स्वदेशी जागरण मंच
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.तो राजनेता भी बाहर से मंगवा लें! MOST RECENT Sunday, July 28, 2013 - चीन भारत के लिए बड़ा खतरा बना - जैन कन्या महाविद्यालय में संगोष्ठी आयोजित श्रीगंगानगर। सरकार की गलत नीतियों के कारण आज देश गर्त में जा रहा है। स्वदेशी चीजों को त्यागकर विदेशी वस्तुओं का खुलेआम आयात किया जा रहा है। सरकार का कहना है कि जो वस्तुएं हमारे यहां काम की नहीं हैं उन्हें बाहर से मंगवाया जाता है। हमारे यहां तो राजनेता भी काम के नहीं हैं तो क्या उन्हें भी बाहर से मंगवा लें। यह बात आत्मवल्लभ जैन कन्या महाविद्यालय में आयोजित 'स्वदेशी की अवधारणा एवं चीन की चुनौतीÓ विषय पर आयोजित गोष्ठी में मुख्य वक्ता स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय संगठन मंत्री कश्मीरीलाल ने कही। उन्होंने कहा कि आज वित्तमंत्री से लेकर योजना आयोग के अध्यक्ष केवल विदेशों की नकल करके काम कर रहे हैं। जबकि देश को चाहिए कि वह अपनी जरूरत के मुताबिक स्वयं आविष्कार करे और उसका प्रयोग करे तभी वह स्वदेशी कहलाएगा। उन्होंने कहा कि फिल्मों में दिखाए गए आविष्कार अभिनेता या फिल्म निदेशक नहीं करता, ये किसी ऐसे गरीब व अनपढ़ व्यक्ति की करामात होती है जो अपने अनुभव व बुद्धि के बल का प्रयोग करता है। वे स्वदेशी और ग्रामीण हैं। इसी तरह के अनुसंधान व खोज कर यदि देश का उत्थान किया जाए तो वह स्वदेशी है। देश के फायदे के लिए व्यापार किया जाना चाहिए। देश में कोई चीज नहीं है, और उसकी अधिक जरूरत है तो बाहर से खरीदी जा सकती है लेकिन देश में वे वस्तुएं हैं फिर भी अन्य देशों से खरीदा जा रहा है यह गलत है। उन्होंने कहा कि विज्ञापनों ने विदेशी वस्तुओं का इस तरह प्रचार-प्रसार किया है कि लोग भ्रमित हो रहे हैं। सरकार की गलत नीतियों से आज देश का भ_ा बैठ रहा है। हमने चीन के सामान मोबाइल सेल, टॉर्च और छोटी से छोटी चीज सस्ते के लालच में खरीदकर उसे स्वयं पर हावी कर लिया है। उन्होंने छात्राओं को स्वदेशी वस्तुएं अपनाने व विदेशी का बहिष्कार करने की सलाह दी। उन्होंने चीन द्वारा गत दिनों की गई घुसपैठ के संदर्भ में बोलते हुए कहा कि तिब्बत, हांगकांग, ताईवान जैसे देशों को पूरी तरह निगलने व पाकिस्तान के साथ परमाणु गुप्त सन्धि एवं नये सहयोगी के रूप में उभर कर सामने आया चीन अब पूर्ण रूप से भारत के लिए खतरा बनकर खड़ा है। 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण कर 38000 वर्ग किलोमीटर भूमि पर जबरदस्ती कब्जा कर लिया। इसके बाद 1963 में हमारे शत्रु पाकिस्तान ने पाक अधिकृत कश्मीर की 5183 वर्ग किमी भूमि चीन को और दे दी। चीन आज अरूणाचल प्रदेश सहित देश की 90000 वर्ग किमी भूमि पर अपना दावा जताकर सीमा चौकियां आगे बढ़ाते हुए घुसपैठ करके हमारे निर्माण कार्यों में बाधा डाल रहा है। चीन ने दैनिक उपयोग की लगभग प्रत्येक घटिया वस्तु को भारत के बाजारों में सस्ते मूल्य में पहुंचाकर स्थानीय उद्योगों को बंद होने की स्थित में पहुंचा दिया है। (चीन से भारत को आयात लगभग तीन लाख करोड़ रूपये वार्षिक है) चीन का रक्षा बजट 150 अरब डॉलर है जबकि भारत का रक्षा बजट मात्र 36 अरब डॉलर है। केंद्र सरकार की सीमाओं पर अनदेखी एवं ढुलमुल नीति के कारण अरूणाचल एवं उद्दाख के सीमान्त प्रदेश संकट में हैं। भारत के सभी पड़ौसी देशों में चीनी सैन्य उपस्थिति के कारण हमारा संपूर्ण देश संकट में है। उन्होंने कहा कि हम चीन की चुनौतियों का सामना करने के लिए समाज को जाग्रत करके केंद्र सरकार पर दबाव डालकर देश की सीमाओं की रक्षा सुदृढ़ करने का विवश कर सकते हैं। सक्रिय एवं जागरूक नागरिक होने के नाते हम चीनी उत्पाद का तत्काल उपयोग बंद करने का दृढ संकल्प लें तथा अधिकाधिक समाज बंधुओं को इस हेतु प्रेरित कर सकते हैं। हम संवदेनशील क्षेत्रों में दिए जा रहे ठेकों पर रोक लगाने की मांग करना, विभिन्न संगठनों द्वारा इस संदर्भ में सरकार पर दबाव डालने के लिए आयोजित धरनों, प्रदर्शनों, गोष्ठियों में सक्रियता से भाग लेना आदि कार्य कर सकते हैं। कार्यक्रम को स्वदेशी के राजस्थान संयोजक भागीरथ चौधरी एवं सह संयोजक धमेन्द्र दूबे ने भी सम्बोधित किया। अध्यक्षता कुन्दनलाल बोरड़ ने की। सचिव नरेश जैन, कोषाध्यक्ष शामलाल जैन एवं अन्य ने भी स्वदेशी पर विचार व्यक्त किये। बड़ी संख्या में छात्राएं, स्टाफ तथा गण्यमान्य नागरिक उपस्थित थे।
Monday, July 29, 2013
तो राजनेता भी बाहर से मंगवा लें!
