Sunday, August 26, 2018

नदियां बिफरें नहीं तो क्या करें

नदियां बिफरें नहीं तो क्या करें

जब नगरीकरण का जुनून जागा तो हमने इन छोटी नदियों के प्रवाह के मार्ग में इतनी नई बस्तियां बना दीं कि नदी के पानी को निकलने के लिए इस या उस मोड़ पर जद्दोजहद करनी ही होती है। उधर, नदियों के पेटे में जम गए प्रदूषण ने बचे-खुचे प्रवाह स्थल को इतना उथला कर दिया कि कोई भी नदी जब नदी होकर बहना चाहती है तो लोगों को उसके प्रवाह में रौद्र रूप ही नजर आता है। जनसत्ता August 15, 2018 5:28 AM अंधाधुंध विकास ने नदियों के साथ बहुत छल किया है। लेकिन अभी भी यदि हम स्थितियों की भयावहता को समझें तो सभ्यता के सतौल को बिखरने से बचा सकते हैं। अतुल कनक इस बार वर्षा ऋतु के प्रारंभ से ही देश के विविध हिस्सों में नदियों ने रौद्र रूप दिखाना शुरू कर दिया। देश के विविध राज्यों में अब तक छह सौ से अधिक लोग जलप्लावन के शिकार हो गए हैं। निश्चित रूप से कुछ हिस्सों में अतिवृष्टि बाढ़ का कारण बनी है, लेकिन सच यह भी है कि नदियों के पेटे में बस गई बस्तियों ने भी बाढ़ की विभीषिका को बढ़ाया है। गंगा के किनारे जो तिबारियां कभी नदी के घाट का हिस्सा हुआ करती थीं, उनमें भी यदि परिवार रहने लगें तो उसे नदी का प्रकोप कैसे कहा जा सकता है! एक कमजोर मनुष्य भी अपने घर की मर्यादा पर किसी का अतिक्रमण नहीं सहन कर पाता, तो फिर नदियों से हम यह कैसे अपेक्षा कर सकते हैं कि जब उनका दिन आएगा तो विकास के नाम पर अपने साथ हुए बुरे बर्ताव को भूल जाएंगी? किसी भी बस्ती में जलप्लावन होना दुख का विषय है, लेकिन हमने तो विकास के नाम पर ऐसी स्थिति प्राप्त कर ली है कि ‘बाढ़ की संभावनाएं सामने हैं/ और नदियों के किनारे घर बने हैं।’

