Wednesday, September 22, 2021

प्राचीन भारत में रोज़गार

प्रायः यह धारणा बन गयी है कि भारत में रोजगार देने राज्य का कभी भी काम नहीं रहा है। परंतु यह पूरी तरह सत्य नहीं है। सरकार भी या राज्य भी इसके लिए जिम्मेवार होता था। प्रसिद्ध विद्वान डॉ भगवती प्रकाश जी ने पांचजन्य में छपे निम्न लेख में बताया है कि यह राज्य की जिम्मेवारी भी रही है। आइए इसे समझें:
संस्कृति संवाद -36 रोजगार केन्द्रित प्राचीन अर्थ चिन्तन 
प्रोफेसर भगवती प्रकाश
 
भारत सहित विश्व के सभी देषों में आज ‘रोजगार रहित आर्थिक वृद्धि, अर्थात ‘‘जाॅब लेस ग्रोथ’’ एक समस्या है। अधिकांष अर्थ व्यवस्थाओं में विगत दशकों में हुई आर्थिक वृद्धि के उपरान्त भी रोजगार में संकुचन भी हुआ है। प्राचीन भारतीय आर्थिक चिन्तन रोजगार केन्द्रित रहा है। वैदिक विमर्ष  से लेकर श्रीराम के उपाध्याय एवं अर्थशास्त्री पुष्पधन्वा और चाणक्य रचित कौटिल्य अर्थशास्त्र तक सभी प्राचीन भारतीय विद्वानों का आर्थिक चिन्तन रोजगार संकेन्द्रित रहा है। कौटिल्य के अनुसार मनुष्यों की वृति अर्थ है, मनष्ुयों से युक्त भूमि अर्थ है एवं ऐसी मनुष्यों से आवासित पृथ्वी की प्राप्ति, विकास व उसका लाभपूर्ण पालन-पोषण का शास्त्र अर्थशास्त्र है।  
‘‘मनुष्याणां वृत्तिरर्थः। मनुष्यवती भूमिरित्यर्थः। तस्य पृथिव्या लाभपालनोपायः शास्त्रमर्थषास्त्रमिति 
(कौटिल्य अर्थषास्त्र 15-1-1) अर्थातः  
इस प्रकार मनुष्याणां वृत्तिरर्थः से आषय है, ‘‘सम्पूर्ण प्रजा या रोजगारक्षम व्यक्तियों को वृत्ति अर्थात आजीविका या रोजगार प्रदान करना अर्थषास्त्र है। मनुष्यवती भूमिरित्यर्थः से आषय है राज्य की भूमि पर बसे लोगों के योगक्षेम अर्थात उनकी आवष्यकताओं पूत्र्ति व उन्हें प्राप्त सुविधाओं के रक्षण की व्यवस्था अर्थशास्त्र है। तस्य पृथिव्या लाभपालनोपायः शास्त्रमर्थषास्त्रमिति से आषय सम्पूर्ण प्रजा से आवासित भूमि पर आय-परक या लाभप्रद गतिविधियाँ जिनमें उद्योग, व्यापार, वाणिज्य, कृषि, वित्तीय प्रबन्ध आदि सम्मिलित है, उससे मानव मात्र के लिए लाभोत्पादक आजीविकाओं की व्यवस्था करना अर्थषास्त्र है।  
रोजगार में वृद्धि के बिना, उत्पादन या जी.डी.पी अर्थात सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि की दर से आर्थिक प्रगति का आकलन भ्रामक हैं। प्राचीन आर्थिक चिन्तन में सम्पूर्ण प्रजा अर्थात प्रत्येक रोजगारक्षम नागरिक या मानव मात्र को आजीविका युक्त करना, उस आजीविका के रक्षण संवर्द्धन व सम्पोषण के साथ उन्हें सतत लाभदायी आय से युक्त बनाए रखना अर्थशास्त्र कहा है।  
वेदों में आजीविकायुत कर्म सामथ्र्य व समृद्धि पर बलः  
वेदों में राज्य शासन व राजा द्वारा सम्पूर्ण प्रजा को सम्यक भरण-पोषण योग्य आजीविकाओं का सृजन एवं संधारण राजा का प्रमुख कत्र्तव्य माना है। यजुर्वेद (9/22-25) में प्रजा की कर्मसामथ्र्य वृद्धि, समृद्धि एवं कृषि, उद्योग, व्यापार व वाणिज्य से उत्पादन की प्रचुरता का निर्देष है।  
अस्मे वोऽअस्त्विन्द्रियमस्मे नृम्णमुत क्रतुरस्मे वर्चासि सन्तु वः। नमो मात्रे पृथिव्यै नमो मात्रे पृथिव्याऽइयं ते राड्यन्तासि यमनो ध्रवोऽसि धरुणः। कृष्यै त्वा क्षेमाय त्वा रय्यै त्वा पोषाय त्वा यजुर्वेद 9/22 
भावार्थः मातृभूमि के प्रति सादर व श्रृद्धापूर्वक (मात्रेपृथिव्यै नमः; मात्रे पृथिव्या नमः) तुम अपने पराक्रम, वर्चस्व व तेजस्विता पूर्वक (वः वर्चांसि अस्मे सन्तु) इस राज्य को आधार बना कर सभी दिषाओं में अपनी कर्मसामथ्र्य, धन व धनाजर्न हेत ु व्यवसाय में वृद्धि करो (नृम्णम् उत क्रतुः अस्मे)। मेरे शासन (इयं राड्) में तुम्हारी कृषि सहित योगक्षेम व आर्थिक समृद्धि एवं सभी प्रकार की जीवनोपयोगी आवष्यकताओं के लिए आवष्यक धनोपार्जन-पूर्वक तुम्हारा सम्पोषण करे (त्वा कष्ृये, त्वाक्षेमाय, त्वा रय्ये, त्वा पोषाम)। तम्ु हारे ये उपार्जन सुस्थिर होवें, इनमें वृद्धि होवे इस हेतु राज्य संकल्पबद्ध  है। (यमनः धव्र: धरूणः असि) यजुवेर्द 9/22 
यजुर्वेद के ही अध्याय 9 के निम्न मन्त्रांष भी यहाँ पठनीय हैः  
‘‘           मधुमतीर्भवन्तु वय राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः स्वाहा।।’’ यजुर्वेद 9/23 अर्थः इन माधुर्यपूर्ण व जीवनोपयोगी इन परिलब्धियों की सुरक्षार्थ परु अथार्त नगर के हम हित-चिन्तक  इस राष्ट्र को सतत जागतृ बनाये रखें।  
‘‘           दापयति प्रजानन्त्स नो रयि सर्ववीरं नियच्छतु स्वाहा।।’’ यजुर्वेद 9/24 इस राज्य में तुम्हारे पराक्रमी उत्तराधिकारियों में यह ‘शुद्ध धन’ (रयि) उत्तरोत्तर बढ़े।  
‘‘        सनेमि राजा परियाति विद्वान् प्रजां पुष्टिं वर्धयमानोऽअस्मे स्वाहा।।’’ यजुर्वेद 9/25 सभी प्रकार के ज्ञान-विज्ञान से युत ये सभी प्रजाजन यहाँ सख्ु ापूवर्क विहार करते हुए अपने 
धन, बल, पशुधन सहित वृद्धि को प्राप्त होवे।  
यजुर्वेद (18/12-13) में ही कृषि, भूगर्भ-विद्या या विज्ञान व उद्योगों से मूल्यवान पदार्थों के उत्पादन एवं विविध उद्योगों, व्यापार व वाणिज्य से सभी प्रकार क े धन के अर्जन व संचय की कामना के सन्दर्भ हैं। इन मन्त्रों मे ं सभी प्रकार की फसलो ं व धातुओं सहित भगू र्भ  की सम्पदा आदि की प्रचुरता की कामना है।  
व्रीहयश्चमे यवाश्चमे माषाश्चमे तिलाश्चमे मुद्गाश्चमे खल्वाश्चमे प्रियङ्गवश्च मेऽणवश्चमे श्यामाकाश्चमे नीवाराश्चमे गोधूमाश्चमे मसूराश्चमे यज्ञेन कल्पन्ताम्।। यजुर्वेद 18/12 अश्माचमे मृत्तिकाचमे गिरयश्चमे पर्वताश्चमे सिकताश्चमे वनस्पतयश्चमे हिरण्यंच मेऽयश्चमे 
श्यामंचमे लोहंचमे सीसंचमे त्रपुचमे यज्ञेन कल्पन्ताम्।। यजुर्वेद 18/13 
मन्त्रार्थः - मेरे चाँवल, साठी के धान, जौ, अरहर, उड़द, मटर, तिल, नारियल, मूँग, चणे, कंगुनी, सूक्ष्म चावल, सामा चाँवल, मडुआ, पटेरा, चीणा आदि छोटे अन्न, पसाई के चावल जो कि बिना बोए उत्पन्न होते हैं। गेहूँ, मसूर और सभी प्रकार के अन्य अन्न व कृषि पदार्थ प्रचुरता में उपजे व बढ़ें ।। 12।। मन्त्रार्थः - मेरे मूल्यवान खनिज व खनिज युक्त पाषाण, हीरा आदि रत्न, रत्नमयी अच्छी मिट्टी और साधारण मृदा, पर्वत व मेघ और बड़े-छोटे पवर्त और पर्वतों में होनेवाले पदार्थ, बड़ी और छोटी-छोटी बालू, मूल्यवान वनस्पतियाँ बड़ और आम आदि वृक्ष लताएँ आदि, मेरा सब प्रकार का धन, स्वर्ण तथा चाँदी, लोह भण्डार और शस्त्र, नीलमणि, लहसुनिया आदि और चन्द्रकान्त जैसी मणियाँ, सुवर्ण तथा कान्तिसार, सीसा, लाख, टिन व जस्ता और पीतल आदि ये सब अनन्त गनु े होवें ।।13।। इस प्रकार वेद सहित प्राचीन वाङम् य में सम्पूर्ण प्रजा के योगक्षेम, समृद्धि एवं वृति अर्थात रोजगार युक्त कृषि, पषुधन, खनिज उद्योगादि की प्रगति की कामना की गई है। इन सभी की संवृद्धि के लिए उचित परिस्थितियों के संस्थापक को चक्रवर्ती राजा बनाने की आवष्यकता बतलाई है।  
सत्पात्र व कमजोर वर्गों की सहायता:  
राजा को विद्यार्थियों, विद्वानों, बा्रह्मणों एवं याज्ञिकों का राजकोष से पालन करना चाहिए। गौतम (10/19-12, 18/39), कौटिल्य (2/1), महाभारत अनुशासन पर्व (61/28-30), महाभारत शान्तिपर्व (165/6-7), विष्णुधर्मसूत्र (3/79-80), मनुस्मृति (7/82 एवं 134), याज्ञवल्क्य स्मृति (1/315 एवं 323 तथा 3/44), मत्स्यपुराण (215/58), अत्रिस्मृति (24) आदि। राजा को असहायों, वृद्धों, दृष्टिहीनों, अपंगों, मन्बुद्धि व विमन्दित जनों, पागलों, विधवाओं, अनाथों, रोगियांे, गर्भवती स्त्रियों की भोजन, दवा, वस्त्र, निवास आदि की सहायता करनी चाहिए। वसिष्ठ 99/35-36), विष्णुधर्माेत्तर, (3/65), मत्स्यपुराण  (215/62), अग्निपुराण (225/25), महाभारत आदिपर्व (49/99), महाभारत सभापर्व (18/24), महाभारत विराटपर्व (18/24, महाभारत शान्तिपर्व 77/18) आदि। विष्णुधर्माेत्तर सूत्र को उद्धृत करते हुए राजनीतिप्रकाश (पृ० 130-131) के अनुसार राजा पतिव्रता स्त्रियों का सम्मान एवं रक्षा करे। राजनीतिप्रकाष ने शंख-लिखित के सन्दर्भ से लिखा है कि जो वर्ग व समुदाय शास्त्रविहित वृत्तियांे अथार्त आजीविकाआंे  से जीवन निवार्ह नहीं कर सकें, उन्हे ं राजा से भरण-पोषण की माँग करनी चाहिए और राजा अपनी सामथ्र्य के अनुसार उनकी सहायता करे। विपत्ति एवं अकाल के समय में राजा यथा शक्ति भोजन आदि की व्यवस्था करके प्रजापालन करना चाहिए 
(मनुस्मृति 5/94 की व्याख्या में मेघातिथि)। बुड्ढों, दृष्टिहीनों, विधवाओं, अनाथों एवं असहायों की व्यवस्था तथा उद्योग या व्यवसाय रहित क्षत्रियों, वैश्यों एवं शूद्रों को समयानुकूल सहायता देना प्राचीन परम्परा है। धर्मशास्त्रीय ग्रन्थों दयालु राजाओं की इसी परम्परा के अनुरूप ही अशोक ने मनुष्यों एवं पशुओं के लिए अस्पताल खुलवाये थे (द्वितीय प्रस्तर अभिलेख)। धर्मशालाओं, अनाथालयों, पौसरों, छायादार वृक्षों, सिंचाई आदि की भी व्यवस्था की थी। राजा खारवेल व रुद्रदामा ने भी प्रजा हित को सर्वोच्च महत्व दिया था। महाभारत अनुशासनपर्व व मत्स्य पुराण (215/68) के अनुसार राजाओं को प्रचुरता में सभा-भवनों, प्रपाओं, जलाशयों, मन्दिरों, विश्रामालयांे आदि निर्माण कराने चाहिए। 
श्लोकः शालाप्रपातडागानि देवतायतनानि च। ब्राह्मणावसथाश्चैव कत्र्तव्यं नृपसत्तमैः।। 
(महाभारत अनुशासनपर्व पराशरमाधवीय, भाग 1, पृ० 466) इस प्रकार प्राचीन राजधर्म रोजगार केन्द्रित व लोक कल्याण प्रेरित अर्थ चिन्तन पर आधारित 
था।  