मंच चलाएगा जागरण अभियान
स्वदेशी जागरण मंच चलाएगा देशभर में जन जागरण अभियान
MOST RECENT
स्वदेशी जागरण मंच
विद्यार्थी बदलते
Monday, July 29, 2013
- चीन संकट के मुद्दे को लेकर सरकार पर बनाएंगे दबाव : कश्मीरीलाल हनुमानगढ़। चीन में राजनैतिक नेतृत्व बहुत मजबूत है जबकि पब्लिक कमजोर है लेकिन भारत में स्थिति ठीक इसके विपरित है। चीन का मुकाबला करने के लिए अपनी शक्ति को बढ़ाना होगा। इसके तहत चीन संकट के मुद्दे को लेकर देशभर में स्वदेशी जागरण मंच द्वारा सितंबर में पन्द्रह दिन का अभियान चलायेगा। यह जानकारी स्वदेशी जागरण मंच के केन्द्रीय संगठन महामंत्री कश्मीरीलाल ने रविवार को आयोजित पत्रकार वार्ता में दी। उन्होंने कहा कि चीन 1962 से लेकर आज तक भारत में करीब 1500 बार घुसपैठ कर चुका है। इसके अलाचा चीन ने भारत के 38 हजार किमी एरिया पर कब्जा किया हुआ है। पाकिस्तान में हमारे हिस्से का 5143 किमी क्षेत्र भी चीन ने कब्जाया हुआ है। चीन का पहले से ही भारत देश के 43 हजार किमी एरिया पर कब्जा है जबकि वह 90 हजार किमी क्षेत्र पर और अपना अधिकार करना चाहता है जो सरासर नाजायज है। उन्होंने कहा कि चीन ने पाकिस्तान, बंगलादेश, नेपाल, श्रीलंका व म्यांमार पर चारों तरफ से कब्जा कर रखा है तथा इन देशों की सुरक्षा का ठेका ले रखा है। इसी के अन्तर्गंत चीन भारत के 150 जिलों में माओवादियों को ट्रेनिंग देकर हमारे खिलाफ ही खड़ा कर रहा है। उन्होंने चीन को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए सरकार से शक्ति बढ़ाने की बात कही। उन्होंने कहा कि चीन हर साल भारत में 5 लाख करोड़ का सामान बेचता है तथा 12 प्रतिशत टैक्स लगाकर करीब 60000 करोड़ रुपये का मुनाफा कमा रहा है। चीन इस पैसे को हमारे खिलाफ ही हथियार बनाकर इस्तेमाल कर रहा है। उन्होंने कहा कि भारत पर चीन से पर्यांवरण का खतरा भी मंडरा रहा है क्योंकि चीन दुनिया में 21 प्रतिशत प्रदूषण फैला रहा है। उन्होंने युवा शक्ति से अपील की कि वे सोशल मीडिया के माध्यम से भी चीन का खूंखार चेहरा दुनिया के सामने लाए। उन्होंने बताया कि जनजागरण अभियान के तहत पम्पलेट वितरण, सोशल मीडिया के माध्यम से जागरूकता व स्कूलों में जाकर विद्यार्थिंयों को सचेत करने आदि के माध्यम से जनता को जागरूक कर सरकार पर दबाव बनाने का प्रयास करेंगे। पत्रकार वार्तां में मंच के प्रदेश संयोजक भागीरथ चौधरी, सह संयोजक धर्मेंन्द्र दुबे, जिला संयोजक राजकुमार शर्मां, मोहन चंगोई, खेमचन्द तेजवानी भी मौजूद थे।
Thursday, July 25, 2013
A pamphlet material (Hindi ) against Chinese products and Policies
क्या हम जानते है ?
- 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण कर 38000 वर्ग किलोमीटर भूमि पर
जबरदस्ती कब्जा कर लिया। इसके बाद 1963 में हमारे शत्रु पाकिस्तान ने पाक
अधिकृत कश्मीर की 5183 वर्ग किलोमीटर भूमि चीन को और दे दी।
- चीन आज अरूणाचल प्रदेश सहित देश की 90,000 वर्ग किलोमीटर भूमि पर अपना
दावा जताकर सीमा चैकियां आगे बढ़ाते हुए घुसपैठ करके हमारे निर्माण
कार्यों में बाधा डाल रहा है।
- चीन द्वारा जम्मू-कश्मीर को अपने नक्शों में भारत का अंग नहीं दिखाया
जाता है। अरूणाचल प्रदेश को चीन का अंग दिखाकर वहां के नागरिकों को बिना
पासपोर्ट वीजा के चीन आने का आमंत्रण दिया जाता है।
- हमारे प्रधानमंत्री जी द्वारा अरूणाचल को ‘‘हमारा सूरज का प्रदेश’’
करने पर चीन द्वारा हमारी महिला राजदूत को रात्रि 2 बजे उठाकर कड़ा विरोध
व्यक्त करते हुए चेतावनी दी जाती है।
- चीन ने हमें आहत करने हेतु लश्कर-ए-तोयबा के आतंकवादी व जैश-ए-मोहम्मद
के संस्थापक मसूद अजहर को अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी घोषित करने के लिए
संयुक्त राष्ट संघ में प्रस्तुत भारत का प्रस्ताव का विरोध किया।
- चीन ने भारतीय सीमा पर परमाणु मिसाइलें तैनात कर दी है, जिनके मारक
क्षेत्र में सम्पूर्ण भारत आता है।
- भारत की चारों ओर से घेराबंदी की दृष्टि से चीन ने पाकिस्तान (ग्वादर
बंदरगाह), बांग्लादेश (चटगांव बंदरगाह), नेपाल एवं श्रीलंका में सैन्य
गतिविधियां तेज कर दी है।
- हमारे देश के अतिसंवेदनशील स्थानों पर विविध परियोजनाओं में निर्माण के
ठेके अत्यन्त कम दरों पर भरकर देश के अन्दर चीन अपनी उपस्थिति एवं
गतिविधियां बढ़ा रहा है।
- चीन ने दैनिक उपयोग की लगभग प्रत्येक घटिया वस्तु को भारत के बाजारों
में सस्ते मूल्य में पहंुचाकर स्थानीय उद्योगों को बन्द कराने की स्थिति
में पहुंचा दिया है। (चीन से भारत को आयात लगभग तीन लाख करोड़ रूपये
वार्षिक है।),
- चीन का रक्षा बजट 150 अरब डाॅलर है जबकि भारत का रक्षा बजट मात्र 36
अरब डाॅलर है।
परिणाम क्या हो सकते हैं ?
- केन्द्र सरकार की सीमाओं पर अनदेखी एवं दुलगुल नीति के कारण अरूणाचल
एवं लद्दाख के सीमान्त प्रदेश गहन संकट में हैं।
- भारत के सभी पड़ोसी देशों में चीनी सैन्य उपस्थिति के कारण हमारा
संपूर्ण देश संकट में हैं।
- अन्तर्राष्ट्रीय विरोध के बावजूद चीन द्वारा अपने क्षेत्र में
बह्मपुत्र नदी पर बड़े बांधों के निर्माण के फलस्वरूप असम सहित
पूर्वाेत्तर राज्यों में सूखे की आशंका।
- सस्ते व घटिया चीनी उत्पादों के भारी आयात से हमारे यहां के लघु व
मध्यम उद्योग जल्दी ही बंद होने के कगार पर है। जिससे लाखों लोगों के
बेरोजगार होने का खतरा मंडरा रहा है।
हम क्या कर सकते हैं ?
- समाज को जाग्रत करके केन्द्र सरकार पर दबाव डालकर देश की सीमाओं की
रक्षा सुदृढ़ करना।
- सक्रिय एवं जागरूक नागरिक होने के नाते हम चीनी उत्पादों का तत्काल
उपयोग बंद करने का दृढ़ संकल्प लें तथा अधिकाधिक समाज बन्धुओं को इस हेतु
प्रेरित करें।
- केन्द्र सरकार पर दबाव बनाकर भारत में टयूरिस्ट वीजा पर रह रहे चीनी
कर्मचारियों को देश से बाहर निकालना।
- संवेदनशील क्षेत्रों में दिए जा रहे ठेकों पर रोक लगाने की मांग करना।
- विभिन्न संगठनों द्वारा इस संदर्भ में सरकार पर दबाव डालने के लिए
आयोजित धरनों, प्रदर्शनों, गोष्ठियों में सक्रियता से भाग लें।
हम पुनः सावधान हों - चीन आज तिब्बत, हांगकांग, ताईवान जैसे देशों को
पूरी तरह निगल चुका है और यदि हम नहीं जागे तो यह दिन हमें भी देखने पड़
सकते हैं।
हम स्वयं जगे - समाज को जगाएं - देश को बचाएं।
स्वदेशी अपनाएं - देश बचाएं।
Tuesday, July 2, 2013
राजू शर्मा के उपन्यास. विसर्जन की समीक्षा ...भूमंडलीकरण बनाम राष्ट्
1. वास्तव में एक दिन स्वदेशी विषय पर आम आदमियों के बीच भाषण देने का अपना मसौदा तेयार कर रहा था. आप जानते ही हैं की ऐसे कठिन विषय को सरल ढंग से अपनी बात रखना बड़े मुश्किल स्तर का काम हैं. इस लिए में नेट पर ढून्ढ रहा था की क्या किसी उपन्यासकार ने आर्थिक सुधारों और भूमंडलीकरण को आधार बना कर कोई उपन्यास इस विषय पर लिखा है क्या? इस खोज मैं नजर पड़ी राजू शर्मा के उपन्यास विसर्जन पर. समीक्षा पढने की कौशिश की तो शायद एक समीक्षा मिली जो अलग अलग लोगों ने अपने अपने ब्लॉग में लिखी थी पर मूल स्त्रोत एक ही था. खैर समीक्षा साहित्यक शब्दावली और लच्छेदार भाषा के जाल मैं पूरी तरह फस्सी हुई थी. पर फ्रीडमन , वैश्वीकरण, सकल घरेलु उत्पाद, या उत्पात, गरीबी रेखा का निर्धारण, आर्थिक सुधारो की गांधी के विचार दर्शन से तुलना आदि बाते देख कर लगा की पुस्तक जरूर पढनी चाहिए . और अभी चार दिन पहले ही ये साढे चार सो पृष्ठों की ये पुस्तक हाथ लगी.. और खट-खट पढ़ डाली. इतना ही नहीं तो मारकर से काफी पेज पीले रंग से पोत भी डाले.
