Friday, May 22, 2015

मधमेह, कोलेस्ट्रोल, आदि के अच्छे घरेलू नुक्से


मधुमेह (डायबिटीज) : राजीव दीक्षित Rajiv Dixit

आजकल मधुमेह की बीमारी आम बीमारी है। डाईबेटिस भारत मे 5 करोड़ 70 लाख लोगोंकों है और 3 करोड़ लोगों को हो जाएगी अगले कुछ सालों मे सरकार ये कह रही है | हर दो मिनट मे एक मौत हो रही है डाईबेटिस से और Complications तो बहुत हो रहे है... किसी की किडनी ख़राब हो रही है, किसीका लीवर ख़राब हो रहा है किसीको ब्रेन हेमारेज हो रहा है, किसीको पैरालाईसीस हो रहा है, किसीको ब्रेन स्ट्रोक आ रहा है, किसीको कार्डियक अरेस्ट हो रहा है, किसी को हार्ट अटैक आ रहा है Complications बहुत है खतरनाक है |

जब किसी व्यक्ति को मधुमेह की बीमारी होती है। इसका मतलब है वह व्यक्ति दिन भर में जितनी भी मीठी चीजें खाता है (चीनी, मिठाई, शक्कर, गुड़ आदि) वह ठीक प्रकार से नहीं पचती अर्थात उस व्यक्ति का अग्नाशय उचित मात्रा में उन चीजों से इन्सुलिन नहीं बना पाता इसलिये वह चीनी तत्व मूत्र के साथ सीधा निकलता है। इसे पेशाब में शुगर आना भी कहते हैं। जिन लोगों को अधिक चिंता, मोह, लालच, तनाव रहते हैं, उन लोगों को मधुमेह की बीमारी अधिक होती है। मधुमेह रोग में शुरू में तो भूख बहुत लगती है। लेकिन धीरे-धीरे भूख कम हो जाती है। शरीर सुखने लगता है, कब्ज की शिकायत रहने लगती है। अधिक पेशाब आना और पेशाब में चीनी आना शुरू हो जाती है और रेागी का वजन कम होता जाता है। शरीर में कहीं भी जख्म/घाव होने पर वह जल्दी नहीं भरता।

तो ऐसी स्थिति मे हम क्या करें ? राजीव भाई की एक छोटी सी सलाह है के आप इन्सुलिन पर जादा निर्भर न करे क्योंकि यह इन्सुलिन डाईबेटिस से भी जादा खतरनाक है, साइड इफेक्ट्स बहुत है |

इस बीमारी के घरेलू उपचार निम्न लिखित हैं।
आयुर्वेद की एक दावा है जो आप घर मे भी बना सकते है -
1. 100 ग्राम मेथी का दाना
2. 100 ग्राम तेजपत्ता
3. 150 ग्राम जामुन की बीज
4. 250 ग्राम बेल के पत्ते
इन सबको धुप मे सुखाके पत्थर मे पिस कर पाउडर बना कर आपस मे मिला ले, यही औषधि है |

औषधि लेने की पद्धति : सुबह नास्ता करने से एक घंटे पहले एक चम्मच गरम पानी के साथ लेले फिर शाम को खाना खाने से एक घंटे पहले लेले | तो सुबह शाम एक एक चम्मच पाउडर खाना खाने से पहले गरम पानी के साथ आपको लेना है | देड दो महीने अगर आप ये दावा ले लिया और साथ मे प्राणायाम कर लिया तो आपकी डाईबेटिस बिलकुल ठीक हो जाएगी |

ये औषधि बनाने मे 20 से 25 रूपया खर्च आएगा और ये औषधि तिन महिना तक चलेगी और उतने दिनों मे आपकी सुगर ठीक हो जाएगी |
सावधानी :
1. सुगर के रोगी ऐसी चीजे जादा खाए जिसमे फाइबर हो रेशे जादा हो, High Fiber Low Fat Diet घी तेल वाली डायेट कम हो और फाइबर वाली जादा हो रेशेदार चीजे जादा खाए| सब्जिया मे बहुत रेशे है वो खाए, डाल जो छिलके वाली हो वो खाए, मोटा अनाज जादा खाए, फल ऐसी खाए जिनमे रेशा बहुत है |
2. चीनी कभी ना खाए, डाईबेटिस की बीमारी को ठीक होने मे चीनी सबसे बड़ी रुकावट है | लेकिन आप गुड़ खा सकते है |
3. दूध और दूध से बनी कोई भी चीज नही खाना |
4. प्रेशर कुकर और अलुमिनम के बर्तन मे खाना न बनाए |
5. रात का खाना सूर्यास्त के पूर्व करना होगा |

जो डाईबेटिस आनुवंशिक होतें है वो कभी पूरी ठीक नही होता सिर्फ कण्ट्रोल होता है उनको ये दावा पूरी जिन्दगी खानी पड़ेगी पर जिनको आनुवंशिक नही है उनका पूरा ठीक होता है |

अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें:
http://www.youtube.com/watch?v=oiRf-LLSq0U
2. कार्य क्षमता बढ़ाने व कोलॅस्ट्रोल घटाने का अचूक आयुर्वेदिक नुस्खा------

अपनी कार्य क्षमता बढ़ा कर सफल होने, स्फूर्तिवान होने व चर्बी घटा कर तन्दरूस्त होने का यह आजमाया हुआ नुस्खा है। अनेक लोगों ने इसका प्रयोग कर सफलता पाई है। नुस्खा निम्न प्रकार है:
मिश्रण: 50 ग्राम मेथी, 20 ग्राम अजवाइन,10 ग्राम काली जीरी
बनाने की विधिः---- मेथी, अजवाइन तथा काली जीरी को इस मात्रा में खरीद कर साफ कर लें। प्रत्येक वस्तु को धीमी आंच में तवे के उपर हल्का सेकें। सेकने के बाद प्रत्येक को मिक्सर-ग्राइंडर में पीसकर पावडर बनालें। तीनों के पावडर को मिला कर कांच की शीशी में रख ले .आपकी अमूल्य दवाई तैयार है।
दवाई लेने की विधिः------ तैयार दवाई को रात्रि को खाना खाने के बाद सोते समय 1 चम्मच गर्म पानी के साथ लेवें। याद रखें इसे गर्म पानी के साथ ही लेना है। इस दवाई को रोज लेने से शरीर के किसी भी कोने में अनावश्यक चर्बी/ गंदा मैल मल मुत्र के साथ शरीर से बाहर निकल जाता है, तथा शरीर सुन्दर स्वरूपमान बन जाता है। मरीज को दवाई 30 दिन से 90 दिन तक लेनी होगी।
लाभः- इस दवाई को लेने से न केवल शरीर मंे अनावश्यक चर्बी दूर हो जाती है बल्किः-

- शरीर में रक्त का परिसंचरण तीव्र होता है। ह्नदय रोग से बचाव होता है तथा कोलेस्ट्रोल घटता है।
- पुरानी कब्जी से होेने वाले रोग दूर होते है। पाचन शक्ति बढ़ती है।
- गठिया बादी हमेशा के लिए समाप्त होती है।
- दांत मजबूत बनते है। हडिंया मजबूत होगी।
- आँखों का तेज बढ़ता है .
- कानों से सम्बन्धित रोग व बहरापन दूर होता है।
- शरीर में अनावश्यक कफ नहीं बनता है।
- कार्य क्षमता बढ़ती है, शरीर स्फूर्तिवान बनता है। घोड़े के समान तीव्र चाल बनती है।
- चर्म रोग दूर होते है, शरीर की त्वचा की सलवटें दूर होती है, लालिमा लिये शरीर क्रांति-ओज मय बनता है।
- स्मरण शक्ति बढ़ती है तथा आयु भी बढ़ती है, यौवन चिरकाल तक बना रहता है।
- पहले ली गई एलोपेथिक दवाईयां के साइड इफेक्ट को कम करती है।
- इस दवा को लेने से शुगर (डायबिटिज) नियंत्रित रहती है।
- बालों की वृद्धि तेजी से होती है।
- शरीर सुडौल, रोग मुक्त बनता है।

 योग करने से दवाई का जल्दी लाभ होता है।

परहेजः- ------
- इस दवाई को लेने के बाद रात्रि में कोई दूसरी खाद्य-सामग्री नहीं खाएं।
- यदि कोई व्यक्ति धुम्रपान करता है, तम्बाकू-गुटखा खाता या मांसाहार करता है तो उसे यह चीजे छोड़ने पर ही दवा फायदा पहुचाएंगी।
- शाम का भोजन करने के कम-से-कम दो घण्टे बाद दवाई लें।

3. Tulsi

तुलसी न सिर्फ समाज में पूजनीय है, बल्कि इसमें कई औषधीय गुण भी हैं। इसका स्‍वाद भले ही कुछ लोगों को पसंद न आए, लेकिन सेहत के लिए यह बहुत फायदेमंद है। खासतौर पर दिल के लिए इसे अत्‍यंत उपयोगी माना जाता है। तुलसी पित्तनाशक, वातनाशक, कुष्ठरोग निवारक, पसली में दर्द, खून में विकार, कफ और फोड़े-फुन्सियों के उपचार में रामबाण की तरह फायदा करती है।

कड़वी और तीखी तुलसी सांस, कफ और हिचकी को तुरन्त मिटा देती है। उल्‍टी होने, दुर्गन्ध, कुष्ठ, विषनाशक तथा मानसिक पीड़ा को मिटाने में बड़ी कारगर सिद्ध होती है। तुलसी की महत्ता के साक्ष्‍य बारे में कई ऐतिहासिक पुस्‍तकों में वर्णन मिलता है। इसका प्रयोग वैद्यों द्वारा बहुत पहले से होता आया है। मंदिरों में पूजा-अर्चना के पश्चात् गंगाजल में तुलसी के पत्तों को डालकर प्रसाद वितरण किया जाता है। इन सब प्रयोगों के पीछे एक ही संकेत है कि लोग तुलसी का प्रयोग अपनी दैनिक जीवनचर्या में निरन्तर करें तो कई बीमारियों से फायदा होगा।

