Monday, October 10, 2016

चिड़िया और दाने की कहानी

चिड़िया और दाने की कहानी
छोटी सी कहानी सुनी तो पहले भी होगी पर अब समझ आई।
चिड़िया के दाने वृक्ष की दराज में गिर गए, और वृक्ष से लौटने को कहा, नहीं माना.  गयी बढ़ई के पास की तूं तन काट दे, फिर गयी राजा के पास, की बढ़ई को सजा दे, नहीं माना। हर छोटी बड़ी बात के लिए ऍफ़.आई.आर ठोको गए तो क्या हाल होगा? गयी रानी के पास की राजा से रूठ जा, फालतू बात। भाग। गयी महावत के पास की राजा-रानी को पीठ से फ़ेंक दे, तेरा दिमाग़ खराब है, तो गयी हाथी के पास की महावत ने नहीं सुनी, तू तो हमारी बिरादरी का, तू महावत पे सूंड चला। सामने छोटी सी चींटी से बोली की तूं हाथी की सूंड में घुस जा। बोली कि मेरे क्या पड़ी कि इतना रिस्क लूँ।चल आगे किसी पे जा, सरकारी बाबू की तरह बोली। बोली की अब तक जितनो के पास गयी, उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकती पर तुझे कोई मेरी चोंच से बचा नहीं सकता, पंजे में दबाते हुए बोली। थोड़ी मोहलत देती हूँ। बस वो दौड़ी हाथी के पास, फिर हाथी महावत, रानी, राज, बढई और बढई लेके आरी आया वृक्ष के पास के या तो इसके दाने दे, नहीं तो में चलाता हूँ आरी.  अरे चिड़िया प्यारी, में तो किया था मजाक, तूं भागी गुस्से की मारी। ये ले दाने की पिटारी। तू बिटिया हमारी। राजदुलारी।
देखिय न हम पकिस्तान में सर्जिकल स्ट्राइक कर सकते, न चीन पे तोप चला सकते,  ब्रह्मपुत्र की धारा खुलवा सकते, पर पर चीन के पठाके तो खरीदना बंद कर सकते, लड़िया छोड़ मिट्टी के दिए तो जला सकते, ओप्पो, लेनोवा के मोबाइल की जगह माइक्रोमैक्स, कार्बन, इंटेक्स, जिओ के मोबाइल तो खरीद ही सकते है, चीन से 52 अरब डॉलर का व्यापार घाटा तो कम कर सकते, है। बस आगे तो वो स्वयं ही गिड़गिड़ाये गे।

ये प्रयोग जापान ने किया तो गुलाम होते हुए भी काबिज अमरीका के संतरे नहीं खाये, हिरोशिमा और नागासाकी में एटम बम गिरने के बावजूद स्वदेअहि के बल पर दुनिया की दूसरी आर्थिक शक्ति बना।ये प्रयोग 1905 में लाल बाल पाल ने किया और बंग भंग विरोधी आंदोलन में अंग्रेज सरकार को झुकाया।ये प्रयोग गांधी जी ने किया और विदेशी वस्त्रो की होली जलायी। आयो पांच पांच स्कूलों में जाकर बच्चों से शपथ दिलवाये, संतो से प्रार्थना करें की अपने प्रवचनों में बोले।सरकार से कहे कि एंटी डंपिंग ड्यूटी लगाये। जो हम कर सकते हे उस पर ध्यान देवें।सफलता मिले गी।

