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Tuesday, September 14, 2021

Odisha Resolution 1 (H) बौद्धिक संपदा अधिकारों पर अमेरिकी चेतावनी, मात्रा एक दिखावा

Odisha Resolution 1 (H)
बौद्धिक संपदा अधिकारों पर अमेरिकी चेतावनी, मात्रा एक दिखावा
विश्व की ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था में बौद्धिक संपदा अधिकारों ने विश्व व्यापार संगठन के अन्तर्गत सन् 1995
में WTO समझौता होने के पश्चात एक महत्वपूर्ण स्थान ग्रहण कर लिया है। अमेरिका की सकल आय का 35ः और
यूरोपीय यूनियन की सकल आय का 39ः हिस्सा बौद्धिक सम्पदा आधारित व्यवसायों पर आधारित एवं उनसे प्राप्त
होने के कारण अमेरिका और यूरोपीय यूनियन के लिए यह एक गम्भीर मुद्दा बन गया है। इसलिए पश्चिमी देशो की
ओर से भारत सहित अन्य विकासशील देशों पर इन देशों में लागू घरेलू बौद्धिक संपदा अधिकार कानूनों में उनके हित
में बदलाव करने का लगातार भारी दबाव है। वर्तमान समय में भारत सरकार द्वारा बौद्धिक संपदा अधिकार नीति बनाए
जाने की प्रक्रिया चलने और देश में लागू पेटेन्ट कानूनों में, विशेषकर निम्न 3 या 4 मुद्दों में भारत सरकार द्वारा
बदलाव न किए जाने पर बडी दवा कम्पनियों के दबाव में अमेरिका द्वारा आर्थिक प्रतिबन्धों की धमकी के वातावरण में
यह मुद्दा अत्यंत सम्वेदनशील हो गया है -

1. पेटेंट कानून, 1990 की धारा 3३ (डी) जिसके अन्तर्गत नोवार्टिस, स्विट्जरलैंड की औषधि के फर्जी आविष्कार
की पेटेंट मान्यता रद्द की गई थी और माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा उक्त प्रावधान को ज्त्प्च्ै समझौते के पूर्ण
रूपेण अनुरूप मानते हुए मान्य किया गया था।

2. अनिवार्य लाइसेंसिग से सम्बन्धित प्रावधान, विशेषकर ‘नाटको’ कम्पनी को कैन्सर की दवा के उत्पादन की
अनुमति दिए जाने के कारण, क्योंकि यह दवा जर्मनी की ‘बेयर’ कम्पनी द्वारा अत्यंत मंहगे दामों पर बेची जा रही थी।

3. दवाईयों से सम्बन्धित तथ्यों की गोपनीयता रखने की अवैधानिक मांग जोकि ट्रिप्स समझौते की धारा 39.3 के
अन्तर्गत भारत सरकार के औषधि नियंत्राण प्राधिकरण को सार्वजनिक स्वास्थ्य और मानवीयता के आधार पर उक्त
दवाईयों के परीक्षण नतीजे भारतीय जेनरिक दवा कम्पनियों के साथ साझा करने से रोकती है।

इन मुद्दों के अलावा भी भारत सरकार को भारतीय पेटेंट कानून के वर्तमान में लागू अन्य प्रावधानों जिसमें पेटेंट
दिए जाने से पूर्व विरोध दर्ज करना शामिल है, के सम्बन्ध में समझौता नहीं करना चाहिए। इसके अतिरिक्त, भारत
सरकार को ट्रिप्स समझौते के वर्तमान में लागू अनेक अहितकारी प्रावधानों की पूर्ण समीक्षा एवं विश्व व्यापार संगठन के
सभी सम्बन्धित मंचों पर पर्यावरण एवं अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में नवीन टैक्नोलोजी की सुगम उपलब्धता के साथ साथ इस
सम्बन्ध में पुनः चर्चा की मांग करनी चाहिए। हमें शराब आदि उत्पादों से आगे बढ कर, दार्जिलिंग चाय, बासमती
चावल, टैक्सटाइल उत्पादों और भारत के बहुत सारे अन्य मूल कृषि उत्पादों की भौगोलिक पहचान के संरक्षण की
विशेष मांग करनी चाहिए।

हमें हमारी जैव विविधता, पारम्परिक ज्ञान और लोक गीत के संरक्षण हेतु भी वर्तमान में चल रहे दोहा प्रस्तावों के
कार्यान्वयन के दौरान बिना चर्चा में नए बिन्दु जोडें, मांग करनी चाहिए।