Wednesday, September 15, 2021

न मन हूँ न बुद्धि न चित अहंकार



निर्वाण षटकम् – आदि शंकराचार्य 1200 वर्ष पूर्व। 
The Atmashatkam (, ātmaṣaṭkam), also known as Nirvanashatkam ( Nirvāṇaṣaṭkam), is a composition consisting of 6 fold śloka (and hence the name Ṣaṭ-ka to mean six-fold) written by the Hindu philosopher Adi Shankara summarizing the basic teachings of Advaita Vedanta, or the Hindu teachings of non-dualism. It was written around 788-820 BCE.
It is said that when Ādi Śaṅkara was a young boy of eight and wandering near River Narmada, seeking to find his guru, he encountered the seer Govinda Bhagavatpada who asked him, "Who are you?". The boy answered with these stanzas, which are known as "Nirvāṇa Ṣaṭkam" or Ātma Ṣaṭkam". Swami Govindapada accepted Ādi Śaṅkara as his disciple. The verses are said to be valued to progress in contemplation practices that lead to Self-Realization.
"Nirvāṇa" is complete equanimity, peace, tranquility, freedom and joy. "Ātma" is the True Self
जन्मकाल अर्थात 2631 युधिष्‍ठिर संवत में आदि शंकराचार्य का जन्म हुआ था। मतलब आज 5158 युधिष्ठिर संवत चल रहा है। अब यदि 2631 में से 5158 घटाकर उनकी जन्म तिथि निकालते हैं तो 2527 वर्ष पूर्व उनका जन्म हुआ था। इसको यदि हम अंग्रेजी या ईसाई संवत से निकालते हैं तो 2527 में से हम 2019 घटा दे तो आदि शंकराचार्य का जन्म 508 ईसा पूर्व हुआ था। इसी तरह मृत्यु का सन् निकालें तो 474 ईसा पूर्व उनकी मृत्यु हुई थी।Most historians agree that Adi Shankaracharya lived in the 8th century CE, ईसापूर्व  or 1,200 years ago, 1,300 years after the Buddha. कालड़ी, म्रत्यु केदारनाथ,32 वर्ष आयु। 

 
ना मन हूँ ना बुद्धि ना चित अहंकार
ना जिव्या नयन नासिका कर्ण द्वार
ना मन हूँ ना बुद्धि ना चित अहंकार
ना जिव्या नयन नासिका कर्णद्वार
ना चलता ना रुकता ना कहता ना सुनता
जगत चेतना हूँ अनादि अनन्ता
जगत चेतना हूँ अनादि अनन्ता।।1।।

मनो-बुद्धि-अहंकार चित्तादि नाहं ,
न च श्रोत्र-जिह्वे न च घ्राण-नेत्रे ।
न च व्योम-भूमी न तेजो न वायु ,
चिदानंद-रूपं शिवो-हं शिवो-हं ॥ १॥
2. 
ना मैं प्राण हूँ ना ही हूँ पंच वायु
ना मुझमें घृणा ना कोई लगाव
ना लोभ मोह इर्ष्या ना अभिमान भाव
धन धर्म काम मोक्ष सब अप्रभाव
 मैं धन राग गुणदोष विषय परियन्ता
जगत चेतना हूँ अनादि अनन्ता।।2।।
मैं धन राग गुणदोष विषय परियांता
जगत चेतना हूँ अनादि अनन्ता......