जहां पर तुलसी के पौधे का आरोपण होगा वहां की वायु भी शुद्ध होगी और विषैले कीटाणु भी प्रभावहीन हो जाते है। यूनानी चिकित्सकों के मतानुसार तुलसी के सेवन से रोगाणु नष्ट होने लगते है। यह एक प्रकार की हृदय में शक्ति भर देने की महाऔषधि है। वायु को परिशोधित करने की शक्ति रखती है। उनकी दृष्टि में इस पौधे में अनेकों तरह के औषधीय गुण विद्यमान रहते है। एलोपैथी चिकित्सा प्रणाली में तो इसे सद्गुण सम्पन्न बताया गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि तुलसी में मलेरिया रोग को भगाने की शक्ति विद्यमान है। सर्दी, खांसी, निमोनिया को नष्ट कर देती है।

स्वास्थ्य-संवर्धन की दृष्टि से तुलसी की गंध को अत्यधिक उपयोगी माना जाता है। इसकी पीली पत्तियों में हरे रंग के एक तैलीय पदार्थ की सत्ता समाहित है। हवा में इस औषधि के मिलने से कई कीटाणु समाप्‍त होते हैं। रात्रि को सोते समय यदि तुलसी को कपूर को हाथ-पैरों पर मालिश कर लिया जाए तो मच्छर पास नहीं आयेंगे।

पानी में तुलसी डालकर प्रयोग करने से कई बीमारियां समाप्‍त होती हैं। तुलसी की पत्तियों को मिलकार जल नित्य प्रति सेवन करने से मुखमण्डल का तेज निखर कर आता है। तुलसी का प्रयोग करने से स्मरणशक्ति बढ़ती है। तुलसी में एक विशेष प्रकार का एसिड पाया जाता है जो दुर्गन्ध को भगाता है। भोजन के पश्चात तुलसी की दो-चार पत्तिया चबा लेने से मुंह से दुर्गंध नही आती है।

दमा अथवा तपैदिक के रोगी को तुलसी की लकड़ी अपने पास सदैव रखनी चाहिए। तुलसी की माला पहनने संक्रामक रोगों के फैलने का खतरा कम होता है। तुलसी विश्व प्रसिद्ध औषधि है और उच्चतम कोटि का रसायन है। तुलसी के प्रयोग से शरीर के सफेद दाग मिटते और सुन्दरता बढ़ती है। क्योंकि इसमें रक्त शोधन क्षमता विद्यमान है। नींबू के रस में तुलसी की पत्तियों का रस मिलाकर चेहरे पर लगाया जाये तो चर्मरोग मिटता है और चेहरा खिलता है। तुलसी की पत्तियों को सुखाकर उसमें दालचीनी, तेजपत्र, सौंफ, बड़ी इलायची, अगियाघास, बनफशा, लाल चंदन और ब्राह्मी को मिलायें और कूट डालें। उसपाउडर को किसी कांच के बर्तन में रख लें। चाय के स्थान पर इसका प्रयोग करने से चाय की हानियों से भी बचेंगे और स्वस्थ भी रहेंगे।

4.
गिलोय- अमृत बेल

Botanical Name— Tinospora cordifolia

Family- MENISPERMACEAE, Names in different language, Marathi : Ambarvel, Gulavela, Oriya : Gulochi, Gulancha, Hindi : Gibe, Gurach, Kannada : Arnryta balli, Ugani, Malayalam: Amrytu, Sittamrytu, Telugu : Tippa teega, Bengali : Giloe, Gulancha, Punjabi : Batindu, Gibogularich, Gujarati : Gado, Gulo, Sikkim : Gurjo, Tamil : Amrida Valli, Pattigai Silam

गिलोय- अमृत बेल
गिलोय को अमृता भी कहा जाता है। यह स्वयं भी नहीं मरती है और उसे भी मरने से बचाती है, जो इसका प्रयोग करे। कहा जाता है की देव दानवों के युद्ध में अमृत कलश की बूँदें जहाँ जहाँ पडी, वहां वहां गिलोय उग गई।
यह सभी तरह के व्यक्ति बड़े आराम से ले सकते हैं। ये हर तरह के दोष का नाश करती है।
कैंसर की बीमारी में 6 से 8 इंच की इसकी डंडी लें इसमें wheat grass का जूस और 5-7 पत्ते तुलसी के और 4-5 पत्ते नीम के डालकर सबको कूटकर काढ़ा बना लें।
इसका सेवन खाली पेट करने से aplastic anaemia भी ठीक होता है। इसकी डंडी का ही प्रयोग करते हैं पत्तों का नहीं, उसका लिसलिसा पदार्थ ही दवाई होता है।
डंडी को ऐसे  भी चूस सकते है . चाहे तो डंडी कूटकर, उसमें पानी मिलाकर छान लें, हर प्रकार से गिलोय लाभ पहुंचाएगी।
इसे लेते रहने से रक्त संबंधी विकार नहीं होते . toxins खत्म हो जाते हैं , और बुखार तो बिलकुल नहीं आता। पुराने से पुराना बुखार खत्म हो जाता है।
इससे पेट की बीमारी, दस्त,पेचिश,  आंव, त्वचा की बीमारी, liver की बीमारी, tumor, diabetes, बढ़ा हुआ E S R, टी बी, white discharge, हिचकी की बीमारी आदि ढेरों बीमारियाँ ठीक होती हैं ।
अगर पीलिया है तो इसकी डंडी के साथ-  पुनर्नवा  (साठी,  जिसका गाँवों में साग भी खाते हैं) की जड़ भी कूटकर काढ़ा बनायें और पीयें। kidney के लिए भी यह बहुत बढ़िया है।
गिलोय के नित्य प्रयोग से शरीर में कान्ति रहती है और असमय ही झुर्रियां नहीं पड़ती।
शरीर में गर्मी अधिक है तो इसे कूटकर रात को भिगो दें और सवेरे मसलकर शहद या मिश्री  मिलाकर पी लें।
अगर platelets बहुत कम हो गए हैं, तो चिंता की बात नहीं , aloevera और गिलोय मिलाकर सेवन करने से एकदम platelets बढ़ते हैं।
इसका काढ़ा यूं भी स्वादिष्ट लगता है नहीं तो थोड़ी चीनी या शहद भी मिलाकर ले सकते हैं. इसकी डंडी गन्ने की तरह खडी करके बोई जाती है इसकी लता अगर नीम के पेड़ पर फैली हो तो सोने में सुहागा है।
अन्यथा इसे अपने गमले में उगाकर रस्सी पर चढ़ा दीजिए।
देखिए कितनी अधिक फैलती है यह और जब थोड़ी मोटी हो जाए तो पत्ते तोडकर डंडी का काढ़ा बनाइये या शरबत। दोनों ही लाभकारी हैं।
यह त्रिदोशघ्न है अर्थात किसी भी प्रकृति के लोग इसे ले सकते हैं।
गिलोय का लिसलिसा पदार्थ सूखा हुआ भी मिलता है। इसे गिलोय सत कहते हैं .
इसका आरिष्ट भी मिलता है जिसे अमृतारिष्ट कहते हैं। अगर ताज़ी गिलोय न मिले तो इन्हें भी ले सकते हैं।
ताजी गिलोय के छोटे-छोटे टुकड़े कर पानी में गला दिया जाता हे, गली हुई टहनियों को हाथ से मसलकर पानी चलनी या कपडे से छान  कर अलग किया जाता हे और स्थिर छोड़ दिया जाता हे अगले दिन तलछट (सेडीमेंट) को निथार कर सुखा लिया जाता हे

यही गिलोय  सत्व होता हे जो ओषधि के कडवेपन से भी मुक्त और पूर्ण लाभकारी होता हे बाज़ार में भी इसी नाम से मिलता हे।

सूखी गिलोय से भी सत्व निकला जा सकता हे पर वह मात्रा में कम निकलता हे,और कुछ कम गुणों वाला हो सकता हे।

गिलोय घन सत्व-शेष बचे हुए पानी को उबाल कर गाडा होने पर धुप में सुखा लिया जाता हे यह गिलोय घन सत्व होता हे यह भी दिव्य औषधि हे।  ये दोनों गिलोय सत्व एवं गिलोय घन सत्व'  बहुत उपयोगी पाउडर है जो  जड़ी बूटी गिलोय  के महान गुण क्षमता रखती हे  सकारात्मक बात यह हे कि इसकी  मामूली मात्रा  भी यह अद्भुत काम करती है। इससे गिलोय चूर्ण के रूप में न केवल अधिक मात्रा बचा जा सकता हे वहीँ कड़वाहट से भी छुटकारा मिल जाता हे।
इसे गुर्च भी कहते हैं । संस्कृत में इसे गुडूची या अमृता कहते हैं । कई जगह इसे छिन्नरूहा भी कहा जाता है क्योंकि यह आत्मा तक को कंपकंपा देने वाले मलेरिया बुखार को छिन्न -भिन्न कर देती है।

