer months especially, the only flow downstream of Wazirabad is of industrial and sewage effluents. Lesser discharge means lesser river flow and thus, greater levels of pollution. From the Okhla barrage, which is the exit point for the river in Delhi, the Agra canal branches out from Yamuna. During the dry months, almost no water is released from this barrage to downstream Yamuna. Instead, discharges from the Shahadara drain join the river downstream of the barrage, bringing effluents from east Delhi and Noida into the river. This is the second largest polluter of the river after the Najafgarh drain.
Anyhow, the recent initiative by the Supreme Court should instil a ray of hope in this matter.

यमुना की सफ़ाई - अदालत की तरफ से गठित समिति

दिल्ली की एक पुरानी समस्या है यमुना की सफ़ाई। समय समय पर यहाँ बहुत प्रकार के कार्यक्रमों की भरमार रही है जिसके केन्द्र मे यमुना कि सफ़ाई रहीं है। कुछ साल पहले हमने जलपुरुश राजेन्द्र सिन्घ और उनके साथियो को लम्बे समय तक यमुना के किनारे सवछ्ता शिविर लगाये भी देखा हे, पर हलात जस के तस रहे।
सर्वोच्च न्यायालय यमुना में बढ़ते प्रदूषण को लेकर पहले भी कई बार दिशा-निर्देश जारी कर चुका है। मालूम हो कि सुप्रीम कोर्ट पिछले 18 वर्षो से यमुना में प्रदूषण के मुद्दे पर सुनवाई कर रहा है। कई बार नदी को प्रदूषण मुक्त करने की समय सीमा भी तय की जा चुकी है, लेकिन यमुना आज भी मैली की मैली है। मगर इसमें कोई सुधार नहीं आ पाया तो इसकी बड़ी वजह सरकारों में इच्छाशक्ति की कमी है। यमुना हर जगह एक सी गंदी नहीं है। नदी में विभिन्न स्थानों पर प्रदूषण का स्तर अलग-अलग मिला है। दिल्ली में निजामुद्दीन पुल के नीचे यमुना सबसे ज्यादा मैली है। आगरा में भी यह काफी प्रदूषित है। हरियाणा जहां अपने कारखानों के जहरीले कचरे को दिल्ली भेज रहा है वहीं दिल्ली भी उत्तर प्रदेश को अपने गंदे नालों और सीवर का बदबूदार मैला पानी ही सप्लाई कर रही है। दिल्ली में यमुना की सफाई के नाम पर अब तक साढ़े तीन हजार करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। ढाई हजार करोड़ रुपए अभी और खर्च होने हैं। दिल्ली में यमुना में अठारह बड़े नाले गिरते हैं, जिनमें नजफगढ़ का नाला सबसे बड़ा और सबसे अधिक प्रदूषित है। इस नाले में शहरी इलाकों के अड़तीस और ग्रामीण इलाकों के तीन नाले गिरते हैं।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड [सीपीसीबी] की ताजा जांच रिपोर्ट से इस बात का पता चलता है। रिपोर्ट में हरियाणा के हथनीकुंड से लेकर आगरा में ताजमहल तक 14 स्थानों पर की गई प्रदूषण जांच का ब्योरा दिया गया है.

हरियाणा जहां अपने कारखानों के जहरीले कचरे को दिल्ली भेज रहा है वहीं दिल्ली भी उत्तर प्रदेश को अपने गंदे नालों और सीवर का बदबूदार मैला पानी ही सप्लाई कर रही है। दिल्ली में यमुना की सफाई के नाम पर अब तक साढ़े तीन हजार करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। ढाई हजार करोड़ रुपए अभी और खर्च होने हैं। दिल्ली में यमुना में अठारह बड़े नाले गिरते हैं, जिनमें नजफगढ़ का नाला सबसे बड़ा और सबसे अधिक प्रदूषित है। इस नाले में शहरी इलाकों के अड़तीस और ग्रामीण इलाकों के तीन नाले गिरते हैं। यमुना से कृष्ण का अटूट नाता रहा है और इसकी पवित्रता को बरकरार रखने के लिए उन्होंने कालिया नाग को खत्म किया था। लेकिन द्वापर में प्रदूषित होने से बची यमुना कलयुग में जहर उगलते कारखानों और गंदे नालों की वजह से मैली हो गई है। यमुना की निर्मलता और स्वच्छता को बनाए रखने के दावे तो किए जा रहे हैं, लेकिन इस पर कायदे से अब तक अमल नहीं हो पाया है। अपने उद्गम से लेकर प्रयाग तक बहने वाली इस नदी की थोड़ी-बहुत सफाई बरसात के दिनों में इंद्र देव की कृपा से जरूर हो जाती है। लेकिन यमुनोत्री से निकली इस यमुना की व्यथा बेहद त्रासद है। अतीत में यमुना को भी पवित्रता और प्राचीन महत्ता के मामले में गंगा के बराबर ही अहमियत मिलती थी। पश्चिम हिमालय से निकल कर उत्तर प्रदेश और हरियाणा की सीमाओं की विभाजन रेखा बनी यह नदी पंचानवे मील का सफर तय कर उत्तरी सहारनपुर के मैदानी इलाके में पहुंचती हैं। फिर पानीपत, सोनीपत, बागपत होकर दिल्ली में दाखिल होती है। यहां से बरास्ता मथुरा और आगरा होते हुए प्रयाग पहुंच कर गंगा में समा जाती है।

पिछले कई दशक में हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश की सरकारों ने यमुना की सफाई के नाम पर अरबों रुपए खर्च दिए। पर साफ-सुथरी दिखने के बजाए यमुना और ज्यादा मैली होती गई। सरकार ने इस प्राचीन नदी के अस्तित्व से सरोकार नहीं दिखाया तो देश की सबसे बड़ी अदालत ने सवाल उठाते हुए कई बार सरकारों को कड़ी फटकार भी लगाई। लेकिन सरकार तो सरकार ठहरी, उस पर किसी फटकार का अव्वल तो कोई असर नहीं होता और अगर होता भी है तो थोड़ी देर के लिए तभी तो हर राज्य यमुना की सफाई को लेकर अपना ठीकरा दूसरे पर फोड़ देता है। 1994 में यमुना के पानी के बंटवारे पर एक समझौता हुआ था। दिल्ली जल बोर्ड के पूर्व अधिकारी रमेश नेगी के मुताबिक समझौते के तहत दिल्ली को हरियाणा से पेयजल की जरूरत के लिए यमुना का पानी मिलना तय हुआ था। बदले में दिल्ली से उत्तर प्रदेश को सिंचाई के लिए पानी मिलना था, लेकिन विडंबना देखिए हरियाणा जहां अपने कारखानों के जहरीले कचरे को दिल्ली भेज रहा है वहीं दिल्ली भी उत्तर प्रदेश को अपने गंदे नालों और सीवर का बदबूदार मैला पानी ही सप्लाई कर रही है।

दिल्ली में यमुना की सफाई के नाम पर अब तक साढ़े तीन हजार करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। ढाई हजार करोड़ रुपए अभी और खर्च होने हैं। दिल्ली में यमुना में अठारह बड़े नाले गिरते हैं, जिनमें नजफगढ़ का नाला सबसे बड़ा और सबसे अधिक प्रदूषित है। इस नाले में शहरी इलाकों के अड़तीस और ग्रामीण इलाकों के तीन नाले गिरते हैं। यह नाला वजीराबाद पुल के बाद सीधे यमुना में गिरता है। वजीराबाद, आईटीओ और ओखला में तीन बांध हैं। मकसद यमुना के पानी को रोक कर दिल्ली को पेयजल की जरूरत को पूरा करना है। वजीराबाद पुल से पहले तो फिर भी यमुना का पानी पीने लायक दिखता है। लेकिन यमुना यहां से आगे बढ़ती है तो नजफगढ़ का नाला इसमें गिरता है और फिर पानी का रंग बदल कर काला हो जाता है। कश्मीरी गेट बस अड्डे पर बने पुल से गुजरने पर एक तरफ नाले जैसी दिखती यमुना की धारा के बीच झोपड़ी डाल कर साग-सब्जी उगाने वाले किसान दिखाई देते हैं तो दूसरी तरफ दर्जनों की संख्या में धोबी घाट। इससे बदतर हालत लोहे वाले पुल से दिखाई देती है। एक तरफ यमुना में कचरे का अंबार दिखता है तो दूसरी तरफ काला स्याह पानी। आईटीओ पुल, निजामुद्दीन और टोल ब्रिज से गुजरने पर दो-तीन धाराओं में बहती यमुना नदी कम बड़ा नाला ज्यादा नजर आती है।

यमुना के प्रदूषण ने दिल्ली मेट्रो रेल कारपोरेशन की चिंता भी बढ़ा दी है। इसके प्रदूषित पानी में मिले औद्योगिक कचरे से ऐसी जहरीली गैसें निकल रही हैं कि उनके असर से यमुना के ऊपर से गुजरने वाली मेट्रो भी प्रभावित हो रही है। इनकी वातानुकूलन प्रणाली पर इन गैसों का प्रभाव पड़ रहा है। आमतौर पर रात के समय गैस ज्यादा निकलती है। मेट्रो के अधिकारियों ने इसकी शिकायत दिल्ली सरकार से की है। छानबीन से सामने आया है कि प्रदूषित जल से अमोनिया और हाइड्रोजन सल्फाइड जैसी जहरीली गैसें निकलती हैं और मेट्रो के डिब्बों की एसी प्रणाली के कंडेंशरों पर लगी कोटिंग इससे हट जाती है। नतीजतन एसी की गैस रिस जाती है। इस वजह से मेट्रो के कंडेंशर बार-बार बदलने पड़ रहे हैं। इस शिकायत का संज्ञान लेते हुए केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने यमुना के ऊपर की हवा का विश्लेषण कराने का फैसला किया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ये जहरीली गैस अगर मेट्रो के एसी को प्रभावित कर रही हैं तो आसपास के इलाकों में रह रहे लोगों को भी बीमार बना रही होगी।

कालिंदी कुंज के पास यमुना में गिरने वाला गंदा नाला तो कचरे से लबालब तालाब जैसा नजर आता है। इसी में तपती गर्मी से राहत पाने के लिए मवेशी तैरते दिखते हैं। जिसे देख कर रसखान की याद आ जाती है। रसखान आज होते तो अपनी लिखी इन पंक्तियों पर पछताते-

‘जो खग हौं, तो बसेरो करौं मिलि कालिंदिकूल-कदम की डारन।’

मोटेतौर पर दिल्ली में यमुना का पाट डेढ़ से तीन किलोमीटर तक चौड़ा है। दिल्ली में इसका कुल दायरा संतानवे वर्ग किलोमीटर है। जिसमें करीब सत्रह वर्ग किलोमीटर पानी में है, जबकि अस्सी वर्ग किलोमीटर सूखा पाट। करीब पचास किलोमीटर लंबा यमुना में वजीराबाद बैराज तक पानी साफ दिखता है। लेकिन पच्चीस किलोमीटर दूर जैतपुर गांव में यह खासा प्रदूषित हो जाता है। यह भी एक तथ्य है कि यमुना के किनारे बसे शहरों में सबसे ज्यादा प्रदूषित इसे दिल्ली ही करती है। इसमें गिरने वाली कुल गंदगी में से अस्सी फीसद दिल्ली की होती है। प्रदूषत कचरे की वजह से ही इसके पानी में ऑक्सीजन की मात्रा लगभग खत्म हो गई है। वजीराबाद से ओखला बांध तक सबसे ज्यादा प्रदूषण है। दिल्ली सरकार के ओखला में कूड़े से खाद बनाने के कारखाने से निकलने वाली जहरीली गैस से आसपास के लोगों का जीना दूभर हो गया है। ऐसा ही संयंत्र दशकों पहले वजीराबाद पुल के पास बना था।