गांधीवादी चिंतन - लेख जनसत्ता का


गांधीवादी चिंतक धर्मपाल ने आधुनिक सभ्यता को ‘मनुष्य केंद्रित सभ्यता’ कहा है। इसमें मुझे जोड़ना यह है कि यह ‘मनुष्य केंद्रित आधुनिक सभ्यता’ मुख्यतया ‘अहिंसक हिंसा की सभ्यता’ है। यह अहिंसक हिंसा है क्या, इसे समझने के लिए गांधीजी की पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ से एक उद्धरण काफी होगा: ‘‘हजारों साल पहले जो हल काम में लिया जाता था, उससे हमने काम चलाया। हजारों साल पहले जैसे झोंपड़े थे, उन्हें हमने कायम रखा। हजारों साल पहले जैसी हमारी शिक्षा थी, वही चलती आई। हमने नाशकारक होड़ को समाज में जगह नहीं दी। ऐसा नहीं कि हमें यंत्र वगैरह की खोज करना नहीं आता था। लेकिन हमारे पूर्वजों ने देखा कि लोग अगर यंत्र वगैरह की झंझट में पड़ेंगे, तो गुलाम बनेंगे और अपनी नीति को छोड़ देंगे। उन्होंने सोच-समझ कर कहा कि हमें अपने हाथ-पैरों से जो काम हो सके, वही करना चाहिए। हाथ-पैरों का इस्तेमाल करने में ही सच्चा सुख है, उसी में तंदरुस्ती है।’’
यह बात 1909 में कही गई थी, जिसमें गांधी ने भारतीय सभ्यता की हजारों वर्षों से चली आ रही स्थिरता, अविच्छिन्नता का चित्र उकेरा था। मगर हजारों वर्षों से चला आया परिदृश्य आज पूरी तरह बदल चुका है। आज खेतों में न हल-बैल हैं, न झोंपड़े, न प्राचीन शिक्षा। ‘यंत्रों की झंझट’ से मुक्त रहने वाले पूर्वजों के वंशधर आज यंत्रों की गिरफ्त में आते जा रहे हैं, उन्हें खुशी-खुशी गले का हार, जीवन का शृंगार समझ कर अंगीकार करते जा रहे हैं। आज खेतों में ट्रैक्टर, थे्रसर, जेसीबी जैसी मशीनें हैं। शहर तो शहर, गांव-गांव में कंकरीट के जंगल फैलते जा रहे हैं। अंगरेजी ढंग की शिक्षा देने वाले स्कूलों से गांव भी पटते जा रहे हैं। यानी जो चीजें गांधी की दृष्टि में भारतीय सभ्यता की हजारों वर्षों से चली आ रही अक्षुण्णता, स्थिरता का आधार स्तंभ थीं, महज सौ वर्षों के दरम्यान नष्ट हो चुकी हैं।
गौरतलब है कि इन सबका विनाश किसी हिंसक युद्ध, रक्तपात या तोप-तलवार के जरिए नहीं, बल्कि यूरोप की औद्योगिक क्रांति की कोख से जन्मी प्रौद्योगिकी की बदौलत हुआ है, जिसने हमें विकास, सुविधा, आराम का नशा चखाते हुए इस कदर मदहोश कर दिया कि हमने मशीनीकरण और शहरीकरण को वरदान समझ लिया, बगैर यह देखे कि इनसे कैसे हमारी मूल्यवान न्यामतों का संहार होता जा रहा है। यही है अहिंसक हिंसा, जो बगैर रक्तपात के दीमक की तरह हमारी सभ्यता को खोखली करती जा रही है। दरअसल, बगैर खून-खराबे के प्रकृति प्रदत और समाजकृत चीजों को उन्मूलित किए जाने का आरंभ औद्योगिक क्रांति की औरस संतान बन कर सामने आया। मशीनीकरण ने सुविधा, आराम, कार्यकुशलता, उत्पादकता-वृद्धि के नाम पर धीरे-धीरे अर्थ, उद्योग, व्यापार, जीवन-मूल्य आदि से संबद्ध अनेकानेक पारंपरिक चीजों को खत्म करना शुरू किया। पंूजी का केंद्रीयकरण होता गया, कृषि-सापेक्ष हस्तशिल्प का संहार होता गया। विडंबना यह है कि इस पूंजीवाद का विरोध करने वाले कार्ल मार्क्स को भी कृषि और कृषकों का बने रहना सर्वहारा क्रांति के मार्ग में अवरोध प्रतीत हुआ।
मशीनों की बढ़ती आमद ने मनुष्य को दूसरे प्रकार की गुलामी में जकड़ना शुरू किया और उस मशीनीकरण के फलस्वरूप बढ़ते शहरीकरण ने मिल कर सदियों से प्रकृति के साथ लय बना कर चले आ रहे जीवन को क्षत-विक्षत करना शुरू किया। दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि इस मशीनीकरण के गर्भ में पलने वाले जैविक विनाश के कीटाणुओं को वैज्ञानिकता का दंभ भरने वाला मार्क्सवादी दर्शन नहीं देख सका! देखा तो भाववादी दर्शन के लिए बदनाम गांधी ने, जिन्होंने 1909 में ही ‘हिंद स्वराज’ में यह चेतावनी दे दी कि ‘‘मशीनें यूरोप को उजाड़ने लगी हैं और वहां की हवा अब हिंदुस्तान में चल रही है।… मशीन की यह हवा अगर ज्यादा चली तो हिंदुस्तान की बुरी दशा होगी।’’
ऐसा संकेत करके गांधी ने दरअसल, मशीनों के जरिए होने वाली ‘अहिंसक हिंसा’ की ही विभीषिका को सामने रखा था। हथियारों से लड़े जाने वाले युद्धों में मानव-संहार तो होता था, लेकिन युद्धोपरांत फिर आबादी बढ़ती जाती थी, अर्थ, उद्योग, शिक्षा, सामाजिक जीवन और प्रकृति के साथ लयात्मक योग पूर्ववत चलते रहते थे। ‘स्वदेशी समाज’ नामक निबंध में रवींद्रनाथ ठाकुर ने लिखा: ‘‘राजाओं में कितने युद्ध हुए, लेकिन हमारे वेणुकुंजों में, आम और कटहल के बागों में मंदिर बनते रहे, अतिथिशालाएं स्थापित होती रहीं, तालाब खोदे जाते रहे, संस्कृत पाठशालाओं में शास्त्र-शिक्षा चलती रही, चंडी-मंडपों में रामायण-पाठ कभी बंद नहीं हुआ, गांव के आंगन सर्वदा कीर्तन-ध्वनि से मुखरित रहे। समाज ने न तो कभी बाहर से सहायता मांगी और न बाहर के उपद्रव से उसकी अवनति हुई।’’
यह सब इसलिए संभव था कि समाज चक्रीय विकास की गति से चलता रहा था, जिसमें थोड़ी देर के लिए ओझल हो जाती चीजों की वापसी हो जाया करती थी। लेकिन औद्योगिक क्रांति ने चक्रीय विकास को पीछे ठेलते हुए एकरेखीय विकास क्रम को सामने रखा, जिसमें वापसी संभव नहीं होती। निरंतर आगे बढ़ते जाना ही विकास का मानक माने जाने लगा। मार्क्स भी इस एकरेखीय विकास के प्रबल प्रवक्ता थे। आज इस एकरेखीय विकास से मोहाविष्ट होकर मनुष्य जल, जंगल, जमीन को नष्ट करता जा रहा है। जॉन जर्जन जैसे विख्यात अमेरिकी चिंतक, जिन्होंने ‘एलीमेंटस आॅफ रिफ्यूजल’, ‘फ्युचर प्रीमिटिव’, ‘वाई आई हेट स्टार ट्रेक’, ‘द फेल्योर आॅफ सिंबॉलिक थॉट’ जैसी विचारोत्तेजक किताबें लिख कर बौद्धिक जगत में हलचल मचा रखी है, इस एकरेखीय विकास की भयावह परिणति पर उनकी टिप्पणी गौरतलब है: ‘‘चक्रीय सभ्यता तो कम से कम मौसमों की लय से जुड़े होने के कारण प्रकृति से कहीं न कहीं जुड़ती थी। मगर सभ्यता के विकास के साथ चक्रीय समय की जगह एकरेखीय क्रमिक विकास ने ले ली। अगर समय एकरेखीय हो, तो इतिहास है, फिर तरक्की है, फिर भविष्य की मूर्तिपूजा है। अब हम प्रजातियों, संस्कृतियों और शायद पूरी की पूरी प्राकृतिक दुनिया को एक काल्पनिक भविष्य की वेदी पर कुर्बान करने को तैयार हैं।…’’