यह एक झाडीदार लता है। इसकी बेल की मोटाई एक अंगुली के बराबर होती है इसी को सुखाकर चूर्ण के रूप में दवा के तौर पर प्रयोग करते हैं। बेल को हलके नाखूनों से छीलकर देखिये नीचे आपको हरा,मांसल भाग दिखाई देगा । इसका काढा बनाकर पीजिये । यह शरीर के त्रिदोषों को नष्ट कर देगा । आज के प्रदूषणयुक्त वातावरण में जीने वाले हम लोग हमेशा त्रिदोषों से ग्रसित रहते हैं। त्रिदोषों को अगर मैं सामान्य भाषा में बताने की कोशिश करूं तो यह कहना उचित होगा कि हमारा शरीर कफ ,वात और पित्त द्वारा संचालित होता है । पित्त का संतुलन गडबडाने पर। पीलिया, पेट के रोग जैसी कई परेशानियां सामने आती हैं । कफ का संतुलन बिगडे तो सीने में जकड़न, बुखार आदि दिक्कते पेश आती हैं । वात [वायु] अगर असंतुलित हो गई तो गैस ,जोडों में दर्द ,शरीर का टूटना ,असमय बुढापा जैसी चीजें झेलनी पड़ती हैं । अगर आप वातज विकारों से ग्रसित हैं तो गिलोय का पाँच ग्राम चूर्ण घी के साथ लीजिये । पित्त की बिमारियों में गिलोय का चार ग्राग चूर्ण चीनी या गुड के साथ खालें तथा अगर आप कफ से संचालित किसी बीमारी से परेशान हो गए है तो इसे छः ग्राम कि मात्र में शहद के साथ खाएं । गिलोय एक रसायन एवं शोधक के र्रूप में जानी जाती है जो बुढापे को कभी आपके नजदीक नहीं आने देती है । यह शरीर का कायाकल्प कर देने की क्षमता रखती है। किसी ही प्रकार के रोगाणुओं ,जीवाणुओं आदि से पैदा होने वाली बिमारियों, खून के प्रदूषित होने बहुत पुराने बुखार एवं यकृत की कमजोरी जैसी बिमारियों के लिए यह रामबाण की तरह काम करती है । मलेरिया बुखार से तो इसे जातीय दुश्मनी है। पुराने टायफाइड ,क्षय रोग, कालाजार ,पुराणी खांसी , मधुमेह [शुगर ] ,कुष्ठ रोग तथा पीलिया में इसके प्रयोग से तुंरत लाभ पहुंचता है । बाँझ नर या नारी को गिलोय और अश्वगंधा को दूध में पकाकर खिलाने से वे बाँझपन से मुक्ति पा जाते हैं। इसे सोंठ के साथ खाने से आमवात-जनित बीमारियाँ ठीक हो जाती हैं ।गिलोय तथा ब्राह्मी का मिश्रण सेवन करने से दिल की धड़कन को काबू में लाया जा सकता है।

गिलोय का वैज्ञानिक नाम है--तिनोस्पोरा कार्डीफोलिया । इसे अंग्रेजी में गुलंच कहते हैं। कन्नड़ में अमरदवल्ली, गुजराती में गालो, मराठी में गुलबेल, तेलगू में गोधुची ,तिप्प्तिगा , फारसी में गिलाई,तमिल में शिन्दिल्कोदी आदि नामों से जाना जाता है। गिलोय में ग्लुकोसाइन, गिलो इन, गिलोइनिन, गिलोस्तेराल तथा बर्बेरिन नामक एल्केलाइड पाये जाते हैं। अगर आपके घर के आस-पास नीम का पेड़ हो तो आप वहां गिलोय बो सकते हैं । नीम पर चढी हुई गिलोय उसी का गुड अवशोषित कर लेती है ,इस कारण आयुर्वेद में वही गिलोय श्रेष्ठ मानी गई है जिसकी बेल नीम पर चढी हुई हो ।

KASHMIRI LAL,kashmirilalkamail@gmail.com,
9868271424, Shiv Shakti Mandir, RK Puram, New Delhi- 110022

सासाराम में दिया प्रेस वक्तव्य (21.5.15)


स्वदेशी जागरण मंच।
सासाराम, बिहार।
श्री कश्मीरी लाल, राष्ट्रीय संगठक का सासाराम में पत्रकार वार्ता में दिया वक्तव्य। दिनांक 21-5-1....

स्वदेशी जागरण मंच की स्पष्ट मान्यता है कि पिछले लगभग ढाई दशकों से चल रही उदारीकरण की आर्थिक नीतियों के फलस्वरूप देश की जनता के कष्टों में भारी वृद्धि हुई है, समाज में असमानतायें बढ़ी हैं, रोजगार के अवसर क्षीण हुए हैं और देश का आर्थिक तंत्र छिन्न-भिन्न हुआ है। पिछली सरकार की पूंजीपतियों के साथ मिलीभगत के फलस्वरूप कुछ चुनिंदा पूंजीपतियों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लाभ देने में भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा दिखाई दी। नई आर्थिक नीतियों के नाम पर भ्रष्ट तरीकों से पूंजीपतियों को लाभान्वित करने के कृत्यों पर विराम लगाने और देश के आर्थिक तंत्र को पुनः पटरी पर लाने हेतु नयी सरकार को मिला जनादेश का मोदी
सरकार द्वारा वित्तीय समावेषन (विषेष तौर पर जनधन योजना और मुद्रा बैंक की स्थापना) सहित कई आर्थिक नीतियों का हम हार्दिक स्वागत करते हैं। परंतु साथ ही कई विषयों पर नयी केंद्रीय सरकार से पहल करने की उम्मीद करते है; जो अभी पूरी होती दिखाई नहीं दे रही।

पहला मुद्दा, जिसपर स्वदेशी जागरण मंच ने इस 5 मई 2015 के दिल्ली जंतर मंतर में आयोजित अपने जनसंसद में स्पष्ट मांग की कि भूमि अधिग्रहण बिल पर हम कुछ सुधर चाहते हैं
यद्यपि सरकार ने प्रत्येक प्रभावित परिवार में से न्यूनतम एक व्यक्ति को रोजगार, निजी शिक्षण संस्थाओं एवं अस्पतालों के लिए भूमि अधिग्रहित न करने व जनहित में 9 अन्य संशोधन किये है जो कि जनहित में सराहनीय कदम हैं।  इसके बावजूद भूमि अधिग्रहण बिल में आपत्तिजनक प्रावधान हैं, जो किसान, कृषि, खाद्य सुरक्षा और प्राकृतिक न्याय के विरूद्ध है।
जैसाकि सर्वविदित है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी परियोजनाओं के संदर्भ में यह स्थापित प्रक्रिया है कि उसकी निर्मिति से पहले उसके सामाजिक, पर्यावरणीय एवं अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभावों का भलीभांति आकलन किया जाए और उसी आलोक में भूमि की आवश्यकता का भी आकलन हो। इस सुस्थापित अंतर्राष्ट्रीय प्रक्रिया का अध्यादेष उल्लंघन करता है। और चाहे सरकार भी भूमि ले रही है, किसान की सहमति जरूरी है, ऐसा हमारी अपेक्षा है। इसके साथ हम चाहते है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् आज तक सरकारोें द्वारा अधिग्रहित भूमि, उसके वर्तमान उपयोग तथा खाली पड़ी शेष भूमि और बड़े उद्योगपतियों के पास पड़ी बेकार भूमि के बारे में एक श्वेत पत्र जारी किया जाए।

दुसरे, हम चाहते है कि जी.एम. फसलों के जमीनी परीक्षणों पर रोक लगे।अगस्त 2013 में कृषि पर संसदीय स्थाई समिति ने कहा था कि जीएम फसलों के सभी जमीनी परीक्षणों को रोकना  चाहिए, जब तक कि मानव, धरती और जैव विविधता पर इनके प्रभाव पता नहीं लग जाते। सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित तकनीकी विषेषज्ञ समिति ने संबंधित ने भी जी.एम. फसलों के खुले में परीक्षणों में निहित खतरों के बारे में कहा था और भारतीय जनता पार्टी के चुनाव घोषणा-पत्र में भी यही बात रखी गई कि मानव एवं उर्वरा पर दीर्घकालिक प्रभावों का पूरा वैज्ञानिक मूल्यांकन नहीं हो जाता तब तक जी.एम. बीजों की अनुमति नहीं दी जाएगी। इस लिए हमारा मानना है क़ि भारत को आसान बाजार मानकर ये कम्पनियां देष के खाद्य तंत्र पर एकाधिकार चाहती है, जो की हरगिज नहीं होना चाहिये।

तीसरा बिंदु है कि सरकारी प्रतिबंध के बावजूद ई-काॅमर्स में विदेशी कंपनियां अपना कारोबार फैला रही है। हम ई कॉमर्स के विरोधी नहीं पसर विदेशी रिटेल कंपनिया इसे चोर दरवाजा बनाकर न घुसे। वे अपने विशाल संसाधनों का उपयोग करते हुए भारी डिस्काउंट के नाम पर हिंसक (predatory) कीमतों के द्वारा ये विदेशी कंपिनयां देश से प्रतियोगिता समाप्त कर रही हैं। इससे एक ओर छोटे और मझले दुकानदारों का कारोबार चौपट हो रहा है, तो दूसरी ओर इन कंपनियों द्वारा करों की चोरी से सरकारों की आय भी प्रभावित हो रही है।  विदेषी कंपनियां कानूनों की अस्पष्टता का भी दुरुपयोग कर रही ह बात की है कि उपभोक्ता और छोटे कारोबारियों के व्यापक हितों की सुरक्षा का ध्यान रखते हुए विदेषी कंपनियों द्वारा ई-काॅमर्स के माध्यम से कारोबार करने पर तुरंत प्रभावी प्रतिबंध लगाया जाए। साथ ही सरकार को बहुब्रांड में खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश को तुरंत रोकना चाहिए।
चौथी बात कि पिछले समय में सामारिक साझेदारों को सार्वजनिक उद्यमों को बेचने (जैसे माॅर्डन फूड इंस्ट्रीज लिमिटेड, बालकों, हिन्दुस्ताान जिंक लिमिटेड इत्यादि) के दुष्परिणाम देष देख चुका है। अतः बजट 2015-16 में सामरिक विनिवेश की घोषित नीति का परित्याग किया जाए।  पांचवा मुद्दा है कि आर्थिक नीतियों में आंतरिक उदारीकरण को प्रोत्साहन देने के साथ लघु उद्योगों को संरक्षण प्रदान किया जाए और लघु उद्योगों की परिभाषा को यथावत रखा जाए। इसलिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश कि बजाये भारतीय उद्योगों को बढ़ावा देना चीन के बाजार में आक्रमण को रोकने का स्थायी हल है। हम इसे 'मेक इन इंडिया ' नहीं बल्कि 'मेड बॉय इंडिया' कह कर अपना अंतर समझाते है। और छठा अंतिम मुद्दा चिंता का ये है की दुनिया भर की दवा कंपनिया पेटेंट और बौद्धिक सम्पदा अधिकार के नाम पर न केवल जनता को लूट रही है, बल्कि मौत के मुंह में धकेल रही है। सरकार ने पेटेंट एक्ट में सेक्शन 3D जो रखा है, अंतर्राष्ट्रीय दवाव में हरगिज हरगिज नहीं हटाना चाहिए। जैसे स्टैंड सरकार नें विश्व व्यापार संगठन कि बैठक मे दृढ़ता पूर्वक वा सफलतापूर्वक रखा; वैसा ही दवा उद्योग की सुरक्षा में रखना चाहिए। दुनिया भर के गरीब व विकासशील देश भारत की रहनुमाई की इस मामले में सापेक्ष रखते है।
इन सब बातो पर अपनी अगली रणनीति पर विस्तृत चर्चा करने मंच की अगली राष्ट्रिय परिषद 27-28 जून को विजय वाड़ा में होगी जिसमे देशभर के चुने हुए कार्यकर्ता भाग लेंगे।