दिल्ली में प्रदूषित यमुना
लोगबाग कहते हैं कि यह संयंत्र पानी के संशोधन के साथ कूड़े से बिजली बनाने के लिए लगाया गया था। लेकिन करोड़ों रुपए खर्च करने के बाद पता चला कि यहां का कचरा इस लायक है ही नहीं कि उसका ट्रीटमेंट कर उससे बिजली बनाई जा सके। यही हाल उन नालों पर लगे जल ट्रीटमेंट संयंत्रों का है जिनका तीन चौथाई गंदा पानी सीधे यमुना में मिलता है। सच्चाई यह है कि दिल्ली जल बोर्ड के सत्रह सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट है, जिनकी जलशोधन क्षमता करीब 355 एमजीडी है। जबकि होनी चाहिए 5-12 एमजीडी प्रतिदिन। जाहिर है कि शेष गंदा पानी नालों के जरिए यमुना में ट्रीटमेंट के बिना ही बहाया जा रहा है। यों दिल्ली के अठारह बड़े नालों पर इंटरसेप्टर लगाने के लिए जापानी कंपनी इंजीनियर्स इंडिया लिमिटेड को ठेका दिया गया है। जिस पर करीब सत्रह सौ करोड़ रुपए खर्च आएगा। अभी तक मुश्किल से दो इंटरसेप्टर ही लग पाए हैं।

यों तो यमुना की सफाई के लिए कार्य योजना सरकार ने काफी पहले बनाई थी। मसलन पहला यमुना एक्शन प्लान 1993 में लागू हुआ था। जिस पर करीब 680 करोड़ रुपए खर्च हुए। फिर 2004 में दूसरा प्लान बना। इसकी लागत 624 करोड़ रुपए तय की गई। सीएजी की रिपोर्ट के मुताबिक यमुना की सफाई पर दिल्ली जल बोर्ड ने 1998-99 में 285 करोड़ रुपए और 1999 से 2004 तक 439 करोड़ रुपए खर्च किए। डीएसआईडीसी ने 147 करोड़ रुपए अलग खर्च कर दिए। अगर यमुना के प्रदूषण की बात करें तो इसे गंदा करने में दिल्ली सबसे आगे है। बेशक कसर हरियाणा और उत्तर प्रदेश भी कुछ नहीं छोड़ रहे। उत्तर प्रदेश में भी मथुरा और आगरा जैसे शहरों के गंदे नाले सीधे यमुना में गिरते हैं। इन्हें रोकने के लिए अब तक गंभीर कोशिश नहीं हुई है।

हकीकत तो यह है कि आज की यमुना अपने उद्गम से लेकर संगम तक कहीं भी गंदगी से मुक्त नहीं है। हालांकि दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के इक्कीस शहरों में अब तक यमुना की सफाई पर 276 योजनाएं क्रियान्वित की जा चुकी हैं। जिनके माध्यम से 75325 लाख लीटर सीवर उत्प्रवाह के शोधन की क्षमता सृजित किए जाने का सरकारी दावा है। एक तरफ यमुना को बचाने के नाम पर सरकारी योजनाएं बन रही हैं तो दूसरी तरफ कुछ गैरसरकारी संस्थाएं भी मैली यमुना में सीधे न सही पर रस्म अदायगी के जरिए तो डुबकी लगा ही रही हैं। लेकिन ऐसे आधे-अधूरे प्रयासों से न यमुना की गत सुधरने वाली है और न इस प्राकृतिक धरोहर को बर्बाद होने से रोका जा सकता है। सचमुच यमुना को बचाना है तो इसके लिए एक तरफ तो सामाजिक चेतना जगानी होगी, दूसरी तरफ इसे गंदा करने वालों पर कड़ा दंड लगाना होगा।

हकीकत तो यह है कि यमुना को बचाने के ज्यादातर प्रयास थोथे, दिखावटी और ढकोसला भर है जो इससे सरोकार दिखाते हैं वे भी अखबारों में फोटो छपवाने तक ही सीमित दिखते हैं। मसलन, पिछले साल तब के पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने नाव मे यमुना की सैर की थी। रमेश यमुना कार्य योजना के तीसरे चरण के पक्ष में थे और 1656 करोड़ रुपए की इस योजना को दिल्ली के हिस्से में बहने वाली यमुना की सफाई तक सीमित रखने की तैयारी कर रहे थे। लेकिन उनका महकमा ही बदल दिया गया। इसलिए फिलहाल इस पर विराम लग गया है। दिल्ली सरकार के अलावा कई गैरसरकारी संगठनों ने यमुना को बचाने के लिए खूब प्रयास किए। पर नतीजा कुछ नहीं निकला हालांकि दिल्ली सरकार ने यमुना किनारे बने बाईपास के आसपास कश्मीरी गेट से आईटीओ तक वृक्षारोपण का काम शुरू किया है और यमुना किनारे की खाली जमीन को पार्क की शक्ल देने की कोशिश कर रही है, ताकि हरियाली के साथ-साथ यमुना भी साफ-सुथरी रहे। लेकिन बिना ईमानदार कोशिश के मैली यमुना को और मैली होने से नहीं बचाया जा सकता।

अब सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली और रुड़की के भारतीय तकनीकी संस्थानों के निदेशकों से कहा है कि वे केंद्र के साथ-साथ हरियाणा और उत्तर प्रदेश सरकारों के संबंधित अधिकारियों के साथ मिल कर यमुना को स्वच्छ करने के लिए दो महीने के भीतर एक रूपरेखा तैयार करें। इसके लिए अगले महीने की बारह तारीख को सभी अधिकारियों के साथ बैठक भी तय कर दी गई है, जिनमें केंद्रीय पर्यावरण सचिव, हरियाणा के मुख्य सचिव, दिल्ली जल बोर्ड के मुख्य अभियंता, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सचिव, नोएडा विकास प्राधिकरण, दिल्ली नगर निगम और दिल्ली विकास प्राधिकरण के अधिकारी और सीवर प्रणाली के दो विशेषज्ञ शिरकत करेंगे। अदालत के इस निर्देश से सकारात्मक नतीजे की उम्मीद बनी है। यमुना की सफाई के नाम पर अब तक विभिन्न सरकारें और नगर निकाय बारह हजार करोड़ रुपए से ऊपर खर्च कर चुके हैं। राष्ट्रमंडल खेल शुरू होने से पहले दिल्ली सरकार ने दावा किया था कि वह टेम्स नदी की तर्ज पर यमुना सफाई अभियान चलाएगी। इसके लिए अलग से बजटीय प्रावधान किए गए। कई जगह गंदे पानी की सफाई के लिए जलशोधन संयंत्र लगाए गए। मगर कोई फर्क नहीं पड़ा। बल्कि यमुना में प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ता गया है। हालत यह हो गई कि यमुना के पानी में जहरीले पदार्थों की मात्रा बढ़ जाने के कारण उसे साफ करना मुश्किल हो गया और दिल्ली के कई इलाकों में पेयजल की आपूर्ति रोकनी पड़ी।

एक बार आप यमुना के पुल पर रुक कर देखेंगे तो आप को कारन अपने आप पता चल जायेगा्। वैसे भी यमुना में प्रदूषण बढ़ते जाने की वजहें छिपी नहीं हैं। तमाम पाबंदियों और निगरानियों के बावजूद बहुत सारे कारखानों से निकलने वाले जहरीले पानी को rबगैर शोधन के, सीधे यमुना में गिरा दिया जाता है। इसके अलावा खुले नालों में मिलने वाला घरेलू कचरा भी इसका बड़ा कारण रहा है। पिछले साल जब हरियाणा के कारखानों से छोड़े गए दूषित जल की वजह से यमुना का प्रदूषण स्तर इस कदर बढ़ गया कि उसे शोधित कर पीने लायक बनाना कठिन हो गया तो केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड कुछ सचेत हुआ था। उसने हरियाणा सरकार से कहा कि अगर कारखानों की इस मनमानी पर रोक नहीं लगाई गई तो उसे कड़े कदम उठाने पर मजबूर होना पड़ेगा। मगर हुआ कुछ नहीं। राजनीतिक रसूख और प्रदूषण रोकने के लिए तैनात कर्मचारियों-अधिकारियों की मिलीभगत के सहारे कारखानों की मनमानी जारी है। अवैध रूप से चल रहे कारखानों पर भी रोक नहीं लग पाई है। इस सिलसिले पर अंकुश लगाने के लिए सरकारों को सख्ती बरनी होगी। फिर, घरेलू कचरे के निपटान का कारगर इंतजाम होना भी जरूरी है। दिल्ली सरकार इस मामले में अभी तक लाचार ही नजर आई है। इसके चलते हजारों टन कचरा यमुना में मिल जाता है। दिल्ली में गंदे पानी के शोधन के लिए लगाए गए संयंत्रों में से ज्यादातर देखरेख में लापरवाही की वजह से काम करना बंद कर चुके हैं या उनकी क्षमता पर्याप्त नहीं रह गई है। यमुना की सफाई के लिए हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश को मिल कर काम करना होगा। आखिर इससे तीनों राज्यों के पेयजल की समस्या भी जुड़ी हुई है। उनके बीच तालमेल कैसे कायम हो पाएगा, यह अदालत की तरफ से गठित समिति के लिए चुनौती का विषय है। उम्मीद की जानी चाहिए कि देर से ही सही, यमुना को प्रदूषण-मुक्त बनाने का कारगर अभियान शुरू होगा।

Saturday, October 27, 2012

नए भारत का निर्माण लेखक संदीप वासलेकर

देश बदलने का इरादा है तो यह पुस्तक सिर्फ आपके लिए है
नए भारत का निर्माण
लेखक संदीप वासलेकर

Sandeep
Published on Saturday, 06 October 2012 17:15




नई दिल्ली। अभी देश में रॉबर्ट वाड्रा की अकूत संपत्ति को लेकर बवाल मचा हुआ है। उन्हें देश के किसी भी हवाई अड्डे से बिना जांच गुजरने की इजाजत मिली हुई है। यह सब केवल इसलिए है कि वो यूपीए व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद, प्रियंका के पति व राहुल गांधी के जीजा हैं और इस परिवार को राजनीति का पहला परिवार माना जाता है। इसलिए यहां से जुड़े हर व्यक्ति को स्वत: सारी सुविधाएं, तामझाम, सुरक्षा, विशेष सहूलियत मिल जाती है। वास्तव में यह देश व्यक्ति पूजक देश है, जिसमें एक साधारण अभिनेत्री खुशबू के प्रशंसक उसका मंदिर बनवा देते हैं, सचिन को क्रिकेट के भगवान का दर्जा दे दिया जाता है, शाहरुख खान बादशाह घोषित हो जाते हैं और गांधी-नेहरू परिवार पर आज भी आंख मूंद कर विश्वास किया जाता है।



इस देश के राजनीतिज्ञों व शासक वर्ग की तो बात ही मत पूछिए, हर नेता-मंत्री व उनके परिवार से जुड़े सदस्यों को विशेष सुविधाएं हासिल है जबकि कई विकसित विदेशों में वहां के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को भी ऐसी सुविधाएं हासिल नहीं होतीं। हमारी इस मानसिकता पर संदीप वासलेकर की पुस्तक 'नए भारत का निर्माण' बार-बार चोट करती है। संदीप वासलेकर इस पुस्तक में एक जगह लिखते हैं, ''हमारा मजदूर रेलवे के दूसरे दरजे के डिब्बे में किसी तरह लटक कर यात्रा करता है तो हांगकांग-मलेशिया के मजदूरों को आरामदायक बस सेवा उपलब्ध हो गई है। इसके विपरीत जब स्वीडन के उद्योगपति और तुर्की के मंत्री रेलवे के दूसरे दरजे में यात्रा करते हैं तो भरत के राजनेता और उद्योगपति कारों का काफिला लेकर चलते हैं।''