अब यह खाई में जाने की विश्वव्यापी दौड़ है। अंतरराष्ट्रीय कंपनियां प्रतियोगिता में हैं कि कौन कामगारों का सबसे अधिक शोषण और पर्यावरण को सबसे अधिक बर्बाद कर सकता है। विकास का अर्थ है पर्यावरण का विनाश और व्यक्ति का अमानवीकरण। इस अमानवीकरण का एक प्रत्यक्ष उदाहरण यही है कि हम मोबाइल फोन की सुविधाओं के पीछे पागल होकर टॉवर पर टॉवर लगाते जा रहे हैं, बगैर यह देखे कि कैसे इन टॉवरों से आए दिन पक्षी मौत का शिकार हो रहे हैं। एक समय वह था जब एक पक्षी की हत्या ने वाल्मीकि को आदि कवि बना दिया, और आज का समय है कि सैकड़ों पक्षियों की मौत का कोई असर हम पर नहीं होता। जर्जन ने हमारे समय में एकरेखीय विकास की ‘अहिंसक हिंसा’ का जो यथार्थ रखा है, उससे हम इंकार नहीं कर सकते। क्या यह सत्य नहीं है कि बड़ी-बड़ी परियोजनाओं के कारण लाखों-करोड़ों लोगों को पुश्तैनी आवास से विस्थापित होना पड़ा है।
उत्पादकता वृद्धि के नाम पर पारंपरिक जैविक खेती, जल-प्रबंधन, वन संपदा आदि की बलि देते हुए रासायनिक खादों और कीटनाशक दवाओं के बल पर जिस व्यावसायिक खेती और औद्योगीकरण को बढ़ावा दिया गया, उससे पर्यावरण का विनाश होने के साथ-साथ मनुष्य कई बीमारियों का शिकार होता गया है, अनेक पशु-पक्षियों की प्रजातियां समाप्त हो चली हैं। वनों का विकल्प वृक्षारोपण के रूप में पेश किया जा रहा है, पर क्या इन वृक्षों के बीच शेर, बाघ, हाथी, हिरण जैसे वन्यजीव रह सकते हैं? सड़क, भवन, बांध आदि बनाने के लिए ‘भूधर’ कहलाने वाले पहाड़ों को जिस तरह तोड़ा जा रहा है, क्या फिर से पहाड़ खड़े किए जा सकते हैं? स्पष्टत: इस एकरेखीय विकास क्रम में समाप्त होती जा रही इन चीजों की वापसी संभव नहीं है। इस अहिंसक हिंसा ने हमें आज जिस मुकाम पर पहुंचा दिया है वह आदिवासी चिंतक बृजलाल के शब्दों में यों है: ‘आसमान फटा जा रहा है और हुक्मरान थिगड़े लगाने की बात कर रहे हैं।’
जाहिर है कि तथाकथित वैज्ञानिक और प्रौद्योगिक प्रगति बगैर किसी खून-खराबे के मनुष्य के सामने सुविधाओं का अंबार लगा कर विनाशकारी सुरंग में उसे धकेले जा रही है। न केवल मनुष्य और मनुष्यता की, बल्कि समस्त जड़-चेतन की बलि हो रही है इस विकास देवी की वेदी पर। ऐसे में विचारणीय है कि क्या रक्तरंजित हिंसा से अधिक संहारक इस ‘अहिंसक हिंसा’ को इसी तरह चलते रहने देना दिया जाए या फिर दुनिया को बचाने के लिए इस पर लगाम लगाई जानी चाहिए। जॉन जर्जन ठीक ही कहते हैं: ‘‘व्यवस्था को पलट देने का आह्वान हास्यास्पद लग सकता है, लेकिन एकमात्र चीज, जो इससे भी अधिक हास्यास्पद है कि इस व्यवस्था को चलते रहने देना चाहिए।’’
यहां हमें फिर गांधी की याद आती है, जिन्होंने 5 अक्तूबर 1945 को पं. नेहरू को लिखे पत्र में यह चेतावनी दी थी: ‘‘मुझे कोई डर नहीं है कि दुनिया उल्टी ओर जाती दिखती है। यों तो पतंगा जब अपने नाश की ओर जाता है तब सबसे ज्यादा चक्कर खाता है और चक्कर खाते-खाते जल जाता है।… मेरे कहने का निचोड़ यह है कि मनुष्य जीवन के लिए जितनी जरूरत की चीज है, उस पर निजी काबू रहना ही चाहिए, अगर न रहे तो व्यक्ति बच ही नहीं सकता।’’ यक्ष प्रश्न यही है कि क्या ‘जरूरत की चीज’ और विकास के बीच हम संतुलन स्थापित कर इस अहिंसक हिंसा को रोकेंगे या इस मार्ग पर बढ़ते हुए पतंगे की तरह जल जाएंगे
कथा चिड़िया को मिला अपने दाने
छोटी सी कहानी सुनी तो पहले भी होगी पर अब समझ आई।
चिड़िया के दाने वृक्ष की दराज में गिर गए, और वृक्ष से लौटने को कहा, नहीं माना.  गयी बढ़ई के पास की तूं तन काट दे, फिर गयी राजा के पास, की बढ़ई को सजा दे, नहीं माना। हर छोटी बड़ी बात के लिए ऍफ़.आई.आर ठोको गए तो क्या हाल होगा? गयी रानी के पास की राजा से रूठ जा, फालतू बात। भाग। गयी महावत के पास की राजा-रानी को पीठ से फ़ेंक दे, तेरा दिमाग़ खराब है, तो गयी हाथी के पास की महावत ने नहीं सुनी, तू तो हमारी बिरादरी का, तू महावत पे सूंड चला। सामने छोटी सी चींटी से बोली की तूं हाथी की सूंड में घुस जा। बोली कि मेरे क्या पड़ी कि इतना रिस्क लूँ।चल आगे किसी पे जा, सरकारी बाबू की तरह बोली। बोली की अब तक जितनो के पास गयी, उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकती पर तुझे कोई मेरी चोंच से बचा नहीं सकता, पंजे में दबाते हुए बोली। थोड़ी मोहलत देती हूँ। बस वो दौड़ी हाथी के पास, फिर हाथी महावत, रानी, राज, बढई और बढई लेके आरी आया वृक्ष के पास के या तो इसके दाने दे, नहीं तो में चलाता हूँ आरी.  अरे चिड़िया प्यारी, में तो किया था मजाक, तूं भागी गुस्से की मारी। ये ले दाने की पिटारी। तू बिटिया हमारी। राजदुलारी।
देखिय न हम पकिस्तान में सर्जिकल स्ट्राइक कर सकते, न चीन पे तोप चला सकते,  ब्रह्मपुत्र की धारा खुलवा सकते, पर पर चीन के पठाके तो खरीदना बंद कर सकते, लड़िया छोड़ मिट्टी के दिए तो जला सकते, ओप्पो, लेनोवा के मोबाइल की जगह माइक्रोमैक्स, कार्बन, इंटेक्स, जिओ के मोबाइल तो खरीद ही सकते है, चीन से 52 अरब डॉलर का व्यापार घाटा तो कम कर सकते, है। बस आगे तो वो स्वयं ही गिड़गिड़ाये गे।