जातक कथाओं में एक प्रसंग आता है। वर्षा ऋतु के ठीक पहले गौतम बुद्ध एक ऐसे गांव में पहुंचे जिस गांव के किनारे एक नदी थी और अक्सर बरसात के मौसम में उस नदी में बाढ़ आ जाया करती थी। बुद्ध जिस किसान के यहां रुके, वह अतिथि की तेजस्विता से उत्साहित हो गया और उसने बुद्ध को बताया कि इस बार बारिश के पहले ही उसने अपनी झोंपड़ी का छप्पर ठीक कर लिया है और अपनी जरूरत का पर्याप्त सामान एकत्र कर लिया है। इसलिए चाहे तेज बारिश हो या नदी में बाढ़ आए, उसे कोई चिंता नहीं है। बुद्ध मुस्कुरा कर बोले कि उन्होंने भी काल की नदी में बाढ़ आने के पहले अपने कर्मों का छप्पर ठीक कर लिया है और पर्याप्त मात्रा में चित्त शुद्धि एकत्र कर ली है, इसलिए उन्हें भी अब कोई चिंता नहीं है। दोनों अपने-अपने प्रसंगों में अपनी-अपनी प्राथमिकताओं को दर्शा रहे थे, लेकिन यह प्रसंग इतनी आवश्यकता तो रेखांकित करता ही है कि हम मानसून के पहले बरसात के स्वागत की पूरी तैयारी कर लें। बरसात की तैयारी का आशय है कि हम जल प्रवाह के रास्तों को निर्बाध करें। पानी अपने प्रवाह का रास्ता अपवाद स्वरूप ही बदलता है। लेकिन हमने तो विकास के नाम पर सीमेंट और कंक्रीट के जंगल इस तरह खड़े कर दिए कि पानी के प्रवाह के रास्ते को ही अवरुद्ध कर दिया। देश भर में छोटी-छोटी नदियां किसी क्षेत्र के लिए न केवल जल संचित करती थीं, बल्कि भूजल स्तर को बनाए रखने में मदद भी करती थीं। इनमें मुंबई की नीरी नदी, कोटा की मंदाकिनी नदी, जयपुर की द्रव्यवती नदी जैसे कितने ही नाम लिए जा सकते हैं। लेकिन जब नगरीकरण का जुनून जागा तो हमने इन छोटी नदियों के प्रवाह के मार्ग में इतनी नई बस्तियां बना दीं कि नदी के पानी को निकलने के लिए इस या उस मोड़ पर जद्दोजहद करनी ही होती है। उधर, नदियों के पेटे में जम गए प्रदूषण ने बचे-खुचे प्रवाह स्थल को इतना उथला कर दिया कि कोई भी नदी जब नदी होकर बहना चाहती है तो लोगों को उसके प्रवाह में रौद्र रूप ही नजर आता है। न्यूजीलैंड की एक अदालत ने कुछ दिन पूर्व नदियों को सप्राण अस्तित्व (लीविंग एंटिटी) अर्थात जीवित इकाई माना था। उत्तराखंड उच्च न्यायालय के एक खंडपीठ ने भी एक मामले की सुनवाई के दौरान गंगा और यमुना जैसी नदियों को जीवित इकाई मानते हुए फैसला सुनाया कि संविधान द्वारा व्यक्तियों को प्रदत्त अधिकार नदियों के प्रकरण में भी अक्षुण्ण रहेंगे और नदियों के पानी को प्रदूषित करने वालों के खिलाफ समुचित कार्रवाई होगी। नदियों के पक्ष में माननीय न्यायालयों ने अपने निर्णय भले ही अभी सुनाए हों, लेकिन हम भारतीय तो सदियों से नदियों को देवी रूप में पूजते हुए उन्हें जीवंत इकाई ही मानते आए हैं। यही कारण है कि प्राचीनकाल में दिन की शुरुआत ही नदियों की वंदना से हुआ करती थी। नदियों को हम मां के रूप में पूजने के हिमायती रहे हैं। परंपरागत भारतीय ज्योतिष तो यह तक मानता है कि किसी व्यक्ति की जन्मकुंडली का चौथा स्थान बहते पानी, मां और सुख का कारक होता है। बहता पानी- यानी नदी। इसका अर्थ हमारा परंपरागत ज्योतिष नदियों के संरक्षण को सुख का कारक मानता है। ज्योतिष की एक चर्चित पद्धति है- लाल किताब ज्योतिष। लाल किताब ज्योतिष के अनुसार यदि किसी व्यक्ति पर मातृ-ऋण होता है तो वह अपने घर की गंदगी को बहते पानी में फेंकता है। आज जिस तरह से समूचे शहर की गंदगी नालों के माध्यम से नदियों में फेंकी जा रही है, उसे देख कर सवाल उठ सकता है कि क्या सारा समाज ही मातृ ऋण का सताया हुआ है? नदियों की पीड़ा को समझने में हमने अभी भी दुविधा दिखाई तो हो सकता है कि फिर हमें कुछ समझने का मौका ही न मिले। याद करिए, जब महाभारत का युद्ध प्रारंभ हुआ था, लगभग उसी क्षण दिव्य कही जाने वाली नदी सरस्वती ने अपने को समेटना शुरू कर दिया था। आज हम भले ही उपग्रह चित्रों के माध्यम से सरस्वती के प्रवाह के मार्ग को जान लेने के अनगिनत दावे करें, लेकिन जिस नदी के किनारे वेद ऋचाओं का प्रणयन हुआ- वह नदी अपने समय के सबसे विकराल युद्ध के साक्ष्य में बहती हुई मानो पथरा ही गई। नदी तो मां होती है ना, और कोई भी मां यह कब सहन कर सकती है कि उसकी संतानें परस्पर युद्ध करके एक दूसरे का खून बहाएं। इंग्लैंड के डेवोम प्रांत में एक नदी के किनारे बिकलेघ का किला है। मध्ययुग में वहां राजसत्ता की प्राप्ति के लिए भीषण युद्ध हुआ और आक्रमणकारियों ने युवा राजकुमार को जिंदा काट कर नदी में फेंक दिया। काल ने इसके बाद मनुष्य की स्मृतियों पर अनेक आवरण चढ़ा दिए, लेकिन नदी अभी भी उस दर्द से कराह उठती है। कहते हैं कि हर साल उसी तारीख को, जब एक युवा राजकुमार का सिर काट कर नदी में फेंका गया था, नदी का एक हिस्सा लाल हो जाता है- जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में पर्यटक भी वहां पहुंचते हैं। हिंसा के दंश से लाल हुआ एक नदी का हृदय पर्यटकों के कौतूहल का विषय हो सकता है, लेकिन संवेदनशील लोगों के लिए तो हर नदी के अस्तित्व को बचाना, हर नदी के दर्द को समझना उनके सरोकारों की प्रमुखता में होना चाहिए। अंधाधुंध विकास ने नदियों के साथ बहुत छल किया है। लेकिन अभी भी यदि हम स्थितियों की भयावहता को समझें तो सभ्यता के सतौल को बिखरने से बचा सकते हैं। पंजाब में बाबा बलबीर सिंह सिचेवाल ने ऐसा कर भी दिखाया है। लुधियाना जिले में एक नदी थी कालीबेई। इस नदी का ऐतिहासिक और सामाजिक ही नहीं, सांस्कृतिक महत्त्व भी था। मान्यता है कि गुरुनानक देव ने इसी नदी में स्नान करते हुए शबद रचना की थी। लेकिन समय और समाज की उपेक्षा ने इस छोटी-सी, लेकिन पवित्र नदी को भी एक नाले में बदल दिया। बलबीर सिंह सिचेवाल ने इस नदी की सफाई का संकल्प लिया और प्रयासों में जुट गए। धीरे-धीरे उनकी मुहिम को दूसरे लोगों का भी समर्थन मिला और कालीबेई में फिर स्वच्छ जल लहलहाने लगा। कालीबेई का उदाहरण साबित करता है कि मन में चेतना और संकल्प हो तो नदियों को प्रदूषण से मुक्त किया जा सकता है। वरना, ऐसा न हो कि सभ्यता के प्रारंभ से ही मानव जीवन की संभावनाओं को संवारने वाली नदियां मनुष्य के स्वार्थी आचरण को देख कर सरस्वती की तरह लुप्त होने लगें। यदि ऐसा हुआ तो शायद भविष्य हमें नदियों की दुर्दशा की अनदेखी करने के अपराध के लिए कभी क्षमा नहीं करेगा।

Tuesday, August 14, 2018

संघर्ष वाहिनी कार्यशाला भाग 2

4. भारत में हुए प्रमुख आन्दोलन :