भारत सरकार को नवोन्वेषण एवं सष् जनात्मकता की वृद्धि हेतु इस देश के वैज्ञानिकों और कारीगरों को उचित सम्मान
देते हुए शोध एवं विकास पर किए जाने वाले सरकारी खर्च को बढाना चाहि

Sunday, February 15, 2015

हमारे देश का दवा उद्योग दुनिया के गरीबों की आस

दुनियाभर में कमजोर वर्ग की आस भारत का दवा उद्योग।
वैसे तो 21 मई को संयुक्त राष्टसंघ द्वारा योग को अंतर्राष्ट्रीय दिवस घोषित करने से दुनिया का बहुत बड़ा भला होने वाला है। फिर भी अंग्रेजी या ऐलोपैथिक दावा के क्षेत्र में भारत का बहुत बड़ा योगदान है। कैसे जानिये एक समाचार द्वारा।
जनवरी 2014 से जनवरी 2015 तक के 13 महीनों में भारतीय अरबपतियों की कुल संपत्ति में 4,64,067 करोड़ रुपए की वृद्धि हुई। इसमें सबसे बड़ा योगदान दवा उद्योगपतियों का रहा। इन सबका धन इसलिए बढ़ा, क्योंकि उनके शेयरों में विदेशी संस्थागत निवेशकों ने खूब निवेश किए। जानकारों ने इसे अनेक चुनौतियों के बावजूद भारतीय दवा उद्योग की संभावनाओं में निवेशकों के कायम भरोसे का प्रमाण माना। यानी दुनियाभर के बाजारों में सस्ती दवा उपलब्ध कराने वाली भारतीय दवा कंपनियों की साख कायम है। ये दवाएं न सिर्फ अफ्रीका और अन्य विकासशील देशों में, बल्कि अमेरिका में भी कमजोर वर्ग के मरीजों की आस बनी हुई हैं। नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री जोसेफ स्टिगलिट्ज ने पिछले हफ्ते लिखे लेख में यहां तक कहा कि अगर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को अपने बहुचर्चित हेल्थकेयर प्रोग्राम की सफलता सुनिश्चित करनी है, तो उन्हें भारतीय दवा उद्योग पर नकेल कसने की कोशिशों से बाज़ आना चाहिए। गौरतलब है कि पेटेंट संबंधी जिन भारतीय कानूनों की वजह से हमारी कंपनियां सस्ती दवाएं मुहैया कराने में कामयाब हुई हैं, उन्हें बदलवाने के लिए अमेरिकी कंपनियां अभियान चलाती रही हैं और ओबामा प्रशासन उनकी तरफ से भारत पर दबाव डाल रहा है।
ये कानून 1970 के दशक में बने, जिनसे उन्नत और कारगर जेनरिक दवाओं के उत्पादन का रास्ता खुला। वैश्विक पेटेंट व्यवस्था विश्व व्यापार संगठन के तहत ट्रिप्स समझौते के 2005 में लागू होने से बदली। फिर भी कई मामलों में भारतीय कंपनियों के लिए जेनरिक दवाओं का उत्पादन मुमकिन बना रहा। ये औषधियां पेटेंट-अधिकार रखने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों की दवाओं की तुलना में कितनी सस्ती होती हैं, इसकी एक मिसाल हेपेटाइटिस-सी की दवा सोवाल्डी है। अमेरिका में इसकी पेटेंटेड दवा के पूरे कोर्स पर 84,000 डॉलर खर्च होते हैं, जबकि भारतीय कंपनियां उसका जेनरिक संस्करण 1,000 डॉलर में उपलब्ध कराती हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पिछली अमेरिका यात्रा के दौरान दोनों देशों में भारत की पेटेंट नीति के पुनर्मूल्यांकन पर सहमति बनी थी। स्वाभाविक रूप से इससे दुनियाभर में चिंता पैदा हुई, लेकिन निवेशकों ने जैसा भरोसा भारतीय कंपनियों में दिखाया है, उससे उम्मीद बनती है कि भारतीय सफलता की ये शानदार कहानी आगे भी जारी रहेगी। एनडीए सरकार को इसे अवश्य सुनिश्चित करना चाहिए

Wednesday, December 31, 2014

Odisha Resolution 1 (H) बौद्धिक संपदा अधिकारों पर अमेरिकी चेतावनी, मात्रा एक दिखावा