ये प्रयोग जापान ने किया तो गुलाम होते हुए भी काबिज अमरीका के संतरे नहीं खाये, हिरोशिमा और नागासाकी में एटम बम गिरने के बावजूद स्वदेअहि के बल पर दुनिया की दूसरी आर्थिक शक्ति बना।ये प्रयोग 1905 में लाल बाल पाल ने किया और बंग भंग विरोधी आंदोलन में अंग्रेज सरकार को झुकाया।ये प्रयोग गांधी जी ने किया और विदेशी वस्त्रो की होली जलायी। आयो पांच पांच स्कूलों में जाकर बच्चों से शपथ दिलवाये, संतो से प्रार्थना करें की अप

Friday, October 7, 2016

पेप्सी/कोक में जहर, नई जानकारी

बात तो पहले भी चली है और लैब में सिद्ध भी हुआ है, परंतु ये बहुराष्ट्रीय कंपनियां जैसे तैसे मैनेज कर फंदे से छूट जाती है।
इस बार न छोटे हम सब या कर सकते हैं?
ईएनएस
नई दिल्ली | October 6, 2016 10:48 am

स्वास्थ्य मंत्रालय के ड्रग्स टेक्निकल एडवाइजरी बोर्ड (डीटीएबी)की जांच में पेप्सिको तथा कोका कोला जैसी कंपनियों के कोल्ड्रिंक्स में एंटीमोनी, लीड, क्रोमियम, कैडमियम और कम्पाउंड डीईएचपी जैसे जहरीले तत्व मिले हैं।
सरकारी जांच में पेप्सिको तथा कोका कोला जैसी कंपनियों के कोल्ड्रिंक्स में एंटीमोनी, लीड, क्रोमियम, कैडमियम और कम्पाउंड डीईएचपी जैसे जहरीले तत्व मिले हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय के ड्रग्स टेक्निकल एडवाइजरी बोर्ड (डीटीएबी) ने अपनी जांच में पेप्सी, कोका कोला, माउंटेन ड्यू, स्प्राइट और 7 अप कोल्ड्रिंक्स के सैंपल्स को शामिल किया था। गौरतलब है कि 7 अप और माउंटेन ड्यू पेप्सिको कंपनी के प्रॉडक्ट हैं वहीं, स्प्राइट कोका कोला कंपनी का प्रॉडक्ट है।
डीटीएबी ने इस साल फरवरी मार्च में परीक्षण के लिए इन कोल्ड्रिंक्स का सैंपल एकत्रित किया था और उसके दिशानिर्देशों के तहत ही स्वास्थ्य मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले कोलकाता स्थित ‘आॅल इंडियन इंस्टिट्यूट आॅफ हाइजीन एंड पब्लिक हेल्थ’ (एआईआईएचपीएच) में परीक्षण किया गया था। सूत्रों के हवाले से मिली जानकारी के मुताबिक एआईआईएचपीएच ने डीटीएबी के चेयरमैन जगदीश प्रसाद को इस टेस्ट से जुड़े रिजल्ट सौंप दिए हैं। इससे पहले इस संस्थान ने विभिन्न स्वास्थ्य वर्धक दवाओं के नमूनों में भी हेवी मेटल्स पाए जाने की पुष्टि की थी।

इस संबंध में पेप्सिको इंडिया के प्रवक्ता का कहना है, ‘हमें अभी तक जांच रिपोर्ट के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है और जब तक हम यह नहीं जान जाते की जांच में किस मेथडॉलॉजी का प्रयोग किया गया है, हमारे लिए इस रिपोर्ट पर कुछ कहना संभव नहीं होगा। मैं बताना चाहूंगा कि हम अपने सभी उत्पादों में ‘फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स’ के नियमों का पालन करते हैं। हम अपने उत्पादों में इन नियमों के तहत ही हेवी मेटल्स का उपयोग करते हैं।’ वहीं, कोका कोला इंडिया की तरफ से इस संबंध में कोई प्रतिक्रिया देने से मना कर दिया गया।

Sunday, October 2, 2016

The total assets of MNCs

According to Sh. Dhanpatram  Aggarwal. The total assets value of all the MNCs put together at global level was US $ 105.778 trillion which exceeds the total global GDP of US $ 73.152 trillion in the year 2015. The aggregate value of the global sales of these MNCs was US $ 36.668 trillion which is more than 50% of the aforesaid global GDP. The value of FDI outward stock at global level is US $ 25.045 trillion at the end of 2015. These figures are indicative to understand the monotheistic size and the influence of MNCs on the global economy and also on the global