न च प्राण-संज्ञो न वै पञ्च-वायु:,
न वा सप्त-धातुर्न वा पञ्च-कोष: ।
न वाक्-पाणी-पादौ न चोपस्थ पायु:
चिदानंद-रूपं शिवो-हं शिवो-हं ॥ २ ॥

3. 
मैं पुण्य ना पाप सुख दुःख से विलग हूँ
ना मंत्र ना ज्ञान ना तीर्थ और यज्ञ हूँ
 ना भोग हूँ ना भोजन ना अनुभव ना भोक्ता
जगत चेतना हूँ अनादि अनन्ता
ना भोग हूँ ना भोजन ना अनुभव ना भोक्ता
जगत चेतना हूँ अनादि अनन्ता।।3।।

न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं
न मन्त्रो न तीर्थो न वेदा न यज्ञः
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम ॥3॥
(न मे द्वेष-रागौ न मे लोभ-मोहौ,
मदे नैव मे नैव मात्सर्य-भाव: .
न धर्मो न च अर्थो न कामो न मोक्ष:
चिदानंद-रूपं शिवो-हं शिवो-हं .. ॥ ३ ॥)

 
                ।।4।।

ना मृत्यु का भय है ना मत भेद जाना
ना मेरा पिता माता मैं हूँ अजन्मा
 निराकार साकार शिव सिद्ध संता
जगत चेतना हूँ अनादि अनंता
निराकार साकार शिव सिद्ध संता
जगत चेतना हूँ अनादि अनंता।।
           ।।5।।

न मे मृत्युशंका न मे जातिभेदः
पिता नैव मे नैव माता न जन्म
न बन्धुर्न (बंधुर न) मित्रं गुरुर्नैव शिष्यं
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम ॥5॥

मैं निरलिप्त निरविकल्प सूक्ष्म जगत हूँ
हूँ चैतन्य रूप और सर्वत्र व्याप्त हूँ
मैं हूँ भी नहीं और कण कण रमता
जगत चेतना हूँ अनादि अनंता
मैं हूँ भी नहीं और कण कण रमता
जगत चेतना हूँ अनादि अनंता

अहं निर्विकल्पो निराकार रूपो,
विभुत्त्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणां ।
सदा मे समत्त्वं न मुक्तिर्न बंध:
चिदानंद रूपं शिवो-हं शिवो-हं ..॥ ६॥

              ।।6।।

ये भौतिक चराचर ये जगमग अँधेरा
ये उसका ये इसका ये तेरा ये मेरा
ये आना ये जाना लगाना है फेरा
ये नश्वर जगत थोड़े दिन का है डेरा
 ये प्रश्नों में उत्तर हूँ, निहित दिगंता
जगत चेतना हूँ अनादि अनंता।।।


 

ना मन हूँ ना बुद्धि ना चित अहंकार
ना जिव्या नयन नासिका करण द्वार
ना मन हूँ ना बुद्धि ना चित अहंकार
ना जिव्या नयन नासिका करण द्वार

 ना चलता ना रुकता ना कहता ना सुनता
जगत चेतना हूँ अनादि अनंता
ना चलता ना रुकता ना कहता ना सुनता
जगत चेतना हूँ अनादि अनंता
ना चलता ना रुकता ना कहता ना सुनता
जगत चेतना हूँ अनादि अनंता
ना चलता ना रुकता ना कहता ना सुनता
जगत चेतना हूँ अनादि अनंता
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अर्थ
मैं न तो मन हूं‚ न बुद्धि‚ न अहांकार‚ न ही चित्त हूं
मैं न तो कान हूं‚ न जीभ‚ न नासिका‚ न ही नेत्र हूं
मैं न तो आकाश हूं‚ न धरती‚ न अग्नि‚ न ही वायु हूं
मैं तो मात्र शुद्ध चेतना हूं‚ अनादि‚ अनंत हूं‚ अमर हूं।

न च प्राणसंज्ञो न वै पंचवायुः
न वा सप्तधातुः न वा पंचकोशः
न वाक्पाणिपादं न चोपस्थपायु
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम ॥2॥

मैं न प्राण चेतना हूं‚ न ही ह्यशरीर को चलाने वालीहृ पञ्च वायु हूं
मैं न ह्यशरीर का निर्माण करने वालीहृ सात धातुएं हूं‚ और न ही ह्यशरीर केहृ पाँच कोश
मैं न वाणी हूं‚ न हाथ हूं‚ न पैर‚ न ही विसर्जन की इंद्रियां हूं
मैं तो मात्र शुद्ध चेतना हूं‚ अनादि‚ अनंत हूं‚ अमर हूं।

न मे द्वेषरागौ न मे लोभ मोहौ
मदो नैव मे नैव मात्सर्यभावः
न धर्मो न चार्थोन कामो न मोक्षः
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम ॥3॥

न मुझे किसी से वैर है‚ न किसी से प्रेम‚ न मुझे लोभ है‚ न मोह
न मुझे अभिमान है‚ न ईष्र्या
मैं धर्म‚ धन‚ लालसा एवं मोह से परे हूं
मैं तो मात्र शुद्ध चेतना हूं‚ अनादि‚ अनंत हूं‚ अमर हूं।

न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं
न मन्त्रो न तीर्थो न वेदा न यज्ञः
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम ॥4॥

मैं पुण्य‚ पाप‚ सुख और दुख से विलग हूं
न मैं मंत्र हूं‚ न तीर्थ‚ न ज्ञान‚ न ही यज्ञ
न मैं भोजन हूं‚ न ही भोगने योग्य हूं‚ और न ही भोक्ता हूं
मैं तो मात्र शुद्ध चेतना हूं‚ अनादि‚ अनंत हूं‚ अमर हूं।

न मे मृत्युशंका न मे जातिभेदः
पिता नैव मे नैव माता न जन्म
न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यं
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम ॥5॥

न मुझे मृत्यु का डर है‚ न जाति का भय
मेरा न कोई पिता है‚ न माता‚ न ही मैं कभी जन्मा था
मेरा न कोई भाई है‚ न मित्र‚ न गुरु‚ न शिष्य
मैं तो मात्र शुद्ध चेतना हूं‚ अनादि‚ अनंत हूं‚ अमर हूं।

अहं निर्विकल्पो निराकार रूपो
विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम्
न चासंगत नैव मुक्तिर्न मेयःव
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम ॥6॥

मै निर्विकल्प हूं‚ निराकार हूं
मैं विचार विमुक्त हूं‚ और सर्व इंद्रियों से पृथक हूं
न मैं कल्पनीय हूं‚ न आसक्ति हूं‚ न ही मुक्ति हूं
मैं तो मात्र शुद्ध चेतना हूं‚ अनादि‚ अनंत हूं‚ अमर हूं।

∼ आदि शंकराचार्य


Tuesday, September 14, 2021

शहीद सुखदेव - १० विशेष बातें

भारत के खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश के खिलाफ अपील

भारत के खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश के खिलाफ अपील

क्या आप जानते है :

1. भारत में 1 करोड़ 20 लाख छोटी बड़ी दुकानें हैं।

2. ये दुकानें देश के 120 करोड़ लोगों को एक वर्ष में 23 लाख करोड़ रूपये का माल खरीदती/बेचती हैं।

3. लगभग 3.5 करोड़ लोग इन दुकानों पर मालिक अथवा कर्मचारी के रूप में कार्यरत हैं तथा 1.5 करोड़ लोग इन दुकानों पर माल लाने/ले जाने व अन्य गतिविधियों में लगे हुए हैं।

4. इन 5 करोड़ लोगों के परिवार एवं साप्ताहिक बाजार (सोम बाजार, मंगल बाजार आदि-आदि) में लगे हुए लोगों की संख्या जोड़ ली जाए तो लगभग 26 करोड़ लोगों का जीवन यापन इन्हीं दुकानों पर निर्भर है।

5. भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) का लगभग 9 प्रतिशत इसी व्यापार से आता है।

भारत के व्यापार में विदेशी कम्पनियों की दस्तक

1. अमरिका, यूरोप आदि के विकसित देशों ने अपनी जीवन शैली इतनी विलासितापूर्ण एवं खर्चीली बना ली है कि इनका अपने देश में ही कमाई से गुजारा नहीं हो सकता, इसलिए दुनिया के दूसरे देशों के बाजारों पर कब्जा करके भारी कमाई करते हैं। इसी क्रम में इनकी सरकारें भारत सरकार पर दबाव डालकर यहां के बाजार विदेशी कम्पनियों के लिए खुलवा रहे हैं। अमरिका में आई मन्दी के बाद इस गति में तेजी आयी है।

2. वालमार्ट, टेस्को, केरीफोर आदि कम्पनियों ने अनेक देशों के करोड़ों दुकानदारों को व्यापार से बाहर करके उन देशों के 80 प्रतिशत तक व्यापार अपने कब्जे में कर लिया है।