Thursday, May 14, 2015

फ़िल्म फायर इन ब्लड

फायर इन ब्लड फ़िल्म जो फार्मा उद्योग की लूट उजागर करती है

भूमिका : साल 1996 में वेस्टर्न फार्मास्युटिकल कंपनियों ने कम लागत वाली ऐंटि-एड्स ड्रग्स को अफ्रीकी देशों तक इरादतन पहुंचने नहीं दिया था, जिससे करीब एक करोड़ लोग बेमौत मारे गए। भारतीय फार्मा कंपनी सिप्ला ने बहुत अच्छी लेकिन बहुत सस्ती दवा बनाई तो बहुत अड़ंगे विदेशी बिग फार्मा ने लगाये। इसी विषय पर 2013 में बनी डाक्युमेंट्री फिल्म 'फायर इन द ब्लड' को कई अंतरराष्ट्रीय समारोहों में खूब सराहा गया है और पुरस्कृत भी किया गया है। उसका youtube का ये लिंक है :
https://www.google.co.in/url?sa=t&source=web&rct=j&ei=qHVVVZbwLIyIuATp44G4Cw&url=http://m.youtube.com/watch%3Fv%3DNqoUIhsnAns&ved=0CDUQuAIwCA&usg=AFQjCNEM2-OYH6-WV9AoGfboFbTMp8dAAw&sig2=Gm5WRHgLveu7Ahf6mFgd4w

आयरिश-पंजाबी राइटर-डायरेक्टर डिलन मोहन ग्रे की यह फिल्म सन डांस फिल्म फेस्टिवल के वर्ल्ड डाक्युमेंट्री कॉम्पीटिशन में चुनी जाने वाली पहली भारतीय डाक्युमेंट्री है। चार देशों में शूट की गई इस फिल्म को अब कई देशों के पॉलिसी मेकर्स को दिखाने की योजना है। मुझे लगता है कि भारत में श्री मोदी जी समेत अन्य मंत्रियो को जरूर देखनी चाहिए। नोवार्टिस के विरुद्ध ग्लिवेक और जर्मन की बायर्स के मुकाबले भारत ने जो 1लाख 66 रुपए की 6600 रूपए और 2 लाख 80 हज़ार के बदले मात्र 8000 रुपये की दवा बनाना इन विदेशी कंपनियो को बिलकुल बर्दाश्त नहीं होगा । इसके लिए वे हमारी सर्कार पर बहुत दवाव बनाये गी। अत हर कार्यकर्ता को इसे देखना चाहिए और समझना चाहिए। मैंने जंतर मंतर पर 5 मई 15 के जनसंसद के बाद श्री देविन्दर शर्मा से इस फ़िल्म बाबत बात छेड़ी तो उन्होंने कहा की डायरेक्टर ने ही उनको फ़िल्म भेजी थी और अच्छी लगी। सारी बात को हमने मात्र छ: बिंदुओं में समेटा है तो कृपया पूरा पढ़ लेवें।
1.  लूट का धंधा ही नहीं बल्कि मौत का फन्दा है ये पेटेंट:
एक बार जरा पूरा मामला समझ लेवें। पश्चिमी दवा कंपनियों की दवाओं, एकाधिकार और कपट की कहानी को सामने लाने वाली फिल्म ‘फायर इन द ब्लड’ के निर्देशक डिलन ग्रे ने पिछले दिनों लंदन के द गार्डियन अखबार के ऑनलाइन संस्करण में प्रकाशित लेख में कहा, ”बहुत साल पहले मैंने वह जानना शुरू किया जिसे मैं मानव इतिहास में सबसे बड़ा गुनाह मानता हूं। अफ्रीका और अन्य स्थानों पर लाखों लोग बड़ी निर्दयता से एड्स से मरने के लिए छोड़ दिए गए, जबकि पश्चिमी देशों की सरकारों और फार्मास्यूटिकल कंपनियों ने लोगों तक कम कीमत वाली दवाओं को पहुंचने नहीं दिया। …विकासशील देशों में जहां लोग दवाओं के लिए अपनी सामथ्र्य से बाहर खर्च करते हैं, स्थिति इससे भी बदतर है। फार्मास्यूटिकल कंपनियों के प्रतिनिधियों ने मुझे बताया कि (तुलनात्मक रूप से समृद्ध) दक्षिण अफ्रीका में वे अपने उत्पादों की कीमत बाजार के सबसे ऊपरी हिस्से श्रेष्ठ पांच प्रतिशत के हिसाब से लगाते हैं, जबकि भारत में उपभोक्ता आधार मात्र ऊपरी हिस्सा 1.5 प्रतिशत ही होगा। बाकी की जनसंख्या का कोई महत्त्व नहीं है। साथ ही दूसरी तरफ दवा कंपनियां दिन-रात मेहनत कर रही हैं कि वह भारत, ब्राजील और थाईलैंड जैसे देशों में बनाई जा रही कम कीमत की जेनेरिक दवाओं की आपूर्ति को काट सकें ताकि वे यह सुनिश्चित कर लें कि वे एक भी ऐसा उपभोक्ता नहीं खो रहे हैं जो उनकी गगनचुंबी कीमतों को अदा कर सकता है।
एचआईवी-एड्स के एक मरीज को एक साल के इलाज के लिए 12 हजार से 15 हजार डॉलर खर्च करने पड़ते थे। भारत की बड़ी जेनेरिक दवा निर्माता कंपनियों में से एक सिप्ला ने उच्च गुणवत्ता वाली एचआईवी-एड्स एंटीरेट्रोवाइरल दवाएं सस्ते में उपलब्ध कराकर विकासशील देशों, विशेषकर अफ्रीका में मरीजों में एक नई आशा जगाई। सिप्ला ने तीन एंटीरेट्रोवाइरल को मिलाकर एक गोली बनाई जिसका नाम ट्राइओम्यून है। इसके लिए मरीज को एक साल के इलाज के लिए 350 डॉलर देने पड़ते हैं। यानी प्रति दिन का एक डॉलर! अफ्रीका और अन्य विकासशील देशों में 85 प्रतिशत दवाएं भारतीय कंपनियों से जाती हैं। इन जेनेरिक दवाओं ने बहुत सारे लोगों का जीवन बचाया और बहुत सारे मरीजों की जीवन-प्रत्याशा को बढ़ाया। पूरी दुनिया में चार करोड़ लोग एड्स से पीडि़त हैं। इन मरीजों को सस्ती और उच्च गुणवत्ता वाली जेनेरिक दवाएं उपलब्ध होना जरूरी है, क्योंकि इन मरीजों में से अधिसंख्य के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों की दवाएं खरीदना असंभव है।

2. खोज कम षडयंत्र ज्यादा:

दवाओं की इतनी अधिक कीमत के मामले में बहुष्ट्रीय कंपनियों का तर्क है कि वह दवा की खोज और उसके विकास में बहुत अधिक निवेश करते हैं और अपने फार्मूले पर वह इसलिए भी अधिकार चाहते हैं ताकि वे आने वाले समय में अपनी गुणवत्ता को बढ़ा सकें। पर शोध और विकास में बहुत अधिक धन खर्च करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों का तर्क पूरी तरह निराधार है। इस मामले में हुए अध्ययन बताते हैं कि दवा अनुसंधान के लिए जो वैश्विक फंडिंग है उसमें से 84 फीसदी पूंजी सरकारों और सार्वजनिक स्रोतों से आती है। जबकि फार्मास्यूटिकल कंपनियां 12 प्रतिशत ही पूंजी लगाती हैं। उल्टा ये कंपनियां औसतन 19 गुना अधिक पैसा मार्केटिंग पर खर्च करती हैं। अपने राजस्व का 1.3 प्रतिशत पैसा ही ये कंपनियां मूल अनुसंधान पर खर्च करती हैं।

3. खोज तो वास्तव में गरीब देशों ने की थी पर नहीं किया था दस्तावेजीकरण:

दरअसल, व्यापार संबंधी बौद्धिक संपदा अधिकारों के प्रसार के बाद पेटेंट बड़ा मुनाफा कमाने का एक खतरनाक हथियार बन गया है। जबकि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि प्राकृतिक दुनिया से संबंधित ज्ञान का एक बहुत बड़ा हिस्सा जो आज मानव के पास है उसमें कई सदियों के दौरान देशज और स्थानीय लोगों के प्रयासों का योगदान रहा है। देशज लोगों ने जो आविष्कार और खोजें की उन पर स्वामित्व का दावा नहीं किया। हालांकि हाल के दशकों में व्यापार संबंधी बौद्धिक संपदा के अधिकारों (ट्रिप्स) के परिणामस्वरूप देशज और स्थानीय लोगों के अधिकारों का उल्लंघन हुआ है। ट्रिप्स जीव रूपों और ट्रांस नेशनल कॉरपोरेशनों की गतिविधियों, जो जैविक संसाधनों (इस प्रक्रिया को जैव संभावना के नाम से जाना जाता है) पर आधारित उत्पादों के व्यावसायीकरण में शामिल हैं, को पेटेंट करने की इजाजत देता है। ट्रांस नेशनल कॉरपोरेशन जिन बहुत सारे ‘आविष्कारों’ को करने का दावा करते हैं, वह ज्ञान पहले से मौजूद रहा है, लेकिन जिसका दस्तावेजीकरण नहीं किया गया था। यह मौखिक तौर पर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को मिलता रहा है। यह सामूहिक ज्ञान है, इस पर स्वामित्व का अधिकार नहीं किया गया। देशज लोग इस तरह के ज्ञान के व्यावसायीकरण को पसंद नहीं करते थे। असली आविष्कारक इसे लोकहित में इस्तेमाल करते थे। बौद्धिक संपदा दौर के प्रसार के साथ पिछले कुछ सालों में देशज और स्थानीय लोगों के अधिकारों का उल्लंघन हुआ है। ट्रिप्स समझौते, जो जीवाणु, सूक्ष्म जीव विज्ञान प्रक्रियाओं और साथ ही वनस्पतियों की किस्मों के पेटेंट के लिए रास्ता उपलब्ध कराता है, ने पिछले कुछ वर्षों में पेटेंट के प्रसार के लिए अवसर उपलब्ध कराया है। ट्रांस नेशनल कॉरपोरेशनों ने देशज और स्थानीय लोगों के परंपरागत ज्ञान को स्वयं द्वारा किए गए ‘आविष्कारों’ का दावा करके पेटेंट कराने की कोशिश की है
लेखक का मत है कि असल में, सरकारें ऐसी कंडीशन रखती हैं जिससे आवश्यक दवाओं पर राज्य की मोनोपोली हो जाती है। फार्मा कंपनियों का दबाव और लॉबीइंग भी एक वजह है, लेकिन उनका मकसद बस अपना मुनाफा बढ़ाना होता है। जबकि इन कंपनियों की तुलना में सरकारों से तो यह उम्मीद की ही जाती है कि वे जनहित के बारे में सोचें और उसे प्राथमिकता दें। न केवल अपने देश के नागरिकों के लिए बल्कि वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भी। सुनने में यह जरूर आदर्शवादी लग सकता है, लेकिन मोनोपोली प्राइसिंग पर आधारित प्रचलित पेटेंट सिस्टम गवर्नेंस के मूल सिद्धांतों के बिल्कुल उलट है। समस्या की जड़ मोनोपोली में है, जिसके लिए सरकार को ही जिम्मेवारी है।.

4.  तथाकथित ह्यूमन एक्टिविस्ट बिलकुल चुप रहे:
उसका कहना है कि यह फिल्म केवल एचआईवी/एड्स के बारे में नहीं है। हैरानी की बात यह थी कि वे लाखों लोग अमीर देशों में काम कर रहे एड्स एक्टिविस्टों के लिए भी मायने नहीं रखते थे। किसी ने उनकी परवाह नहीं की। जब किसी बीमारी के इलाज के लिए प्रभावी दवा दुनिया के किसी कोने में मौजूद है, तब भी उसके अभाव में लोग बेमौत क्यों मारे जाएं? हमें ध्यान रखना होगा कि इस तरह का भयानक हादसा फिर कभी न दोहराया जाए।
5. कुछ शांति के मसीह भी है:
निर्माता का कहना है कि इस कहानी में प्रेजिडेंट क्लिंटन का रोल बेहद महत्वपूर्ण है। ऐंटिरेट्रोवायरल ड्रग्स (एआरवीज) की कीमत को नीचे लाने में क्लिंटन फाउंडेशन का रोल अहम रहा है। इतना ही नहीं, हाई-क्वालिटी व कम कीमत वाली इंडियन जेनेरिक एआरवीज को पहचान दिलाने में भी क्लिंटन की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। इसके अतिरिक्त स्थानीय नेता और डेसमंड टूटू और नोबेल विजेता अर्थशास्त्री जोसफ स्टिग्लिट्ज़ जैसे लोग बेशक देरी से ही सही लेकिन डट कर इसके विरुद्ध बोले। ऐसे मानवता के मसीहों के आगे बहुत बड़े रोल मॉडल की जरूरत है।

6. हमें क्या करना है:
  छटा मुद्दा है कि कुछ सालों से पेटेंट के मुद्दे पर भारत की लड़ाई सही दिशा में है। सचाई तो यह है कि साल 1970 में अपने पेटेंट लॉ के बदलने के बाद से भारत हाई-क्वॉलिटी व अपेक्षाकृत कम कीमतों वाली दवाओं को दुनिया के कई कोनों में सप्लाई कर रहा है। इस लड़ाई में कई रुकावटों के बावजूद, भारत सरकार इस क्षेत्र में दुनिया के कई कोनों में प्रशंसा हासिल कर रही है। वेस्टर्न गवर्नमेंट्स की तरफ से भारत पर काफी दबाव है। समय आ गया है कि भारतीय नागरिक भी इस समस्या के बारे में जानें और समझें। साउथ अफ्रीका में ये कंपनियां तब पीछे हटी थी जब आम आदमियों ने एक बहुत बड़ा आंदोलन छेड़ा था। आज स्वदेशी जसग्रं मंच भारत में इस लड़ाई को इसी कैनवास पर ले जाना चाहता है। कृपया राय अपनी जरूर दे।



फायर इन ब्लड पर एक बढ़िया लेख

आजकल में एक फ़िल्म कअ जिक्र जरूर करता हूँ जिसका नआम फायर ईन ब्लड हऐ। नीचेका लेखक का लेख बड़ा ठीक लगा। जरा पढ़े।
दवा का जहर : पश्चिमी दवा कंपनियों का तांडव और उसे रोकने का संघर्ष क्या जारी रह पाएगा?
Posted by कृष्ण सिंह
औषधि के क्षेत्र में होने वाला कोई भी अनुसंधान, शोध तथा खोज और फिर उसका विकास मूलत: व्यापक मानव समाज के हित के लिए ही किया जाना चाहिए। इस अवधारणा को बहुत ही सतर्कता और चालाकी से अब बाजार के खेल में कहीं बहुत पीछे धकेल दिया गया है। वैश्विक परिदृश्य में बड़ी दवा कंपनियों का रिकार्ड देखने पर साफ पता चलता है कि उनका एकमात्र एजेंडा सिर्फ छप्पर फाड़ मुनाफा होता है। इसके लिए ये कंपनियां पेटेंट को सबसे बड़े हथियार के रूप में इस्तेमाल करती हैं। यह उन्हें बाजार में एकाधिकार का ऐसा कवच प्रदान करता है, जिसके जरिए दवाओं की मनमाफिक काफी ऊंची कीमतें तय की जाती हैं। पश्चिम की बड़ी दवा कंपनियां अपनी सरकारों की मदद के जरिए अपने उत्पादों का बड़ा हिस्सा विकासशील और तीसरी दुनिया के गरीब मुल्कों के बाजारों में खपाती हैं। इसकी दो वजहें हैं। पहली यह कि दुनिया की आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा इन देशों में रहता है जिसके कारण यहां का बाजार भी काफी बड़ा है। दूसरा, इन देशों में असाध्य और अन्य तमाम तरह की बीमारियों के बढऩे की दर भी तेज है। इन देशों में रहने वाली आबादी के बड़े हिस्से के पास जीवनयापन की सुविधाएं भी वैसी नहीं रही हैं जैसी कि विकसित देशों में हैं। इन परिस्थितियों में दवाओं के एकाधिकार के सहारे बहुराष्ट्रीय कंपनियां एक ऐसा दुष्चक्र तैयार करती हैं जिसमें यदि आप (मरीज) नहीं फंसते हैं तो भी मारे जाएंगे और फंसते हैं तो भी आपका बच पाना असंभव है।

उदाहरण के लिए, गुर्दे और यकृत के कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली नेक्सवर दवा का वैश्विक पेटेंट जर्मनी की बहुराष्ट्रीय दवा कंपनी बेयर कॉरपोरेशन के पास है। भारत में नेक्सवर के एक पैकेट (120 कैप्सूल) की कीमत 2.8 लाख रुपए है। दवा की यह खुराक एक माह के लिए होती है। लेकिन इस दवा की इतनी अधिक कीमत भारत जैसे विकासशील देशों में मध्य वर्गीय तो क्या उच्च मध्य वर्गीय पृष्ठभूमि से आने वाला मरीज भी वहन नहीं कर सकता है। ऐसे में यदि मरीज को बचाना है या उसकी जीवन-प्रत्याशा बढ़ानी है तो उसके परिवार को इतनी महंगी जीवन रक्षक दवा के लिए अपनी घर-संपत्ति तक को बेचना पड़ेगा। फिर भी कहना मुश्किल है कि इलाज कराने में वह सक्षम हो भी पाएगा या नहीं। वैसे भी विकासशील देशों में कैंसर से पीडि़त मरीजों के इलाज के संसाधनों की उपलब्धता बहुत ही कम है। भारत में दस हजार कैंसर पीडि़तों के लिए केवल एक डॉक्टर है। यह हाल तब है जब भारत को तेजी से उभरती हुई एक ताकतवर अर्थव्यवस्था के रूप में पेश किया जा रहा है। ऐसे में तीसरी दुनिया के अन्य गरीब देशों में स्वास्थ्य सुविधाओं का क्या हाल होगा इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि भारत में हर साल दस लाख से ज्यादा लोग कैंसर की बीमारी से प्रभावित होते हैं। इनमें से एक तिहाई लोग हर साल मर जाते हैं। वर्ष 2025 तक भारत में कैंसर के मरीजों की संख्या में पांच गुना वृद्धि होगी। भारत में तीन प्रतिशत आबादी किसी न किसी तरह के कैंसर से पीडि़त है। वर्ष 2012 में भारत में कैंसर के कारण पांच लाख 55 हजार लाख लोगों की मौत हुई थी।