Odisha Resolution 1 (H)
बौद्धिक संपदा अधिकारों पर अमेरिकी चेतावनी, मात्रा एक दिखावा
विश्व की ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था में बौद्धिक संपदा अधिकारों ने विश्व व्यापार संगठन के अन्तर्गत सन् 1995
में ज्त्प्च्ै समझौता होने के पश्चात एक महत्वपूर्ण स्थान ग्रहण कर लिया है। अमेरिका की सकल आय का 35ः और
यूरोपीय यूनियन की सकल आय का 39ः हिस्सा बौद्धिक सम्पदा आधारित व्यवसायों पर आधारित एवं उनसे प्राप्त
होने के कारण अमेरिका और यूरोपीय यूनियन के लिए यह एक गम्भीर मुद्दा बन गया है। इसलिए पश्चिमी देशो की
ओर से भारत सहित अन्य विकासशील देशों पर इन देशों में लागू घरेलू बौद्धिक संपदा अधिकार कानूनों में उनके हित
में बदलाव करने का लगातार भारी दबाव है। वर्तमान समय में भारत सरकार द्वारा बौद्धिक संपदा अधिकार नीति बनाए
जाने की प्रक्रिया चलने और देश में लागू पेटेन्ट कानूनों में, विशेषकर निम्न 3 या 4 मुद्दों में भारत सरकार द्वारा
बदलाव न किए जाने पर बडी दवा कम्पनियों के दबाव में अमेरिका द्वारा आर्थिक प्रतिबन्धों की धमकी के वातावरण में
यह मुद्दा अत्यंत सम्वेदनशील हो गया है -

1. पेटेंट कानून, 1990 की धारा 3३ (डी) जिसके अन्तर्गत नोवार्टिस, स्विट्जरलैंड की औषधि के फर्जी आविष्कार
की पेटेंट मान्यता रद्द की गई थी और माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा उक्त प्रावधान को ज्त्प्च्ै समझौते के पूर्ण
रूपेण अनुरूप मानते हुए मान्य किया गया था।

2. अनिवार्य लाइसेंसिग से सम्बन्धित प्रावधान, विशेषकर ‘नाटको’ कम्पनी को कैन्सर की दवा के उत्पादन की
अनुमति दिए जाने के कारण, क्योंकि यह दवा जर्मनी की ‘बेयर’ कम्पनी द्वारा अत्यंत मंहगे दामों पर बेची जा रही थी।

3. दवाईयों से सम्बन्धित तथ्यों की गोपनीयता रखने की अवैधानिक मांग जोकि ट्रिप्स समझौते की धारा 39.3 के
अन्तर्गत भारत सरकार के औषधि नियंत्राण प्राधिकरण को सार्वजनिक स्वास्थ्य और मानवीयता के आधार पर उक्त
दवाईयों के परीक्षण नतीजे भारतीय जेनरिक दवा कम्पनियों के साथ साझा करने से रोकती है।

इन मुद्दों के अलावा भी भारत सरकार को भारतीय पेटेंट कानून के वर्तमान में लागू अन्य प्रावधानों जिसमें पेटेंट
दिए जाने से पूर्व विरोध दर्ज करना शामिल है, के सम्बन्ध में समझौता नहीं करना चाहिए। इसके अतिरिक्त, भारत
सरकार को ट्रिप्स समझौते के वर्तमान में लागू अनेक अहितकारी प्रावधानों की पूर्ण समीक्षा एवं विश्व व्यापार संगठन के
सभी सम्बन्धित मंचों पर पर्यावरण एवं अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में नवीन टैक्नोलोजी की सुगम उपलब्धता के साथ साथ इस
सम्बन्ध में पुनः चर्चा की मांग करनी चाहिए। हमें शराब आदि उत्पादों से आगे बढ कर, दार्जिलिंग चाय, बासमती
चावल, टैक्सटाइल उत्पादों और भारत के बहुत सारे अन्य मूल कृषि उत्पादों की भौगोलिक पहचान के संरक्षण की
विशेष मांग करनी चाहिए।

हमें हमारी जैव विविधता, पारम्परिक ज्ञान और लोक गीत के संरक्षण हेतु भी वर्तमान में चल रहे दोहा प्रस्तावों के
कार्यान्वयन के दौरान बिना चर्चा में नए बिन्दु जोडें, मांग करनी चाहिए।