3. भारत का 97 प्रतिशत व्यापार करोड़ों दुकानदारों के द्वारा ही किया जाता है। अभी तक इस व्यापार में विदेशी कम्पनियों को अनुमति नहीं मिली हुई है। किन्तु इन विदेशी कम्पनियों की गिद्ध दृष्टि लगातार हमारे व्यापार पर कब्जा करने के लिए लगी हुई है।

4. केन्द्र की यू.पी.ए. सरकार देश के कुछ प्रान्तों के हुए विधानसभा चुनावों उपरान्त अब विदेशी कम्पनियों को आने की अनुमति देने जा रही है।



विदेशी कपंनियों के क्या तर्क हैं :



1. विदेशी कम्पनियों के आने से उपभोक्ता को सस्ता एवं अच्छी गुणवत्ता का माल मिलने लगेगा।

2. इन कम्पनियों में नौकरी करके रोजगार के अवसर प्राप्त होंगे।

3. बिचौलियों से छूटकारा मिलेगा।

सच्चाई क्या है:

1. इन्हीं तको± के साथ देश के शीतल पेय के बाजार में कुछ वर्ष पूर्व पेप्सी कोला एवं कोका-कोला कम्पनी आई थी। आज स्थिति यह है कि शीतल पेय का 95 प्रतिशत बाजार इन कम्पनियों ने कब्जा करके देश के करोड़ों शीतल पेय निर्माताओं (केम्पा-कोला, स्थानीय ब्राण्ड वाले शीतल पेय, कन्चे वाली बोतल, जूस, गन्ने का रस, शिकञ्जी, सोड़ा, लस्सी, बेल का शरबत आदि-आदि) को बबाZद कर दिया।

2. ये कम्पनियां बिचौलियों को हटाने की बात करती है किन्तु स्वयं फिल्मी सितारों, खिलाड़ियों को सैकड़ों करोड़ रूपये तथा टेलीविजन चैनल को 1 लाख रूपये प्रति सेकण्ड की दर से विज्ञापन के लिए भुगतान करती है। क्या ये लोग बिचौलिए नहीं हैर्षोर्षो

3. अन्य देशों में इन कम्पनियों का इतिहास यह बताता है कि ये पहले तो सस्ता माल बेच कर वहां ही दुकानों को बन्द करवा देते है फिर ग्राहक को भी मनमाना लूटते है।

4. यूरोप में करीब 4 लाख दुकानें इन्हीं कम्पनियों के कारण बन्द हो गई है। अमरिका के किसानों की आय 10 प्रतिशत कम हो गई है। वालमार्ट ने अपना माल चीन से खरीदना शुरू कर दिया जिस कारण अमरिका का व्यापार घाटा बढ़ गया तथा 5 लाख लोग भी बेरोजगार हो गए। जर्मनी और दक्षिण कोरिया ने अपने दुकानदारों को बचाने के लिए वालमार्ट जैसी कम्पनियों को देश से बाहर निकाल दिया। चीन, थाईलैण्ड व मलेशिया की सरकारें इन कम्पनियों से बचने के लिए रास्ते तलाश रही हैं।

5. देश की संसद के द्वारा गठित संसदीय समिति ने दिनांक 8 जून 2009 को इस सम्बन्ध में विदेशी कम्पनियों को भारत में अनुमति दिए जाने का कड़ा विरोध करते हुए अपनी रिपोर्ट लोकसभा के पटल पर रखी थी। किन्तु उस रिपोर्ट को सरकार दरकिनार करके एक निजी एजेंसी की रिपोर्ट को महत्व दे रही है। इक्रियर नाम की इस एजेंसी ने देश भर में मात्र 2018 दुकानों का सर्वे किया है। यह एक संयोग है कि इस एजेंसी को विदेशी कम्पनियों के सबसे बड़े पेरोकार श्री मोण्टेक सिंह अहलूवालिया (योजना आयोग के उपाध्यक्ष) की धर्मपत्नी चलाती हैं।

भारत में खतरा क्या है :

1. देश में ज्यादातर दुकानदार स्वयं के द्वारा ही जुटाई गई बहुत कम पूञ्जी से अपना व्यापार चलाते हैं। दूसरी ओर बड़ी कम्पनियों को बहुत कम ब्याज पर बैंकों से बड़ी-बड़ी राशि मिल जाती है। इस कारण वे बड़ी कम्पनियों के साथ मुकाबले में वे टिक नहीं पाएंगे।

2. करोड़ों की संख्या में ये छोटे दुकानदार बेरोजगार हो जाएंगे। जिसके कारण हत्या, आत्महत्या एवं लूटपाट बढ़ेगी तथा देश में अनेक प्रकार के आर्थिक, सामाजिक एवं सुरक्षा सम्बन्धी संकट खड़े हो जाएंगे।

3. काण्ट्रेक्ट खेती के नाम पर ये कम्पनियां किसानों का भी भारी शोषण करेगी।

4. भारी मुनाफा कमाकर ये कम्पनियां देश का धन बाहर ले जायेगी।

सरकार से हमारी मांग

1. खुदरा व्यापार खोलने से पहले देश भर में इस मुद्दे पर सरकार की ओर से एक बहस चलायी जाए कि आम व्यापारी इस बारे में क्या सोचता है।

2. सिंगल ब्राण्ड रिटेलिंग के क्षेत्र में अभी तक जिन कम्पनियों को पिछले वषो± में अनुमति दी गई है उसके सम्बन्ध में अब तक देश को हुए लाभ हानि का लेखा जोखा (श्वेत पत्र) सरकार शीघ्र जारी करे। (जैसे शीतल पेय में कोका-कोला, पेप्सी-कोला, खाद्यान्न में कारगिल कम्पनी, आदि-आदि)

3. बड़ी कम्पनियों के आने से लगभग 17 करोड़ लोगोें की दुकानदारी एवं रोजगार बिल्कुल खत्म हो जायेगी, उनके पुनर्वास के लिए क्या योजना है।

4. दिनांक 28 जुलाई 2010 को दिल्ली के कंस्टीटयूशन क्लब में योजना आयोग के उपाध्यक्ष ने स्वीकार किया था कि कृषि से आजीविका चलाने वाले लोगों की संख्या घटानी पडेगी, लघु उद्योगों में ओर अधिक लोगों को रोजगार नहीं दिया जा सकता अपितु लोगों को निकाला जा रहा है। एक तरफ किसान आत्महत्या कर रहे है, दूसरी तरफ छोटे लघु उद्योगों को चीन का माल बबाZद कर रहा है तो ऐसी स्थिति में खुदरा व्यापार में भी विदेशी कम्पनियों को बुला कर करोड़ों लोगों को क्यों बबाZद किया जा रहा :



हमारा संकल्प

``लघु किसान- लघु व्यापार- लघु उद्योग

बचेगा तो - बचेगा देश - बचेगा देश´´

``घर-घर ले जाएंगे - हम यह सन्देश´´

आईये हम सब मिलकर प्रधानमन्त्री के नाम ज्ञापन पर अपने हस्ताक्षर करके स्वदेशी जागरण मंच द्वारा चलाए जा रहे हस्ताक्षर अभियान में सम्मिलित होकर करोड़ों लोगों के रोजगार की रक्षा करने में भागीदार बनें।

चीन का खतरा और समाधान - कश्मीरी लाल

चीन का खतरा evam samadhan

यदि ये पूछा जाये कि आजाद भारत का ऐसा कौन सा क्षण हे जिस पर आप सबसे ज्यादा गर्व कर सकते हे. इस के कई उत्तर हो सकते हे. पोखरण के विस्फोट से लेकर बाबरी ढांचा गिरने तक और कारगिल विजय से अन्ना हजारे की विजय तक कई उत्तर हो सकते हैं. लेकिन आजाद भारत के पूरे इतिहास को देखें तो बंग्लादेश पर विजय एक ऐसा उत्तर हे जिसपर काफी लोग सहमत हो जायेंगे. इस तेरह दिन के युद्ध में भारत ने पकिस्तान को बुरी तरह परास्त करके आत्म-समर्पण के लिए मजबूर किया. क्या नज़ारा था जब 16 दिसंबर 1971 को हमारे जेनेरल अरोड़ा ने पकिस्तान के जेनेरल निआज़ी को आत्मसमर्पण पत्र पर दस्तखत करने पर उनके 90 ,००० से ज्यादा भेद-बकरीओं की तरह इकट्ठे किये सैनिको को रिहा किया. अब अगर इससे बिलकुल उल्टा प्रश्न ये पूछा जाये कि आजादी के बाद का सबसे शर्मनाक समय कौन सा हो सकता है, तो इसके भी कई उत्तर हो सकते हे । संसद पर या ताज होटल पर हमले से लेकर नोट फॉर वोट जैसी घटना के कई शर्मनाक दिन गिनाये जा सकते हे. लेकिन एक उत्तर पर ज्यादातर लोगों कि सहमति होगी. वो होगी चीन से करारी हार. 1962 में चीन के हाथों ये बहुत ही शर्मनाक हार थी, और आज भी उसका स्मरण कर सर शर्म से झुकता है. कोई लोग तो उस दुर्घटना को याद भी नहीं करना चाहेंगे। इस हार के कारण क्या थे, इसको विष्लेषण करने के लिए एक समिति बनाई गई थी। उस रिपोर्ट पर चर्चा करके कुछ सबक सीखने की बात तो दूर, उस रिपोर्ट को आजतक सार्वजनिक ही नहीं किया गया।