मैं संदीप वासलेकर को नहीं जानता था। सच कहूं तो नाम भी नहीं सुना था, लेकिन मेरे मित्र व प्रभात प्रकाशन के निदेशक पीयूष जी ने एक ई मेल भेजा जिसमें संदीप वासलेकर की पुस्तक 'नए भारत का निर्माण' के लोकार्पण पर मुझे आमंत्रित किया गया था। पुस्तक का लोकार्पण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ मोहनराव भागवत करने वाले थे। मोहन भागवत जी को पहली बार देखने और सुनने का अवसर मिल रहा था इसलिए वहां चला गया। जब हॉल के अंदर पहुंचा तो संदीप वासलेकर बोल रहे थे, टूटी-फूटी हिंदी में। पहले तो मैं यह समझ ही नहीं पाया कि ये कौन बोल रहे हैं, लेकिन मंच पर उनके नाम की पट्टी के आगे किसी व्यक्ति को बैठा न पाकर समझ गया कि वही पुस्तक के लेखक संदीप वासलेकर हैं।

संदीप ने एक सच्ची कहानी सुनाई, कोरिया के पूर्व राष्ट्रपति रोहमून के बारे में, जो अपने कार्यकाल की समाप्ति के बाद अपने गांव लौट गए थे और वहीं रहते थे। एक दिन उन्हें पता चला कि उनकी पत्नी ने उनके कार्यकाल में उनके नाम का इस्तेमाल करते हुए एक बड़े औद्योगिक समूह को कोई फायदा पहुंचाया था। रोहमून इतने ईमानदार थे कि इस सूचना ने उन्हें व्यथित कर दिया और इसका प्रायश्चित करने के लिए उन्होंने पहाड़ी से छलांग लगाकर आत्महत्या कर लिया।

इसे सुनकर अपने देश के वर्तमान हालात पर अनायास ही मेरे विचार अटक गए। कोरिया में कोई किसान आत्महत्या नहीं करता, बल्कि पत्नी द्वारा किसी को फायदा पहुंचाने की सूचना मात्र से वहां का पूर्व राष्ट्रपति आत्महत्या कर लेता है। हमारे यहां आर्थिक तंगी की वजह से दो लाख से अधिक किसान आत्महत्या कर चुके हैं और हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री पर देश में हुए अब तक के सबसे बड़े घोटाले (कोल-ब्लॉक आवंटन) का सीधा आरोप है, लेकिन उन्हें देखिए 'मेरी खामोशी ने कितनों की आबरू रख ली'- जैसे जुमले गढ़ कर वह एक के बाद एक हुए घोटालों का बड़ी सफाई से बचाव करते चले जा रहे हैं।

मेरी उत्सुकता संदीप की पुस्तक में बढ़ गई। बाद में पीयूष जी ने उपहार स्वरूप यह पुस्तक मुझे दी। और सच कहूं, लगातार दो दिनों तक अपना सारा काम बंद कर मैं यह पुस्तक ही पढ़ता रहा। पुस्तक बढ़ने के दौरान कई बार रह-रह कर अपने अंदर उमड़ते दर्द से मेरा सामना हुआ। आज अमेरिका में गरीब और निम्नवर्गीय व्यक्तियों का भोजन पिज्जा-बर्गर है और यहां...? यह नवधनाढ्यों और संभ्रांतों की विलासिता का प्रतीक है। हमारा देश वास्तव में आजादी के 66 साल बाद भी समस्या की ओर पीठ फेर कर खड़ा है और हमारा शासक वर्ग व संपन्न तबका, आमजन को लूट कर अपनी सुविधाएं जुटाने और अमीरी का प्रदर्शन करने में मशगुल है।

पुस्तक लोकार्पण के समय मोहन भागवत जी ने बार-बार संदीप से पूछा था कि आपका कहीं से कभी भी आरएसएस से संबंध तो नहीं रहा है न?...हर बार उन्हें प्रति उत्तर में 'न' ही सुनने को मिला। इस पर मोहन भागवत जी ने कहा कि इस देश की उन्नति व विकास का जो लक्ष्य आरएसएस का है, वही लक्ष्य संदीप जैसे लाखों लोगों का भी है, जिसके लिए सभी अपने-अपने स्तर से प्रयासरत हैं। धाराएं अलग-अलग हैं लेकिन मंजिल सभी की एक ही है, देश का भला।

वास्तव में देश के बारे में सोचने वाले हर व्यक्ति को आज आरएसएस से जोड़ कर देखने या कहिए बदनाम करने का चलन कांग्रेस, मीडिया, और नव आंदोलनकारियों में बढ़ा है, शायद इसीलिए मोहन भागवत संदीप से पूछ रहे थे कि आपका आरएसएस से तो संबंध नहीं रहा है न!

संदीप के बारे में आप सभी को बता दूं कि संयुक्त राष्ट्र संघ से लेकर, यूरोपीय संसद, ब्रिटिश हाउस ऑफ लॉर्ड्स जैसे अंतरराष्ट्रीय मंच उनके विचारों का न केवल सम्मान करते हैं, बल्कि उनके 'ब्लू पीस' अवधारणा को आगे बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं, जिसमें पानी को दो राष्ट्रों के बीच शांति दूत के रूप में इस्तेमाल करने का विचार प्रस्तुत किया गया है।

संदीप 'स्टैटेजिक फोरसाइट ग्रुप' के अध्यक्ष हैं, जो भारत सहित विभिन्न राष्ट्र व उनकी सरकारों को भविष्य की चुनौतियों के बारे में सलाह देते हैं। 50 से अधिक देशों की यात्रा और उनके राजनेताओं व सरकार के प्रतिनिधियों से सीधे संपर्क रखने वाले संदीप ने पुस्तक लेखन के लिए अंग्रेजी की जगह अपनी मातृभाषा मराठी को वरीयता दी। आज प्रभात प्रकाशन की वजह से यह पुस्तक हिंदी भाषियों के लिए भी उपलब्ध है। महज 125 रुपए की यह पुस्तक उन्नत भारत का स्वप्न देखने वाले हर व्यक्ति को अवश्य पढ़ना चाहिए। इस पुस्तक से पता चलता है कि 40 वर्ष पूर्व जो देश हमसे भी पिछड़े थे, भूख और दरिद्रता से जूझ रहे थे, वो आज भारत से मीलों आगे निकल चुके हैं।

सुपर 30 के संस्थापक आनंद कुमार के शब्द हैं, '' आज इस देश के युवाओं को सही मार्गदर्शन के लिए इस पुस्तक की बेहद आवश्यकता है। वह न केवल इसे पढ़ें, बल्कि अपने मित्रों को भी उपहार स्वरूप इसे दें ताकि कड़ी से कड़ी जुड़ती चली जाए और देश के लिए कुछ कर सकने का जज्बा वृहत आकार ले सके।''

इस पुस्तक का सारांश संदीप के ही शब्दों में कहूं तो यह है,'' हमारे शासक और संपन्न लोग शराबी पतियों जैसा व्यवहार करते हैं। जैसे बेकार और नशाखोर पति अपनी पत्नी को मजदूरी करने भेजता है और उसकी कमाई पर ऐश करता है। ठीक उसी प्रकार हमारे देश के शासक और संपन्न लोग सामान्यजनों का शोषण कर स्वयं मलाई खाते हैं।''