पुस्तक को इधर उधर के रोचक तथ्यों से भरने की कोशिश लेखक ने की... रति प्रसंग सुना कर जिसे मैं 'स्किप' कर कर के आगे निकल रहा था. फिर बीच मैं मेरे लिए रुचिकर आंकड़े आ जाते यथा दिल्ली में अभी भी 195 गाँव आज भी दर्ज है, की रा की स्थापना देश से बाहर गुप्तचरी के लिए 1968 में हुई, की दिल्ली में 86000 ओटो हैं, और की दिल्ली मैं 73072 साईकल रिक्शे दर्ज है, की दो लाख से ऊपर गैर लाइसेंसी रिक्शे भी पुब्लिक की सेवा कर रहे है, की पढ़ा लिखा मूरख तुगलक दिल्ली का ही था और आज उसके वंशज फिर राज कर रहे हैं,आदि आदि. मन में एक संतोष था की भूमंडलीकरण न भी समझ आया तो कम से कम दिल्ली तो समझ आ ही जाये गी. पर धीरे धीरे लेखक भूमंदलीकरण की और भी बढ़ता है और अच्छे ढंग से व्याख्या करता हैं. बेशक पुस्तक फ्री मिली थी पर लगा की की यदि खुद खरीदी भी होती तो पैसे वसूल हो गए थे.
पर एक तथ्य और था जो पुस्तक को गहराई से पढने के लिए प्रेरित कर रहा था. वो पक्ष था लेखक का व्यक्तित्व. लेखक सफल सिविल सर्वेंट रहा हुआ था और यही ग्रुप था जिसने एक बार भ्रष्ट प्रशासनिक अधिकारीयों की सूची जारी करके तहलका मचाया था. पढ़ा आगे ये भी था की अभी 2010 में उसने ये कह कर प्रशासनिक सेवा से मुक्ति ले ली थी की अब आगे चलना संभव नहीं था. मतलब ये की लेखक का उपन्यास लिखना कोई रोजी रोटी कमाने का धंधा नहीं है बल्कि एक मिशन है. ऐसा उसका बायो डाटा पढ़ कर लगा. सही गलत तो आगे की बात है. हाँ इस पुस्तक को जरूर पढना चाहिए ये लगा. आओ, अब जरा गंभीर विमर्श करे पुस्तक का लेख पक्षधर के 13 वे अंक मे छप चुका जो मेरे भी कट पेस्ट का कमाल है..
2. हिंदी साहित्य मैं यद्यपि दिखता तो यही है की भूमंडलीकरण और आर्थिक सुधारों पर बबुत काम हुआ है, पर वास्तव मैं ऐसा है नहीं:
यह उपन्यास ऐसे समय में आया है जबकि हिन्दी साहित्य में भूमंडलीकरण व उसके प्रभावों को लेकर प्रचुर मात्रा में रचनात्मक व आलोचनात्मक लेखन हो रहा है किन्तु यह लेखन भू-मंडलीकरण के दृश्यमान प्रभावों, राजनीतिक परिदृश्य, अस्मितागत विमर्शों आदि पर ज्यादा हो रहा है। ‘जल-जंगल-जमीन’, स्त्री, दलित, आदिवासी, नव समाजिक आंदोलनों, मार्क्सवाद के फेल्योर आदि पर हो रहे लेखन को देखकर प्रथम दृष्टया तो यह लगता है कि हिन्दी के साहित्यकार भूमंडलीकरण व उससे उत्पन्न खतरों को न सिर्फ पहचान रहे हैं बल्कि उससे मुठभेड़ भी कर रहे हैं । किन्तु गहराई से इस पूरे रचनात्मक परिदृश्य पर नजर डालने से यह साफ हो जाता है कि भूमंडलीकरण को लेकर जो पूरा विमर्श हिंदी साहित्य में चल रहा है वह भूमंडलीकरण के प्रति सिर्फ एक सामान्य छात्रोपयोगी समझ ही विकसित कर पा रहा है। भूमंडलीकरण का डीकंस्ट्रक्शन’सही मायनों में हिंदी साहित्य में अभी तक संभव नहीं हो पाया है। दरअसल हिंदी साहित्य ने जाने अनजाने ही अपनी सुविधानुसार कही न कही भूमंडलीकरण के प्रति अपनी चिंताओं का एक आसान सा वृत्त तैयार कर लिया है। जिसका केन्द्र भूमंडलीकरण है और स्त्री , दलित’ आदिवासी, बाजार उस केन्द्र के ईद-गिर्द वृत्त का निर्माण करते हैा जाहिर तौर पर हिन्दी लेखन केंद्र के माध्यम से इन्हीं कुछ विर्मशों पर गोल-गोल घुम रहा है। हिन्दी साहित्य में भूमंडलीकरण के मेकेनिज़्म को समझते हुए, उसके भीतर घुसकर उसे डीकंस्ट्रक्ट करने, सत्ता के साथ उसके रिश्ते की द्वंद्वात्मकता को समझते हुए उसकी समूची कार्य प्रविधि का अध्ययन करते हुए नये सत्ता संबंधों को उजागर करने, आर्थिक नीतियों (अर्थशास्त्र),सांख्यिकी, विज्ञान, सूचना प्रौद्योगिकी आदि को किस तरह वह अपने हक में व्याख्यायित करता है या कैसे यह चींजें उसे मजबूत करती हैं- को देखने का सार्थक काम हिन्दी में तकरिबन न के बराबर हुआ हैं।
3. उपन्यास का सारांश की देखने मैं भूमंडलीकरण के नारे अच्छे है पर है य. स्वनाशी औ सर्वनाशी :
वसर्जन में राजूशर्मा का शुरुआती वाक्य है-"कुछ लोग होते हैं, एक नज़र देखो और लगता है इसे बादशाहियत हासिल है, दूसरे उंगलियों में चक्र के यह चक्रवर्ती है, पर यह आँखों में झाँकने के पहले का अहसास है क्योंकि उसकी आँखें दो सयाह गहरी सुरंगे हैं और तब तुम जान लेते हो जो वह हमेशा से जानता है। यह बादशाह स्वनाशी है, अपना ही निषेध ।" यह वाक्य अपने समूचे व्याप्ति में भूमंडलीकरण व बाजार की हकीकत को उजागर करता हैा भूमंडलीकरण, बाजार की चकाचौंध हमें कहीं न कहीं शुरूआत में यह आश्वस्त करती हैं कि स्वतंत्रता बंधुत्व, बहुलतावाद, अवसर की सामनता जैसी बड़ी अवधारणाये इसमें अन्तर्निहित है किन्तु यह आभासी व छ्द्म यथार्थ ही है, जैसे ही हम इसकेभीतर प्रविष्ट होते हैं, इसकी विध्वंसकता व इसके शोषक व दमनकारी चरित्र को जानते हैं तब स्पष्ट होता है कि इस चमक-दमक के पीछे एक विद्रूप चेहरा है। उपन्यास के प्रमुख चरित्र रंगराजन के व्यक्तित्व व कार्यों पर भी पूर्वोक्त पंक्तियाँ काफी सटीक बैठती हैं। वह स्वनाशी है साथ ही अर्थ विस्तार करें तो सर्वनाशी भी । इतना ही नहीं उपन्यास का यह शुरूआती वाक्य वर्तमान हिन्दी साहित्य के परिदृश्य पर जो कि भूमंडलीकरण से संबंधित है पर भी सटीक बैठता है। ऊपर से देखने पर तो यह भू मंडली करण का निषेध (प्रतिरोध) करता दिखता है किन्तु, भीतर घूसकर देखने पर रचनात्मक रिकत्तता ही नजर आती है।
पी.वी. इस उपन्यास का प्रमुख पात्र है। धारावाहिक घोटाले के पीछे का दिमाग पी.बी का ही है। वह नायक/खलनायक दोनों ही है। उसके फलसफ़े में ‘’निजी स्वेच्छाचार समाज का केन्द्रिय मूल्य है। उसका मानक-मणि दर्शन कहता है कि व्यक्ति की स्वतंत्रता स्टेट और उसके दावों से पूर्व और मौलिक है और आजाद माहौल में सहयोग की दशा खुद-ब-खुद प्रवर्तित होती है। स्टेट के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं। वह शास्त्रीय उदारवाद के प्रतिमानों में हर खलल और बदलाव के खिलाफ है ।उसकी मान्यता है जो उदारवाद को पजिटिव अधिकार , प्रगतिशील कर और कल्याणकारी नीतियों से जोड़ते हैं वे प्रदूषक और खतरे की घंटी हैं।"