भारत सरकार को नवोन्वेषण एवं सष् जनात्मकता की वृद्धि हेतु इस देश के वैज्ञानिकों और कारीगरों को उचित सम्मान
देते हुए शोध एवं विकास पर किए जाने वाले सरकारी खर्च को बढाना चाहि

Concept Paper on IPR

Intellectual Property Rights (IPR) is playing a vital role in the present era of knowledge based economy and particularly so under the WTO regime through the TRIPS Agreement. India has vast resource of intellectual capital including our traditional knowledge and our biological resources. We also have good research institutions, but due to lack of proper awareness and due to our social values and ethics, we have not been able to monetise and optimise the value of our intangible or intellectual assets. Our National IPR Policy adopted by Indian Cabinet on 12th June 2016 has mentioned about developing a strong IP Eco System, which speaks about creation, protection, enforcement, commercialisation of IPR and to educate our scientists and students about the legal framework for getting registration and for transfer of technology by patenting and so on.

The global Intangible wealth is about 80 per cent of the total economic wealth and more than one third of the GDP of US and Europe comes from IP intensive industry. Therefore it is essential that the economy of our country needs to grow through transformation and innovation and for this we need to develop a strong IP Eco system. USA keeps on threatening for imposition of article 301 and there are several issues due to which our Pharma companies are asked to pay for infringement of their patent rights and several restrictions are imposed for compulsory licensing. The lack of knowledge is causing tremendous amount of technology leakage and brain drain from our country by virtue of which our own research is recycled and we are bound to pay hefty amount for royalty and technical fees which is a big drain on our precious foreign exchange.

Therefore there is a need to identify and inventories our vast knowledge resource whether it is in the form of copyrights, or industrial designs or traditional knowledge or geographical indications (GI). We have developed a traditional knowledge digital library but we need to develop more such intellectual resource. IP and Innovation is the key to make India strong and resourceful in the 21st Century. 

It would be very good if We develop an organisation to be named as “Baudhik Sampad Parishad” or Intellectual Resource Centre (IRC) within Sangh Parivar to develop a strong network for all the IP Professional, it can help to protect and create huge amount of intellectual capital in the country.