हमने इस पराजय को एक घिसे-पिटे शब्द से छुपाने व पर्दा डालने की कोशिश की और वह शब्द है ‘‘धोखा’’। चीन ने हमारे साथ छल किया, फरेब किया ऐसा हमारे नेताओं ने कहा. 'हिन्दी चीनी भाई-भाई' के नारे लगाते-लगाते गला अभी सहज भी नहीं हो पाया था कि हमारा गला कोई घोंटने लगा । हमारे प्रधानमंत्री जी ने पंचषील के शांति के कबूतर छोड़कर और उनके सुखद फडफड़ाने के स्वर से आह्लादित हो आंखे बंद कर ली थी. अचानक हमारे इन शांतिदूत कबूतरों के गले से दबी चीख निकली और खून के छींटे नीचे गिरे। चीन के बाजों और चीलों ने उनपर झपट्टा मारके घायल कर दिया था। नेहरु लाचार थे. और सारा देश शर्मसार था. उनको कुछ समझ नहीं आ रहा की ये कैसे हो गया.



१.चीन का आक्रमण क्या अचानक हुआ था :हमारे कुछ रक्षा विषेषज्ञों ने इस सत्य को तथ्यों के साथ उजागर किया है कि ‘‘धोखे’’ का यह इल्जाम शंकास्पद ही नहीं, हास्यास्पद भी है। 'फन्नी' ही नहीं 'फाल्स' भी हे. समय रहते हम ने चीन के कुत्सित इरादों की और कभी गौर नहीं किया था. नेहरु जी की दुनिया में शांति का मसीहा बनाने की खोखली चाहत ने उन्हें कुछ समझने ही नहीं दिया. इतिहास गवाह हे की चीनी नेता माओत्से तुंग ने कई बार कहा था कि तिब्बत चीन के हाथ ही हथेली की मानिंद है और हथेली के साथ की पांच उंगलियां लद्दाख, सिक्किम, नेपाल, भूटान और नेफा है. लेकिन हमने कभी जियादा गौर नहीं किया था। 1950 के बाद के अपने नक्शों में चीन कोरिया, इंडोचीन, मंगोलिया, बर्मा, मलेषिया, पूर्वी तुर्किस्तान, नेपाल, सिक्किम, भूटान व भारत जैसे 11 देषों को अपनी सीमा में दिखाता रहा है. हमें तभी संभलना चाहिए था. लेकिन हमने गौर नहीं किया ।(भारत वर्मा , रक्षा विशेषज्ञ, चीन से भारत को आशंका, इंडियन डिफेन्स रेवियु , मई 2010 ) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया श्रीगुरू जी की भविष्यवाणी उसी समय की गई थी की चीन भारत पर हमला कर सकता हे . उसी समाया चीनी प्रधानमंत्री चायू एन लाई की भारत यात्रा के समय भारत हिंदी-चीनी, भाई-भाई के नारे लगा रहे थे । श्रीगुरू जी की चेतावनी भी अनसुनी कर दी गई - और फिर कहा गया कि धोखा हुआ है।



इस धोखे की बात को आज फिर याद करना पड़ेगा । कुछ विशेषज्ञों का मानना हे की चीन फिर भारत पर अगले साल हमला कर सकता हे. उन रक्षा विषेषज्ञों का अनुमान है कि चीनी विजय के 50 वर्ष 2012 में होंगे। इस स्वर्ण जयन्ति (गोल्डन जुबली ) को चीन भारत पर दुबारा हमला करके मनाएगा। इसके कारन भी बताये हे. चीन की अपनी घरेलू समस्याएं हैं, गरीब अमीर का अंतर बाद रहा हे । गाँव में आक्रोश हे की शहरों की चकाचोंध वहीं सिमट कर रह गई हे. और साड़ी दुनिया में लोकतंत्र की बयार उनके देश को नहीं छू रही. वो पहले की तरह तिनामिनान चौक पर अपने लोगों को टैंकों से रोंद कर 'श्मशान की शांति' पैदा करने से बचना चाहेगा। वह भारत पर आक्रमण करके अपनी जनता का ध्यान बढते हुए आक्रोश से हटा सकता है। भारत की समृधि की और बढ़त उसे फूटी आँखों सुहा नहीं रही. उसे भी अवरुद्ध करने वो हमला कर सकता हे. लेकिन क्या हमारी तैयारी है? क्या हम इसी भरोसे बैठे हैं की चीन व्यापारी बन गया हे और हमारे बाजार को छोड़ेगा नहीं, युद्ध तक नहीं जायेगा. यही बातें 1962 पहले भी नेतायों द्वारा कही जाती थी. हम इतिहास के गढ़े मुर्दे उखडने के आदी नहीं है, लेकिन इतना ही स्मरण करवाना चाहते है कि जो लोग इस कहावत को अक्सर भूलते है कि इतिहास अपने को दोहराते हैं और उससे सीख नहीं लेते वे पुनः लज्जा, शर्म सहने को अभिषप्त रहते है। हमारा ये जन जागरण अभियान एक चेतावनी सा हे. हम पूरे देश के सामने ये बात रखना चाहते हे की यदि युद्ध दुबारा होता हे तो क्या हमारी तेयारी हे. नेता इस मामले में चैन से सोते दिखाई दे रहे हैं.



हमारी सरकार को व जनता को लगातार इस खतरों को भांपना चाहिए था। हर बार पृथ्वीराज की तरह उदार होते-होते फिर स्वयं गिरफ्तार और आंखों से लाचार होने को अभिशप्त होना हमारी नियति नहीं होनी चाहिए. धोखा-धोखा चिल्लाने की बजाय कुछ और सोचना चाहिए. क्या अच्छा नही कि भारत शिवाजी महाराज की तरह पूर्व तैयारी में हो. धोखा देने वाला अफजल खां रूपी चीनी दैत्य स्वयम पेट की आंतडियां बाहर निकलते वक्त चिल्लाए 'फरेब', 'धोखा'। यदि भारत चैन की नींद न सोये तो यह बिलकुल हो सकता है. भारत को तेयार रहना ही चाहिए. .



2. चीन द्वारा पैदा किये गए संकट का कारण क्या हैं: हमें कई बार हेरानी होती हे की चीन बेशक हमारा सदा से पडोसी रहा हे और हमेश से ही एक ड्रेगन के स्वाभाव का देश रहा हे. दूसरों को अपने अधीन करने वाला मुल्क रहा हे. लेकिन हमारे इतिहास में एक भी घटना ये नहीं दर्शाती की चीन ने हमारे पर कभी कोई हमला किया हो. चंगेज़ खान नामक वहां का क्रूर हमलावर जहाँ कहाँ अपनी तलवार घुमाता रहा लेकिन भारत भूमि पर बिलकुल नहीं आया क्योंकि वो बौद्ध धर्म का मानाने वाला बताया जाता हे और महात्मा बुद्ध की भूमि को कैसे छेड़ता. इतिहासकार तो उसका नाम भी चंगेस हान बताते हे. तो फिर क्या हुआ की चीन ने सं 1962 में हमारे पर हमला बोल दिया और तब से लगातार हमारे प्रति शत्रुता दिखा रहा हे. वास्तव में चीन और हमारे बीच तिब्बत था, और 1950 से पहले कभी भी हमारी और चीन की सीमा आपस में मिलती नहीं थी. तिब्बत की बफर स्टेट बीच में गायब होते ही स्थिति गड़बड़ा गयी. ये गलती इस लिए हुई की तत्कालीन प्रधान मंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु चीन के इरादे नहीं भांप पाए थे और चीन को खुश करने के लिए एक से एक गलती करते गए जिसको आज तक भुगतना पड़ रहा हे. पंडित नेहरु "हिंदी चीनी भाई भाई " और " तीसरी दुनिया को अलग पहचान दिलाने " की हवाई नीतियों में मस्त रहे और चीन नयी से नयी चाले चलने में व्यस्त रहा. तिब्बत पर चीन से समझौता बहुत बड़ी भूल थी, और इसके बाद वो लगातार हिमालयन फ्रंटीयर के इलाके में फेलता गया और भारत अपने पैर समेटता गया ( . मोनिका चंसोरिया "चीन क विस्तार" "जौर्नल, सेंटर फॉर लैंड वार फैर स्टडीज़ )