यह सिर्फ कैंसर की जीवन रक्षक दवाओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि एचआईवी/एड्स की पेटेंट वाली दवाओं की कीमतों का भी यही हाल है। पश्चिमी दवा कंपनियों की दवाओं, एकाधिकार और कपट की कहानी को सामने लाने वाली फिल्म ‘फायर इन द ब्लड’ के निर्देशक डिलन ग्रे ने पिछले दिनों लंदन के द गार्डियन अखबार के ऑनलाइन संस्करण में प्रकाशित लेख में कहा, ”बहुत साल पहले मैंने वह जानना शुरू किया जिसे मैं मानव इतिहास में सबसे बड़ा गुनाह मानता हूं। अफ्रीका और अन्य स्थानों पर लाखों लोग बड़ी निर्दयता से एड्स से मरने के लिए छोड़ दिए गए, जबकि पश्चिमी देशों की सरकारों और फार्मास्यूटिकल कंपनियों ने लोगों तक कम कीमत वाली दवाओं को पहुंचने नहीं दिया। …विकासशील देशों में जहां लोग दवाओं के लिए अपनी सामथ्र्य से बाहर खर्च करते हैं, स्थिति इससे भी बदतर है। फार्मास्यूटिकल कंपनियों के प्रतिनिधियों ने मुझे बताया कि (तुलनात्मक रूप से समृद्ध) दक्षिण अफ्रीका में वे अपने उत्पादों की कीमत बाजार के सबसे ऊपरी हिस्से श्रेष्ठ पांच प्रतिशत के हिसाब से लगाते हैं, जबकि भारत में उपभोक्ता आधार मात्र ऊपरी हिस्सा 1.5 प्रतिशत ही होगा। बाकी की जनसंख्या का कोई महत्त्व नहीं है। साथ ही दूसरी तरफ दवा कंपनियां दिन-रात मेहनत कर रही हैं कि वह भारत, ब्राजील और थाईलैंड जैसे देशों में बनाई जा रही कम कीमत की जेनेरिक दवाओं की आपूर्ति को काट सकें ताकि वे यह सुनिश्चित कर लें कि वे एक भी ऐसा उपभोक्ता नहीं खो रहे हैं जो उनकी गगनचुंबी कीमतों को अदा कर सकता है। ”

पेटेंट को पश्चिम की दवा कंपनियां सबसे बड़े हथियार के रूप में इस्तेमाल करती हैं। ये कंपनियां अपनी सरकारों की मदद के जरिए अपने उत्पादों का बड़ा हिस्सा विकासशील और तीसरी दुनिया के गरीब मुल्कों में खपाती हैं। दवाओं के एकाधिकार के सहारे बहुराष्ट्रीय कंपनियां ऐसा दुष्चक्र तैयार कर चुकी हैं जिसमें यदि आप (मरीज) नहीं फंसते हैं तो भी मारे जाएंगे और फंसते हैं तो भी आपका बच पाना असंभव है। उदाहरण के लिए, गुर्दे और यकृत के कैंसर के इलाज की नेक्सवर नामक दवा का वैश्विक पेटेंट जर्मनी की बहुराष्ट्रीय दवा कंपनी बेयर कॉरपोरेशन के पास है। भारत में नेक्सवर के एक पैकेट (120 गोलियां) की कीमत दो लाख 80 हजार रुपए है। यह एक माह की खुराक है। यही हाल एचआईवी/एड्स और कैंसर की पेटेंट वाली दवाओं की कीमतों का है।
फिलहाल, जेनेरिक (ऐसी दवाएं जिनके पेटेंट नहीं होते) दवा निर्माता कंपनियों और बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों के बीच कानूनी लड़ाइयों का बड़ा अखाड़ा अभी भारत बना हुआ है। हालांकि इन कानूनी लड़ाइयों में फिलहाल जेनेरिक दवा कंपनियां जीतती दिखाई दे रही हैं, लेकिन नव उदारीकरण और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हित में बनने वाली नीतियों के इस दौर में आगे क्या होगा यह कहना मुश्किल है। अभी जो चल रहा है उसकी गाथा कुछ इस तरह से है। बहुराष्ट्रीय दवा कंपनी बेयर कॉरपोरेशन की जिस पेटेंटयुक्त कैंसर रोधी दवा नेक्सवर की कीमत भारत में दो लाख 80हजार रुपए है, जबकि उसी दवा के जेनेरिक संस्करण के एक पैक की कीमत 8800 रुपए है। भारतीय पेटेंट कार्यालय ने पिछले साल नौ मार्च को हैदराबाद की कंपनी नेटको फार्मा को नेक्सवर के जेनेरिक संस्करण को भारत में बनाने और बेचने का अनिवार्य लाइसेंस दिया। भारतीय कानून में अनिवार्य लाइसेंसिंग की अनुमति विश्व व्यापार संगठन के नियमों के अनुरूप ही है। इसके मुताबिक कोई भी स्थानीय कंपनी राष्ट्रीय गैर व्यावसायिक वजहों से किसी दवा को स्थानीय स्तर पर बना और बेच सकती है। बेहद आपात परिस्थितियों में ऐसा पेटेंट धारक की इच्छा के खिलाफ जाकर भी किया जा सकता है। जब कंट्रोलर जनरल ऑफ पेटेंट्स यह सुनिश्चित कर लेता है कि जनता की जरूरत पेटेंट धारक के अधिकारों से ज्यादा बड़ी है तो वह इस तरह का अनिवार्य लाइसेंस जारी करता है। यही बेयर के मामले में भी हुआ। कंट्रोलर जनरल ने अनिवार्य लाइसेंस के लिए जो शर्तें लगाईं उसके मुताबिक नेटको को जेनेरिक दवा नेक्सवर की बिक्री से छह प्रतिशत की रॉयल्टी बेयर को देनी होगी।

बेयर ने इस आदेश को बौद्धिक संपदा अपीलीय बोर्ड (आईपीएबी) में चुनौती दी थी। चार मार्च 2013 को बोर्ड ने भारतीय पेटेंट कार्यालय के फैसले पर मुहर लगाते हुए बेयर की अपील ठुकरा दी और काफी महंगी जीवन रक्षक दवाओं के कम दामों में मिलने का रास्ता खोल दिया। बोर्ड की अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रभा श्रीदेवन और सदस्य डीपीएस परमार ने विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संधिपत्रों और भारतीय कानूनों को आधार बनाकर कहा कि सदस्य देशों को ऐसे अनिवार्य लाइसेंस देने की इजाजत है ताकि दवाएं लोगों तक सस्ते दामों में पहुंचाई जा सकें। बोर्ड का कहना था कि पेटेंट हासिल करने के बाद भी बेयर ने एक तय समय के भीतर बड़े पैमाने पर और वहन करने योग्य कीमत पर दवा उपलब्ध नहीं कराई। बेयर की ओर से दाखिल शपथपत्रों और निवेदनों को देखने के बाद बोर्ड इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि उसकी (दवा) 2.8 लाख की कीमत वहन करने योग्य नहीं थी। बौद्धिक संपदा अपीलीय बोर्ड का कहना था कि पेटेंट आविष्कार से जनता को लाभ के लिए दिया जाता है। हालांकि बोर्ड ने रॉयल्टी के मामले में संशोधन करते हुए नेटको को बेयर को सात प्रतिशत रॉयल्टी देने का निर्देश दिया है।

बौद्धिक संपदा अपीलीय बोर्ड का यह फैसला ऐतिहासिक है। जैसा कि यूनिवर्सिटी ऑफ ओकलाहोमा कॉलेज ऑफ लॉ में प्रोफेसर श्रीविद्या राघवन ने कहा, ”यह राय इससे बेहतर समय पर नहीं आ सकती थी, क्योंकि सात दिन पहले समाचारपत्रों ने यह खबर दी थी कि डिपार्टमेंट ऑफ फार्मास्यूटिकल्स ने सुझाया है कि अनिवार्य लाइसेंसिंग पर अब विराम लगा देना चाहिए। मुझे वह रिपोर्ट आज भी याद है जब दोहा घोषणापत्र में सार्वजनिक स्वास्थ्य के मामले में ट्रिप्स समझौते के लिए मुरासोली मारन ने अगुवाई की थी, जिसे व्यापक रूप से विकासशील देशों की एक बड़ी जीत माना जाता है। जो समझौता हमने इतने विचार करके हासिल किया कितनी शर्म की बात होती अगर भारत उसे रद्द करने के लिए पहला कदम उठाता।” प्रोफेसर राघवन का कहना था, ”इस फैसले का सबसे अहम हिस्सा है ‘रीजनेबल’ (तर्कसंगत) शब्द की लोगों की क्रय की क्षमता के संदर्भ में विवेचना। कुल मिलाकर फैसला बहुत ही हिम्मत भरा था- क्योंकि यह जनहित को भारत में पेटेंट मुद्दों के केंद्र में लाकर रख देता है। अगर समस्या है, तो वह सरकार के लिए है कि वह ऐसे काबिल व्यक्ति को ढूंढ ले जो न्यायमूर्ति श्रीदेवन की जिम्मेदारी और हिम्मत का, उनके रिटायर होने के बाद भी वहन कर सके। ”