दरअसल पी.बी. रंगराजन के बौद्धिक सरोकार और उसके राजनीतिक दर्शन, अर्थ-सिद्धान्त के आस्ट्रियन स्कूल से आधार पाते हैं। वह हायक, नोजिक और मिल्टन फ्रीडमैन जैसे महान विचारकों से अपने सिद्धान्त और कार्य-योजनाएँ गढ़ता था । खासकर फ्रीड़मैन को वह सबसे अर्थ गर्भित मानता था क्योंकि बकौल पी.बी. "फ्रीड़मैन ने अंतिम रूप से साबित कर दिया कि असली सामाजिक और राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए मुक्त बाजार और न्यून स्टैट एकमात्र और सही विकल्प है।" वस्तुत: पी.वी. मुक्त बाजार का टिमायती होने के साथ-साथ अराजकतावादी भी है। वह अपने चिंतन में स्टेट को वलफेयर से अलग करता है। व्यक्ति स्वातंत्र्य का वह हिमायती अराजकता की हद तक है । ‘ पी.वी. ने 'हमेशा सामजवादी विचारधारा को खारिज किया । उसकी नजर में समता को अलग से तरजीह देना बैल को हाँकने की जगह उसकी पूँछ में फुलझड़ी लगाने के जैसा है।‘हायक’ 'नोजिक' और 'फ्रीडमैन' जिन्हें वह गांधी जी के तीन बंदरों की जगह बिठाता है मुक्त-बाजार के परम हिमायती थे । ‘रार्बट नोजिक एक मिनारकिस्ट था। न्यून सरकार होनी चाहिए । सरकार के बस तीन काम है, जान-माल की सुरक्षा, हिंसा का दमन और निजी करार का प्रवर्तन ।' जबकि हायके ने निजी सम्पत्ति के तत्वों को सभ्यता का जन्म बताया। उसके अनुसार मुक्त मूल्य प्रणाली इतनी ही मौलिक है जितनी की भाषा की उत्पत्ति।‘’ पी.वी. इन विचारकों से ऊर्जा ग्रहण करता है। वी.पी. के भीतर एक नई ग्रस्तता भी थी जिसके तहत वह खुद को इक्कीसवी शताब्दी यानी आज का माहत्मा गांधी समझने लगा था । ‘’वी.पी.के त्वरित दिमाग में गांधी और उसकी अपनी जीवनी में बारीक और सरासर समानताएँ दिखाई दे रहीं थीं। जिस तरह गांधी अधेड़ उम्र में अचानक दक्षिण अफ्रीका से लौटा था, पी.वी. अमरीका से खास समय लौटा है। वहुत जल्न्दी महात्मा ने कांग्रेस पार्टी और देश की जनता पर अपना प्रभुत्व जमा लिया था; पी.वी. ने तमाम संस्थाओं का नेटर्वक तैयार किया है। वह उनका नेतृत्व कर रहा है और मिडिल क्लास उसका नित्य अभिनंदन कर रही है। महात्मा गांधी ने चरखा, धोती और खादी को अपने आंदोलन का प्रतीक बनाया; पी.वी. ने योग साधना की कल्ट पैदा की, आर्थिक सुधार ,अभिव्यंजना और अभिलाषा को खुशहाली का गुरू-मंत्र बनाया और बचत, निवेश और विकास का सदगुण चक्र। गांधी जी ने आजादी के लिए अहिंसा और सत्याग्रह का अनोखा तरीका ईजाद किया; पी.वी. ने बाजारवाद और ग्लोबलाइजेशन का एक देशी संस्करण सामने रखा । महात्मा गांधी ने आत्मत्याग और सरल जीवन का पाठ पढाया था; और पी.वी. ने अनन्त अभिलाषा और लाभ के लिए उधारजनित उपभोग को दिव्य-बोध की रोशनी दी।‘’और महात्मा गांधी की तरह पी.वी. के पास न सरकारी पद था, न राजनैतिक गद्दी और न वह इस दौड़ में शामिल था। दरअसल पी.वी. आर. रंगराजन के चरित्र का यह पक्ष और इसको निर्मिता करने वाले दार्शनिक आर्थिक आधार जो कुछ भी इस उपन्यास में कराते हैं वह भारतीय स्टेट की उस बिडम्बना को दर्शाता है जो उसने ग्लोबलाइजेशन के चलते गांधी व उनके विचारों के साथ किया है। सिर्फ ग्लोबलाइजेशन के चलते ही क्यू वरन् आजादी के बाद से ही गांधी व उनके विचारो के साथ भारतीय सरकार का सलूक उपेक्षापरक ही रहा है ।उपन्यास का ताना-बाना पी.वी. के चरित्र की इन्हीं खासियतों के ईद-गिर्द बुना गया है।
4. कथानक का ताना बाना:
धारावाहिक घोटाले की जांच से शुरू होने वाली उपन्यास की कथा जांच के बहाने, जांच की प्रक्रिया से ही आगे बढ़ती है और उसी प्रक्रिया में पी.वी. के चरित्र खासकर उसके द्वारा किये जा रहे कार्यों से भूमंडलीकरण का रेशा-रेशा हमारे सामने खुलता जाता है। ऐसार, टुप्पुर, भीमसिंह आर्दश दरबारी, प्रोफेसर चन्द्रशेखर आदि के बीच होने वाली बातचीत से ही उपन्यास का केन्द्रीय विर्मश आगे बढ़ता है। दरअसल, राजू शर्मा के उपन्यासों की यह खास प्रविधि है कि वह पॉलीमिक्स की थ्यौरी अपनाते हैं । वह स्थितियों का चित्रण घटनाओं के बजाए बातचीत से करते हैं और इन्हीं बातचीत के माध्यम से स्थितियाँ, परिस्थितियां पाठकों के सामने खुलती जाती हैं ऐसार और प्रोफेसर चन्द्र शेखर की बातचीत हो ऐसार और पी.वी. की या पी.वी. का खुद का आत्मालाप सब के सब भूमंडलीकरण के मेकनिज्म को खोलते ही हैं। उसको डीकास्ट्रक्ट करते हैं ।
5. इस पूरे विमर्श को समझने के लिए हमें थोड़ा इतिहास में पीछे लौटाना पडे़गा :
बहरहाल ! पी.वी. के चरित्र की विशेषताएं और खासकर उसके द्वारा अपने आप को इक्कीसवी सदी का गांधी समझने की ग्रस्तता भूमंडलीकरण, बाजार व वर्तमान भारतीय-राष्ट्र के अंत:संबंधों के परिदृश्य पर एक बड़ा विमर्श रचती है, एक नये किस्म के बहस का स्पेस निर्मित करती हैं । यहीं विमर्श ‘उपन्यास’ के नाम विसर्जन को भी सार्थक करता हैं। वह उसकी अर्थव्याप्ति के तमाम स्तरों को उजागर भी करता है। दरअसल इस पूरे विमर्श को समझने के लिए हमें थोड़ा इतिहास में पीछे लौटाना पडे़गा खासकर भारत की आजादी के ठीक बाद के परिदृश्य तक । भारत में उपनिवेशवाद से पूर्व राज्य का आदमी के जीवन में कोई बहुत सीधा हस्तक्षेप नहीं था। तब न राष्ट्र की अवधारणा थी न राष्ट्रवाद की । उन दिनों बाजार भी आज का बाजार नहीं था । वह तुलसी, कबीर, के यहाँ दूसरे संदर्भों का बाजार था । एक कहावत जो कि तुलसी के मानस के हवाले से लोक में व्याप्त थी ‘कोई नृप होये