Tuesday, September 20, 2016

प्रदुषण के भारत व दुनियां को मापे जाने वाले नुक्सान

वायु प्रदूषण से सालाना 56 हजार करोड़ डॉलर का नुकसान, 14 लाख मौत केवल भारत में। ऐसी खबर एक सप्ताह पूर्व छपी तो मैं पढ़कर एकदम चोंका। अभी तक ऐसे आंकलन छपते थे जो सूक्ष्म प्रभाव वाले या अनगिनत असर दर्शाते थे, यथा कि इतने शहर डूब जायेंगे, कि लोगों का सांस लेना मुश्किल हो जायेगा, आदि, आदि। पर ये खबर एकदम साफ बताती है कि देश की अर्थव्यवस्था को वायु प्रदूषण से सालाना 56,049 करोड़ डॉलर से अधिक का नुकसान हो रहा है तथा 14 लाख से ज्यादा लोगों को अपनी जान गँवानी पड़ती है। विश्व बैंक द्वारा जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2013 में वायु प्रदूषण की रोकथाम तथा इससे होने वाली बीमारियों के इलाज पर भारत का खर्च 50,510.3 करोड़ डॉलर रहा था। इसके अलावा 14,03,136 लोगों की वायु प्रदूषण जनित बीमारियों से मौत हो गई थी। श्रमबल की हानि के रूप में भी अर्थव्यवस्था को 5,539 करोड़ डॉलर का नुकसान उठाना पड़ा। इस प्रकार कुल नुकसान 56,049.3 करोड़ डॉलर रहा जो देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 8.53 प्रतिशत था। रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 1990 में वायु प्रदूषण के मद में जनकल्याण पर खर्च 10,490.6 करोड़ डॉलर रहा था। इसके अलावा श्रमबल हानि के रूप में 2,874.2 करोड़ डॉलर रहा था। वर्ष 1990 में इससे 10,43,182 लोगों की मौत हुई थी।
वायु प्रदूषण से जीडीपी को होने वाले नुकसान के मामले में चीन पहले नंबर पर, भारत दूसरे नंबर पर तथा अमेरिका तीसरे नंबर पर है। चीन ने वर्ष 2013 में इससे जुड़ी कल्याणकारी योजनाओं पर 1,58,976.7 करोड़ डॉलर तथा अमेरिका ने 45,467.5 करोड़ डॉलर खर्च किये थे। इनके अलावा रूस और जापान का खर्च भी 10 हजार करोड़ डॉलर से ज्यादा है। विश्व बैंक के अनुसार, वायु प्रदूषण सबसे घातक प्रदूषण के रूप में सामने आया है। यह दुनिया भर में समय से पहले मौत का चौथा सबसे बड़ा कारक है। इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था को वर्ष 2013 में 22,500 करोड़ डॉलर के बराबर श्रमबल का नुकसान हुआ था। इसके अलावा इससे जुड़ी कल्याणकारी योजनाओं पर होने वाला खर्च पाँच लाख करोड़ डॉलर रहा जो दुनिया की कुल जीडीपी का 7.5 प्रतिशत है।
इस बात को पढ़ कर एकात्म मानव दर्शन, हिन्द स्वराज सबके अर्थ समझ आने लगते है कि हमारे देश के चिंतक प्रकृति संरक्षण पर इतना ध्यान क्यों देते थे।


Friday, September 16, 2016

हर अमरीकी परिवार पौने छह लाख रुपये का क्रेडिट कार्ड कर्ज़


वाशिंगटन - यह बड़े आश्चर्य का विषय है कि बढ़ती आर्थिक असमानता और स्थिर कमाई के कारण आम अमेरिकी क्रेडिट कार्ड के कर्ज में डूबते जा रहे हैं.निजी फाइनेंस वेबसाइट वैलेटहब की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 30 सालों की तुलना में क्रेडिट कार्ड के कर्ज में रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई है.

रिपोर्ट के अनुसार हर अमेरिकी परिवार पर 8500 डॉलर का क्रेडिट कार्ड का ऋण है, जो 05 लाख 70 हजार रुपये के करीब है. बता दें कि वर्ष 1986 की दूसरी तिमाही के बाद यह क्रेडिट कार्ड के कर्ज में सबसे बड़ा उछाल है.वर्ष 2016 के अंत तक अमेरिकियों पर क्रेडिट कार्ड का कर्ज एक लाख करोड़ रुपये पार कर जाने का अनुमान है. 2016 की दूसरी तिमाही में क्रेडिट कार्ड का कर्ज 34.4 अरब डॉलर (2304 अरब रुपये) बढ़ गया.