1 सविनय अवज्ञा आन्दोलन( नमक आन्दोलन – 12 मार्च 1930 दाण्डी मार्च - सफल।

2 असहयोग आन्दोलन सितम्बर 1920 से फरवरी 1922 - जलियाँवाला बाग कांड।

3 वारडोली सत्याग्रह 1928 - नील की खेती और कर के विरूद्ध - सफल।

4 भारत छोड़ो आन्दोलन, अगस्त 1942 - विफल।    

5 केन्द्र सरकार की तानाशाही के विरूद्ध छात्र आन्दोलन, 1974 - सफल।       

          स्वदेशी जागरण मंच देश की आर्थिक स्वावलंबन]  तत्कालिकरूप से GATT एवं WTO के  खिलाफ चलने वाला एक आंदोलन है। जुलाई 1991 में भारत सरकार के वित्तमंत्री मनमोहन सिंह ने नईआर्थीक नीति की घोषणा संसद में किया। उसके पश्चात स्वदेशीजागरण मंच का गठन 22 नवंम्बर 1991 को हुआ। केन्द्र सरकार नेअप्रेल 1994 में WTO के समझौते पर हस्ताक्षर कर दिया। 1 जनवरी 1995 से WTO समझौता लागु हो गया। नई आर्थिक निति की घोषणाके समय से स्वदेशी जागरण मंच पुरे देश में आन्दोलन चला रहा है।हमारे आन्दोलन को अनेक मोर्चां पर सफलता मिली है।  जिसके कारणआज WTO मरणासन्न की स्थिति में पहुंच गया है। परन्तु हमें इसआन्दोलन में पूरी सफलता प्राप्त करने के लिए अपने आन्दोलन कोऔर तेज करना होगा। स्वदेशी जागरण मंच वर्तमान में देश की सुरक्षा,शिक्षा, व्यापार, रोजगार, संस्कृति पर हो रहे आक्रमण के खिलाफवैचारिक एवं अहिंसात्मक संघर्ष के तरीके से लगातार आंदोलनरत है।

 

5.     स्थानीय मुद्दे एवं सफलता की गाथा

       क. विषय

       ख. प्रभावित लोग एवं क्षेत्र

       ग. जनभावना कैसी थी एवं हमलोगों ने उसकोकैसे प्रस्तुत किया

       घ. कार्यक्रम की रचना एवं इसमें जनभागीदारी

       ड. नेतृत्व, समिति एवं समन्वय

       च. कानूनी लड़ाई

       छ. परिणाम - वर्तमान स्थिति

6.      आंदोलनधर्मी कार्यकर्ता और कार्यक्रम

 

कार्यकर्ता :

       क. कार्यकर्ता के लक्षण

       ख. सामूहिक निर्णय

       ग. नेतृत्व

       घ. समन्वयक

       ड. कार्यक्रम रचना की कला

       च. सामूहिक दृष्टि

कार्यक्रम:

क. प्रभावित लोगों की अधिकतम भागीदारी युक्तकार्यक्रम

ख. प्रभावित क्षेत्रानुसार कार्यक्रम

ग. क्रमवार कार्यक्रम नीचे से उपर

घ. कार्यक्रम के बीच समय का अंतराल

च. जागरणात्मक एवं विरोधात्मक

छ. कानूनी विषय

ज. बौद्धिक एवं प्रचार

 

7. संघर्षवाहिनी की कार्य पद्धति

 

1.      अ0भा0 टोली

इस टोली में अ.भा. संघर्षवाहिनी प्रमुख के अलावे देश मेंसफलतापूर्वक आंदोलन चलाने वाले प्रमुख कार्यकर्ता,चिंतक, लेखक, पत्रकार, वकील इत्यादि।  टोली में 5-10तक कुल संख्या होनी चाहिए।  साल में दो बैठक होनीचाहिए। इस बैठक में राष्ट्रीय स्तर की समस्याओं पर विचारविमर्श राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन की रूपरेखा तय करनातथा राष्ट्रीय सम्मेलन, राष्ट्रीय सभा तथा राष्ट्रीय परिषद कीबैठक में इसकी घोषणा करना।  साल में एक बारसंघर्षवाहिनी की राष्ट्रीय परिषद् की बैठक आयोजित करन,इस बैठक में देशभर में चलने वाले आंदोलन की समीक्षाकरना, इस बैठक मे अ.भा. टोली, प्रांतीय टोली, प्रांतीयसंचालन समिति, जिला संघर्षवाहिनी प्रमुख को बुलाना।

2.      प्रांतीय टोली

प्रांत संघर्षवाहिनी प्रमुख के अलावे प्रांत स्तर पर आंदोलनचलाने वाले प्रमुख कार्यकर्ता, चिंतक, लेखक, पत्रकार,वकील इत्यादि।  टोली की कुल संख्या 5-10 तक होनीचाहिए।

3.      प्रांतीय संचालन समिति

        प्रांत टोली$जिला संघर्षवाहिनी प्रमुख-सह प्रमुख

        प्रांतीय संचालन समिति की साल में एक बैठक होनीचाहिए।  इस बैठक में प्रांतीय स्तर की समस्याओं परआंदोलन की रूपरेखा तैयार करना है।  प्रांत सम्मेलन मेंआंदोलन की घोषणा करना।

4.      जिला टोली

जिला संघर्षवाहिनी प्रमुख-सह प्रमुख के अलावे आंदोलनचलाने वाले प्रमुख कार्यकर्ता, लेखक, पत्रकार, वकीलइत्यादि।

5.      जिला संचालन समिति

प्रांतीय टोली, नगर संघर्षवाहिनी प्रमुख-सह प्रमुख,समविचारी संगठनों के दो-दो प्रतिनिधि, किसान, व्यापारी,मजदूर तथा अन्य कर्मचारी संगठनों के दो-दो प्रतिनिधि,विद्यार्थी संगठन।