संदीप वस्लेकर

*सर्वसमावेशक विकास की अवधारणा* को अमल में लाकर भारतीय नागरिकों की उन्नति करना हमारे देश के समक्ष आज की सबसे बड़ी चुनौती है. उच्च वर्ग से लेकर सर्वाधिक पिछड़े व्यक्ति तक सबको एक साथ एक दिशा में आगे बढ़ने की आवश्यकता है. उसी को गांधीजी के शब्दों में ” *अन्त्योदय* ” कहा जाएगा. यह विचार सबसे पहले उन्होंने ही प्रतिपादित किया था. उसका महत्व वे जानते थे. भारत के अंतिम नागरिक के आंसू पोंछे जाएँगे , तभी हमारा देश सच्चे अर्थों में स्वतंत्र कहलाएगा, यह उन्होंने ही कहा था. महात्मा गांधी के इस दूरदर्शी सोच को वास्तविक रूप में समझकर आत्मसात करने एवं भविष्य की चुनौतियों के बारे में देश एवं विदेश की सरकार को सलाह देने का उत्कृष्ट एवं प्रशंसनीय कार्य किया है- *संदीप वासलेकर* ने, जो ” *स्ट्रेटेजिक फोरसाईट ग्रुप* ” के अध्यक्ष भी हैं. अभी हाल ही में इनके द्वारा रचित पुस्तक ” *नए भारत का निर्माण* ” प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित हुई है. यह पुस्तक डेढ़ साल पहले सर्वप्रथम मराठी में प्रकाशित हुई थी . आठ संस्करणों , उर्दू अनुवाद और दृष्टिबाधितों के लिए ऑडियो संस्करण के साथ यह बेस्टसेलर बनी हुई है. अनगिनत लोगों के जीवन को यह पहले ही बदल चुकी है. भारत में भ्रष्टाचार , आतंकवाद , पर्यावरण -क्षति जैसी चुनौतियों से निपटने की क्या उम्मीद है? हम ऐसा राष्ट्र किस प्रकार बना सकते हैं, जो आम आदमी का जीवन स्तर सुधार सके ? ऐसा राष्ट्र किस प्रकार बनाया जा सकता है, जहाँ आतंकवादी और अपराधी अपनी करतूतो को अंजाम देने के बारे में सोच भी न सकें? ऐसा राष्ट्र किस प्रकार बनाया जा सकता है ,जो विश्व में जल्द ही संभावित चतुर्थ औद्योगिक क्रांति में प्रमुख भूमिका निभा सके? सबसे महत्वपूर्ण यह है कि इन 7 -8 बर्षों में किस प्रकार आर्थिक , सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यवार्नीय परिवर्तन ला सकते हैं? लाखों भारतीय लोगों के मन में उठाने वाले कई कठिन प्रश्नों के उत्तर इस पुस्तक में है. इन्हें लेखक कि 50 से अधिक देशों के राजनेताओं , सामाजिक परिवर्तकों, व्यवसायियो और आतंकवादियों से हुई बातचीत के आधार पर तैयार किया गया है. इस पुस्तक में समस्याओं के समाधान तथा भारत के युवा नागरिकों के लिए रूपरेखा उपलब्ध कराई गई है. यह आश्वस्त करती है कि अगर हम नई दिशा कि तलाश करें , तो भारत का भविष्य उससे भी बेहतर हो सकता है, जितना कि हम सोचते हैं. आपको जानकर सुखद लगेगा कि संदीप वासलेकर *नई नीति अवधारणाएँ तैयार करने के लिए* जाने जाते हैं, जिन पर संयुक्त राष्ट्र , भारतीय संसद , यूरोपीय संसद , ब्रिटिश हॉउस ऑफ लॉर्ड्स , हॉउस ऑफ कॉमंस , विश्व आर्थिक मंच और अन्य अंतर्राष्ट्रीय संगठनों में विचार किया जा चुका है. उन्होंने ” ब्लू पीस ” नाम कि अवधारणा तैयार की, जिससे जल को राष्ट्रों के बीच शांति के साधनों के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. वे ‘विवाद का मूल्य’ प्रणाली के अग्रदूत हैं, जिससे किसी भी विवाद के मूल्यों को करीब 100 मानदंडों पर मापा जा सकता है. संदीप वासलेकर ने कई पुस्तकें और शोधपत्र लिखें हैं. उन्होंने करीब पचास देशों की यात्राएं की हैं. 1500 से अधिक समाचार-पत्रों , टेलीविजन चैनलों और वेबसाईटों ने उनके साक्षात्कार लिए हैं और उनके बारे में लिखा है. उन्होंने इंग्लैण्ड की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से दर्शनशास्त्र, राजनीति शास्त्र और अर्थशास्त्र की पढ़ाई की है. हाल ही में उन्हें पुणे की सिम्बोसिस इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी में भारतीय राष्ट्रपति के हाथों मानद डी.लिट. उपाधि प्रदान की गई. *उनके बहुआयामी अनुभवों को समाहित कर स्वतंत्र पत्रकार एवं आर.टी.आई एक्टिविस्ट गोपाल प्रसाद द्वारा प्रस्तुत आलेख के प्रमुख अंश….* *स्वीडन* निवासी आज अत्याधुनिक जीवन जी रहे हैं . उन्हें कोई भी श्रम अथवा भागदौड़ नहीं करनी पड़ती. शिक्षा तथा चिकित्सा सेवा सरकार उपलब्ध कराती है. इसके लिए उन्हें कोई व्यय नहीं करना पड़ता . सफाई कर्मचारी से लेकर वरिष्ठ अधिकारीयों तक सबको अच्छा वेतन मिलता है. किसानों को बड़े पैमाने पर सब्सिडी दी जाती है . अल्पसंख्यक लोग विशेष रूप से सुखी हैं दुनियां के अनेक देशो से लोग स्वीडन में जाकर बसते हैं वहां दंगे हिंसाचार अथवा हड़ताले नहीं होती . सभी लोग स्वप्रेरणा से अनुशासित हैं. कभी कोई गाडी आगे निकालने के लिए दूसरी गाड़ियों का जाम नहीं लगवाता , न ही कोई सिग्नल तोड़ता है. कोई भी न तो सड़क पर थूकता है, न ही कचरा करता है. स्वीडिश लोग मितभाषी हैं. पड़ोसियों से दोस्ती नहीं करते , मगर संकट के समय किसी की भी मदद के लिए सदैव तत्पर रहते हैं. स्वीडन ने अपने विकास की व्याख्या सामजिक , सांस्कृतिक , राजनीतिक और आर्थिक उत्कर्ष के रूप में की है. यह देखकर स्वाभाविक रूप से मन में यह विचार आता है की इतनी कम कालावधि में सर्वसमावेशक तथा सर्वांगीण विकास करना के लिए कैसे संभव हो सका, अर्थात इसका श्री यदि किसी को दिया जा सकता है तो वह विकास की रह दिखानेवाले नेतृत्व को तथा उसपर चलनेवाली सम्पूर्ण जनता को . वास्तविकता यह है की जार्जटाउन अथवा स्टॉकहोम की भंति भारतीय शहरों का भी कायाकल्प सहज संभव है. फिर भी ऐसा नहीं हो रहा तो क्यों? असफलता के लिए स्पष्टीकरण देने में हमारे नेता निपुण हैं. शत्रु राष्ट्रों के उपद्रव एवं भौगोलिक परिस्थितियों के कारण विकास संभव नहीं हो सका, ऐसे स्पष्टीकरण राजनीतिज्ञों द्वारा दिए जाते हैं . मगर ये स्पष्टीकरण कितने आधारहीन हैं यह हमें दुनियां के अन्य देशों के उदाहरण देखकर पता चलता है. दुर्गम क्षेत्र में स्थित गांवों का विकास होना चाहिए . उन्हें मुख्य प्रवाह में लाया जाना चाहिए . सर्वसामान्य जनता का जीवन स्तर यूरोपियन लोगों के समकक्ष लाया जाना चाहिए. रेसीप अर्दोगान ने पहले अत्याधुनिक तकनीक से शोध कार्य किया . उन्हें पता चला की सामान्य जनता के लिए न्याय तथा विकास इन दो चीजों का महत्त्व सर्वाधिक है. इसलिए उन्होंने पार्टी का नाम न्याय तथा विकास पार्टी रखा . तुर्किस्तान के एसियाई क्षेत्र में अनातोलिया सर्वाधिक पिछड़ा प्रदेश है. वहां के छोटे उद्योगपति , व्यापारी , विद्यार्थी सबका आत्मविश्वास तथा आर्थिक आय बढे इस उद्देश्य से उन्होंने समाज के कमजोर वर्गों के लिए लाभकारी उदारीकरण किया . तुलनात्मक दृष्टि से कहें तो , अपने यहाँ विदेशी मुद्रा , आयात-निर्यात और बड़े उद्योग मुक्त अर्थनीति के केंद्र हैं. मगर भारतीय किसान मात्र कृषि उपज मंदी संबंधी कानूनों , सहकारी कृषि की झोलबन्दी तथा निवेश के अभाव के कारण गरीब बना हुआ है . अर्दोगान ने तुर्की के किसानों तथा छोटे उद्योगपतियों के लिए हानिकारक प्रतिबन्ध हटा दिए . उनके विकास के लिए आर्थिक निवेश किया . ग्रामीण स्त्रियों के लिए पारंपरिक वेश में शहरी शिक्षा प्राप्त करना संभव बनाया . सीरिया , आर्मेनिया, ग्रीस आदि सभी शत्रु देशों के साथ समझौते कर वैमनस्य ख़त्म किया और रक्षा पर होनेवाले व्यय की बची राशि ग्रामीण विकास पर खर्च की. देश का एक नई दिशा में सफर शुरू हुआ , उन्हें दिशा मिल गई और विकास के इस नए सुर में सभी नागरिकों ने भी अपना सुर मिलाया . उपजाऊ भूमि का आभाव , पानी का अकाल , अरब देशों से बैर होने से इंधन की भी कमी , ऐसी प्रतिकूल परिस्थिति में भी इजराइल ने कृषि और औद्योगिक क्षेत्रों में विकास कर पिछले 60 बर्षों में अधिकांस नागरिकों को विकास की मूलधारा में समाविष्ट कर लिया है. कहावत है की कभी भारत में घरों पर सोने के कवेलू हुआ करते थे . यहाँ की संपत्ति , उपजाऊ जमीन और अनुकूल वातावरण सारी दुनिया के लिए ईर्ष्या का कारण थे. यही कारण है की विदेशी आक्रमणकारियों ने इसे बार- बार लूटा. मगर यह इतिहास है. स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भौगोलिक स्थिति अनुकूल होने , पर्याप्त संसाधन होते हुए और किसी भी प्रकार के मानव संसाधनों की कमी न होने के बाबजूद विकास के क्षेत्र में दुनिया के अनेक देशों से हम आज भी बहुत पीछे हैं, इसका क्या कारण है? स्वतंत्रता प्राप्ति के समय एक नवजात शिशु के सामान रहे इस देश की आयु आज 65 बर्ष से अधिक है. उदार अर्थव्यवस्था स्वीकार किए भी हमें बीस बर्ष हो चुके हैं . हमारे गणित क्यों गलत हो रहे हैं? क्यों जनता को योग्य दिशा देने में हमारे राजनीतिज्ञ असफल हुए हैं? क्या शासकीय व्यवस्थाओं की त्रुटियाँ , कमियां , निष्क्रियता, जनता के दबाब का अभाव इसके लिए जिम्मेदार है? इस सबके बारे में आत्मचिंतन करने पर एक बात तीव्रता से महसूस होती है – वह यह की हमें किस दिशा में आगे बढ़ाना है, यह अभी भी स्पष्ट नहीं है. परतंत्रता के दिनों में असंभव प्रतीत होनेवाला स्वतंत्रता का एकमात्र ध्येय सभी भारतीय नागरिकों के समक्ष था. इस ध्येय की प्राप्ति के लिए सारा देश एक दिल से , एकजुटता से , एक दिशा में आगे बढ़ रहा था. उस संघर्ष में हमें स्वतंत्रता की प्राप्ति हुई. उसके बाद अपने देश के विकास का स्वप्न प्रत्येक की आँखों में था. उसके लिए दिशा निर्धारित करने का प्रयत्न भी हुआ . पंडित नेहरु ने बाँधों, इस्पात संयंत्रों तथा उच्च अभियांत्रिकी शिक्षा संस्थानों के निर्माण पर जोर दिया . इंदिरा गांधी ने छोटे – छोटे गाँव तक बैंकों का जाल फैलाया. हरित क्रांति का मार्ग दिखाया. राजीव गांधी ने कंप्यूटर और यातायात के क्षेत्र में क्रांति की. देश आधुनिकता की दिशा में तेजी से आगे बाधा. नरसिंहराव के कार्यकाल में मुक्त अर्थव्यवस्था लागू की गई. जीवनावश्यक वस्तुओं का अभाव कम हुआ . अटल बिहारी वाजपेयी ने ग्राम सड़क योजना के माध्यम से गांवों को आपस में जोड़ा. शहरों को मंडियों से जोड़ा. डा. मनमोहन सिंह ने भी रोजगार योजना , किसानों की कर्ज माफी , ग्रामीण विकास की योजनाएं बनाई. प्रत्येक प्रधानमंत्री के कार्यकाल में प्रयत्न किए जाने पर भी 6 दशकों के बाद भी देश में गिनती के लोग संपन्न हैं. बाकी सारे विपन्न. ऐसी परिस्थिति क्यों है? इस सीधे और सरल प्रश्न का उत्तर खोजना हमारे लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है. हमें उसी का उत्तर खोजना होगा. हम बहुत विकसित हो गए हैं आधुनिक हो गए हैं , ऐसा हम समझते हैं. यह केवल विशिष्ट वर्ग की जीवनशैली के कारण. मुट्ठी भर धनिकों का संपत्ति प्रदर्शन , उनकी बड़ाई , उपभोगवाद , ऐश आराम के कारण अपना देश बहुत विकसित हो रहा है, ऐसा कृत्रिम चित्र खड़ा हो रहा है. दिल्ली, मुम्बई , पुणे , नागपुर, इंदौर, बेंगलुरु में दिखने का प्रयत्न किया जाता है. बाजार – हाट का बदला स्वरुप , चमचमाते मॉल्स के रूप में दिखाई देता है. विदेशी ब्रांड्स का प्रदर्शन करते फैशन , पति-पत्नी – बच्चों के लिए अलग-अलग गाड़ियाँ, विदेशों में शिक्षा प्राप्ति के लिए बच्चों को भेजने की होड़ , डिस्को-डंडिया और लाखों रुपयों की दही हंडिया लगाकर आधुनिक पद्धति से माने जानेवाले त्यौहार , अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा और दर्जा बनाए रखने के लिए करनी पद रही कसरत, उसके लिए सिर पर चढ़ाता कर्जा का बोझ , आर्थिक श्रोत जुटाने के लिए , विनियोग और झटपट धन कमाने के लिए शेयर मार्केट जैसे विकल्प या शॉर्टकट्स , बाद में आयकर अधिकारियों से लेकर बैंक प्रबंधकों तक को पटाने के लिए की जानेवाली भागदौड़ और उसके कारण होनेवाले भ्रष्ट व्यव्हार , यह सब विशाल महासागर से भटक रही दिशाहीन नौका की तरह है. विकास का सम्बन्ध विचारों से तथा सकारात्मक कृति से है, केवल संपत्ति से नहीं, यह हम भूल जाते हैं.केवल धनप्राप्ति से जीवन का ध्येय प्राप्त हो गया ऐसा मानना जीवन के बारे में अतिशय संकुचित करने जैसा है. अपने यहाँ सॉफ्टवेयर ,बायोटेक कुछ मात्रा में सौर शक्ति जैसे आधुनिक क्षेत्रों में कुछ युवकों ने शैक्षणिक संस्थाएं खड़ी की. , इसके पीछे उनका उद्देश्य हम स्वयं और दूसरों के लिए कुछ अच्छा कार्य करना था. ऐसे सकारात्मक कार्य से उन्हें समाधान मिला , आनंद मिला. सेवा क्षेत्र में बाबा आमटे , अन्ना हजारे , पांडुरंग शास्त्री आठवले, अभय बंग तो उद्योग क्षेत्र में नंदन निलेकणी , किरण मजुमदार जैसे अनेक उदाहरण याद आते हैं. मगर 115 करोड़ के भारतबर्ष में ऐसे व्यक्ति बिरले ही हैं. अधिकांश लोगों को धन संचय बढ़ाने में ही समाधान मिलता है, मगर उन्हें संतुष्टि कभी भी नहीं मिलती. संपत्ति और महत्वाकांक्षाओं की मर्यादाएं नहीं होती .हम इसके बजाय उसके पीछे अंधे होकर दौड़ते रहते हैं तथा अपनी दिशा भूल जाते हैं. जब समाज के बहुसंख्य लोग सकारात्मक विचार करना छोड़कर संपत्ति और लालसाओं के पीछे दौड़ने लगते हैं, तब उनके हाथ तो कुछ आता नहीं समाज भी दिशाहीन हो जाता है. वैश्वीकरण की प्रक्रिया में अपना स्थान और सहभाग जांचने के उद्देश्य से ” स्ट्रेटेजिक फोरसाईट ग्रुप ” के अध्ययनकर्ताओं ने ‘भारत का भविष्य ‘बिषय पर 2002 में प्रतिवेदन बनाना प्राम्भ किया . उनके द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार 2001 में लगभग 10 करोड़ लोग रोटी , कपड़ा, मकान की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सक्षम थे. उनमें कुछ दुपहिया वहां रखने , कभी -कभार छुट्टियाँ मनाने के लिए बाहर जाने जैसी थोड़ी बहुत मौज – मस्ती करने में भी सक्षम थे. दूसरे वर्ग के 80 करोड़ लोग अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करने में भी सक्षम नहीं थे. पिछले दशक में हमें कुछ तक गरीबी हटाने में सफलता मिली है. मगर जनसँख्या में वृद्धि के कारण गरीबों की संख्या में कमी नहीं आ सकी है. यही स्थिति आज भी बनी हुई है. यह जानकारी वर्तमान अध्ययन के आंकड़ों से स्पष्ट होती है. आज सन 2010में भारत की जनसँख्या 115 करोड़ है. इसमें से 35 करोड़ लोग उच्च अथवा मध्यमवर्गीय हैं. 80 करोड़ लोग दरिद्रता का जीवन जी रहे है.सन 2005 में भारत की जनसँख्या 140 करोड़ होगी . उसमे से 60 करोड़ लोग सुखमय जीवन जीवन जीने में सक्षम होंगे तो 80 करोड़ लोगों का जीवन कष्टमय बना रहेगा. इस प्रकार * 80 *करोड़ लोगों के निर्धन रहते देश की प्रगति असंभव है. आज भले ही उच्च मध्यमवर्गीय लोगों की संख्या 35 करोड़ हो , मगर उनमें से 30 करोड़ लोग अभी भी हासिये पर हैं. माह के अंत में उनके हाथ तंग होते हैं, बच्चों की पढ़ाई पूरी होने के बाद नौकरी के लिए उन्हें दर-दर भटकना पड़ता है, परेशान होना पड़ता है, अपनी परेशानियों को भुलाने के लिए वे सिनेमा देखकर उसके नायक के संघर्ष के साथ खुद की तुलना करते हैं. भारत में लगभग 35 करोड़ मध्यमवर्गीय जनसँख्या बताई जाती है. वास्तव में हमारे यहाँ तीन वर्ग हैं – गाडीवाले, बाईकवाले और बैलगाड़ीवाले . इनमें से केवल 5 करोड़ गाड़ीवाले हैं 30 करोड़ बाईकवाले और शेष 80 करोड़ बैलगाड़ीवाले हैं. हकीकत तो यह है की इनमें से अधिकांश के नसीब में बैलगाड़ी भी नहीं है. पिछले 10 बर्षों में हमारे देश में समृद्धि आई है, ऐसा कहा जाता है , क्योंकि सन 2001 की 2 -3 करोड़ गाडीवालों तथा 15 करोड़ बाईकवालों की संख्या आज दोगुनी हुई है. मगर बैलगाड़ी अर्थव्यवस्था के जंजाल में जकडे 80 करोड़ की स्थिति आज भी वही है. सन 2001 में स्ट्रेटेजिक फोरसाईट ग्रुप ने जब भारतीय अर्थव्यवस्था के सम्बन्ध में अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया , तब ग्रामीण क्षेत्र में परिवर्तन के लिए आने क सुझाव दिए थे . पिछले 10 बर्षों में अनेक बड़े उद्योग समूहों ने कृषि के क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है . इनमें से कुछ लोगों ने इमानदारी से किसानों को अच्छा मूल्य मिले इसलिए अनाज के संग्रहण हेतु उच्च स्तर के गोदाम तथा शहरी ग्राहकों के साथ सीधे संपर्क हेतु योजनाएं भी दीं. मगर यह बहुत कम मात्रा में ही हुआ. सामान्य किसान आज भी गरीब ही बना हुआ है. भारत के बीस करोड़ किसानों और कृषि मजदूरों में से मुश्किल से 20 लाख किसानों के पास ट्रैक्टर हैं. कुल 8 -10 करोड़ दुग्ध उत्पादकों में से मुश्किल से 8 हजार के पास दूध निकालने के आधुनिक यंत्र हैं . गांवों में रहनेवाले लोगों के कष्ट देखकर, भारत को आर्थिक महाशक्ति कहनेवाले लोगों को शर्म आनी चाहिए . महाराष्ट्र में पहले मुख्य रूप से ठाणे , रत्नागिरी , रायगढ़ , पुणे और सतारा जिले के लोग नौकरी हेतु शहरों में आ बसते थे. मगर वर्तमान में तथाकथित आर्थिक महाशक्ति के पर्व में लातूर, नांदेड , सोलापुर , परभणी, जालना , बीड़, उस्मानाबाद जिलों से भी शहरों की तरफ आने का क्रम बढ़ने लगा है. इन्हीं जिलों में उग्रवादी संगठनों की जड़ें भी मजबूत हो रही है, अर्थात गाँव के किसान उमड़ रहे हैं, बड़े शहरों की और तो शहर का उच्च वर्ग उमड़ रहा है-वीजा प्राप्त करने के लिए अमेरिका, इंग्लैण्ड या ऑस्ट्रेलिया के दूतावासों की ओर . जो ग्रामीण शहर नहीं जा पाते अथवा शहर के जिस अशिक्षित वर्ग को विदेशी दूतावास घास नहीं डालते ,वे शामिल हो जाते हैं गुंडों की टोली में या फिर उग्रवादी संगठनों में. प्रत्येक व्यक्ति की अपनी अलग दिशा है. ऐसी परिस्थिति में भारत राष्ट्र की दिशा क्या हो? क्या इस दिशा की खोज करना तत्काल जरूरी नहीं है?