हमें का हानी’, स्टेट और आम आदमी के रिश्ते को ठीक से व्याख्यायित करती है। किन्तु जब भारत उपनिवेश बना तब अंग्रेजो ने धीरे-धीरे हमारे मस्तिष्क में स्टेट को बैठाया। स्टेट की नीतियों का सीधा हस्तक्षेप हमारे रोज़मर्रा के जीवन में होने लगा । चूंकि स्टेट की एक कार्यप्रविधि थी, मशीनरी थी, इसलिए समाज के क्रिया व्यापार, उसके जीवन, रहन-सहन आदि के नियंत्रण में उस मशीनरी का हस्तक्षेप ज्यादा बढ़ना स्वाभविक था। सबसे बड़ी बिडम्बना घटित हुई आजादी के बाद । वर्तमान पूँजीवादी व्यवस्था चूंकि अर्थ को केन्द्र में रखती है और वर्तमान आर्थिक जगत व्यक्ति को व्यक्ति नहीं वरन ऑकड़े में रिडयूस करके देखता है । प्रोफेसर महेल्नवीस की अध्यक्षता में भारतीय सांख्यिकी विभाग के गठन के बाद आज तक भारतीय राष्ट्र की नीतियां आकड़ों से मुक्त नहीं हो पायी हैं। व्यक्ति आज भी महज एक आंकड़ा है। गरीबी रेखा तय करने का आंकड़ा, मुद्रार्स्फीति ,शेयर-सूचकांक, देश की आर्थिक वृद्धि व उसकी विकास दर आदि के नाम पर परोसे जाने वाले आंकड़े प्रथमत: और अन्तत: मानवीय गरिमा का हनन ही करते हैं। मानसी के शब्दों का सहारा लेकर रहा जाय तो सांख्यिकी/ समुच्चयता गैर मानवीय दृष्टिकोण है । गरीबी की गणना के सम्बन्ध में मानसी द्वारा ऐसार को दिया गया यह तर्क कि ‘’…… हमारे अर्थ जगत में गरीबी की परिभाषा की जद्दोजहद आज भी जारी है। पचास साल से ज्यादा हो गये और आज भी हम गरीबी का नाप भोजन की कैलोरी आवश्यकता के आधार पर करते हैं। मोटा-मोटा यह कि कितना खाने और जिन्दा रहे । मानो इंसान नहीं पशु की बात कर रहे हैं। ‘’ आंकड़ों के खेल को अनावृत करता है । स्टेट द्वारा प्रस्तुत किये जाने वाले आंकड़े तेजी से कम होती गरीबी का मिथ्या यथार्थ सृजित कर रहे हैं। अर्थात-आजादी के बात से जो आंकड़े का झूठा खेल इस देश में शुरू हुआ था वह आज ज्यादा भयवाह स्थिति में पहुँच गया है।
आंकड़ों की महिमा को एक अर्थशास्त्री होने के कारण पी.वी. आर. रंगराजन ठीक से समझता था। इसलिए उसने सांख्यिकी विभाग से आंकड़े चोरी करवाये । वह जानता था कि सूचनाये; आंकडे़ आज के सत्ता की कुंजी हैं। इनसे वह सरकार गिरा सकता है । पी.वी. का चरित्र जैसा कि मैंने पहले कहा एक बड़ा विमर्श रचता है। वह अपनी तुलना गांधी से तो करता है किन्तु गांधी की शब्दावली का इस्तेमाल करते हुए भी वह गांधी का कुपाठ प्रस्तुत करता है। पी.वी. का चरित्र अपनी पूरी अन्विति में प्रतिरोधी ज्ञान मीमांसा को उलट देता हैं, उसमे ग्लोबलाइजेशन का संदर्भ और अर्थ भरता है दरअसल दुनिया के ज्यादातर बड़े दार्शनिक अपने चिंतन में स्टेटलेस सोसायटी की वकालत करते हैं फिर वह चाहे मार्क्स हों या गांधी । गांधी तो राज्य को गैर जरूरी मानते थे। वह कहते थे कि वैसे तो राज्य होना ही नहीं चाहिए चीजों का नियोजन इस तरह से हो कि व्यक्ति व समाज का नैतिक उन्नयन हो जिससे कि राष्ट्र औटोमेटेड हो जाए । अगर राज्य बहुत जरूरी हो या कि हो भी (गांधी राज्य को अनिवार्य बुराई मानते थे) तो ‘संचार’, विदेश-नीति व रक्षा मामलों तक ही सीमित हो । गांधी के सम्पूर्ण चिंतन में परस्पर सहभाव, अहिंसा नैतिक उन्नयन( व्यक्ति व समाज का )पर बल है। उनके केन्द्र में अंतिम आदमी है । उनके स्वराज की अवधारणा अंत्योदय से पूरी होती है। किन्तु,पी.वी. अपने फलसफे में गांधी का ठीक उल्टा है। न्यून स्टेट, व्यक्ति स्वतंत्र्य आदि सम्बन्धी उसकी अवधारणा के केन्द्र में परस्पर सहकार नहीं वरन गलाकाट प्रतिस्पर्धा है। गांधी के यहाँ व्यक्ति लगातार परिभाषित है। वह अंतिम आदमी है जिसके पास कुछ भी नहीं है। गांधी उसके उदय / उत्थान/ उन्नति की बात करते हैं। मार्क्स के यहाँ भी व्यक्ति श्रमिक के रूप में हैं । न ही गांधी व्यक्ति स्वतंत्र्य के विरोधी थे और न ही मार्क्स । मेनीफेस्टो में साफ-साफ कहा गया है कि प्रत्येक की सवतंत्रता सबके स्वतंत्रता की अनिवार्य शर्त हैं । बावजूद इसके पी.वी. मार्क्स को पसंद नहीं करता क्योंकि एक तो मार्क्स का आर्थिक चिंतन पी.वी. के उलट है दूसरा बड़ा कारण पी.वी. के व्यक्ति का गांधी व मार्क्स के व्यक्ति से अलग होना है। पी.वी. का व्यक्ति का ‘अंतिम आदमी’ या समाज का दबा कुचला गरीब व्यक्ति अथवा श्रमिक नहीं है बल्कि वह है जो बाजार में पैसा लगा सकता है,उसको मजबूत करता है, जिसके पास क्रय शक्ति हैं। जाहिर तौर पर वह उच्च वर्ग या कि मध्य-वर्ग है। मध्य वर्ग आज बाजारा को सबसे ज्यादा मजबूत कर रहा है। इसलिए यह अकारण नहीं है कि वह पी.वी. कि जय-जय कार करता है, उससे पूजता है। पी॰वी॰ साफ कहता है कि देश के असली सैनिक तो वे लाखों मिलेनिथर लोग हैं जो डॉलर कमा रहे हैं। वहीं देश की अर्थव्यवस्था के इंजन हैं।
इस उपन्यास में पी.पी. का चरित्र एक तरीके से गांधी का ग्लोबल प्रति-संस्करण हैं। जिस तकनीकी का गांधी जीवन भर विरोध करते रहें उसी तकनीकी की सहायता से पी.वी. ने अगवा ग्रुप बना करके देश में सरकार के विरोध में एक माहौल कायम किया । उसे सत्ता तक पहुँचने की कुंजी के रूप में वह इस्तेमाल करता हैं। इतना ही नहीं ‘अहिंसा’ को वह आर्थिक सुधार से जोड़ कर पर्चे भी लिखता हैं। उसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि वह ग्लोबलाइजेशन का प्रतिनिधि चरित्र हैं। उसने पूरी प्रतिरोधी ज्ञान परम्परा की भाषा पर अपना कब्जा जमा लिया है। अंतिम आदमी की भाषा पर कब्जा करके उसने उन्हें गूंगा बना दिया है, उनकी भाषा उसने छीन ली। इसीलिए जब पी.वी. बोलता है तब सब उसे सिर्फ सुनते हैं। वह हमेशा वक्ता होता है। दरअसल पी.वी. ‘सर्वदर्शनग्राही’ है। जिस तरह भूमंडलीकरण गांधी को लेकर चेग्वेरा तक का का इस्तेमाल अपने सामान बेचने के लिए करता है, या कि लोकतंत्र का छद्म यथार्थ प्रस्तुत करता है । ठीक उसी तरह उसे पी.