बोर्ड का फैसला इस मायने में भी दूरगामी असर डालने वाला हो सकता है क्योंकि बेयर का नेटको के साथ ही विवाद नहीं चल रहा था, बल्कि वह एक और भारतीय जेनेरिक दवा निर्माता कंपनी सिप्ला के साथ भी कानूनी लड़ाई लड़ रही है। बेयर ने सिप्ला पर भी उसके पेटेंट के उल्लंघन करने का आरोप लगाया है। यह मामला अभी दिल्ली हाईकोर्ट में लंबित है। सिप्ला ने जेनेरिक नेक्सवर (सोराफेनिब टोसीलेट) का 120 कैप्सूल का पैक करीब 30 हजार रुपए की कीमत पर बाजार में उतारा था। अभी जब नेटको बनाम बेयर के मामले में बौद्धिक संपदा अपीलीय बोर्ड का मत सामने आया तो उस समय सिप्ला 5400 रुपए की कीमत पर इस दवा को बेच रही थी। हैरान करने वाली बात यह है कि पेटेंट के उल्लंघन के आरोपों और नेटको को अनिवार्य लाइसेंस देने से पहले वर्ष 2008 से 2010 के बीच बेयर ने सोराफेनिब टोसीलेट दवा का भारत में नाममात्र के लिए ही आयात किया। वर्ष 2008 में तो बेयर ने इसका आयात ही नहीं किया, जबकि उस साल बेयर ने दुनिया के बाकी हिस्से से जो लाभ कमाया वह 67 करोड़ 80 लाख डॉलर था। जबकि यह दवा लीवर और किडनी के कैंसर के पूरे फैल जाने की स्थिति (एडवांस स्टेज) में इस्तेमाल होती है। भारत और अमेरिका दोनों में इसका पेटेंट बेयर के पास है। बेयर का इस मामले में यह शर्मनाक रुख दर्शाता है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां पेटेंट को हथियार बनाकर अपनी सुविधा के हिसाब से उसका इस्तेमाल करती हैं।

कैंसर और एड्स के इलाज में काम आने वाली अधिकतर दवाओं पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कब्जा है, क्योंकि उनके पास इन दवाओं का पेटेंट है। लेकिन पिछले कुछ सालों से जेनेरिक दवा कंपनियों ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए चुनौती पेश की है। इसका एक और उदाहरण नोवार्टिस का है। नोवार्टिस स्विट्जरलैंड की बहुराष्ट्रीय दवा कंपनी है। नोवार्टिस को ग्लेविक दवा के लिए भारत में विशेष मार्केटिंग अधिकार प्राप्त थे। ग्लेविक इमाटिनिब मैसेलेट का बीटा क्रिस्टल रूप है। ग्लेविक क्रोनिक माइलॉयड ल्यूकिमिया के लिए निर्धारित औषधि है। नोवार्टिस की दवा की कीमत प्रति माह एक लाख बीस रुपए बैठती है। जबकि भारतीय जेनेरिक निर्माता इसी जीवन रक्षक दवा को दस हजार रुपए प्रति माह की कीमत पर मरीजों को उपलब्ध कराते हैं। बौद्धिक संपदा अपीलीय बोर्ड ने ग्लेविक के पेटेंट नवीकरण करने से इनकार कर दिया। इसके पीछे बोर्ड का आधार यह था कि इसकी कीमत बहुत ही अधिक है। नोवार्टिस यह मामला सुप्रीम कोर्ट में ले गई है। इसके अलावा भारत फाइजर कंपनी की कैंसर की दवा सूटंट, रॉश होल्डिंग एजी की हेपेटाइटिस सी की दवा पैग्सिस और मर्क एंड कंपनी की अस्थमा के इलाज की एयरोसोल सस्पेंशन फॉम्र्यूलेशन के मंजूर पेटेंटों को रद्द कर चुका है।

देखा जाए तो जेनेरिक दवा निर्माता कंपनियां बहुराष्ट्रीय कंपनियों के एकाधिकार का विकल्प बन सकती हैं। खासकर एचआईवी/एड्स के इलाज में इस्तेमाल में लाई जाने वाली एंटीरेट्रोवाइरल दवाओं के मामले में यह देखने को मिला है। एचआईवी-एड्स के एक मरीज को एक साल के इलाज के लिए 12 हजार से 15 हजार डॉलर खर्च करने पड़ते थे। भारत की बड़ी जेनेरिक दवा निर्माता कंपनियों में से एक सिप्ला ने उच्च गुणवत्ता वाली एचआईवी-एड्स एंटीरेट्रोवाइरल दवाएं सस्ते में उपलब्ध कराकर विकासशील देशों, विशेषकर अफ्रीका में मरीजों में एक नई आशा जगाई। सिप्ला ने तीन एंटीरेट्रोवाइरल को मिलाकर एक गोली बनाई जिसका नाम ट्राइओम्यून है। इसके लिए मरीज को एक साल के इलाज के लिए 350 डॉलर देने पड़ते हैं। अफ्रीका और अन्य विकासशील देशों में 85 प्रतिशत दवाएं भारतीय कंपनियों से जाती हैं। इन जेनेरिक दवाओं ने बहुत सारे लोगों का जीवन बचाया और बहुत सारे मरीजों की जीवन-प्रत्याशा को बढ़ाया। पूरी दुनिया में चार करोड़ लोग एड्स से पीडि़त हैं। इन मरीजों को सस्ती और उच्च गुणवत्ता वाली जेनेरिक दवाएं उपलब्ध होना जरूरी है, क्योंकि इन मरीजों में से अधिसंख्य के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों की दवाएं खरीदना असंभव है।

दवाओं की इतनी अधिक कीमत के मामले में बहुष्ट्रीय कंपनियों का तर्क है कि वह दवा की खोज और उसके विकास में बहुत अधिक निवेश करते हैं और अपने फार्मूले पर वह इसलिए भी अधिकार चाहते हैं ताकि वे आने वाले समय में अपनी गुणवत्ता को बढ़ा सकें। पर शोध और विकास में बहुत अधिक धन खर्च करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों का तर्क पूरी तरह निराधार है। इस मामले में हुए अध्ययन बताते हैं कि दवा अनुसंधान के लिए जो वैश्विक फंडिंग है उसमें से 84 फीसदी पूंजी सरकारों और सार्वजनिक स्रोतों से आती है। जबकि फार्मास्यूटिकल कंपनियां 12 प्रतिशत ही पूंजी लगाती हैं। उल्टा ये कंपनियां औसतन 19 गुना अधिक पैसा मार्केटिंग पर खर्च करती हैं। अपने राजस्व का 1.3 प्रतिशत पैसा ही ये कंपनियां मूल अनुसंधान पर खर्च करती हैं।

दरअसल, व्यापार संबंधी बौद्धिक संपदा अधिकारों के प्रसार के बाद पेटेंट बड़ा मुनाफा कमाने का एक खतरनाक हथियार बन गया है। जबकि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि प्राकृतिक दुनिया से संबंधित ज्ञान का एक बहुत बड़ा हिस्सा जो आज मानव के पास है उसमें कई सदियों के दौरान देशज और स्थानीय लोगों के प्रयासों का योगदान रहा है। देशज लोगों ने जो आविष्कार और खोजें की उन पर स्वामित्व का दावा नहीं किया। हालांकि हाल के दशकों में व्यापार संबंधी बौद्धिक संपदा के अधिकारों (ट्रिप्स) के परिणामस्वरूप देशज और स्थानीय लोगों के अधिकारों का उल्लंघन हुआ है। ट्रिप्स जीव रूपों और ट्रांस नेशनल कॉरपोरेशनों की गतिविधियों, जो जैविक संसाधनों (इस प्रक्रिया को जैव संभावना के नाम से जाना जाता है) पर आधारित उत्पादों के व्यावसायीकरण में शामिल हैं, को पेटेंट करने की इजाजत देता है। ट्रांस नेशनल कॉरपोरेशन जिन बहुत सारे ‘आविष्कारों’ को करने का दावा करते हैं, वह ज्ञान पहले से मौजूद रहा है, लेकिन जिसका दस्तावेजीकरण नहीं किया गया था। यह मौखिक तौर पर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को मिलता रहा है। यह सामूहिक ज्ञान है, इस पर स्वामित्व का अधिकार नहीं किया गया। देशज लोग इस तरह के ज्ञान के व्यावसायीकरण को पसंद नहीं करते थे। असली आविष्कारक इसे लोकहित में इस्तेमाल करते थे। बौद्धिक संपदा दौर के प्रसार के साथ पिछले कुछ सालों में देशज और स्थानीय लोगों के अधिकारों का उल्लंघन हुआ है। ट्रिप्स समझौते, जो जीवाणु, सूक्ष्म जीव विज्ञान प्रक्रियाओं और साथ ही वनस्पतियों की किस्मों के पेटेंट के लिए रास्ता उपलब्ध कराता है, ने पिछले कुछ वर्षों में पेटेंट के प्रसार के लिए अवसर उपलब्ध कराया है। ट्रांस नेशनल कॉरपोरेशनों ने देशज और स्थानीय लोगों के परंपरागत ज्ञान को स्वयं द्वारा किए गए ‘आविष्कारों’ का दावा करके पेटेंट कराने की कोशिश की है।