Saturday, September 22, 2012

खुदरा में विदेशी घुसपैठ raviwar.com se sabhar पीयूष पंत


खुदरा में विदेशी घुसपैठ raviwar.com se sabhar
पीयूष पंत


भारत में रीटेल क्षेत्र के भीतर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफडीआई नया नहीं है लेकिन अब तक यह एकल ब्रांड तक ही महदूद था. अब जबकि केंद्र सरकार ने मल्टीब्रांड में एफडीआई के लिए रीटेल क्षेत्र को खोलने का फैसला ले लिया है, तो उसकी आलोचना हो रही है. सरकार का रवैया बिल्कुल वैसा ही अडि़यल है, जैसा 2005 में अमरीका के साथ नाभिकीय संधि के दौरान दिखा था. इस मौके पर हमें कुछ साल पहले नाभिकीय रिएक्टर बनाने वाली लॉबी द्वारा अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश पर भारत के साथ नाभिकीय संधि करने संबंधी बनाए गए भारी दबाव को याद करना होगा, जिसके आगे अपनी सरकार के वजूद को खतरे में डालकर यूपीए-1 के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने घुटने टेक दिए थे, जिसके बाद संसद ने इसे मंजूरी दे दी थी. और अब विदेशी रिटेल कंपनियों की लॉबिंग और दबाव के चलते यूपीए 2 के मंत्रिमंडल ने भारतीय खुदरा व्यापार में 51 फीसदी विदेशी निवेश को मंजूरी दे दी है.

दरअसल वाल मार्ट 2007 से ही अमरीकी कानून निर्माताओं के बीच भारत में अपने प्रवेश की योजना को लेकर पैरवी व प्रचार करता रहा है और इसके द्वारा पक्षपोषित मुद्दों में भारत में निवेश के लिए संवर्द्धित बाजार पहुंच भी शामिल रहा है. 2007 से 2009 के बीच कंपनी ने लॉबिंग पर 52 करोड़ रुपए खर्च किए. पंद्रह देशों में कारोबार और सालाना 400 अरब डॉलर के कुल विक्रय वाली अमरीका की इस शीर्ष कंपनी ने वहां और भारत दोनों ही जगहों पर तगड़ी लॉबिंग की है.

वॉशिंगटन से जारी पीटीआई की रिपोर्ट कहती है- हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट में दर्ज हालिया लॉबिंग डिसक्लोज़र रिपोर्ट के मुताबिक अमरीका की कंपनियों और उद्योग समूहों ने 2012 की शुरुआत से लेकर अब तक लॉबिंग पर लाखों डॉलर खर्च किए हैं जिनके तहत भारत में एफडीआई, भारत के कराधान ढांचे में बदलाव और व्यापार संबंधी अन्य मुद्दे शामिल हैं.

रिपोर्ट कहती है कि वाल मार्ट ने 30 जून 2012 को खत्म हुई तिमाही में भारत में एफडीआई से संबंधित व अन्य मुद्दों पर लॉबिंग के लिए 15 लाख डॉलर खर्च किए हैं. रिपोर्ट बताती है कि कंपनी ने 2010 के शुरुवाती तीन महीनों में भारत में एफडीआई संबंधी परिचर्चा पर छह करोड़ रुपए खर्च किए हैं.

विदेशी बाजारों में पहुंच के लिए विशाल कॉरपोरेट घराने अकेले लॉबिंग का ही इस्तेमाल नहीं करते. वे अपने देश के बड़े राजनीतिक रसूख वाले लोगों को भी अपने बोर्ड में शामिल करते हैं जो दूसरी सरकारों पर कॉरपोरेट हितों को पूरा करने के लिए पूरी बेशर्मी से दबाव बनाते हैं. ज़रा देखिए कि कैसे नई दिल्ली स्थित अमरीकी दूतावास को सितम्बर 2009 में भेजे अपने संदेश में (प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का दूसरा कार्यकाल शुरू होने के कुछ दिनों बाद) अमरीकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन अप्रत्यक्ष तौर पर वाल मार्ट के प्रवेश का संदर्भ उठाती हैं (हिंदू-विकीलीक्स इंडिया केबल सीरीज़ः 18 मार्च 2011 के मुताबिक): शर्मा (वाणिज्य मंत्री) भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के दिशानिर्देशों पर क्या राय रखते हैं, किन क्षेत्रों को खोलने की उनकी योजना है, मल्टीब्रांड रीटेल को खोलने में उन्हें संकोच क्यों है.