Friday, August 26, 2016

उत्तराखंड का चिपको आंदोलन

चिपकोआंदोलन
चिपको आंदोलन की मांगे चिपको और इस आंदोलन में महिलाओं की भूमिका
हम जब से चिपको आंदोलन के बारे में पढ़ते है तो सबसे पहले हमारे सामने राजस्थान के अमृता देवी बिश्नोई की वृक्षों से चिपक कर आत्माहुति देने वाली घटना आती है। परंतु उत्तराखंड का चिपको आंदोलन भी बहुत प्रेरणादाई है। इसके बारे में सुना बहुत है परंतु अधिक विस्तार से नहीं सुना था। आज ही नेट पर किसी लेखक का निम्न लेख पढ़ा तो बहुत प्रेरक लगा। आइये आप भी देखें।
चिपको आंदोलन मूलत: उत्तराखण्ड के वनों की सुरक्षा के लिए वहां के लोगों द्वारा 1970 के दशक में आरम्भ किया गया आंदोलन है। इसमें लोगों ने पेड़ों केा गले लगा लिया ताकि उन्हें कोई काट न सके। यह आलिंगन दर असल प्रकृति और मानव के बीच प्रेम का प्रतीक बना और इसे "चिपको " की संज्ञा दी गई। चिपको आंदोलन के पीछे एक पारिस्थितिक और आर्थिक पृष्ठभूमि है। जिस भूमि में यह आंदोलन अपजा वह 1970 में आई भयंकर बाढ़ का अनुभव कर चुका था। इस बाढ़ से 400 कि०मी० दूर तक का इलाका ध्वस्त हो गया तथा पांच बढ़े पुल, हजारों मवेशी, लाखों रूपये की लकडी व ईंधन बहकर नष्ट हो गयी। बाढ़ के पानी के साथ बही गाद इतनी अधिक थी कि उसने 350 कि०मी० लम्बी ऊपरी गंगा नहर के 10 कि०मी० तक के क्षेत्र में अवरोध पैदा कर दिया जिससे 8.5 लाख एकड़ भूमि सिंचाई से वंचित हो गर्ई थी और 48 मेगावाट बिजली का उत्पादन ठप हो गया था। अलकनदा की इस त्रासदी ने ग्रामवासियों के मन पर एक अमिट छाप छोड़ी थी और उन्हें पता था कि लोगों के जीवन में वनों की कितनी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। चिपको आंदोलन को ब्रिटिशकालीन वन अधिनियम के प्रावधानों से जोड कर भी देखा जा सकता है जिनके तहत पहाड़ी समुदाय को उनकी दैनिक आवश्यकताओं के लिए भी वनों के सामुदायिक उपयोग से वंचित कर दिया गया था। स्वतंत्र भारत के वन-नियम कानूनों ने भी औपनिवेशिक परम्परा का ही निर्वाह किया है। वनों के नजदीक रहने वाले लोगों कोवन-सम्पदा के माध्यम से सम्मानजनक रोजगार देने के उद्देश्य से कुछ पहाड़ी नौजवानों ने 1962 में चमोली जिले के मुख्यालय गोपेश्वर में दशौली ग्राम स्वराज्य संघ बनाया था। उत्तर प्रदेश के वन विभाग ने संस्था के काष्ठ-कला केंद्र को सन् 1972-73 के लिए अंगु के पेड़ देने से इंकार कर दिया था। पहले ये पेड़ नजदीक रहने वाले ग्रामीणों को मिला करते थे। गांव वाले इस हल्की लेकिन बेहद मजबूत लकडी से अपनी जरूरत के मुताबिक खेती- बाड़ी के औजार बनाते थे। गांवों के लिए यह लकडी बहुत जरूरी थी। पहाडी खेती में बैल का जुआ सिर्फ इसी लकड़ी से बनाया जाता रहा है, पहाड में ठण्डे मौसम और कठोर पथरीली जमीन में अंग के गुण सबसे खरे उतरते हैं। इसके हल्केपन के कारण बैल थकता नहीं। यह लकड़ी मौसम के मुताबिक न तो ठण्डी होती है, न गरम, इसलिए कभी फटती नहीं है और अपनी मजबूती के कारण बरसों तक टिकी रहती है। इसी बीच पता चला कि वन विभाग ने खेल-कूद का सामान बनाने वाली इलाहाबाद की साइमंड कम्पनी का गोपेश्वर से एक किलोमीटर दूर मण्डल नाम के वन से अंगू के पेड़ काटने की इजाजत दे दी है। वनों के ठीक बगल में बसे गांव वाले जिन पेडों को छू तक नहीं सकते थे, अब उन पेडों को दूर इलाहाबाद की एक कम्पनी को काटकर ले जाने की इजाजत दे दी गई। अंगू से टेनिस, बैडमिंटन जैसे खेलों का सामान मैदानी कम्पनियों में बनाया जाये-इससे गांव के लोगों या दशौली ग्राम स्वराज्य संघ को कोई एतराज नही था। वे तो केवल इतना ही चाहते थे कि पहले खेत की जरूरतें पूरी की जाये और फिर खेल की। इस जायज मांग के साथ इनकी एक छोटी-सी मांग और भी थी। वनवासियों को वन संपदा से किसी-न-किसी किस्म का रोजगार जरूर मिलना चाहिए ताकि वनों की सुरक्षा के प्रति उनका प्रेम बना रह सके। चिपको आंदोलन का मूल केंद्ररेनी गांव (जिला चमोली) था जो भारत-तिब्बत सीमा पर जोशीमठ से लगभग 22 किलोमीटर दूर ऋषिगंगा और विष्णुगंगा के संगम पर बसा है। वन विभाग ने इस क्षेत्र के अंगू के 2451 पेड़ साइमंड कंपनी को ठेके पर दिये थे। इसकी  इसकी खबर मिलते ही च<डी प्रसाद भट्ट के नेत्तट्टव में 14 फरवरी, 1974 को एक सभा की गई जिसमें लोगों को चेताया गया कि यदि पेड़ गिराये गये, तो हमारा अस्तित्व खतरे में पड जायेगा। ये पेड़ न सिर्फ हमारी चारे, जलावन और जड़ी-बूटियों की जरूरते पूरी करते है, बल्कि मिट्टी  का क्षरण भी रोकते है।