        साल में तीन बार संचालन समिति की बैठक, बैठक मेंचलने वाले आंदोलन की समीक्षा करना तथा नये विषयों परआंदोलन की रूपरेखा तैयार करना।  आंदोलन चलाने केलिए अलग-अलग संचालन समिति गठिथ करना।

        विषयवार आंदोलन के संचालन समिति में, जिसविषय पर आंदोलन चलाना है,  उससे प्रभावित क्षेत्र केसंगठनों के प्रतिनिधियों को शामिल करना।  संयोजकसहसंयोजक$प्रचार प्रमुख$कोष संग्रह समिति कार्यक्रम,प्रमुख इत्यादि।

        सभी समितियों में स्वदेशी जागरण मंच केपदाधिकारी स्थाई आमंत्रित सदस्य होंगे।  आंदोलन में जमाहोनेवाले राशि स्व.जा.म. के खाता में जमा होगा।

        आंदोलन के लिए स्थानीय मुद्दे का चयन करना एवंआंदोलन संचालन करने वाली समिति की बैठकआवश्यकतानुसार करनी चाहिए। आंदोलन के लिए मोर्चाका गठन करना।  आंदोलन पूर्ण होने पर आंदोलन समितिको भंग कर देना है।

विषय

1. स्वदेशी जागरण मंच का परिचय एवं आंदोलनका इतिहास

2. आंदोलन का स्वरूप, क्यां और कैसे

3. संघर्षवाहिनी का स्वरूप एवं कार्य पद्धति

4. आंदोलन में प्रचार की भूमिका

5. स्थानीय मुद्दे एवं सफलता की गाथा

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Monday, August 13, 2018

संघर्ष वाहिनी कार्यशाला भाग 1

भूमिका

संघर्ष वाहिनी स्वदेशी जागरण मंच का एक विभाग है, और उसकी अखिल भारतीय कार्यशाला जयपुर में 11,12 अगस्त 2018 को हुई। मंच के उद्देश्य तो बड़े है ही, परंतु स्थानीय मुद्दे भी उस आलोक में आने चाहिए। यह संघर्ष वाहिनी का एक मुख्य लक्ष्य है।  निम्न पत्रक वहां उपर्युक्त कार्यशाला में दिया गया है। स्थानीय आंदोलन क्यो जरूरी है, कैसे सफल कीजे नाते हैं, इन सभी बातों को योग्य ढंग से समझाया गया है। आपका कोई सुझाव हो तो जर्रोर लिखें।

1. आंदोलन क्यों और कैसा 

1-     आंदोलन का प्रकार

       क- तत्कालीन

       ख- अल्पकालीन

       ग- दीर्घकालीन

2-     विषय का अध्ययन

3-     डाक्यूमेंटशन] पंपलेट] हैण्डबिल] पुस्तक कानिर्माण

4-     प्रभावित व्यक्ति&क्षेत्रानुसार समिति रचना

5-     छोटा टीम&नेतृत्व] नेतृत्व की विश्वसनीयता

6-     समाज का प्रभावी व्यक्ति] ओपिनियन मेकर्स कोसाथ में लेना

7-     नीचे का समिति] उपर की समिति और नेतृत्व मेंसमन्वय एवं परस्पर विश्वास

8-     विषय का क्षेत्र परिधि को बढ़ाना

9-     आम जनता का जीवन और जीविका के साथविषय को जोड़ना

10-    प्रेस] मीडिया अन्य प्रचार तंत्र काप्रयोग&व्यवहार

11-    कानूनी सलाहकार समिति

12-    कार्यक्रम रचना

13-    अर्थ संग्रह

 

2. जन-आन्दोलन

परिभाषा: जब लोगों में बदलाव की इच्छा तीव्र हो जाती है,महत्वाकांक्षा व्यापक हो जाती है और कोई दमनकारी बल इसकेविपरित खड़ा होकर अपनी पूरी क्षमता से इसे दबाना चाहता है, तो बदलाव की यही इच्छा धीरे-धीरे जन आंदोलन का स्वरूप लेती है।एक बार जब यह जन-आंदोलन का रूप ले लेती है।  तब कितनी भीदमनकारी बल हो,  उसे झुकना पड़ता है।

सन् 1857 में बैरकपुर में भारतीय सिपाही मंगल पांडे ने अंग्रेजों केखिलाफ हथियार उठा लिया था।  जिसे हम सैनिक विद्रोह के नाम सेभी जानते हैं।  देखते ही देखते क्रांति की लपक बंगाल, बिहार, अवध,अंबालाऔर मेरठ इत्यादि जगहों से होते हुए दिल्ली पहुंच जाती है।

सरदार भगत सिंह ने एसेंबली में बम फेंका और वहां से भागे नहीं,अपनी गिरफ्तारी दी ताकि लोगों को लगे कि एक लड़का अंग्रेजों केखिलाफ खड़ा हो सकता है तो पूरा देश क्यों नही।
12 दिसंबर 1930 को बाबू गेनू ने मुम्बई में विदेशी कपड़ों से भरे ट्रक को रोकने का  प्रयास किया, अंग्रेज सार्जेंट ने ट्रक उसके ऊपर चढ़ा दिया। आंदोलन और मुखर हुआ।

9 अगस्त 1942 को पूज्य महात्मा गांधी के नेतृत्व में अंग्रेजों भारतछोड़ो का नारा दिया गया और यह जनआंदोलन का रूप ले लिया। 

5 जून] 1974 को लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व मेंपटना के गांधी मैदान में संपूर्ण क्रांति की घोषणा हुई और धीरे-धीरे यहजन आंदोलन का रूप ले लिया।