हिलेरी के इन सवालों और वाल मार्ट के हितों के बीच रिश्तों पर अगर अब भी भरोसा ना हो तो एबीसी न्यूज़ की 31 जनवरी 2008 की रिपोर्ट देखें जिसका शीर्षक था ''यूनियनों पर वाल मार्ट के दमन पर क्लिंटन खामोश''. रिपोर्ट कहती है कि वाल मार्ट के बोर्ड में निदेशक रहते हुए हिलेरी ने दसियों हजार डॉलर कमाए और वाल मार्ट के अधिकारियों व लॉबिस्टों ने 2007-08 में उनके चुनाव प्रचार पर हजारों डॉलर खर्च किए. यह भी कहा गया है कि निदेशक के तौर पर हिलेरी ''कंपनी की वफादार बनी रहीं.''

इस तरह यह कहा जा सकता है कि रीटेल और अन्य क्षेत्रों को 100 फीसदी एफडीआई के लिए खोलना भारतीय अर्थव्यवस्था की ज़रुरत नहीं है बल्कि मनमोहन सिंह की सरकार की इस बेचैनी के पीछे ''विदेशी हाथ'' है. रीटेल के अलावा अन्य कारोबारों में भी अमरीकी कंपनियां बाजार पहुंच की कवायद कर रही हैं. इनमें डाउ केमिकल्स का भी नाम है जिसने पिछली तिमाही ''ट्रांस पैसिफिक पार्टनरशिप मार्केट ऐक्सेस इंडिया'' के मुद्दे पर 36 लाख डॉलर खर्च किए. भारत के साथ व्यापार से जुड़े मसलों पर खर्च करने वाली अन्य कंपनियों में डेल, मोर्गन स्टेनली, जि़रॉक्स, कारगिल, एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज़ एसोसिएशन ऑफ अमरीका और चैम्बर ऑफ कॉमर्स ऑफ यूएस शामिल हैं.

दुनिया भर में कॉफी की दुकानों की श्रृंखला चलाने वाला स्टारबक्स भारत में एकल ब्रांड रीटेल में 100 फीसदी एफडीआई के लिए लॉबिंग करता रहा है. अमरीकी सीनेट के सामने दिए गए डिसक्लोज़र बयान के मुताबिक कंपनी ने 2011 की पहली छमाही में ''भारत में बाजार खोलने संबंधी पहलों'' पर एक करोड़ रुपए खर्च किए थे. ध्यान देने की बात है कि स्टारबक्स की पहल कामयाब हुई क्योंकि भारत सरकार ''विदेशी दबाव'' के आगे झुक गई और कुछ समय पहले वो एकल ब्रांड रीटेल में 100 फीसदी एफडीआई को मंजूरी दे चुकी है.

अब सवाल उठता है कि भारत में रीटेल बाजार तक पहुंच के लिए विदेशी कॉरपोरेट ने इतनी तगड़ी लॉबिंग क्यों की? इसे समझने के लिए हमें भारत में रीटेल बाज़ार का आकलन करना होगा. भारत का खुदरा क्षेत्र बहुत बिखरा हुआ है और यहां 97 फीसदी कारोबार असंगठित खुदरा विक्रेता चलाते हैं. इसीलिए भारत के खुदरा क्षेत्र में भारी संभावनाएं देखी जाती हैं और अनुमान के मुताबिक 2007 के 330 अरब डॉलर के मुकाबले इसकी बढ़त 2015 में दोगुना यानी 640 अरब डॉलर हो जाएगी. इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च एंड इंटरनेशनल इकनॉमिक रिलेशंस (आईसीआरआईईआर) के अनुमान के मुताबिक 2006-07 में असंगठित रीटेल का कुल सालाना कारोबार भारत में 408.8 अरब डॉलर और पारंपरिक खुदरा दुकानों की कुल संख्या 1.3 करोड़ थी. एक अध्ययन के मुताबिक भारतीय खुदरा बाजार का आकार अनुमानतः 704 करोड़ रुपए का है जो कुल खुदरा बाजार का सिर्फ 3 फीसदी है. एक रिपोर्ट कहती है कि 2003 से 2008 के बीच खुदरा बिक्री सालाना 8.3 फीसदी की दर से बढ़ती रही है.

विश्लेषकों के मुताबिक अगले दस साल में यह क्षेत्र 9 फीसदी सालाना की दर से बढ़ेगा और संगठित खुदरा दुकानों की संख्या में भी वृद्धि होगी. उन्हें उम्मीद है कि संगठित खुदरा कारोबार मौजूदा 4 फीसदी से 2018 में 25 फीसदी पर पहुंच जाएगा. वे मानते हैं कि भारत में संगठित खुदरा बाजार के विकास की भारी संभावनाएं हैं चूंकि यहां उपभोक्ता बाजार बहुत बड़ा है. कृषि के बाद यह क्षेत्र रोजगार का सबसे बड़ा स्रोत है और ग्रामीण भारत में इसकी गहरी पहुंच है, जहां देश के जीडीपी में 10 फीसदी से ज्यादा का यह योगदान दे रहा है.
भारत का विशाल खुदरा क्षेत्र खोलने से आखिर किसे फायदा होगा. क्या इससे भारतीस उपभोक्ताओं को लाभ होगा या किसानों को. कहीं यह विदेशी कॉरपोरेट कंपनियों के हितों को तो साधने में ही नहीं लग जाएगा. कुछ लोग सरकारी दलील देते हैं कि मलटीब्रांड रीटेल में एफडीआई से बड़े पैमाने पर देश में विदेशी पूंजी आएगी जिससे वित्तीय घाटा कम होगा और परिणामस्वरूप आर्थिक वृद्धि होगी. बार-बार वे एक ही दलील देते हैं कि रीटेल में एफडीआई को लाने से बिचैलियों की समाप्ति हो जाएगी जिससे न सिर्फ किसान बल्कि उपभोक्ता भी फायदे में रहेगा. यदि हम संगठित खुदरा क्षेत्र के काम करने के वास्तवित तरीके पर नज़र डालें तो यह दलील कहीं नहीं ठहरती.

सच्चाई यह है कि पूरे काम में बिचौलियों से निजात नहीं पाया जा सकता. फर्क बस यह आएगा कि मौजूदा बिचैलियों की जगह बड़े और अमीर बिचैलिए आ जाएंगे और ये सभी खुद रीटेलर के अपने लोग होंगे. यह बात ध्यान देने की है कि किसान से खुदरा दुकानदार को सीधी बिक्री तब तक नहीं हो सकती जब तक कि रीटेलर का अपना खेत न हो.

जहां तक किसान के लाभान्वित होने का तर्क है तो यह विचार भी गड़बड़ जान पड़ता है. जो लोग यह कहते हैं कि रीटेल में एफडीआई से किसानों को बेहतर दाम मिलेगा और उपभोक्ता को कम पैसे चुकाने पड़ेंगे उन्हें इस बात का जवाब देना चाहिए कि जब घरेलू रीटेलरों के कामकाज से किसानों को लाभ नहीं मिल सका है तो विदेशी रीटेलरों से यह कैसे संभव होगा. इसके अलावा विशाल बहुराष्ट्रीय रीटेलरों के कारोबार का मंत्र ही होता है ''सबसे कम में खरीदो, सबसे ज्यादा में बेचो.'' ऐसे रीटेलर बाजार में अपनी शर्तें चलाने के हिसाब से काम करते हैं. चूंकि उनका काम ही अधिकतम मुनाफा कमाना है, इसलिए वे किसानों का न्यूनतम भुगतान करेंगे. चूंकि फल और सब्जियां जल्द खराब होने वाली चीज़ें हैं और देश में प्रशीतन का ढांचा अच्छा नहीं है, लिहाजा किसानों को रीटेलरों के मनमाफिक दाम पर अपने उत्पाद बेचने पड़ेंगे.

भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान को एक बार पश्चिमी देशों में किसानों के हालात पर नज़र दौड़ा लेनी चाहिए जहां बहुराष्ट्रीय कंपनियों का रीटेल श्रृंखला पर कब्ज़ा है. कई रिपोर्टें पश्चिम से इस बाबत आ रही हैं कि खेती के निगमीकरण और खरीद की प्रक्रिया में प्रसंस्करण कंपनियों व रीटेलरों के वर्चस्व के चलते हजारों किसानों को खेती छोड़ देनी पड़ी.

रिपोर्टें आ रही हैं कि अमरीका में छोटे किसानों पर खतरा है और साल दर साल भारी संख्या में वे खेती छोड़ कर जा रहे हैं. हालत यह हो गई है कि इंग्लैंड में रायल एसोसिएशन आफ ब्रिटिश डेयरी फार्मर्स ने शिकायत की है कि ताज़े दूध के बदले किसानों को जो कीमत मिल रही है वह बेहद कम है औसत किसान को प्रति लीटर उत्पादित दूध पर नुकसान हो रहा है जबकि पिछले कुछ वर्षों में इसी से सुपरमार्केट को हो रहा मुनाफा लगातार बढ़ा है. भारत में उपभोक्ता एक लीटर दूध के लिए जितने पैसे देता है, उसका 75 फीसदी तक किसान को मिल जाता है.

मल्टीब्रांड रीटेल में एफडीआई को मंजूरी देने के बाद तो अब भारत का डेयरी किसान भी बरबाद हो जाएगा. सरकार ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए जो अनिवार्यता रखी थी कि उन्हें अपनी जरूरत के सामान का 30 फीसदी स्थानीय स्तर पर ही जुटाना होगा, कंपनियों के दबाव को देखते हुए उसे भी छोड़ना पडा. ये कंपनियां आम तौर पर अपने देश से सामान का आयात करती हैं या फिर उन देशों से जहां श्रम सस्ता है (जैसे चीन). इसके अलावा गैट समझौते का अनुच्छेद 3 किसी भी पक्ष के लिए यह अनिवार्य करता है कि वह दूसरे पक्ष के साथ अनुबंध के तहत उसके उत्पादों को ‘‘राष्ट्रीय बरताव’’ प्रदान करे. इसमें साफ तौर पर घरेलू उद्योगों से संसाधन लेने की जरूरत संबंधी नियमन को बाहर रखा गया है. चूंकि भारत ने इन्हीं शर्तों पर विश्व व्यापार संगठन की सदस्यता ली थी, लिहाजा सिर्फ भारतीय उद्यमों से 30 फीसदी संसाधन लेने की बाध्यता वह लागू नहीं कर सकता क्योंकि इसे दूसरे देश चुनौती दे देंगे.

इसके अतिरिक्त भारत ने 71 देशों के साथ द्विपक्षीय निवेश संवर्द्धन और संरक्षण संधियां की हुई हैं जिसके तहत इन देशों के निवेशकों के साथ ‘‘राष्ट्रीय बरताव’’ किया जाना होगा.

ज़ाहिर है ये देश अपने यहां के छोटे और मझोले उद्यमों से सामग्री आयात की बात करेंगे. केर सेंटर फॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट ‘‘यूएस फार्म क्राइसिस’’ कहती है कि ‘‘हाल के वर्षों में विशाल निगमों ने उत्पादन अनुबंध और ऐसे ही अन्य एकीकरण उपकरणों के माध्यम से किसानों की आजादी को छीना है.’’ प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक एमएस स्वामिनाथन द्वारा इसी संदर्भ में कहे गए ये शब्द हमेशा याद रखने होंगे- ‘‘किसानों की जरूरतों, सुरक्षा और मोलभाव करने की उसकी क्षमता को सुनिश्चित किए बगैर अनुबंध खेती की जल्दबाजी इस क्षेत्र में भारी विस्थापन पैदा करेगी.’’