चीन की रणनीति शुरू से यही रही की शक्ति बन्दूक की नाली से निकलती हे ना की शांति के प्रवचनों से. वैसे यदि हमने चीन के षड्यंत्रों को समझना हो तो चीन के एक पुराने राजनीतिक चिन्तक झून-जी (298 -238 ईसा पूर्व ) को समझना होगा. उसके तीन सिद्धांत चीन आज भी अनुसरण करता प्रतीत हो रहा हे. क्रमांक एक कि आदमी स्वाभाव से कुटिल और धूर्त होता हे. दुसरे कि संघर्ष और कलह में से ऐसी परिस्थितियाँ बनती हे जिसमें हर देश को उसका लाभ अपने हक में करने की कोशिश करनी चाहिए. और तीसरे यह के द्वि-पक्षीय संबंधो को कानूनी रूप देने से पहले अपनी हालत इतनी मजबूत कर लेनी चाहिए , जहाँ से उसका दब-दबा हमेश बरकरार रहे. अगर चीन और भारत के सम्बन्ध देखें जाएँ तो ये बातें बिलकुल खरी उतरती हे और चीन इन बातों का उपयोग अपने हक में करता स्पष्ट दिखाई देता हे. (नेहा कुमार, चीन से आणविक खतरा" इंडिया क्वार्टरली 65 ,2009 ) सन 1949 के बाद से ही चीन ने अपना चक्र-व्यूह रचना शुरू कर दिया था. चीन की चाल में फँस कर नेहरु ने तिब्बत जो की एक स्वतंत्र देश था, उसको चीन का अभिन्न अंग मानने की गलती कर ली. वास्तव में 1950 में तिब्बतियों ने भारत के साथ रहने और भारत का प्रोटेक्टोरत बनने की इच्छा जाहिर की. लेकिन विडम्बना देखिये कि नेहरु जी ने उदारता बरतते हुए उन्हें चीन का प्रोटेक्टोरत बनने की सलाह दी. इतना ही नहीं तो 1951 में उनकी एक संधि भी करवाई जिसमे तिब्बत की आन्तरिक स्वायत्ता और संस्कृति और स्वशाशन आदि कायम रहें गे, ऐसा कहा. और कहा की केवल संधि कर चीन की संप्रभुता तिब्बत स्वीकार कर ले. तिब्बत ने भारत के भरोसे ही यह संधि की थी. लेकिन भरोसे में मारा गया. जैसे ही 1955 के बाद चीन ने तिब्बत में अपनी सेना भेजनी शुरू की तो पंडित नेहरु को अपनी गलती का एहसास होने लगा. 1959 के आते आते चीन ने तिब्बत पर पूरी तरह कब्ज़ा कर लिया . यही वो दुर्भाग्यशाली साल था जब पूज्य दलाई लामा को तिब्बत छोड़ कर भारत की शरण लेनी पड़ी. यहाँ ध्यान रहे कि पंडित नेहरु ने चीनी विस्तारवाद का विरोध तो किया लेकिन यह विरोध केवल शब्दों तक ही सीमित था. भारत और चीन के बीच से एक बफर स्टेट तिब्बत के गायब होने से हमारे लिए भी मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा. इसके बाद चीन तिब्बत तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि वो पहले नेपाल, फिर भूटान, मंगोलिया आदि समीपवर्ती देशों पर अपनी पकड़ मजबूत करता गया.



3. एक गलती का एहसास होने पर क्या पंडित नेहरु सम्हल गए ? नहीं, बिलकुल नहीं. तिब्बत को हडपने के बाद चीन ने एक पर एक कब्जे करने शुरू कर दिए. पहले चीनी राष्ट्रपति चायू एन लाई ने कभी नहीं कहा की भारत के साथ चीन का कोई सीमा विवाद हे. लेकिन 1959 में तिब्बत पर कब्ज़ा पूरा होने के बाद चीन ने चिल्लाना शुरू किया कि भारत ने हमारी एक लाख चार हज़ार वर्ग किलो मीटर जमीन दबा राखी हे. दूसरी गलती और सुन लेनी चाहिए. पहला धोखा खाने के बावजूद भारत ने चीन से शांति खरीदने के मृगजाल में एक और गलती करदी. जब चीन संयुक्त राष्ट्र संघ का सदस्य नहीं था तो साम्यवादी देशो के इलावा भारत ही एक ऐसा देश था जिसने चीन कि सदस्यता के लिए प्रबल समर्थन किया था. और चीन ने इस उपकार का बदला दिया और 1962 में भारत पर बलात हमला कर दिया. इसी वक्त हमारी 38 ,000 वर्ग किलो मीटर जमीन पर कब्ज़ा कर लिया जो आजतक यथावत हे. (रिपोर्ट, तिब्बत डेली नोवंबर 2010 ). इतना ही नहीं तो उसने 5183 वर्ग किलोमीटर 1963 में पकिस्तान से ले ली. इसी जमीन पर महत्वपूर्ण कराकोरम पक्का मार्ग तेयार कर लिया. उसका पेट इससे भी नहीं भरा हे. उसने इल्जाम लगाया हे हे की भारत ने उसकी 90000 वर्ग किलोमीटर जमीन कब्ज़ा रखी हे. जो जो इलाके सामरिक दृष्टी से उसे उपयोगी लगते हैं, उनपर उसने अपनी उंगली टिका रखी हे. अब यदि तिब्बत सुरक्षित रहता तो चीन हमारा पडोसी बनकर हमारे पर लगातार दवाब नहीं बना सकता था. दूसरी बात हे जल विवाद की जो उसके बाद पैदा होने शुरू हुए . तिब्बत से ही ब्रह्पुत्र सहित और दस नदियाँ निकलती हे जिनसे 11 देशों की जलापूर्ति होती हे. अब ये सर्व विदित हे कि चीन उन नदियों के जल को अपने ढंग से मोड़ने का प्रयास कर रहा हे. चीन का उत्तर-पूर्वी हिस्सा सूखा हे और उसका तीन घाटियों वाला बाँध सूख रहा हे. इस लिए चीन इन नदियों का पानी उधर दे रहा हे. इसके लिए टनल और सुरंगों का जाल बिछाया जा रहा हे. दुःख का विषय हे की भारत सरकार ने अपने देश से इस बातको छुपा रहा हे. वैसे उपग्रहों के चित्र और अंतर-राष्ट्रीय प्रेक्षक और ऐसी पत्रिकाएं इन तथ्यों को नंगा कर रही ही. चीन की ये करतूते आने वाले दिनों में ये भारत के लिए ही नहीं तो विश्व के लिए एक संकट बनने वाला हे. (डॉ. भगवती शर्मा: चीन एक सुरक्षा संकट, पेज 13 )



४. नेहरु का पंचशील और आजके पंचशूल: हमने नेहरू के पंचषील के सिद्धांत की दुर्दषा होते देखी है - वह पंचषील हमारे लिए ‘पंचषूल’ बन गया और आज वे पांच शूल बहुत ही कष्ट दे रहे है . पहला शूल तो हे आर्थिक रूप से नुकसान. जो चीनी माल हमारे देष की दूकानों में अटे पड़े है। बचों के खिलोनो से लेकर पूजा के लिए लक्ष्मी गणेश कि प्रतिमा तक चीन निर्मित हे. होली का रंग भी चीन का, पिचकारी भी चीन की. दिवाली के चीन निर्मित पटाखे हमारे देश का दिवाला निकल के छोड़ें गे. हर साल चालीस हजार करोड़ रुपये हम चीन तो मुनाफे के रूप में दे रहे हे. बेरोजगारी भी इससे बढ रही हे. दूसरा नुक्सान पर्यावरण का हे. सारी दुनिया में आज पर्यावरण रक्षा की दुहाई दी जा रही हे. लेकिन पता हमें पता रहना चाहिए कि दुनिया का सबसे बड़े पर्यावरण विनाशको में से एक चीन है. बल्कि वो नंबर एक हे । दुनिया के सारे प्रदूषण का पांचवा हिस्सा यानि 21 प्रतिषत चीन फैला रहा है। तीसरा नुकसान चीन द्वारा हमारे देष में अराजकता फेलाना हे । माओवादी कहां से संरक्षण प्राप्त कर रहे हैं, उनको हथियार से लेकर ट्रेनिंग देने में चीन की बहुत बड़ी भूमिका हे. हमारे देश में लगभग 150 जिलो में मायो-वादियों का सिक्का चल रहा हे. और तो और - 'माओ' नाम ही उनके यहां से आया है . चौथा नुक्सान चीन कर रहा हे कि वो हमारे सभी पड़ोसियों को हथियार दे देकर और आर्थिक सहयोग करके उन्हें हमारे खिलाफ उकसा रहा है। पाकिस्तान, नेपाल, बंग्लादेष सभी को हमारे खिलाफ उकसाने का काम तो चीन कर ही रहा हे, उसने वहां अपनी सैनिक चोकियाँ बना ली हे। और पांचवा सीधा-सीधा चीन से सामरिक खतरा है। रक्ष विशेषज्ञों को प्राय ये लगता हे के चीन के सामने हम कहीं नहीं टिकते. संसद में 2007 में सरकार ने एक सवाल के जवाब में इस बात को माना की चीन बार बार हमारे यहाँ घुसपैठ करता हे. ये माना की अकेले इस साल के ग्यारह महीनो में चीन ने 146 बार घुसपैठ की हे. मोटा अनुमान हे की बासठ के युद्ध के बाद अबतक 1500 बार चीन ने हमारी सीमायों में घुसपैठ की हे. ये भी लगता हे के दुबारा चीन से युद्ध होने पर फिर शर्मनाक हार होगी. ये भी लगता हे के सरकार उसी तरह गुमराह हे, या मुगालते में हे जैसे पहले थी. हम उसको अपने देश में मार्केट देकर समझ रहे हे के चीन हमारे से युद्ध करके इस व्यापार को नहीं खोएगा. लेकिन हालत खतरनाक हे. अब तो चीन के शस्त्र भी नये-नये है। उधाहरण के लिए यदि चीन ब्रह्मपुत्र पर बनाए जा रहे बांध को ही कहीं विस्फोट से तोड़ता है तो बहुत बड़े हमारे भूभाग को सुनामी जैसी स्थिति में ला सकता है। यह कल्पना की उड़ान नहीं, कुछ वर्ष पूर्व पूरा हिमाचल ऐसी ही स्थिति में लाने का चीनी प्रयोग सफल रहा है। हमारी सरकार को व जनता को लगातार इस खतरों को भांपना चाहिए था. (भारत वर्मा , रक्षा विशेषज्ञ, चीन से भारत को आशंका, इंडियन डिफेन्स रेवियु , मई 2010 ). आईये इन पांचो खतरों रुपी शूलों को विस्तार से पहचाने.