Warm Regards

Dr.Dhanpat Ram Agarwal

National Co-Convener, Swadeshi Jagaran Manch

dr.agarwal@iitrade.ac.in

+91 98300 41327


Friday, April 29, 2011

भूमि अधिग्रहण का मामला - कृपया हमारा सहयोग करें



मान्यवर,नमस्कार।जैसाकि आपको विदित ही है कि पिछले कुछ समय से भूमि अधिग्रहण का मुद्दा विकास, खाद्य सुरक्षा और लोगों के कल्याण पर दुरगामी दुष्प्रभावों के मद्देनज़र काफी विवादों में है। हमारे देश में भूमि का एक भावात्मक मूल्य है और यह व्यक्ति और परिवार की पहचान का भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसलिए लोग, विशेषतौर पर ग्रामीण पृष्ठभूमि के लोग भूमि के प्रति अधिक जुड़ाव रखते है। 1991 में नयी आर्थिक नीति के लागू होने के बाद, और विशेष तौर पर सेज अधिनियम 2005 के आस्तित्व में आने से कृषि भूमि का एक बहुत बड़ा हिस्सा राज्य सरकारों द्वारा विकास के नाम पर ले लिया गया और उसे विभिन्न कॉपोरेट घरानों को सौम्प दिया गया। ऐसा माना जाता है कि सेज बनाने के उद्देश्य से बड़ी संख्या में गांवों में रहने वालों लोगों को विस्थापित करते हुए अभी तक लगभग 1.5 लाख हेक्टेयर भूमि अभी तक अधिग्रहित की जा चुकी है या वहां अधिग्रहण की प्रक्रिया चल रही है। कई राज्यों में यह भी देखने को मिलता है कि वहां अभी मुआवजे की भी कोई विस्तृत पद्वति वहां नहीं बनी है और न ही वहां कोई सन्तोषजनक पुनर्वास का कोई तरीका खोजा गया है और इस प्रकार से ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लाखों भारतीय, जिनका जीवन कृषि पर आधारित है, को बिना किसी आसरे छोड़ दिया गया है। पिछले कुछ वषो± से हमारे देश में खाद्यान्नों का उत्पादन 210 मिलियन मिट्रिक टन और 230 मिलियन मिट्रिक टन के बीच छुल रहा है, जिसके कारण हमारी प्रति व्यक्ति खाद्यान्न उपलब्धता 436 ग्राम प्रति दिन के स्तर पर पहुंच चुकी है, जो देश की खाद्य सुरक्षा के लिए एक खतरे की घण्टी है। हमारी बड़ी जनसंख्या और विशेष तौर पर युवा जनसंख्या की खाद्य आवश्यकताओं के मद्देनज़र हम लगातार विदेशों पर आयात पर निर्भर नहीं हो सकते। इसलिए भूमि खाद्य सुरक्षा की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण परिसम्पत्ति है। भारत एक महत्वपूर्ण आर्थिक शक्ति के रूप में उभर रहा है। इसलिए इसके औद्योगिक विकास की आवश्यकताओं को भी नज़रअन्दाज नहीं किया जा सकता। इसलिए भूमि अधिग्रहण नीति बनाते हुए हमें विकास और जन कल्याण दोनों के बीच में एक सामञ्जस्य बिठाना होगा। इस सन्दर्भ में स्वदेशी जागरण मंच आपके मूल्यवान सुझावों का महत्व समझते हुए आप से भविष्य में सूचनाओं के आदान प्रदान की अपेक्षा तो रखता ही है, साथ ही साथ आप से मिलकर काम करने की अपेक्षा भी रखता है। हम इस सम्बन्ध में भूमि, विधि एवं विधि तन्त्र से सम्बन्धित विषयों को लेते हुए एक योजना के मध्य में हैं। हम भूमि, उससे सम्बन्धित कानून और व्यक्तियों के भूमि से सम्बन्ध के विषय विशेष पर कार्यरत व्यक्तिओं और संगठनों से सम्पर्क साध रहे हैं ताकि उनके विचारों, दृष्टिकोण और अनुभव का लाभ उठा सके।इसलिए हम आपसे निवेदन करते है कि आप इस विषय से सम्बद्व अपने लेखों, विज्ञप्तियों, जानकारियों तथा प्रकाशनों इत्यादि हमसे साझा करे जिससे उपरोक्त विषय पर अधिक से अधिक जानकारियां प्रभावी ढंग से इक्कठा की जा सके।आपके साथ इस विषय के सम्बन्ध में काम करने के आकांक्षा के साथ,धन्यवाद।
आपका शुभाकांक्षी

Monday, April 25, 2011

स्वदेशी जागरण मंच के नाम से जो गलत खबर लगी थी, आज प्रधान मंत्री कार्यालय में उसका खंडन भेज दिया है, और मंच ने स्पष्ट किया है की हम जल्दी से जल्दी एन्डोसल्फान पर पूरे देश में प्रतिबन्ध चाहते है। वैसे भी प्रधान मंत्री को स्पष्ट किया की खेती के नाम पर केमिकल का जो जहर देश में फेलाया जा रहा है, उसका एक ही विकल्प है और वह है ओर्गानिक खेती। और स्पष्ट भी किया की अभी तक के सरकारी प्रयास काफी कम है।



हमें पता ही होगा की दुनिया के ६३ देशों में एन्डोसल्फान पर प्रतिबन्ध लगा है, और आस्ट्रलिया जो को इस बात को नहीं मानता था की प्रतिबन्ध लगाना चाहिए, उसने भी गत साल लगा दिया है, और पूरा ख़तम करने के लिए २ साल का समय तय किया है। केरला के कासरगोड जिले में तो इसके भयानक परिणाम देखने को मिल रहे है, और बच्चो के इस कारन से ऐसे विकराल रूप देखने को मिल रहे है, की देख कर चीख निकल आये।



स्वदेशी जागरण मंच की केरल इकाई ने तो इस विषय को लेकर पहले भी आन्दोलन, धरना, प्रस्ताव आदि, जो कुछ भी फ़ो सकता है किया है। लेकिन आज तो बहुत अच्छी बात है की केरल के मुख्य मंत्री ने इस विषय को लेकर और एन्डोसल्फान को पूरे भारत में प्रतिबंधित करने के लिए स्वयं धरना दिया है। मेरे हिसाब से किसी मुख्य मंत्री का कृषि के विषय को लेकर स्वयं धरने देने की पिछले एक साल में दूसरी घटना है। इस से पहले मध्यप्रदेश के मुख्य मंत्री शिव राज सिंह चौहान ने भी किसानो के विषय को लेकर धरना दिया था।



हमें भी इस विषय पर विचार करना चाहिए और इस और इस जैसे अन्य जहरों के बारे जनता को जानकारी देने के लिए कोई न कोई कार्यक्रम लेना चाहिए। आप का बहुत धन्यवाद कार्यक्रम करने से पहले ही.