मई 209 में रीटेल पर एफडीआई विषय पर वाणिज्य पर संसदीय समिति की रिपोर्ट की सिफारिशों को भी नहीं भुलाया जाना होगा, जिसमें उसने सभी पहलुओं को संज्ञान में लेकर सभी पक्षकारों से बातचीत करने के बाद रीटेल में एफडीआई को मंजूरी नहीं देने की सिफारिश की थी. दिक्कत यह है कि जब विदेशी कारपोरेट ही यूपीए सरकार को चला रहे हों, तो भारतीय किसानों के प्रति सरोकारों की उम्मीद उनसे कैसे की जा सकती है.

फैसला वाल मार्ट जैसी विशाल बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पक्ष में ही आया है, जो बरसों से इसके लिए काफी कवायद कर रही हैं. ये बात वाल मार्ट के अंतरराष्ट्रीय डिवीज़न के मुखिया जोन मेन्ज़र के 2005 की सालाना बैठक में कही गयी इस बात से भी साफ़ हो जाता है- ‘‘सरकार के साथ अपनी छह बैठकों में हमने वाल मार्ट की काफी अच्छी छवि स्थापित की है...’’ और ‘‘हमने भारत में एफडीआई लाबी को प्रोत्साहित कर विरोधी लाबी के प्रयासों को पहले ही चिह्नित कर लिया है."


.

Friday, September 21, 2012

MERA lekh on FDI in Retail

विदेशी कपंनियों को खुदरा व्यापार में अनुमति देने के नुक्सान.


भारत सरकार द्वारा व्यापारियों, किसानों लघु उद्योगों, राजनैतिक दलों सहित विभिन्न वर्गों द्वारा भारी विरोध के बावजूद सितंबर 14, 2012 को खुदरा क्षेत्र में 51 प्रतिशत विदेशी निवेश को अनुमति देने से देश स्तब्ध रह गया है। यह सर्वविदित है कि इस विषय पर देश में तो क्या सरकार में भी मतैक्य नहीं है। सरकार का यह कृत्य किसी तर्क या औचित्य से विहीन है और बहुराष्ट्रीय कंपनियों और विदेशी ताकतों के प्रभाव में यह लिया गया कदम है। भारत सरकार पिछले लगभग 7 वर्षों से खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश खोलने के तमाम प्रयास करती रही है और इस क्रम में जनवरी 2006 में सरकार ने सिंगल ब्रांड खुदरा में बहुराष्ट्रीय कंपनियों को 51 प्रतिशत निवेश की अनुमति दी जिसे पिछले वर्ष बढाकर 100 प्रतिशत कर दिया गया है। साथ ही साथ केश एण्ड केरी के नाम पर और थोक व्यापार की आड़ में पहले से ही विदेशी कंपनियां मल्टी-ब्रांड खुदरा क्षेत्र में पहले से ही प्रवेश कर चुकी है।


सरकार द्वारा बहुराष्ट्रीय कंपनियों को मल्टी-ब्रांड खुदरा व्यापार में प्रवेश की अनुमति देने का मतलब है - वालमार्ट, टेस्को, केराफोर, स्पैंसर्स इत्यादि कंपनियों को आने की अनुमति। और यह छोटे व्यापारियों के लिए मौत का पैगाम है। सरकार का यह निर्णय खुदरा क्षेत्र में संलग्न 3.3 करोड़ लोगों और इसकी सहायक गतिविधियों में संलग्न 1.7 करोड़ लोगों के प्रति सवेदनहीनता का सीधा-सीधा प्रमाण है, जिनका अस्तित्व ही खतरे में पड़ चुका है। हमारे देश में छोटी बड़ी दुकानों का आकार 50-200 वर्ग फुट का होता है, जबकि वालमार्ट सरीखी कंपनियों के स्टोर लगभग 1 लाख वर्ग फुट के होते है। हमारे कई व्यापारियों के पास तो अपनी दुकान तक नहीं होती और वह अपना व्यवसाय पटरी, रेहड़ी अथवा खोमचा इत्यादि से चलाते है और तमाम प्रकार की समस्याओं और शोषण के शिकार होते हंै। किसी भी अन्य प्रकार के रोजगार के अवसर न होने के कारण वे खुदरा क्षेत्र से अपनी जीविका चलाते है। सरकार की ओर से भी उन्हें वित्त, विपणन अथवा भंडारण इत्यादि की कोई सुविधा नहीं होती। इन लोगों के पास रोजगार का कोई वैकल्पिक साधन भी नहीं है।
क्या किसानो व छोटे उद्योगों को इससे कोई लाभ होगा? बिलकुल नहीं!

इस समय सरकार 'फूट डालो राज करो' की नीति पर चलने क़ि कोशिश कर रही हे जिसके तहत खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश को किसानों व छोटे उद्यमियों के लिए लाभदायक होने का भ्रम फैलाया जा रहा है। यह वक्तव्य एकदम तथ्यों से परे हे. अमरीका जैसे शिखर देशों में जहाँ ‘वालमार्ट’ जैसे संगठित रिटेलर है, वहाँ के किसान सरकारी सब्सिडी पर ही जिंदा हैं। अगर किसानों की हालत वहाँ अच्छी होती तो वहाँ इतनी बड़ी मात्रा में सब्सिडी देने की क्या जरूरत थी ? ध्यान रहे, अमरीका में अब केवल सत्तर हज़ार किसान ही बचे हैं. यही नहीं वहां पिछले चोदह वर्षों में सर्वाधिक भुखमरी छाई हे. पूरे योरोप, जहाँ इन खुदरा कंपनियों का सर्वाधिक प्रभाव हे, प्रति मिनट एक किसान कृषि छोड़ रहा हे. फ़्रांस में केवल 2009 में किसानो की आमदनी 39 % घटी हे . समझ नहीं आता की ये विदेशी कंपनिया किसानो का भला भारत में कैसे करेंगी. वैसे भी इन रिटेल कम्पनियों का नारा हे - ईडीएलसी यानी ‘एवरी डे लो कास्ट’ अर्थात हर रोज कम लागत मूल्य करना । समझ में नहीं आता कि प्रचलित मूल्य से ज्यादा ये किसानों को क्यों देंगी ?

दूसरी तरफ किसानो को तभी लाभ हो सकता है जब उनके सामानों पर बोली लगाने वालों की ज्यादा संख्या हो। ये कंपनिया तो पहला काम ही प्रतियोगियों को बाहर करने का करती हे, और अपना एकाधिकार मंडी पर करती हे . भारतीय छोटे उद्योगों से तीस प्रतिशत माल खरीदने की बात भी बिलकुल बेबुनयाद हे. अंतर-राष्टीय समझोतों के अंतर्गत ऐसा करवा पाना किसी भी सरकार के बस में नहीं हे. तो ऐसे में श्री अन्ना हजारे का इस बारे में कथन बहुत सटीक लगता हैं, 'जब विदेशी कंपनिया आयेंगी तो वे सेवा करने नहीं बल्की मेवा खाने आयेगी'. अतः किसानो या छोटे उद्यमियों का उनसे भला कभी नहीं होगा .

यहाँ श्री अरुण जेटली का तर्क समझाने लायक हे. उनका कथन हे क़ि विदेशी निवेश आने का पहला नुक्सान दुकानदार को नहीं बल्कि भारत के छोटे उद्योग चलाने वालों को होगा. भारत ने पहले ही चीन जैसे देशों के मुकाबले अपने देश में औदोयोगिक ढांचा खड़ा करने का प्रयास नहीं किया हे. इस लिए अब ये कंपनिया चीन का सस्ता माल हमारे मार्केट में भर देंगी. सरकार बोलती हे क़ि ३०% सामान इन कम्पन्यो को भारतीय उद्योगपतियों से खरीदना अनिवार्य कर दिया गया हे. ये अस्संभव सी बात हे. केवल मात्र उनसे बिल ही लिया जायेगा. आज अमरीकी चुनाव में बहुत बड़ा मुद्दा यही हे क़ि वालमार्ट अकेला चीन के कुल उत्पादन का २१ प्रतिशत सामान खरीदता हे, इस लिए अमरीका में स्थानीय उद्योग बंद हो रहे हे. अगर अमरीका जैसे देश के साथ वहां का बड़ा रिटेलर वाल-मार्ट ये दुर्गती कर रहा हे तो भारत क़ि क्या बिसात हे.

क्या आम आदमी को सस्ता सामान और रोजगार मिले गा? असंभव!

ऐसे ही आम व्यक्ति अर्थात उपभोक्ता को भी बहुत बड़ा नुक्सान होगा। तीसरे, यदि सारे आपूर्ति के स्रोत विदेशी कम्पनियों के हाथ आ गये तो देश की सुरक्षा को भी बड़ा खतरा है। इन विदेशी खुदरा कंपनियों द्वारा रोजगार के नए अवसर उपलब्ध कराने की बात भी सचाई से कोसो दूर हे. इस सन्दर्भ में एक उदाहरण पर्याप्त होगा. गत दो वर्षों में टेस्को और सेंसबरी जैसी खुदरा कंपनियों ने क्रमशः ग्यारह और तेरह हज़ार नए रोजगार देने का दावा किया था इंग्लैंड में. पर हकीकत ये हे की क्रमशः 726 रोजगार दिए टेस्को ने और सेंसबरी ने पहले से नौकरी में लगे सोलह सो लोगो को भी हटा दिया. यही हाल कमोबेश सभी बड़ी रिटेलर कंपनियों का हे. उन्होंने कहा कि थाईलैंड, म्यामांर, व फिलीपींस जैसे राष्ट्र अपनी इस नीति को बदलने को मजबूर हुए हैं तथा अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा तक अपनी जनता से छोटी दुकानों से सामान खरीदने की अपील कर रहे उधर, भारत सरकार इसको अनुमति दे रही है थोड़े समय तो ये कंपनिया किसी देश में सस्ता माल बेचती हैं और एक साल तक घटा उठाने के लिए तेयारी करके आती हे. बाद में जब स्थानीय प्रतियोगिता समाप्त हो जाती हे और ये कंपनिया आपस में तालमेल करके कीमतों को बहुत ऊँची ले जाती हैं. तब उपभोगता करेगा भी तो क्या करेगा.
ये किसानो के लिए भक्षक, छोटे उद्योगों के नश्तक और आम जनता के लिए जहरीले तक्षक हे.

ऐसे में सरकार के अत्यंत गैरजिमेदाराना कृत्य के लिए स्वदेशी जागरण मंच गहरा रोष व्यक्त करता है। गौरतलब है कि मल्टी-ब्रांड संसदीय समिति ने सरकार को खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश न खोलने की सिफारिश की थी। संसदीय समिति की सिफारिशों को दरकिनार करते हुए, सरकार द्वारा विदेशी कंपनियों को खुदरा क्षेत्र में अनुमति देने का निर्णय संसदीय लोकतंत्र का भी अपमान है। सरकार का यह कृत्य संसद के प्रति उसकी अवमानना और विदेशी भक्ति का प्रतीक है।


सरकार द्वारा खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश की अनुमति आम आदमी के प्रति सरकार की संवेदनहीनता के विरोध में स्वदेशी जागरण मंच ने देश भर में धरना, प्रदर्शन और पुतला दहन सहित सभी लोकतांत्रिक उपायों के माध्यम से आंदोलन छेडने का निर्णय लिया है। हम सभी जानते हैं क़ि सरकार ने पहले भी इसी प्रकार का तुगलकी निर्णय लिया था और एक दिसंबर २०११ के देश-व्यापी बंद के कारण सरकार ने इस विषय को ठन्डे बसते में डालने का निर्णय लिया था. सरकार ने ये भी आश्वासन दिया था क़ि आगे जब भी अभी इस पर कोई निर्णय लिया जाये गा, वो सबकी सहमती से लिया जायेगा. इसबार सरकार के सहयोगी दल सरेआम चिल्ला चिल्ला कर कह रहे हैं क़ि हमारे से कोई सलाह नहीं ली गयी. अब जब उन्होंने सहयोगियों से ही नहीं पूछा तो विपक्ष या देशवासियों के बारे में तो क्या कहा जायेगा.
स्वदेशी जागरण मंच सरकार से पुनः आग्रह करता है कि आम आदमी के प्रति संवेदनहीनता का त्याग करते हुए खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश के अपने निर्णय को वापिस ले।

Thursday, September 20, 2012

FDI IN RETAIL PAR HINDI ME MERA NAYA LEKH



meta lekh FDI

विदेशी कपंनियों को खुदरा व्यापार में अनुमति देने के नुक्सान.