वी. भी गांधी, अहिंसा, न्यून स्टेट, व्यक्ति स्वातंत्र समता ,सबके उत्थान आदि की बात करता हुआ बाजार, को मजबूत बनाने का काम करता है। परम्परा , राष्ट्र, आदि जैसी बड़ी अवधारणाओं का उपयोग वह बाजार व भूमंड़लीकरण के अनुकूल मानस निर्माण करने में करता है। वह बड़े व महान दार्शिनिकों, समाजसुधारकों की तरह सवाल उठाता है। वह कहता है ‘अपराधी, अपराध, कानून, न्याय, राज्य,... ऐसी अवधारणाओं को दोहन कर तुम और तुम्हारी सरकार अपना जो वर्चस्व कायम रखती है, क्या वह इतना ही मूर्त और परम है ? अखंड और अचल ? हर युग का, समय का निश्चित पथ ? क्या ये राष्ट्र और राज्य के घृणित हथियार नहीं जिनसे वह अपने स्वार्थ और हित की रक्षा करता है। राज्य का विचार सदा संदिग्ध और धूर्त है और वह निरन्तर धूर्त तरीकों से अपनी वैद्यता जनमानस पर थोपता है। और में अपराधी हूँ तो राज्य कितना बड़ा अपराधी हुआ ? क्या ताकतवर अपराधी कम ताकतवर अपराधी को सजा दे, यह न्याय, है।‘’ पी.वी. का यह लहजा दास्तयत्सकी के उपन्यास ‘अपराध और दंड़’ की उस थीम की याद दिलाता है कि इस दुनिया में जिसने भी लीक से हटकर काम किया प्रथमत: उस समय उसे अपराधी माना गया। ईसा मसीह, गांधी, गैलिलियों आदि तमाम नाम इसके उदाहरण हैं। इनके साथ स्टेट ने जिस तरह का बर्ताव किया। उससे पी.वी. की बात सही प्रतीत होती है। वास्तव में पी.वी. तमाम बड़ी अवधारणाओं को मनुष्यता के हित से हटाकर उनसे उनके मूल अर्थ का विसर्जन कर बाजार के हित में इस्तेमाल करता है। इस पूरे परिदृश्य पर राजू उपन्यास में बहुत सटीक टिप्पणी करते हैं। वे लिखते हैं,’’ .... यह भाषा कोई औजार या संवाहक नहीं, खुद विमर्श है। जो भाषा खुद विमर्श और तर्क हो गई है। वहाँ विर्तक की भाषा कहाँ से आएगी ........। अर्थात जिस भाषा के या कि जिन अवधारणाओं को इस्तेमाल कर उपनिवेशवाद या कि शोषण के खिलाफ लड़ाई लड़ी गई थी, जिस भाषा का इस्तेमाल अतीत में तमाम विचारकों, राजनीतिज्ञों, चिंतकों ने’ हेजमीनी को तोड़ने में किया था इतिहास की बिडम्बना से वहीं भाषा खुद शोषण में सहयोग कर रही है। बाजार को स्थापित करने का एक माध्यम हो गई है। पी.वी. की भाषा से लेकर लडकियों के कूल्हों व वक्ष पर टी-शर्ट’ जींस पर खुदे क्रांतिकारी नारों, अहिंसा के संदेश, गांधी या चे की तस्वीरों ने उन्हें अर्थहीन बना दिया है। अब वे महान व्यक्ति व उनके संदेश ‘एक्शन’की जगह ‘फैशन’ बन गये। वर्तमान समय में तो भाषा भी ग्लोबल और निगमित हुई है। कहने की जरूरत नहीं बची है और न ही प्रतिरोध के प्रतीक। सबसे उनके अर्थ व कान्टेक्सट का विसर्जन हो गया। यह शायद इसी का नतीजा है कि साध्य और साधन की पवित्रता में यकीन रखने वालें गांधी जिन्होंने नैतिक बल की सहायता से देशहित में ब्रिटिश शासन पर सवाल खड़े किये थे व उन्हें तोड़ा था, उनसे अपनी तुलना करने वाला पी.वी. देश के कानून को निजीकरण के हित में चुनौती देता है उस पर सवाल खड़े करता है। भारतीय राष्ट्र या कि मनुष्यता के इतिहास की इस त्रासद बिडम्बना को राजू ने पूरे उपन्यास में विन्यस्त किया है।
5. वी.एस.एन. एल. व एम.टी.एन.एल. का मसला हो या दूरदर्शन के निजीकरण का अथवा रियल स्टेट बूम इस उपन्यास में:
‘विसर्जन’ में राजू की बारीक निगाह भारतीय राजनीतिक व समाज में नब्बे के बाद होने वाले परिवर्तन पर है। वी.एस.एन. एल. व एम.टी.एन.एल. का मसला हो या दूरदर्शन के निजीकरण का अथवा रियल स्टेट बूम का सब पर राजू की दृष्टि इस उपन्यास में रही है। जमीन के करोबार की राजनीति, वर्तमान परिदृश्य में भूमि का मार्केट से जो रिश्ता है और जिसके चलते भूमि सम्बन्धी कानूनों में व्यापक फेरबदल किये जा रहे हैं। उस पूरे चक्र को इस उपनयास में केन्द्रीयता प्राप्त है । पी.वी. की महत्वपूर्ण चिन्ता जमीन को सरकार द्वारा अनलाक करा देने को लेकर है वह जमीन के महत्व को लेकर कुछ महत्वपूर्ण आलेख भी लिखता है क्योंकि उसका मानना है कि सिर्फ जमीन को अनलॉक कर दिये जाने से इस देश की तरक्की के तमाम रास्ते खुल सकते हैं। जमीन के पीछे तो इस देश में वैसे भी लम्बी राजनीति काम करती है। सरकारी उपक्रमों को बेचने के बहाने कीमती जमीन को कमीशन लेकर,औने-पैने दामों पर सरकार द्वारा बेचना इस देश में आम है। इसके पीछे के पूरे अर्थशास्त्र को हमारे समाने खोलते हैं।
उपन्यास में राजू शर्मा ने भूमंडलीकरण की महत्वपूर्ण कार्य प्रविधि ‘डिस्कसिर्व प्रेक्टिसेस’ को उजागर किया है, रेखांकित किया है। आज के समय में यथार्थ का कोई मतलब नहीं रह गया है। वर्चुअल रिआलटी ही आज रिअल हो गयी हैं। चीजों का अपने Content से विसर्जन हुआ। न्यू थ्यौरी आँख करेंसी में पूँजी, श्रम से कट गयी है। भाषा, ज्ञान से कट गयी और ज्ञान अन्य सूचना में रिंड्यूस हो गया है। बड़े संदर्भों में कहें तो उत्पादन सम्बन्धों में बदलाव के चलते सुपर स्ट्रक्चर अब बेस से अलग होकर स्वतंत्र होने की प्रक्रिया में हैं, दूसरे शब्दों में कहा जाये तो स्वतंत्र ही हो गया है। एक आभासी दुनिया हमारे सामने यथार्थ बनकर खड़ी है। ज्यादा सही यह होगा कि कहा जाये कि भूमंडलीकरण हमारे सामने सर्वप्रथम एक आभासी यथार्थ रचता है और फिर वहीं यथार्थ बनता है| सब कुछ वीडियों गेम की तरह इस कदर सेट किया जाता हैं कि वह बस हो जाये उसके होने को रोका नहीं जा सकता । इराक युद्ध की तरह पी.वी. भी भारत की अर्थनीति को बदलने उस पर कब्जे का पूरा प्लान वीडियों गेम की तरह सेट करता है और वह फिर हो जाता है। आई.वी. की रिर्पोट जो कि थी ही नहीं, ऐसार की तहकीकात जो उसे दोषी साबित करते थे या फिर सरकार, कोई उसे नहीं रोक पाता। सरकार तो उसे पदम् विभूषण, भारत रत्न देकर पुरस्कृत ही करती हैं।