इस सभा के बाद 15 मार्च को गांव वालों ने रेनी जंगल की कटाई के विरोध में जुलूस निकाला। ऐसा ही जुलूस 24 मार्च को विधार्र्थियों ने भी निकाला। जब आंदोलन जोर पकडने लगा ठीक तभी सरकार ने घोषणा की कि चमोली में सेना के लिए जिन लोगों के खेतों को अधिग्रहण किया गया था, वे अपना मुआवजा ले जाएं। गांव के पुरूष मुआवजा लेने चमोली चले गए। दूसरी ओर सरकार ने आंदोलनकारियों को बातचीत के लिए जिला मुख्यालय, गोपेश्वर बुला लिया। इस मौके का लाभ उठाते हुए ठेकेदार और वन अधिकारी जंगल में घुस गये। अब गांव में सिर्फ महिलायें ही बची थीं। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। बिना जान की परवाह किये 27 औरतों ने श्रीमती गौरादेवी के नेतृट्टव में चिपको-आंदोलन शुरू कर दिया। इस प्रकार 26 मार्च, 1974 को स्वतंत्र भारत के प्रथम पर्यावरण आंदोलन की नींव रखी गई।
चिपको आंदोलन की मांगे
चिपको आंदोलन की मांगें प्रारम्भ में आर्थिक थीं, जैसे वनों और वनवासियों का शोषण करने वाली दोहन की ठेकेदारी प्रथा को समाप्त कर वन श्रमिकों की न्यूनतम मजदूरी का निर्धारण, नया वन बंदोबस्त और स्थानीय छोटे उद्योगों के लिए रियायती कीमत पर कच्चे माल की आपूर्ति। धीरे-धीरे चिपको आंदोलन परम्परागत अल्पजीवी विनाशकारी अर्थव्यवस्था के खिलाफ स्थायी अर्थव्यवस्था-इकॉलाजी का एक सशक्त जनआंदोलन बन गया। अब आंदोलन की मुख्य मांग थी- हिमालय के वनों की मुख्य उपज राष्ट्र के लिए जल है, और कार्य मिट्टी  बनाना, सुधारना और उसे टिकाए रखना है। इसलिए इस समय खड़े हरे पेड़ों की कटाई उस समय (10 से 25 वर्ष) तक स्थगित रखी जानी चाहिए जब तक राष्ट्रीय वन नीति के घोषित उददेश्यों के अनुसार हिमालय में कम से कम 60 प्रतिशत क्षेत्र पेड़ों से ढक न जाए। मृदा और जल संरक्षण करने वाले इस प्रकार के पेड़ों का युद्ध स्तर पर रोपण किया जाना चाहिए जिनसे लोग भोजन-वस्त आदि की अनिवार्य आवश्यकतों में स्वावलम्बी हो सकें।
रेनी में हुए चिपको की खबर पाकर अगले दिन से आसपास के एक दर्जन से अधिक गांवों के सभी पुरुष बड़ी संख्या में वहां पहुंचने लगे। अब यह एक जन-आंदोलन बन गया। बारी-बारी से एक-एक गांव पेड़ों की चौकसी करने लगा। दूर-दराज के गांवो में चिपको का संदेश पहुँचाने के लिए विभिन्न पद्घतियों का सहारा लिया गया जिनमे प्रमुख थे पदयात्राएँ, लोकगीत तथा कहानियाँ आदि। लोकगायकों ने उत्तेजित करने वाले गीत गाये। उन्होंने वनों की कटाई और वन आधारित उद्योगों से रोजगार के अल्पजीवी अर्थव्यवस्था के नारे--
"क्या हैं जंगल के उपकार, लीसा, लकडी और व्यापार"
को चुनौति देते हुए इससे बिल्कुल भिन्न स्थाई
अर्थ-व्यवस्था के इस मंत्र का घोष किया--
"क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार।
मिट्टी , पानी और बयार, जिंदा रहने के आधार।"
गोपेश्वर में वन की कटाई के सफलता-पूर्वक रूकते ही वन आंदोलन ने जोर पकड लिया। सुदूरलाल बहुगुणा के नेतृट्टव में चमोली जिले में एक पदयात्राओं का आयोजन हुआ। आंदोलन तेजी से पहले उत्तरकाशी और फिर पूरे पहाडी क्षेत्र में फैल गया।
इन जागृत पर्वतवासियों के गहरे दर्द ने पदयात्रियों, वैज्ञानिकों और राजनीतिज्ञों के दिलोदिमाग पर भी असर किया। 9 मई, 1974 को उत्तर प्रदेश सरकार ने चिपको आंदोलन की मांगों पर विचार के लिए एक उच्चस्तरीय समिति के गठन की घोषणा की। दिल्ली विश्वविद्यालय के वनस्पति-विज्ञानी श्री वीरेन्द्र कुमार इसके अध्यक्ष थे। गहरी छानबीन के बाद समिति ने पाया कि गांव वालों ओर चिपको आंदोलन कारियों की मांगे सही हैं। अक्टूबर, 1976 में उसने यह सिफारिश भी कि 1,200 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में व्यावसायिक वन-कटाई पर 10 वर्ष के लिए रोक लगा दी जाए। साथ ही समिति ने यह सुझाव भी दिया कि इस क्षेत्र के महट्टवपूर्ण हिस्सों में वनरोपन का कार्य युद्धस्तर पर शुरू किया जाए। उत्तरप्रदेश सरकार ने इन सुझावों को स्वीकार कर लिया। इस रोक के लागु होने के कारण 13,371 हेक्टेयर की वन कटाई योजना वापस ले ली गई। चिपको आदोलन की यह बहुत बड़ी विजय थी।
चिपको आंदोलन कई मामलों में सफल रहा। यह उत्तर प्रदेश में 1000 मीटर से अधिक की ऊँचाई पर पेड़-पौधों की कटाई, पश्चिमी घाट और विंध्य में जंगलों की सफाई (क्लियर फेंलिंग) पर प्रतिबंध लगवाने में सफल रहा। साथ ही, एक राष्ट्रीय वन नीति हेतु दबाव बनाने में सफल रहा है, जो लोगों की आवश्यकताओं एवं देश विकास के प्रति अधिक संवेदनशील होगी। रामचंद्र गुहा के शब्दों में चिपको प्राकृतिक संसाधनों से संबद्घ संघषों की व्यापकता का प्रतिनिधिट्टव करता है। इसने एक राष्ट्रीय विवाद का हल प्रदान किया। विवाद यह था कि हिमालय के वनों की सर्वाधिक सुरक्षा किसके हाथ होगी--स्थानीय समुदाय, राज्य सरकार या निजी पूंजीपतियों के हाथ। मसला यह भी था कि कौन से पेड़-पौधे लगाए जाएं-शंकु वृक्ष, चौडै पत्ते वाले पेड़ या विदेशी पेड़ और फिर सवाल उठा कि वनों के असली उत्पाद क्या हैं- उद्योगों के लिए लकड़ी, गांव के लोगों के लिए जैव संपदा, या पूरे समुदाय के लिए आवश्यक मिट्टी , पानी और स्वक्वछ हवा। अत: पूरे देश के लिए वन्य नीति निर्धारण की दिशा में इस क्षेत्रीय विवाद ने एक राष्ट्रीय स्वरूप ले लिया।