जन-आंदोलन का का लक्ष्य केवल सत्ता परिवर्तन नहीं इसका लक्ष्यव्यवस्था परिवर्तन भी है।  यह केवल भूख हड़ताल या तोड़-फोड़ नहींबल्कि यह एक सतत् प्रक्रिया है जो लोगों की इच्छा से शुरू होता हैऔर धीरे-धीरे व्यापक स्वरूप लेती है।  इसमें समाज में हर तबके कीभागीदारी होती है( राजनैतिक] आर्थिक] सामाजिक] सांस्कृतिक]बौद्धिक] शैक्षणिक व अध्यात्मिक]  वास्तविक जन-आंदोलन लोकतंत्रको मजबूत करता है।

आन्दोलन के प्रकार& तत्कालिक या दीर्घकालीक

आन्दोलन के तरीके  :1- बौद्धिक 2- मीडिया 3- कानून 4-संघर्षात्मक

बौद्धिक&साहित्य का प्रकाशन] गोष्ठी] बैठक] सम्मेलन] पत्राचारशोसल मिडिया का उपयोग ।

मीडिया & पत्रकारवार्ता] लेख लिखना] सामुहिक परिचर्चा।

कानुन & पी0आई0एल] आर0टी0आई।

संघर्षात्मक & बैठक] धरना] नुक्कड़ सभा] पदयात्रा] रैली] मशालजुलुश] रथयात्रा] आमसभा] पुतलादहन] हस्ताक्षर अभियान] समानविचार वाले संगठनों के साथ बैठक] पोस्टर] स्टीकर] करपत्रक] बेनर]उदघोष] झण्डा] पत्रिका] नाटक] संगीत ।

मुद्दों या विषय का चयन :

किसी भी आन्दोलन के लिए सर्वप्रथम विषय का चयन करना है। विषयचयन के बाद यह पता करना जरूरी है कि इस आन्दोलन से किस क्षेत्रके लोग प्रभावित होंगे। तथा जिनके विरूध आन्दोलन करना है वे लोगकौन है तथा उनकी ताकत क्या है। इन सभी बातों की जानकारी केबाद जहां आन्दोलन प्रारम्भ करना है। वहां के प्रमुख कार्यकर्ता के साथबैठक करना है। तथा बैठक में इन सभी बिन्दुओं पर विस्तार से चर्चाकरना है। जहां आन्दोलन प्रारम्भ करना है वहां के प्रमुख कार्यकर्ताओंको मुख्य भुमिका में रहना है। स्थानीय कार्यकर्ताओं को आन्दोलन कानेतृत्व देना चाहिए। आंदोलन से प्रभावित लोगों की सहभागितासफलता के लिए आवश्यक शर्त है।  यह दो प्रकार से हो सकती हैादवू पेनम हो तो स्वस्फूर्त होती है या जनजागरण द्वारा मुद्दे प्रभावितलोगों तक ले जाना। आन्दोलन के लिए अपने प्रमुख कार्यकर्ताओं कीएक समिति बनाना चाहिए तथा सभी समविचारी संगठनों केप्रतिनिधियों को लेकर एक संचालन समिति बनाना है।

सभी संगठनों का अलग अलग बैठक आयोजित करना है। इसके बादसभी संगठनों के सदस्यों के साथ एक सम्मेलन आयेजित करना है।सम्मेलन में आन्दोलन के विषय में गहरी जानकारी रखने वाले वक्ताओंको बुलाना है। सम्मेलन के बाद आगामी कार्यकर्म का क्रमवार घोषणाकरना है।

 

3. नारे:

जय स्वदेशी, जय-जय स्वदेशी

जय स्वदेशी - हर घर स्वदेशी

जय स्वदेशी, घर - घर स्वदेशी

जय स्वदेशी, हर - हर स्वदेशी

 

कार्यक्रम के सफल संचालन के लिए निम्नलिखित समितियों का गठनकरना है।

कार्यकर्म समिति, धन संग्रह समिति, प्रचार समिति, विधि विशेश्ग्यसमिति, मिडिया वार रूम, समन्वय समिति, सलाहकार समिति,संरक्षक, कार्यालय, इत्यादि।

सभी प्रकार के आन्दोलन के लिए गाँव/वार्ड अस्तर पर अलग अलगसमिति बनाना है। पूर्णकालिक कार्यकर्ता तैयार करना है।

4.

Thursday, August 2, 2018

दस गीत (स्वदेशी के)

गीत क्र. 1
मेरा हो मन स्वदेशी, मेरा हो तन स्वदेशी मेरा हो............
मन स्वदेशी, मेरा हो तन स्वदेशी !
मर जाऊं तो भी मेरा -होए कफन स्वदेशी !!
1. चट्टान टूट जाए, तूफान घुमड़ के आए !
गर मौत भी पुकारे ,तो भी लक्ष्य हो स्वदेशी !!
मेरा हो मन स्वदेशी, मेरा हो तन स्वदेशी...

2. जो गाँव में बना हो, और गाँव में खपा हो !
जो गाँव को हँसाए , जो गांव को बसाए !
वह काम है स्वदेशी ,वह नाम है स्वदेशी !!
मेरा हो मन स्वदेशी, मेरा हो तन स्वदेशी...

3. जो हाथ से बना हो, या गरीब से लिया हो ! जिसमें स्नेह भरा हो ,वह चीज है स्वदेशी !!
मेरा हो मन स्वदेशी, मेरा हो तन स्वदेशी...
4. मानव का धर्म क्या है , मानव का दर्द जाने !
जो करे मनुष्यता की ,रक्षा वही स्वदेशी !!
मेरा हो मन स्वदेशी, मेरा हो तन स्वदेशी...
5. करें शक्ति का विभाजन , मिटें पूँजी का ये शासन !
बने गाँव स्वावलम्बी , वह नीति है स्वदेशी !! 
मेरा हो मन स्वदेशी, मेरा हो तन स्वदेशी ...