भारत सरकार द्वारा व्यापारियों, किसानों लघु उद्योगों, राजनैतिक दलों सहित विभिन्न वर्गों द्वारा भारी विरोध के बावजूद सितंबर 14, 2012 को खुदरा क्षेत्र में 51 प्रतिशत विदेशी निवेश को अनुमति देने से देश स्तब्ध रह गया है। यह सर्वविदित है कि इस विषय पर देश में तो क्या सरकार में भी मतैक्य नहीं है। सरकार का यह कृत्य किसी तर्क या औचित्य से विहीन है और बहुराष्ट्रीय कंपनियों और विदेशी ताकतों के प्रभाव में यह लिया गया कदम है। भारत सरकार पिछले लगभग 7 वर्षों से खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश खोलने के तमाम प्रयास करती रही है और इस क्रम में जनवरी 2006 में सरकार ने सिंगल ब्रांड खुदरा में बहुराष्ट्रीय कंपनियों को 51 प्रतिशत निवेश की अनुमति दी जिसे पिछले वर्ष बढाकर 100 प्रतिशत कर दिया गया है। साथ ही साथ केश एण्ड केरी के नाम पर और थोक व्यापार की आड़ में पहले से ही विदेशी कंपनियां मल्टी-ब्रांड खुदरा क्षेत्र में पहले से ही प्रवेश कर चुकी है।


सरकार द्वारा बहुराष्ट्रीय कंपनियों को मल्टी-ब्रांड खुदरा व्यापार में प्रवेश की अनुमति देने का मतलब है - वालमार्ट, टेस्को, केराफोर, स्पैंसर्स इत्यादि कंपनियों को आने की अनुमति। और यह छोटे व्यापारियों के लिए मौत का पैगाम है। सरकार का यह निर्णय खुदरा क्षेत्र में संलग्न 3.3 करोड़ लोगों और इसकी सहायक गतिविधियों में संलग्न 1.7 करोड़ लोगों के प्रति सवेदनहीनता का सीधा-सीधा प्रमाण है, जिनका अस्तित्व ही खतरे में पड़ चुका है। हमारे देश में छोटी बड़ी दुकानों का आकार 50-200 वर्ग फुट का होता है, जबकि वालमार्ट सरीखी कंपनियों के स्टोर लगभग 1 लाख वर्ग फुट के होते है। हमारे कई व्यापारियों के पास तो अपनी दुकान तक नहीं होती और वह अपना व्यवसाय पटरी, रेहड़ी अथवा खोमचा इत्यादि से चलाते है और तमाम प्रकार की समस्याओं और शोषण के शिकार होते हंै। किसी भी अन्य प्रकार के रोजगार के अवसर न होने के कारण वे खुदरा क्षेत्र से अपनी जीविका चलाते है। सरकार की ओर से भी उन्हें वित्त, विपणन अथवा भंडारण इत्यादि की कोई सुविधा नहीं होती। इन लोगों के पास रोजगार का कोई वैकल्पिक साधन भी नहीं है।
क्या किसानो व छोटे उद्योगों को इससे कोई लाभ होगा? बिलकुल नहीं!

इस समय सरकार 'फूट डालो राज करो' की नीति पर चलने क़ि कोशिश कर रही हे जिसके तहत खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश को किसानों व छोटे उद्यमियों के लिए लाभदायक होने का भ्रम फैलाया जा रहा है। यह वक्तव्य एकदम तथ्यों से परे हे. अमरीका जैसे शिखर देशों में जहाँ ‘वालमार्ट’ जैसे संगठित रिटेलर है, वहाँ के किसान सरकारी सब्सिडी पर ही जिंदा हैं। अगर किसानों की हालत वहाँ अच्छी होती तो वहाँ इतनी बड़ी मात्रा में सब्सिडी देने की क्या जरूरत थी ? ध्यान रहे, अमरीका में अब केवल सत्तर हज़ार किसान ही बचे हैं. यही नहीं वहां पिछले चोदह वर्षों में सर्वाधिक भुखमरी छाई हे. पूरे योरोप, जहाँ इन खुदरा कंपनियों का सर्वाधिक प्रभाव हे, प्रति मिनट एक किसान कृषि छोड़ रहा हे. फ़्रांस में केवल 2009 में किसानो की आमदनी 39 % घटी हे . समझ नहीं आता की ये विदेशी कंपनिया किसानो का भला भारत में कैसे करेंगी. वैसे भी इन रिटेल कम्पनियों का नारा हे - ईडीएलसी यानी ‘एवरी डे लो कास्ट’ अर्थात हर रोज कम लागत मूल्य करना । समझ में नहीं आता कि प्रचलित मूल्य से ज्यादा ये किसानों को क्यों देंगी ?

दूसरी तरफ किसानो को तभी लाभ हो सकता है जब उनके सामानों पर बोली लगाने वालों की ज्यादा संख्या हो। ये कंपनिया तो पहला काम ही प्रतियोगियों को बाहर करने का करती हे, और अपना एकाधिकार मंडी पर करती हे . भारतीय छोटे उद्योगों से तीस प्रतिशत माल खरीदने की बात भी बिलकुल बेबुनयाद हे. अंतर-राष्टीय समझोतों के अंतर्गत ऐसा करवा पाना किसी भी सरकार के बस में नहीं हे. तो ऐसे में श्री अन्ना हजारे का इस बारे में कथन बहुत सटीक लगता हैं, 'जब विदेशी कंपनिया आयेंगी तो वे सेवा करने नहीं बल्की मेवा खाने आयेगी'. अतः किसानो या छोटे उद्यमियों का उनसे भला कभी नहीं होगा .

यहाँ श्री अरुण जेटली का तर्क समझाने लायक हे. उनका कथन हे क़ि विदेशी निवेश आने का पहला नुक्सान दुकानदार को नहीं बल्कि भारत के छोटे उद्योग चलाने वालों को होगा. भारत ने पहले ही चीन जैसे देशों के मुकाबले अपने देश में औदोयोगिक ढांचा खड़ा करने का प्रयास नहीं किया हे. इस लिए अब ये कंपनिया चीन का सस्ता माल हमारे मार्केट में भर देंगी. सरकार बोलती हे क़ि ३०% सामान इन कम्पन्यो को भारतीय उद्योगपतियों से खरीदना अनिवार्य कर दिया गया हे. ये अस्संभव सी बात हे. केवल मात्र उनसे बिल ही लिया जायेगा. आज अमरीकी चुनाव में बहुत बड़ा मुद्दा यही हे क़ि वालमार्ट अकेला चीन के कुल उत्पादन का २१ प्रतिशत सामान खरीदता हे, इस लिए अमरीका में स्थानीय उद्योग बंद हो रहे हे. अगर अमरीका जैसे देश के साथ वहां का बड़ा रिटेलर वाल-मार्ट ये दुर्गती कर रहा हे तो भारत क़ि क्या बिसात हे.

क्या आम आदमी को सस्ता सामान और रोजगार मिले गा? असंभव!

ऐसे ही आम व्यक्ति अर्थात उपभोक्ता को भी बहुत बड़ा नुक्सान होगा। तीसरे, यदि सारे आपूर्ति के स्रोत विदेशी कम्पनियों के हाथ आ गये तो देश की सुरक्षा को भी बड़ा खतरा है। इन विदेशी खुदरा कंपनियों द्वारा रोजगार के नए अवसर उपलब्ध कराने की बात भी सचाई से कोसो दूर हे. इस सन्दर्भ में एक उदाहरण पर्याप्त होगा. गत दो वर्षों में टेस्को और सेंसबरी जैसी खुदरा कंपनियों ने क्रमशः ग्यारह और तेरह हज़ार नए रोजगार देने का दावा किया था इंग्लैंड में. पर हकीकत ये हे की क्रमशः 726 रोजगार दिए टेस्को ने और सेंसबरी ने पहले से नौकरी में लगे सोलह सो लोगो को भी हटा दिया. यही हाल कमोबेश सभी बड़ी रिटेलर कंपनियों का हे. उन्होंने कहा कि थाईलैंड, म्यामांर, व फिलीपींस जैसे राष्ट्र अपनी इस नीति को बदलने को मजबूर हुए हैं तथा अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा तक अपनी जनता से छोटी दुकानों से सामान खरीदने की अपील कर रहे उधर, भारत सरकार इसको अनुमति दे रही है थोड़े समय तो ये कंपनिया किसी देश में सस्ता माल बेचती हैं और एक साल तक घटा उठाने के लिए तेयारी करके आती हे. बाद में जब स्थानीय प्रतियोगिता समाप्त हो जाती हे और ये कंपनिया आपस में तालमेल करके कीमतों को बहुत ऊँची ले जाती हैं. तब उपभोगता करेगा भी तो क्या करेगा. ये किसानो के लिए भक्षक, छोटे उद्योगों के नश्तक और आम जनता के लिए जहरीले तक्षक हे.

ऐसे में सरकार के अत्यंत गैरजिमेदाराना कृत्य के लिए स्वदेशी जागरण मंच गहरा रोष व्यक्त करता है। गौरतलब है कि मल्टी-ब्रांड संसदीय समिति ने सरकार को खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश न खोलने की सिफारिश की थी। संसदीय समिति की सिफारिशों को दरकिनार करते हुए, सरकार द्वारा विदेशी कंपनियों को खुदरा क्षेत्र में अनुमति देने का निर्णय संसदीय लोकतंत्र का भी अपमान है। सरकार का यह कृत्य संसद के प्रति उसकी अवमानना और विदेशी भक्ति का प्रतीक है।


सरकार द्वारा खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश की अनुमति आम आदमी के प्रति सरकार की संवेदनहीनता के विरोध में स्वदेशी जागरण मंच ने देश भर में धरना, प्रदर्शन और पुतला दहन सहित सभी लोकतांत्रिक उपायों के माध्यम से आंदोलन छेडने का निर्णय लिया है। हम सभी जानते हैं क़ि सरकार ने पहले भी इसी प्रकार का तुगलकी निर्णय लिया था और एक दिसंबर २०११ के देश-व्यापी बंद के कारण सरकार ने इस विषय को ठन्डे बसते में डालने का निर्णय लिया था. सरकार ने ये भी आश्वासन दिया था क़ि आगे जब भी अभी इस पर कोई निर्णय लिया जाये गा, वो सबकी सहमती से लिया जायेगा. इसबार सरकार के सहयोगी दल सरेआम चिल्ला चिल्ला कर कह रहे हैं क़ि हमारे से कोई सलाह नहीं ली गयी. अब जब उन्होंने सहयोगियों से ही नहीं पूछा तो विपक्ष या देशवासियों के बारे में तो क्या कहा जायेगा.
स्वदेशी जागरण मंच सरकार से पुनः आग्रह करता है कि आम आदमी के प्रति संवेदनहीनता का त्याग करते हुए खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश के अपने निर्णय को वापिस ले।