चिपको ने विकास के आधुनिक मॉडल के समक्ष एक विकल्प पेश किया है। यह आम जनता की पहल का परिणा था। यह आंदोलन भी गांधीवादी संघर्ष का ही एक रूप था क्योंकि इसमे भी अन्यायपूर्ण, दमनकारी शासन व्यवस्था का निरोध किया गया जो पर्यावरण संरक्षण के नाम पर उसका शोषण कर रहा था। इस आंदोलन को वास्तविक नेतृट्टव भी गांधीवांदी कार्यकत्ताओं मुख्यत: चंडीप्रसाद भट्ट और सुंदर लाल बहुगुढा से मिला जिनके द्वारा प्रयोग की गई तकनीक भी गांधी जी के सट्टयाग्रह से प्रे्ररित थी। वंदना शिवा और जयंत वंदोपाध्याय के शब्दों में "ऐतिहासिक दार्शनिक और संगठनात्मक रूप से चिपको आंदोलन पारंपरिक गांधीवादी सत्याग्रहों का विस्तृत स्वरूप था"
चिपको आंदोलन में महिलाओं की भूमिका
चिपको आंदोलन को प्राय: एक महिला आंदोलन के रूप में जाना जाता है क्योंकि इसके अधिकांश कार्यकर्ताओं में महिलाएं ही थीं तथा साथ ही यह आंदोलन नारीवादी गुणों पर आधारित था। 26 मार्च, 1974 को जब ठेकेदार रेणी गांव में पेड़ काटने आये, उस समय पुरुष घरों पर नहीं थे। गौरा देवी के नेतृट्टव में महिलाओं ने कुल्हाड़ी लेकर आये ठेकेदारों को यह कह कर जंगल से भगा दिया कि यह जंगल हमारा मायका है। हम इसे कटने नहीं देंगी। मायका महिलाओं के लिए वह सुखद स्थान है जहाँ संकट के समय उन्हें आश्रय मिलता है। वास्तव में पहाड़ी महिलाओं और जंगलों का अटूट संबंध है। पहाड़ों की उपजाऊ मिट्टी के बहकर चले जाने से रोजगार के लिए पुरुषों के पलायन के फलस्वरूप गृहस्थी का सारा भार महिलाओं पर ही पड़ता है। पशुओं के लिए घास, चारा, रसोई के लिए ईंधन और पानी का प्रबंध करना खेती के अलावा उनका मुख्य कार्य है। इनका वनों से सीधा संबंध है। वनों की व्यापारिक दोहन की नीति ने घास-चारा देने वाले चौड़ी पत्तियों के पेड़ों को समाप्त कर चीड़, देवदार के शंकुधारी धरती को सूखा बना देने वाले पेड़ों का विस्तार किया है। मोटर-सडक़ों के विस्तार से होने वाले पेड़ों के कटाव के कारण रसोई के लिए ईंधन का आभाव होता है। इन सबका भार महिलाओं पर ही पड़ता है। अत: इस विनाशलीला को रोकने की चि<ता वनों से प्रट्टयक्ष जुड़ी महिलाओं के अलावा और कौन कर सकता है। वे जानती हैं कि मिट्टी  के बहकर जाने से तथा भूमि के अनुपजाऊ होने से पुरुषों को रोजगार के लिए शहरों में जाना पड़ता है। मिटटी रुकेगी और बनेगी तो खेती का आधार मजबूत होगा। पुरुष घर पर टिकेंगे। इसका एक मात्र उपाय है - हरे पेड़ों की रक्षा करना क्योंकि पेड़ मिटटी को बनाने और पानी देने का कारखाना हैं।
रेणी के पश्चात् (चिपको के ही क्रम में) 1 फरवरी, 1978 को अदवाणी गांव के जंगलों में सशस्त्र पुलिस के 50 जवानों की एक टुकड़ी वनाधिकारियों और ठेकेदारों द्वारा भाड़े के कुल्हाड़ी वालों के संरक्षण के लिए पहुँची। वहाँ स्त्रियाँ यह कहते हुए पेड़ों पर चिपक गयीं, ‘‘पेड़ नहीं, हम कटेंगी’’। इस अहिंसक प्रतिरोध का किसी के पास उत्तर नहीं था। इन्हीं महिलाओं ने पुन: सशस्त्र पुलिस के कड़े पहरे में 9 फरवरी, 1978 को नरेन्द्र नगर में होने वाली वनों की नीलामी का विरोध किया। वे गिरफ्तार कर जेल में बंद कर दी गईं।
25 दिसम्बर, 1978 को मालगाड़ी क्षेत्र में लगभग 2500 पेड़ों की कटाई रोकने के लिए जन आंदोलन आरंभ हुआ जिसमें हजारों महिलाओं ने भाग लेकर पेड़ कटवाने के सभी प्रयासों को विफल कर दिया। इस जंगल में 9 जनवरी, 1978 को सुदूरलाल बहुगुणा ने 13 दिनों का उपवास रखा। परिणामस्वरूप सरकार ने तीन स्थानों पर वनों की कटाई तत्काल रोक दी और हिमालय के वनों को संरक्षित वन घोषित करने के प्रश्न पर उन्हें बातचीत करने का न्योता दिया। इस संबंध में निर्णय होने तक गढ़वाल और कुमायूं मण्डलों में हरे पेड़ों की नीलामी, कटाई और छपान बंद करने की घोषणा कर दी गई।
चिपको आंदोलन के दौरान महिलाओं ने वनों के प्रबंधन में अपनी भागीदारी की मांग भी की। उनका तर्क था कि वह औरत ही है जो ईंधन, चारे, पानी आदि को एकत्रित करती हैं। उसके लिए जंगल का प्रश्न उसकी जीवन- मृत्यु का प्रश्न है। अत: वनों से संबंधित किसी भी निणर्य में उनकी राय को शामिल करनी चाहिए। चिपको आंदोलन ने वंदना शिवा को विकास के एक नये सिधांत - ‘पर्यावरण नारीवाद’ के लिए प्रेरणा दी, जिसमें पर्यावरण तथा नारी के बीच अटूट संबंधों को दर्शाया गया है।
इस प्रकार हम देख सकते हैं कि जंगलों की अंधाधुंध कटाई के खिलाफ आवाज उठाने में महिलाएं कितनी सक्रिय रहीं हैं। चिपको ने उन पहाड़ी महिलाओं को जो हमेशा घर की चार दीवारी में ही कैद रहती थीं, बाहर निकल कर लोगों के बीच प्रतिरोध करने तथा अपने आपको अभिव्यक्ति करने का मौका दिया। इसने यह भी दर्शाया कि किस प्रकार महिलाएं पेड़-पौधे से संबंध रखती हैं और पर्यावरण के विनाश से कैसे उनकी तकलीफें बढ़ जाती हैं। अत: चिपको पर्यावरणीय आंदोलन ही नहीं है, बल्कि पहाड़ी महिलाओं के दुख-दर्द उनकी भावनाओं की अभिव्यक्ति का भी आंदोलन है