6. तन में बसन स्वदेशी, मन में लगन स्वदेशी ! फिर हो भवन - भवन में, विस्तार हो स्वदेशी !!
मेरा हो मन स्वदेशी, मेरा हो तन स्वदेशी,
मर जाऊं तो भी मेरा होए कफन स्वदेशी ।

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गीत क्रमांक 2
मरें भी अगर तो स्वदेशी कफ़न हो! गीत।
जिएं तो बदन पर स्वदेशी वसन हो!
मरें भी अगर तो स्वदेशी कफ़न हो!

1. पराया सहारा है अपमान होना,
जरूरी है निज शान का ध्यान होना,
है वाजिब स्वदेशी पे कुर्बान होना,
इसी से है संभव समुत्थान होना,
लगन में स्वदेशी के हर मुर्दो ज़न हो!
मरे भी तो तन.....

2. निछावर स्वदेशी पे, कर मालओ-जर दो,
स्वदेशी से भारत का भंडार भर दो,
रहें चित्र-से, वह चकाचौंध कर दो,
दिखा पूर्वजों के लहू का असर दो,
स्वदेशी ही सज-धज, स्वदेशी चलन हो!
मरे भी तो....
3. चलो, इस तरफ़ अपना चरख़ा चला दो,
मनों सूत की ढेरियां तुम लगा दो,
बुनो इतने कपड़े, मिलों को छका दो,
जमा दो, स्वदेशी का सिक्का जमा दो,
स्वदेशी ही गुल, औ स्वदेशी चमन हो!
मरे भी तो....
4. करो प्रण कि आज़ाद होकर रहेंगे,
जहां में कि बरबाद होकर रहेंगे,
सितमगर ही या शाद होकर रहेंगे,
कि हम शादो-आबाद होकर रहेंगे,
स्वदेशी ही ‘अख़्तर’ स्वदेशी कथन हो। .
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       गीत क्रमांक 3
 
स्वदेश का प्यार।
जो भरा नहीं है भावों से,
जिसमें बहती रस धार नहीं।
वह हृदय नहीं है पत्थर हैं,
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। । ध्रु।।
1.जो जीवित जोश जगा न सका,
उस जीवन में कुछ सार नहीं।
जो चल न सका संसार संग,
उसका होता संसार नहीं।
जिसने साहस को छोड़ दिया,
वह पहुंच सकेगा पार नहीं। ...
जो भरा नहीं है भावों से,
जिसमें बहती रस धार नहीं।
वह हृदय नहीं है पत्थर हैं,
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।

2. जिसकी मिट्टी में उगे-बढ़े,
पाया जिसमें दाना-पानी।
हैं मात-पिता बंधु जिसमें,
हम हैं जिसके राजा-रानी।
जिसने कि खजाने खोले हैं,
नव-रत्न दिये है लासानी।
जिस पर ज्ञानी भी मरते हैं,
जिस पर है दुनिया दीवानी।
उस पर है नहीं पसीजा जो,
क्या है वह भू पर भार नहीं। ...
वह हृदय नहीं है पत्थर हैं,
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।
3. निश्चित है, निस्संशय निश्चित,
है जान एक दिन जाने को।
है काल दीप जलता हर दम,
जल जाना है परवाने को।
है लज्जा की यह बात शत्रु,
आये आंखे दिखलाने को।
धिक्कार मर्दुमि को ऐसी,
लानत मर्दाने बाने को।
सब कुछ है अपने हाथों में,
क्या ढाल नहीं तलवार नहीं।.....
वह हृदय नहीं है पत्थर हैं,
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।
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        गीत  4
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(यह उद्यान स्वदेशी हो )
कलियां, सुमन, सुगन्धों वाला,
यह उद्यान स्वदेशी हो।
हर क्यारी, हर खेत स्वदेशी,
हर खलिहान स्वदेशी हो।।
तन-मन-धन की, जनजीवन की
प्रिय पहचान स्वदेशी हो।
मान स्वदेशी, आन स्वदेशी,
अपनी शान स्वदेशी हो।
वीर शहीदरों के सपनों का,
हर अभियान स्वदेशी हो।
एड़ी से चोटी तक सारा,
हिन्दुस्तान स्वदेशी हो।।1।।

अभिमन्यू सा चक्रव्यूह में,
मेरा भारत देश घिरा।
रथ को स्वार्थ के पथ रोकें,
कहां क्षितिज का स्वर्ण सिरा।।
सजे खड़े हैं द्रोण, कर्ण
और दुष्ट दुशासन, दुर्योधन।
कौन युधिष्ठिर, भीम, नकुल,
सहदेवों को दे उद्बोधन।।
जो अर्जुन का मोह मिटा दे,
वह भगवान स्वदेशी हो।
एड़ी से चोटी तक सारा, हिन्दुस्तान स्वदेशी हो ।।2।।
मन गिरवी है, तन गिरवी है,
गिरवी है हर श्वास यहां।
फाके को फाका की कहिए,
मत कहिए उपवास यहां।।
गांधी तेरी खादी रोती, देख दशा इस देश की।
राष्ट्र अस्मिता सिया सरीखी, बन्दी है लंकेश की। जो लंका में आग लगा दे, वह हनुमान स्वदेशी हो। एड़ी से चोटी तक सारा, हिन्दुस्तान स्वदेशी हो।।3।।