पहला शूल: चीन का भारत पर आर्थिक हमला:



अभी इस 16 सितम्बर के दैनिक जागरण एवं दुसरे अखबारों में सुरक्षा सलाहकार का खुलासा चौकाने वाला हे. उसके मुताबिक चीन का खतरा अब देश की सीमाओं तक सीमित नहीं है। हमारी अर्थव्यवस्था के बहुत बड़े हिस्से पर उसका परोक्ष कब्जा हो गया है। लगभग 26 फीसदी औद्योगिक उत्पादन अब चीन से आयातित इनपुट या उत्पादों पर निर्भर है, यानी उसकी मुट्ठी में है। यह हैरतअंगेज निष्कर्ष राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार [एनएसए] का है। एनएसए सचिवालय ने चीन पर हाल में सरकारी विभागों को एक रिपोर्ट दी है।

इसके अनुसार चीन ने कई संवेदनशील क्षेत्रों में हमारी आत्मनिर्भरता पर दांत गड़ा दिए हैं। बिजली, दवा, दूरसंचार और सूचना तकनीक के क्षेत्रों में उसका दखल अब खतरनाक स्तर तक पहुंच गया है। इस रिपोर्ट के बाद विदेश मंत्रालय और आर्थिक मंत्रालयों में हड़कंप मचा हुआ है।

करीब आठ पेज की यह गोपनीय रिपोर्ट बेहद सनसनीखेज है। एनएसए ने इस साल मार्च में योजना आयोग और अगस्त में आर्थिक मंत्रालयों के साथ बैठक की थी। इसके बाद यह रिपोर्ट तैयार की गई है। रिपोर्ट में बताया गया है कि चीन की नीयत और नीतियां साफ नहीं है। वह दूरसंचार और सूचना तकनीक के क्षेत्रों में अपने दखल का इस्तेमाल साइबर जासूसी के लिए कर सकता है।

इस रहस्योद्घाटन ने सरकार के हाथों से तोते उड़ा दिए हैं कि अगले पांच साल में चीन हमारे 75 फीसदी मैन्यूफैक्चरिंग उत्पादन को नियंत्रित करने लगेगा। इस समय देश मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र का करीब 26 फीसदी उत्पादन चीन से मिलने वाली आपूर्ति के भरोसे है। एक देश पर इतनी बड़ी निर्भरता अर्थव्यवस्था को गहरे खतरे की तरफ ले जा रही है। रिपोर्ट के मुताबिक तमाम तरह की सब्सिडी और मौद्रिक अवमूल्यन के चलते चीन हमारी तुलना में 40 फीसदी सस्ता उत्पादन करता है, जिससे भारत की औद्योगिक प्रतिस्पतर्धा बुरी तरह टूट रही है।

चीन के असर से भारत की आत्मनिर्भरता को खतरे के कई उदाहरण इस रिपोर्ट में दर्ज हैं। हमारे उद्योग बिजली बचाने वाले सीएफएल लैंप के प्रमुख कच्चे माल [फास्फोरस] के लिए चीन पर पूरी तरह निर्भर हैं। हाल में फास्फोरस की कीमत बढ़ाकर चीन ने यहां के सीएफएल उद्योग की चूलें हिला दीं। स्टील और इसके उत्पादों में ही चीन की कीमतें यहां से 26 फीसदी कम हैं। हमारा दवा उद्योग भी कुछ बेहद जरूरी [फमर्ेंटेशन आधारित] कच्चे माल यानी और बल्क ड्रग के लिए पूरी तरह चीन के भरोसे है। घरेलू दवा उद्योग चीन से सस्ते आयात के चलते सालाना 2500 करोड़ रुपये का नुकसान उठा रहा है। कंपनियां चीन से आयातित पेनिसिलीन जी पर एंटी डंपिंग लगाने के लिए सरकार से गुहार लगा रही हैं।

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का निष्कर्ष है कि भारत में दूरसंचार उद्योग अपनी जरूरत के 50 फीसदी उपकरण आयात करता है, जिसमें चीन का हिस्सा 62 फीसदी है। बिजली परियोजनाओं के एक तिहाई ब्वॉयलर और टरबाइन जनरेटर चीन से आए हैं, जो भारत के मुकाबले 6 से 20 फीसदी सस्ते हैं। दूरसंचार और बिजली क्षेत्र में चीन के दखल को लेकर सुरक्षा चिंताएं चरम पर हैं। यही चिंता सूचना तनकीक उत्पादों को लेकर भी है, जिनका आयात का आकार 2020 तक पेट्रो आयात से ज्यादा हो जाएगा। चीन इन उत्पादों का दुनिया में सबसे बड़ा निर्यातक है, इसलिए भारत में प्रमुख सप्लायर है।



सिफ इतना ही नहीं तो आज हर तरफ हमारे बाज़ार चीनी माल से भरा पड़ा हे. 2001 तक चीन का भारत से व्यापार कोई खास नहीं था. भारत चीन को हर तरह से सुविधाएँ दे रहा हे. और 2010 तक भारत चीन व्यापार 62 अरब डालर का हो गया था, और 2011 ख़तम होते तक ये आंकड़ा 84 अरब डालर तक पहुँचाने वाला हे. इस व्यापार में दो हिस्से चीन के हे और एक हिस्सा भारत के, लेकिन इस में भी एक पेच हे. वो ये हे की हम जो बीस अरब डालर का माल चीन को देते हे वो कच्चा माल हे. इन बेश-कीमती खनिज पदार्थों में से भी साठ प्रतिशत तो कच्चा लोहा हे. अनुमान हे की यदि भारत इसी गति से लोह-अयस्क का निर्यात करेगा तो ये पचास साठ साल में बिलकुल ख़तम हो जायेगा. फिर जरूरत पूरी करने पर चीन से किस भाव खरीदेंगे, इसका नदाजा ही रोंगटे खड़े कर देता हे. दूसरा सामान जो चीन को हम भेजते हे वो कच्चा रबर हे. आज भारत दुनिया के तीन-चार बड़े रबर उत्पादक देशों में से एक हे. लेकिन त्रासदी ये हे की हम अपना रबर अनुदान देकर निर्यात करते हे. इस का नतीजा ये हे की चीन हमारा रबर सस्ते रूप में खरीदता हे. बस और ट्रक का टायर चीन इसी कारण भारत में 2000 से 3000 रुपये सस्ता बेचता हे. अब हालत ये की बड़ी-बड़ी भारतीय कम्पनिया भी चीन में कारखाना लगाने की सोच रहीं हैं . ऐसे ही वस्त्र उद्योग भी प्रभावित हो रहा हे. कपास भी बड़ी मात्र में चीन जा रही हे. फिक्की के सर्वे में आया हे की 74 पर्तिशत उद्यमियों को चीनी उत्पादों के कड़ा मुकाबला करना पड़ रहा हे. 62 फ़ीसदी उद्यमियों का मानना हे की चीन के सस्ते उद्पादों के कारण कभी भी उनको अपना कारखाना बंद करना पड़ सकता हे. यही हाल प्रिंटिंग या इंजिनीरिंग के उत्पादों का हे, और रसायनों का तो और भी बुरा हाल हे. आज की तारीख में 35 फ़ीसदी पवार प्लांट और टेलीफोन एक्सचेंज भी चीनी लग रहे हे. आर्थिक नुक्सान के साथ साथ एक बहुत बड़ा खतरा ये भी हे की टेलीफोन क्षेत्र में चीन का आना वैसे भी बड़ा संवेदनशील मुद्दा हे. चीन जब चाहे हमारे महत्वपूर्ण लोगो की बात जब चाहे टेप कर सकता हे, देश की सुरक्षा और गोपनीयता कहा बचेगी.चीन से बड़ी मात्र में हम मौसम जानने वाले संयंत्र आयात कर रहे हे. अब वो हमें मौसम का हाल बताएँगे, या यहाँ की गतिविधियों के चित्र अपने देश में पहुचाएंगे.