सवाल यही है कि दवाओं के अनुसंधान और विकास का लाभ किसको मिल रहा है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां जिस तरह से मनमाना मुनाफा वसूल रही हैं उसे क्या चिकित्सा विज्ञान के मानदंडों से उचित कहा जा सकता है ? जैसे, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पेटेंट युक्त इंजेक्शन के दाम डेढ़ लाख रुपए तक हैं। वैश्विक संदर्भ में बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों के एकाधिकार को देखते हुए यह जरूरी है कि पेटेंट युक्त दवाओं के जेनेरिक संस्करण के लिए अनिवार्य लाइसेंस देने की नीति को ज्यादा सक्रिय तरीके से लागू किया जाना चाहिए। जेनेरिक दवा निर्माण और अनिवार्य लाइसेंसिंग के मामले में भारत और अन्य विकासशील देश यदि कमजोर रुख अपनाएंगे तो इसके परिणाम तीसरी दुनिया के लिए बहुत ही घातक होंगे। लेकिन इसके साथ ही जेनेरिक दवा निर्माता कंपनियों की दवाओं की कीमतों के निर्धारण की ऐसी नीति होनी चाहिए जो आम जनता की पहुंच के अंदर हो। भारत जैसे देश में ऐसे लोगों की काफी बड़ी संख्या है जो जेनेरिक दवा निर्माता कंपनियों की जीवन रक्षक दवाओं को भी खरीदने में सक्षम नहीं हैं। अगर जिस व्यक्ति की प्रति माह आमदनी पांच हजार से सात हजार रुपए के बीच है वह इलाज के लिए दस हजार रुपए के कीमत वाली जेनेरिक दवा भी नहीं खरीद सकता है। भारत में इस तरह की कम आय वाले परिवारों की संख्या करोड़ों में है। ”

::::::",,,,,,,,,,,,',,,,,,,,

दवाईयों के पेटेण्ट पर केन्द्र सरकार का निर्णय स्वागत योग्य
डाॅ. भगवती प्रकाश
​केन्द्र सरकार द्वारा अमेरिकी दबाव की अनदेखी कर दवाईयों के पेटेन्ट के मामले में अनिवार्य अनुज्ञापन (कम्पल्सरी लाईसेसिंग) के प्रावधानों एवं भारतीय पेटेन्ट अधिनियम की धारा 3 डी में, किसी भी प्रकार की शिथिलता लाने से इन्कार कर देने का निर्णय अत्यंत स्वागत योग्य है। भारत आज ‘फार्मेसी आॅफ द वल्र्ड‘ कहलाता है और पेटेन्ट के क्षेत्र में उपरोक्त दोनों मानवोचित प्रावधानों के कारण ही आज विश्व भर में ब्लड केन्सर, एच.आई.वी एड्स और अन्य गम्भीर बीमारियों के सस्ते ईलाज के लिए सस्ती दरों पर दवाईयाँ सुलभ करा पा रहा है, जिसके फलस्वरूप ही आज विश्व के 40 प्रतिशत से भी अधिक रोगी अपना ईलाज भारत में सस्ती दर पर सुलभ दवाईयों के कारण ही करा पा रहे है। देश मंे स्वास्थ्य - रक्षा व चिकित्सा लागतों पर नियंत्रण और वैश्विक मानवता के प्रति संवेदनावश ही विगत कई वर्षों से चल रहे अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि और ओबामा प्रशासन के दबाव को पूरी तरह से नकारते हुए अब तो सरकार ने मंगलवार, दिसम्बर 29 को व्यक्त रूप से ही इन मुद्दों पर अमरीकी दबाव में आने से सर्वथा इन्कार कर दिया है। पिछली सरकार इन मुद्दों को व्यक्त रूप से नकारने का साहस नहीं दिखा पायी थी। इस सम्बन्ध में विश्व व्यापार संगठन के हाल ही में नैरोबी में सम्पन्न दसवें मंत्रीय स्तरीय सम्मेलन में भी भारत ने विकासशील व अल्पतम विकसित देशों के पक्ष को मजबूती से रखते हुए इन मुद्दों पर पर्याप्त दृढ़ता दिखाई थी।
​यहाँ पर यह भी उल्लेखनीय है कि वर्ष 2012 में जब भारत के तत्कालीन चीफ कन्ट्रोलर आॅफ पेटेन्ट्स, पी.एच. कुरियन ने जर्मन कम्पनी ‘बायर एजी‘ की 2,80,000 रूपये कीमत वाली, लीवर व किडनी केन्सर की ‘नेक्सावर‘ नामक दवाई को भारत को 8,800 रूपये में बनाकर बेचने के नेटको नामक भारतीय कम्पनी को कम्पलसरी लाईसेन्स दे दिया था, तब केन्द्र सरकार ऐसा साहस नहीं दिखला पायी थी। वस्तुतः श्री कुरिअन द्वारा दिये लाइसेंस के विरूद्ध तब तत्कालीन मनमोहसिंह सरकार पर इस कम्पल्सरी लाइसेंस के विरूद्ध आए यूरो अमेरीकी दबाव को वह सहन नहीं कर पाई थी। इसलिए इस बायर एजी कंपनी द्वारा 2 लाख 80 हजार रूपये में बेचे जा रहे लीवर व किडनी केंसर के इस इन्जेक्शन को, 8800 रूपये में बनाकर बेचने का कम्पल्सरी लाइसेंस देने वाले चीफ कंट्रोलर आॅफ पेटेन्ट्स, पी.एच. कुरियन का कार्यकाल 2.5 वर्ष शेष होने पर भी सरकार उनका इस पद से स्थानान्तरण कर देने के दबाव में आ गई थी। मानवता के हित में देश के विद्यमान कानून और 2001 के बहुपक्षीय दोहा घोषणा पत्र के अनुरूप ही कम्पल्सरी लाइसेंस देने पर भी पी.एच. कुरियन को समय से पहले उस पद से हटा दिया देने अत्यन्त हास्यास्पद निर्णय था। उसके बाद कोई भी चीफ कंट्रोलर आॅफ पेटेन्श देश में कम्पल्सरी लाइसेंस देने का साहस नहीं जुटा पाया है।
​इतना करने अर्थात कुरियन को पद हटा देने के बाद भी तत्कालीन मनमोहनसिंह सरकार के विरूद्ध अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि ने दण्डात्मक कार्यवाही तक के लिए, भारत के विरूद्ध आऊट आॅफ साइकिल जन सुनवाई प्रारंभ कर दी थी। तब यह लग ही रहा था कि अमेरिकी प्रसासन भारत के विरूद्ध अमेरिकी कानून सुपर 301 के अधीन कार्यवाही करने के लिए भारत को प्रायोरिटी फाॅरेन कंट्री की श्रेणी में रखने वाला है। लेकिन, लोक सभा चुनावों के बीच अप्रेल 30, 2013 को जारी अपने प्रतिवेदन में उसने ऐसा नहीं किया। अब तो वर्तमान सरकार की दृढता को देखते हुए अमरिकी व्यापार प्रतिनिधि माइकल फ्रोमेन ने किसी आऊट आॅफ साइकिल समीक्षा जैसा कदम दुबारा नहीं उठाया है जबकि अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि ने अपनी ताजा वार्षिक स्पेशल 301 रिपोर्ट में इस मुद्दे पर गंभीर चिंता व्यक्त की है।
​इस संबंध में भारत सरकार अपनी दृढ़ता बनाये रखते हुए अन्य भी विदेशी पेटेन्ट युक्त महंगी जीवन रक्षक दवाईयों के संबंध में भी उदारता पूर्वक कम्पल्सरी लाइसेंस जारी करने की नीति पर आगे बढ़े तो देश व विदेश के आम रोगियों के लिए वरदान सिद्ध होगा। अच्छा तो यही होगा कि, सरकार पेटेन्ट के अधीन आने वाली अन्य भी ऐसी महंगी दवाईयाँ, जिन्हें कोई भी स्थानीय उत्पादक उसके विदेशी पेटेन्टधारी की तुलना में एक चैथाई से कम कीमत पर बनाकर बेचने को प्रस्तुत हो जाये उन सभी के लिए, स्वतः अनिवार्य अनुज्ञापन (आॅटोमेटिक कम्पल्सरी लाइसेंस) का प्रावधान करे।
​ऐसी अनेक दवाईयां है यथा रोश कम्पनी की केंसर-रोधी 1,35,200 रूपये की दवा हरसेप्टीन मर्क कम्पनी की अरबीटक्स जो 87,920 रूपये की है, ब्रिस्टोल मेयर स्क्विब की आई जेम्प्रा जो 66,460 रू. की है, फाइजर कम्पनी की मेकुजन जो 45,350 रूपये की है और सनोफी एवेन्टीस की फास्चरटेक 45,000 रूपये की कीमत पर उपलब्ध है। ऐसी सभी महंगी दवाईयों के लिए भी कम्पल्सरी लाइसेंस जारी किया जाना चाहिए। इनमें से अधिकांश दवाईयां केंसर, मधुमेह, हृदय रोग एवं अन्य गंभीर वेदनाओं के लिए प्रभावी दवाईयां हैं।
​ऐसे सभी मामलों में ऐसा कम्पल्सरी लाइसेन्स आवश्यक है। इसी प्रकार भारतीय पेटेण्ट अधिनियम की धारा 3 डी के कारण ही ब्लड कैंसर की दवा ग्लिवेक आज भी देश में रू. 1200 के स्थान पर मात्र रू. 90 में उपलब्ध है। अतएव पेटेण्ट व ट्रिप्स के मामले में नरेन्द्र मोदी सरकार की दृढ़ता भारत व विश्व भर के मध्यम व निम्न आय वर्ग के लाखों रोगियों के लिये जीवनदान तुल्य निर्णय है ।
 
डाॅ. भगवती प्रकाश
अखिल भारतीय सह संयोजक
स्वदेशी जागरण मंच

 

संदर्भ:

1. आर. राघवन, ‘नेटको फार्मा विंस कैंसर ड्रग द हिंदू, 5 मार्च 2013।

2. श्रीविद्या राघवन, ‘पेशंट्स विन ओवर पेटेंट्स ; द हिंदू, 7 मार्च 2013।

3. देबोश्री रॉय, ‘ऑफ ग्लेविक एंड नोवार्टिस ; फ्रंटियर, 9-15 दिसंबर 2012।

4. रोहिणी पाडुरंगी, ‘पेटेंटिंग ट्रेडिशनल नॉलेज ; फ्रंटियर, 9-15 दिसंबर 2012।

5. मार्टिन खोर, ‘फार्मा इंडस्ट्री फॉर द वल्र्डस् पूअर ; डेक्कन हेराल्ड, 20 मार्च 2013।