‘राजनीति’ को देखो, इंग्लिश बोल रही फर्राटे से।
‘संस्कृति’ दिल बहलाती है, टी.वी. के सन्नाटे से।।
संस्कारों का किया दाखिला, ‘कान्वेंट’ में गर्व से।
जाने क्या हो गया, मनाने लगे, पतन भी पर्व से।।
आजादी और लोकतंत्र की,
हर संतान स्वदेशी हो।
एड़ी से चोटी तक सारा, हिन्दुस्तान स्वदेशी हो।।4।।
भारत माता के मंदिर में, बहुत प्रदूषण बढ़ा दिया।
लोकतंत्र के शव पर, गांधीवाद काट कर चढ़ा दिया।।
समझौतों की बात यहां पर,
होती है हत्यारों से।
भारत की कुछ गलियां गूंजे,
परदेसी जयकारों से।।
बलिदानों की इस धरती पर,
मां का गान स्वदेशी हो।
एड़ी से चोटी तक सारा, हिन्दुस्तान स्वदेशी हो।।5।।
सोने वालों सोना छोड़ो,
जागो सोना, सोना लो।
आज विदेशों के कब्जे से,
वतन का कोना-कोना लो।
वापस लो, व्यापार गया जो,
वापस स्वाभिमान लो।
फिर भारत को विश्व गुरू करना है,
मन में ठान लो।
उन्नतियों के इन गीतों का
हर सोपान स्वदेशी हो।
एड़ी से चोटी तक सारा, हिन्दुस्तान स्वदेशी हो।।6।।
कृष्णगोपाल कंसल

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गीत 5
अपनी मिट्टी, अपना पानी,
अपना पवन प्रकाश हो।
अपनी मति गति रहे स्वदेशी,
पक्का आत्मविश्वास हो।।

1. कर्जे लेकर धाक बढ़ाना,
झूठी शान हराम है।
खा पीकर सब खर्च करे जो, अकर्मण्य का काम है।
प्रखर तीर से धरा चीरकर, प्रकट सुधा उल्लास हो।
अपनी मिट्टी, अपना पानी, अपना पवन प्रकाश हो।
अपनी मति गति रहे स्वदेशी, पक्का आत्मविश्वास हो।।
अपने पांवों की ताकत से, पहुंचे वैभव शीर्ष पर।
परदेशी वैसाखी के बल, नहीं बन सके जगदीश्वर।।
विश्व गुरू निज अस्त्र छोड़कर,
भिक्षुक नहीं हताश हो।
अपनी मिट्टी, अपना पानी, अपना पवन प्रकाश हो। अपनी मति गति रहे स्वदेशी, अडिग आत्मविश्वास हो।।

3. देशी द्रव्यों की पोषकता, युग-युग सिद्ध प्रसिद्ध है।
परदेशी तथ्यों का हित भी, विष मिश्रित संदिग्ध है।।
अपना सूरज, अपना सागर, अपना मलय सुवास हो।
अपनी मिट्टी, अपना पानी, अपना पवन प्रकाश हो।  अपनी मति गति रहे स्वदेशी, अडिग आत्मविश्वास हो।।
4. आजादी का फिर मतवाला,
जोश खरोश जगाना है। स्वदेशी के अवलंबन हेतु मंत्र अचूक सिखाना है।।
आत्मशक्ति से प्राप्त अलौकिक,
सर्वांगीण विकास हो।
अपनी मिट्टी, अपना पानी, अपना पवन प्रकाश हो। अपनी मति गति रहे स्वदेशी, अडिग आत्मविश्वास हो।। मोहन खंडेलवाल ‘मुकुल’

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.    गीत 6
देश प्रेम का भाव जगाने
देश प्रेम का भाव जगाने,
ग्राम नगर अभियान चले।
लिए स्वदेशी मंत्र आज फिर, बालक वृद्ध जवान चले।।
आज विदेशी कंपनियाँ फिर
भरत भूमि आईं हैं।
भारती की प्रभुसत्ता पर
अधिकार जमाने आईं हैं।
डालर के बल पर स्वदेश में
उद्योग लगाने आयीं हैं।
जाग उठो हे भारत वासी, आजादी का गान चले।। ...
लिए स्वदेशी मंत्र आज फिर,
बालक वृद्ध जवान चले।।1।।
करें प्रतिज्ञा भारत वासी
वस्तु स्वदेशी लेंगे हम।
अपना पैसा अपने घर में
देश समृद्ध बनायें हम।।
माटी से सोना उपजाएँ
जाल विदेश काटें हम।
स्वाभिमान का भाव जगाने
ग्राम नगर अभियान चले।।
लिए स्वदेशी मंत्र आज फिर,
बालक वृद्ध जवान चले।।2।।

ग्राम-ग्राम उद्योग लगायें,
हस्तकला सरसायें हम।
भरे रहें भण्डार सभी के,
अधिक अन्न उपजाएँ हम।।
घर-घर दीप जले लक्ष्मी के,
गीत खुशी से गायें हम।
भारत भू का भाग जगाने,
स्वदेशी की तान चले।।
लिए स्वदेशी मंत्र आज फिर,
बालक वृद्ध जवान चले।।3।।
अपने पैरों आज खड़े हो,
भीख नहीं हम माँगेंगे।
कठिन परिश्रम करके हम सब,
आगे कदम बढ़ायेंगे।।
चरण चूमने मंजिल आये,
समृद्धि का सोपान चले,
लिए स्वदेशी मंत्र आज फिर,
बालक वृद्ध जवान चले।।4।।
मोहन खंडेलवाल ‘मुकुल’
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   गीत 7