आज दुनिया में तकनीक समृद्ध करने की होड़ लगी हे. हमारे यहाँ बताते हे की अभी टेलकम में प्रथम जेनेरशन टेक्नोलोगी ही विकसित हुई, और दूसरी पीड़ी की टेलेकाम टेक्नोलोजी ही यहाँ विकसित नहीं हुई. और तीसरी की तो दूर दूर तक सोची नहीं. चीन, आपकी जानकारी के लिए, चौथी पीड़ी की टेक्नोलोजी विकसित करने में अमरीका से भी आगे बढ़ने की कोशिश में हे. अगर हम आपनी चीजो का उपयोग नहीं करेंगे, अपने यहाँ उत्पादन नहीं करेंगे तो हमेशा के लिए पिछड़ जायेंगे. कच्चा माल ही चीन को देकर खुश होंगे और तेयार माल कई गुना कीमत चुका कर लेते रहेंगे तो हालत बहुत बुरी होगी. ये नीति तो ईस्ट इंडिया कंपनी हमारे साथ आजादी से पहले करती थी. कहाँ तो हम अमरीकी और यूरोप के आर्थिक जाल से बचने की कोशिश कर रहे थे, और कहाँ एक नया फन्दा चीन का और पड़ गया. इसी बात से अनुमान लगा लीजिये की आर्थिक गुलामी चीन से कितनी हे. बच्चो के खिलोनो से लेकर टेक्सन के केलकुलेटर चीनी हे. दिवाली के पटाखों से लेकर 'लिनोवा' के कम्प्यूटर भी चीनी हे. मंदिर पर जगमगाने वाली बिजली की लड़ियों से लेकर पूजा में रखी गयी लक्ष्मी और गणेश जी की मूर्तियाँ भी चीनी हे. मोटा अनुमान हे की हर साल हम 40-50 हजार करोड़ रुपये का आर्थिक सहयोग मुनाफे के रूप में चीन का कर रहे हे. शत्रु देश का आर्थिक सशक्तीकरण करना अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारना ही होता हे. . कुछ समय पहले ही चीन ने जापान को दुनिया की दुसरे नंबर की सर्व-श्रेष्ट अमीर अर्थवयवस्था के स्थान से हटा कर अपना कब्ज़ा जमाया हे. वैसे भी चीन के सामान नुकसानदेह हे. चीनी दूध के उत्पाद दुनिया भर में प्रतिबन्ध का विषय बने हैं क्योंकि उनमे एक मेलामाइन नामक नुक्सानदेह औद्योगिक रसायन हे. खिलोनो के रंगों में भी घातक रसायन बच्चों के लिए खतरनाक हे. सस्ते जरूर होते हे चीनी सामान लेकिन इतनी जल्दी खराब होते हे की पूछिए नहीं. इस लिए लम्बे वक्त में कुल मिला कर चीनी उत्पाद महंगे ही पड़ते हे. बेशक ये एक चुटकला होगो पर चीनी वस्तुयों की हकीकत दर्शाता हे. एक लड़के ने किसी चीन की लडकी से शादी की और पांच-छे महीने बाद ही वो लड़की मर गयी. अफ़सोस करने वालों में से एक ने उसे यूँ धाडस दिलाया: भले मानस क्यों रोता हे, पांच छे महीने तो निकाल ही गयी आपकी चीनी पत्नी. ये क्या कम हे. और चीनी माल वैसे चलता ही कितनी देर हे," ऐसे में फिर क्यों खरीदना ऐसा चीनी सामान को. क्योंकी इससे सेहत का भी नुक्सान, जेब का भी नुक्सान और वातावरण का भी नुक्सान.





दूसरा शूल - चीन से पर्यावरण को खतरा: तिब्बत कभी दुनिया के सबसे पर्यावरण की दृष्टि से साफ़-सुथरे स्थानों में से एक था. लेकिन तिब्बत को हडपने के बाद उसने तिब्बत को न केवल सैनिक अड्डे बल्कि आणविक कचरादान के रूप में तब्दील कर दिया हे. ऐसा करने के लिए तिब्बत के घने जंगलो को उसने काटना शुरू कर दिया हे. तकरीबन 2.5 मिलियन वर्ग किलोमीटर में फ़ैली चीन के हरयाली और खूबसूरती को तहस-नहस कर दिया हे. यहाँ से निकलने वाली दस नदियाँ भारत ही नहीं बल्कि नेपाल, बंगलादेश, भूटान, पकिस्तान, थाईलैंड, बर्मा, विएतनाम, लोस और कम्बोडिया जैसे अन्य ग्यारह देशों का मेरुदंड हैं. ये न केवल उन देशों की पानी की जरूरत पूरी करती हे बल्कि उपजाऊ मिटटी भी इनके बहाव के साथ मिलकर इन देशों की फसल को उपजाऊ बनती हे. मोटे तौर पर इन नदिओं के तटों पर विश्व के करीब आधी आबादी बसती हे.( भारत-नीति प्रतिष्ठान ,'चीनी- विस्तारवाद' पेज 17.)



लेकिन पिछले चार दशकों से इन देशों का मौसम चीन के कारण से बुरी तरह प्रभावित हुआ हे. अगर चीन के द्वारा सैनिक समीकरण के नाम पर तिब्बत की पहाड़ों पर बड़े-बड़े डैम बनाये जाते तो प्रत्यक्ष नुक्सान तो भारत को होगा, पर चीखे गी दुनिया भी. लेकिन इससे भी खराब बात हे के तिब्बत के एक हिस्से को आणविक अवशेष में तब्दील कर दिया गया हे. इससे ये परमाणु का कचरा मुहाने के भारतीय खेत खलिहानों और लोगों के घरों तक पहुँच रहा हे. यहाँ ये बात बताने की हे के कभी दलाई लामा ने विश्व शांति के लिए इस क्षेत्र को 'आणविक-मुक्त क्षेत्र' घोषित करने की बात 1980 के दशक में कही थी. वैसे भी चीन दुनिया के सबसे प्रदूषण फैलाने वाले देशों में अग्रणी हे. दुनिया का पांचवा हिस्सा परदुषण यानी 21 अकेला चीन ही फैला रहा हे. विश्व की सर्वाधिक प्रदुशंकारी ग्रीन हाउस गसों का उत्सर्जन चीन ही कर रहा हे. दुनिया में इस बात की काफी चर्चा हे, और चीन की प्रोद्योगिकी इतनी प्रदुषण पैदा करने वाली हे. ये बाते लोगों के जेहन में बिठाई जाती हे तो चीन देश द्वारा बनाई चीज़ों का बहिष्कार लोग सरलता से कर देंगे.परन्तु साथ में भारत सरकार की एक और बहुत बड़ी गलती ही नहीं बल्की पाप का जिक्र हम करना चाहेंगे. अभी दो साल पहले पर्यावरण पर संपन्न कोपेंगेहन वार्ता में cheen का साथ उस समाया दिया jab वह अंतर-राष्ट्रीय jagat mein kopbhaajan ban raha tha.





हिंद स्वराज के मूल गुजराती रूप का हिंदी और अंग्रेजी में रूपांतरण



हिंद स्वराज पुस्तक का नए (पुराने) रूप में लोकार्पण कार्यक्रम:



ब्रिटिश की कंपनी द्वारा अदरख का पटेंट होने से बच गया हिंदी व इंग्लिश

ब्रिटिश की कंपनी द्वारा अदरख का पटेंट होने से बच गया हिंदी व इंग्लिश
dinank 4 janwari 2012:दिनांक ४ जनुअरी २०१२: सारांश: एक इंग्लैंड की कंपनी ने सन २००६ में एक अर्जी दी थे