हमारे समय का यथार्थ अब ब्लैक एंड़ व्हाइट नहीं रह गया है वरन वह धूसर और ग्रे है । इसमें चीजों को ठीक-ठीक लोकेट कर पाना काफी मुश्किल हो गया है। राजू शर्मा ने इस उपन्यास में यथार्थ को लोकेट करने की कोशिश की है, आभासी या कि छाया यथार्थ को अनावृत्त करके। इस उपन्यास को पढ़ने पर लगता है कि राजू शर्मा ने उत्तरआधुनिकता के तमाम लक्षणों को , उसकी विशेषताओं को औपन्यासिक स्ट्रक्चर में गूंथ कर प्रस्तुत कर दिया है। ‘विसर्जन’ उत्तरआधुनिक सिद्धान्तों का उसके प्रभावों-दुष्प्रभावों का रचनात्मक प्रस्तुतिकरण है।
6. किस तरह से छ्द्म यथार्थ रचती है वह क्रिब रिर्पोट. : उत्तरआधुनिकता किस तरह से छ्द्म यथार्थ रचती है वह क्रिब रिर्पोट व उसके सम्बन्ध में की गई उपन्यासकार की टिप्पणियों से खुलता है। 2050 तक भारत के चीन और अमरीका के बाद सर्वाधिक विकसित देश बनने का दावा करने वाली इस रिर्पोट से जुड़ी उपन्यासकार की टिप्पणी काफी महत्वपूर्ण है- ‘’पर शर्त यह है कि इन क्षमताओं की उपलब्धि के लिए आर्थिक सुधार, सही संरचनाएँ, मुक्त बाजार खुलापन तथा शिक्षा बेहद जरूरी है। एक तरफ से यह चक्रवृद्धि का कमाल दर्शाता है और सीधी-सीधी भाषा में यह संदेश देता है कि अगर आज तुम गरीब हो तो कल तुम अमीर होंगे, बशर्ते निर्दिष्ट राह पर चलो । वही प्राचीन धर्मशास्त्रों का तरीका।‘’
आर्थिक जगत अथवा भूमण्डलीकरण के क्रूर व आलोकतांत्रिक चेहरे पर प्रोफेसर चन्द्रशेखसर और साफ शब्दों में प्रकाश डालते हैं, ‘’…. रिर्पोट का पैमाना, उसकी महिमा, उसका चिकना अहंकार, अभीप्सा और निश्चितता उसे घातक बनाती है, बहस की शर्तें निधारित करती है और प्रतिमान की स्पेस निगल लेती है।‘’ अर्थात् विरोध के लिए इस व्यवस्था में कोई स्पेस नहीं रह जाता। सब कुछ पावर स्ट्रक्चर तय करता है। सारे डिस्कोर्स मार्केट ओरियंटेड पावर स्ट्रक्चर से जनरेट होते हैं। दरअसल बाजार हमारे सपने पैदा करता है व बेहत्तर भविष्य का ऐसा झूठ गढ़ता है जिस को प्राप्त करने के लिए यदि हम उसकी कार्य योजना पर अमल करें तो हम ऊपर से नीचे तक एक प्रोडेक्ट में तबदील हो जायें । गांधी के यहाँ विकास के लिए स्वदेशी स्थानीयता के साथ-साथ स्वावलम्बन व सहकार अनिवार्य था पर आज की व्यवस्था में पी.वी. जैसे लोगों के अर्थशास्त्र में स्वदेशी की जगह ग्लोबल व सहकार की जगह शोषण को लाती हैं। राजू शर्मा को स्टेट की सत्ता-संरचना को डिकान्स्ट्रक्ट करने में महारत हासिल है। ‘हलफनामे’ में जो संरचना वह हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं विसर्जन में वह ज्यादा नग्न और भयवाह रूप में मौजूद है। स्टेट वस्तुत: एक अमूर्त सरंचना है जो अपनी प्रकृति में हिंसक हैं। वह अपने अंगों उपायों के माध्यम से अपनी सत्ता व शक्ति का डैमो करता है। जाहिर तौर पर सत्ता व शक्ति की यह संरचना प्रथमत: भाषा में निर्मित होती है। इसलिए स्टेट के पावर स्ट्रक्चर को समझने व उसे तोड़ने के लिए सर्वप्रथम भाषा का डिकांस्ट्रक्शन जरूरी हो जाता है। राजू शर्मा ने विसर्जन में नामों के माध्यम से इस स्ट्रक्चर को डिकान्स्ट्रक्ट करने का प्रयास किया है , ‘डिब’, ‘आदर्श दरबारी’, पी.वी. आर.आर. रंगराजन (वी.आर.= भारत रत्न) जैसे नाम न सिर्फ स्टेट की कार्य प्रविधि का मजाक उड़ाते हैं बल्कि उसके पीछे यथार्थ को बया भी करते हैं। जो आदर्श दरबारी होगा वहीं इस सत्ता व्यवस्था में प्रमुख पद प्राप्त कर सकता है। आई.बी., की पूरी कार्य प्रविधि कि देश की सर्वाधिक महत्वपूर्ण खुफिया ऐजेंसी में किस तरह के लोग हैं, और कैसे उसका उपयोग राजनैतिक फायदे के लिए किया जाता है न कि देश की सुरक्षा हेतु, इस पर विसर्जन विस्तृत बहस करता है। आई.वी. की स्थिति बेहद दर्दनाक व हास्यस्पद है क्योंकि एसार जैसे ईमानदार अफसर की रिर्पोट का कोई मतलब वहाँ नहीं है।
राजू शर्मा के इस उपन्यास की कथावस्तु बहुत व्यापक है पर कथा छोटी। औपन्यासिक प्रविधि के तहत राजू ने डिटेक्टिव फिक्शन प्रविधि का इस्तेमाल कर इस गरिष्ठ को रोचक व पठनीय बनाय है बाजार से शुरू हुआ यह उपन्यास अंतिम में बाजार के सच को उजागर करता हुआ खत्म होता है अर्थात् बाजार राष्ट्र व समाज को बीमार बना रहा है। इसीलिए यह उपन्यास ऐसार, रंगराजन या आदर्श दरबारी की कथा नहीं है उस पूरे समाज की कथा है । एक ऐसा समाज जहाँ नायक और खलनायक में भेद कर पाना मुश्किल है। रचनात्मक व्यक्तित्व वाले ऐसार मेहनत और सच्चाई का कोई मूल्य नहीं है। पी.वी. जैसे लोग नायक हैं। देरिद्रा ने कहा था कि भाषा में बनी बायनरी को उलट देने की जरूरत है मसलन स्त्री- पुरूष, दिन –रात आदि को। बिडम्बना यह है कि यह अवधारणा भूमण्डलीकरण ने इस तरह इस्तेमाल की उन वी.पी. जैसे लोगों को न हम निष्कर्ष रूप में बुरा कह सकते है न समाज कहता है। जो उसकी बेईमानी के सच को चिन्हित करता है उस सच को समाज नहीं मानता। क्योंकि आज न आप किसी को उस तरह अच्छा कह सकते है और न ही बुरा जैसा कि प्रचलित संदर्भों में समझा जाता था। अब सच का सारा मामला दूरबीन के एंगल का है। कोई व्याख्या गलत नहीं है। शायद इसीलिए पी.वी. की व्याख्या गांधी सी दिखती है।
ये सच है की पुस्तक का अंत भारतीय सिनेमा की तरह नहीं होता जहाँ हीरो विजयी होता है और खलनायक को पीट पीट कर सूली चढ़ाया जाता है. सत्यमेव जयते का लोगो अंत मैं दिखाई दे. ये उपन्यास एक दुखांत सा है जहाँ पी वी की ही जीत होती है और सच में देखें तो अभी यही हो रहा है. अभी हर पार्टी मैं अपने अपने रंगराजन है जिनकी जय जय कार हो रही है. पर लडाई अभी लम्बी है . ये भी समझ में आता है.