Sunday, September 5, 2010

स्वदेशी मेले


Swadeshi Melas
Recently I visited three Swadeshi Melas in the लास्ट month and I was overjoyed to see the participation of common masses in these Melas. First of all I went to the Jamshedpur Mela held in Mazdoor Grounds. Vandeshanker ji with his team of workers was full of enthusiasm to see the rush of people participated, purchasing, and giving the positive reactions regarding it. About 150 kiosks were spread over in the ground and on the final day several dignitaries were on the dais to discuss the plight of Swadeshi movement and its necessity in the period of globalization. Some seven to eight kiosks belonged to garments and say khadi garments. Two or three big shops were there which I have never seen anywhere in Swadeshi Melas and these belonged to furniture prepared of marble. After the popularization of herbal products by Baba Ramdev and other preachers, there was a mushroom growth of stalls having such indigenous medicinal stuffs. Oh, I shouldn’t forget to mention the stall where plants of ayurvedic herbs were sold in earthen pots alongwith supporting literature, in order to popularize the indigenous medicines. About 5000 persons visited the mela on that particular day. Anyhow, in all this din and cry of kiosks, the organizers were not forgetting the distribution of Swadeshi/Videshi products’ list to all the visitors.

Second Mela I visited also belongs to Jharkhand and it was held at Bokaro Steel City, and though comparatively slender in kiosks and visitors compared to the above mentioned Mela, has several strong points to its credit. The number of volunteers or activists of SJM who were conducting all the activities surpasses any other Mela, to the best of knowledge and belief. The stalls of eatables have a specialty of its own and there is always seen good rush at the kiosk of litti-chokha there. The public programme where Deputy Commissioner, local MP, Pashupatinath Singh and one of the highest official of the Steel plant, all sat on the dias and spoke well about the Swadeshi Mela and appreciated this effort of popularizing local products and swadeshi thinking. The young DC Satyendra Singh was much lauded when he lambasted the Chinese policy of flooding and dumping our market with their products and appealed people to boycott such products. It amused everybody when Prant Sanghchalak Jagannath Shahi while giving his presidential remarks said that he had neither visited any fair in his childhood nor in youth, and it is at this fag end of life that I have visited this Swadeshi Fair and the credit goes for it to SJM. Anyhow I appreciated the efforts of organizers, especially Sachindra Badiar and Deepak shuklaji, in the sense that such public dignitaries are called at one stage to ponder over the ill effects of globalization and how to inculcate the indigenous spirit among the masses. I was especially attracted towards one kiosks where locally prepared swords and knives were sold.

And the third Mela I visited on 10th Jan was Raipur Mela of Chhatisgarh. It topped the all in number of participants and visitors and kiosks. On Sunday we could not muster the courage to visit it alongwith Rajendra Dube because of messages coming to him that all roads leading to Mela were blocked by people’s rush. Everyday they invite some particular community to organize the cultural stage show and happily that day belonged to punjabi Sabha. I got a flavour of Punjab in their exhibition of swords, lathi demonstration and other activities and a jubliant crowd was giving a big hand in clapping over every event presented. Really a mega event it was to bring different sections of people at one vantage point of Mela. I was particularly impressed to see two big canopies where one Slam Bhai’s stalls exhibited and it was really a big attraction in the Mela. One stall of eatables run by local Jail inmates was also attracting people. One surprising factor was that wherever we went in the Mela, but one of the enthusiastic organizer Parveen Jain was found there, he was really, say, omnipresent. What created jubilation in me was one other incident. One organizer was announcing on the mike that owner of one particular stall has been caught selling some Chinese products and so all his paraphernalia has been confiscated. The spirit of Swadeshi was at its height among the audience.

Arvind Singh, senior office bearer of CBMD proudly said that with this Raipur Mela, the charming number of 150 melas in the country had been achieved, and this number is excluding a dozen or more Swadeshi Mela which have directly arranged by independent local SJM activists and Bokaro’s Mela you know is one of them The spirit with which Lokmanya Balgangdhar Tilak started this concept of Ganesh Chaturthi procession is reverberating clearly in these Swadeshi Melas.