स्वार्थ, अलस और दास्यभाव को,
दूर हमें भगाना है।
स्वदेशी को अपनाना है,
समर्थक सबको बनाना है।।
शस्त्र स्वदेशी, वस्त्र स्वदेशी,
वस्तु स्वदेशी लाना है।
बीज स्वदेशी, खाद स्वदेशी,
अन्न स्वदेशी खाना है।।ध्रुव।।

कारीगरी में और शिल्प में, कोई नहीं बढ़कर हमसे,  श्रेष्ठ कृषि और उद्योगों में ,बन सकते हैं हम फिरसे।
सब जनहित की प्रतिभाओं को
मुक्त हमें पनपाना है।।1।।
बीज स्वदेशी

जैसा बोलें, लिखते वैसा, भाषा अपनी न्यारी है
संस्कृत मां की सभी बेटियां, बोलियां हमको प्यारी हैं ।
अंग्रेजी से रक्षण करके, इन सब को बचाना है।।2।। बीज स्वदेशी

वैश्वीकरण के नाम हो रहे,
आर्थिक हमले को समझें
उपनिवेश के माया-जाल में,
गलती से भी ना उलझे ।
मंत्र स्वदेशी, और तंत्र से,
जगमग जग करवाना है।।3।।
बीज स्वदेशी,,,
अंधकार को ना अपनाएं,
मोमबत्ती की ज्योत बुझाकर
करें प्रकाशित हृदय-हृदय को,
घर-घर  नन्दा दीप जलाकर
विदेशियत को दूर हटाकर,
मन स्वदेशी बनाना है।।4।। अज्ञात ..........................................
स्वदेशी गीत 8
हर हाथ को हो काम,
हर खेत को हो पानी।
जग भर में फिर गूंजेगी,
भारत की अमर कहानी।।ध्रु।। भारत की अमर ....
जो देश बड़े कहलाते
माया का जाल बिछाते।
निज स्वार्थ-सुरक्षा खातिर
आर्थिक बंधन बंधवाते।।
इन षडयंत्रों को जाने
हम ध्वसं करें मनमानी।।1।।
जग भर में फिर गूंजेगी, भारत की अमर कहानी
हर घर का मिटे अंधेरा
शिक्षा के दीप जलायें।
अपने पैरो पर अपने
उद्योग-को पनपायें।।
भावना स्वदेशी जागे
है अपने मन ठानी।2।।
जग भर में फिर गूंजेगी,
भारत की अमर कहानी

हम आज नहीं युग-युग से
मानव का धर्म निभाते।
नर में नारायण देखा
जड़ में भी चेतन पाते।।
अपना अतीत पहचान
े हम बनें राष्ट्र अभिमानी।।3।।
जग भर में फिर गूंजेगी, भारत की अमर कहानी ‘अनिमेष’ .
.....................................
   गीत 9

श्रम हो अपना, पूंजी अपनी,
गुणवत्ता में भी श्रेष्ठ हमीं।
ग्राहक तब सारा जग होगा।
नत-मस्तक सारा जग होगा,
बोलेगा जय भारत माँ की।।ध्रु।।
भारत के ग्राम, नगर, घर में हर हाथ कला-कौशल जाने।
फिर क्यों विदेश वह भागेगा जब हम उसके गुण पहचाने।।
ना हम विदेश-निर्भर होंगे ठानी है भाग्य बदलने की।।1।। नत-मस्तक जग होगा, बोलेगा जय भारत माँ की ..

विकसित देशों ने जाल रचे हम से शतरंजी चाल चली।
बौद्धिक सम्पद् उत्पादों पर फैलाये माया-जाल, छली।।
ले देश-भक्ति की धार प्रखर काटेंगे जड़ षडयंत्रों की।।2।। नत-मस्तक जग होगा, बोलेगा जय भारत माँ की ...

जय-जय जवान, जय हो किसान हम ही होंगे विज्ञान-जयी।
उद्यम का ध्वज अपना लेकर भारत बन जाये काल-जयी।।
भावना स्वदेशी, जय स्वदेश यह भाव-भूमि हो हर मन की।।3।। नत-मस्तक जग होगा, बोलेगा जय भारत माँ की ..

श्रम हो अपना, पूंजी अपनी,
गुणवत्ता में भी श्रेष्ठ हमीं।
ग्राहक तब सारा जग होगा।
नत-मस्तक सारा जग होगा,
बोलेगा जय भारत माँ की।।ध्रु।।
. ‘अनिमेष’ ............................

गीत 10,

स्वदेश भाव फिर जगे,
स्वदेशी की पुकार है।
अस्मिता पर देश के,
विदेश का प्रहार है।।धु्रव।।

देश-देश लूटकर जो बने महान है। आई.एम.एफ., गैट, वर्ल्ड बैंक के निधान है
झोंकते हैं धूल, झूठ का, गरम बाजार है।।1।।
स्वदेश भाव फिर जगे, स्वदेशी की पुकार है।

कुटुंब है वसुंधरा, हम धरा के पूत हैं समग्रता, एकात्मता की,
संस्कृति की दूत है
सत्यापन का हमें,
मिला सुसंस्कार है।।2।।
स्वदेश भाव फिर जगे,
स्वदेशी की पुकार है।

कुटुंबभाव तोड़कर जो
रच रहे बाजार है
धर्मभाव छोड़कर, जगा रहे विकार है आक्रमण जो कर रहा,
वो शत्रु धुवांधार है।।3।।
स्वदेश भाव फिर जगे, स्वदेशी की पुकार है।

उठो जगो उखाड़ दो,
विज्ञापन के जाल को
जवाब दो खराखरा,
विदेशियों के मॉल को (2)
हिंद देश में सुनो,
उठा प्रचंड ज्वार है।।4।।
स्वदेश भाव फिर जगे, स्वदेशी की पुकार है। .
.....................