Tuesday, June 25, 2013
जैव प्रौद्योगिकी नियामक प्राधिकरण (बीआरएआई).विधेयक
1. इस बिल के बारे में वर्तमान प्रासंगिकता :
अप्रैल 22, 2013: महिलाओं और बच्चों पर अत्याचार के खिलाफ भारी विरोध के बीच लोकसभा में बेरहम जैव प्रौद्योगिकी नियामक प्राधिकरण (बीआरएआई).विधेयक पेश हुआ। सीपीआई (एम) के सांसद श्री बसुदेव आचार्य के कड़े विरोध के बावजूद, श्री जयपाल रेड्डी ने इस बिल को पेश किया। इससे साफ जाहिर है कि यूपीए सरकार ने न केवल जनता की आवाज को बल्कि इस विषय में कृषि संसदीय स्थायी समिति (पीएससी) की विश्वसनीय रिपोर्ट को भी पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। पीएससी ने स्पष्ट तौर पर इस रिपोर्ट में सिफारिश की थी कि देश में जीएम फसलों को विनियमित करने के लिए बीआरएआई विधेयक लाना भावी रास्ता नहीं है।
"अधिकांश कृषि विशेषज्ञों का सुविचारित मत है की लोकसभा में आज पेश हुए बीआरएआई विधेयक को पेश किये जाने से पहले एक संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा जाना चाहिए था, जो इस बिल जिसका असर पूरे राष्ट्र और हमारी आगे आने वाली अनेकों पीढि़यों पर सदियों तक रहेगा, के बारे में विधायी परामर्श करवाती।"
बीआरएआई विधेयक का समाज के विभिन्न हिस्सों एवं जनप्रतिनिधियों, सांसदों द्वारा 11वीं लोकसभा में लगातार विरोध किया जा रहा है। बीआरएआई विधेयक इसलिए विवादास्पद है क्योंकि यह भारत में जीएम फसलों के लिए एक एकल खिड़की तंत्र और देश में जीएम फसलों के विरोध गुमराह करने के लिए संप्रग सरकार द्वारा एक प्रयास है। जीएम फसलों के मानव स्वास्थ्य, जैव विविधता और हमारी खेती पर प्रतिकूल प्रभावों के वैज्ञानिक प्रमाण लगातार बढ़ते जा रहे
"अधिकांश कृषि विशेषज्ञों का सुविचारित मत है की विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री आज बीआरएआई विधेयक को पेश किये जाने लिए जिम्मेदार है। ऐसे में हम यहां पर यह बात साफ करना चाहेंगे कि इस तकनीक के प्रमोटरों को ही नियामकों का दर्जा नहीं दिया जा सकता। बीआरएआई विधेयक को सूचना का अधिकार अधिनियम को ओवरराइड करता है और सार्वजनिक भागीदारी के लिए बहुत कम अवसर प्रदान करता है।"
2.जीन संवर्धित (जीएम) फसलों पर किये जाने वाले प्रयोग को लेकर षुरु से ही विवाद :
बीटी बैंगन पर रोक लगाते समय तो तो पर्यावरण एवं वन मंत्री, जयराम रमेश ने कहा था कि अभी देश में एक स्वतंत्र दीर्घ कालिक जैव सुरक्षा आंकलन तकनीक का आभाव है जिससे साफ जाहिर है कि अभी देश इस तकनीक से खेलने के लिए तैयार नहीं है। कठोर बीआरएआई बिल की जगह जैव सुरक्षा संरक्षण व्यवस्था होनी चाहिए।.
भारत में जीन संवर्धित (जीएम) फसलों पर किये जाने वाले प्रयोग को लेकर षुरु से ही विवाद रहा है। कुछ लोग इस तरह के प्रयोग के पक्ष में हैं, तो वहीं कुछ विरोध में। इस बाबत फसलों पर केन्द्रित भारतीय जैव प्रौद्योगिकी नियामक प्राधिकरण विधेयक (बीआरएआई), 2009 को लेकर पहले भी काफी हो-हल्ला मच चुका है।
दरअसल, इस विधेयक के कुछ प्रावधान बेहद ही विवादास्पद हैं। उदाहरण के तौर पर इस विधेयक के आलोक में सूचना के अधिकार के तहत फसलों पर किये जा रहे वैज्ञानिक परीक्षण के बारे में सूचना नहीं प्राप्त की जा सकती है, परीक्षण के बारे में गलत प्रचार-प्रसार करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी की जा सकती है, इसके तहत दी जाने वाली सजा के कुछ प्रावधान टाडा एवं पोटा से भी ज्यादा सख्त हैं, विधेयक के अनुच्छेद 81, 86 व 87.2 के मुताबिक पूर्व के समान कानूनों के ऊपर स्वतः ही इस कानून का प्रभावषाली होना इत्यादि। उल्लेखनीय है कि बीआरएआई कोई नया कानून नहीं है। पुराने विधेयक एनबीआरए को संषोधित करके इस कानून को अमलीजामा पहनाया गया है। नये विधेयक की तरह पुराने बिल का भी जबर्दस्त विरोध किया गया था। इसके विरोध में जानकारों, वैज्ञानिकों एवं विविध सामाजिक संगठनों सहित देष के 11 राज्य थे।
3. स्वदेशी जागरण मंच ने पहले भी किया था हर जगह विरोध :
पूर्व में बीटी बैंगन को लेकर एक जबर्दस्त देषव्यापी आंदोलन हो चुका है। यह एक संवर्धित जीन वाली प्रजाति का नाम है। मूलतः इस प्रजाति के उपभोग से स्वास्थ पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव को लेकर आम लोगों के मन षंका थी, जिसके कारण किसान इसकी खेती करने से परहेज कर रहे थे। यहाँ पर यह बताना समीचीन होगा कि जीन संवर्धन वाले बीजों के इस्तेमाल का दुष्परिणाम तुरंत सामने नहीं आता है। नकारात्मक प्रभाव के सामने आने में कुछ वक्त लगता है। बहरहाल, इस प्रजाति के विकास से जुड़े वैज्ञानिक आम लोगों के डर को दूर नहीं कर सके। साथ ही, इससे संबंधित अन्य प्रावधान भी किसान व जनविरोधी थे, मसलन, जीन संवर्धित फसल को पुनः बीज के रुप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है, क्योंकि वैज्ञानिक परीक्षण से उसकी जनन क्षमता खत्म हो जाती है।
विरोध में धरने-पदर्षन होने के बावजूद बीटी बैंगन की खेती करने के लिए सरकार द्वारा सिफारिष की गई। कालांतर में पुनः उग्र विरोध का सामना करने के कारण उसपर प्रतिबंध लगाया गया। तब जाकर पूरा मामला षांत हुआ। बीटी कपास के विरोध में भले ही व्यापक स्तर पर कोई बड़ा जनांदोलन नहीं हुआ, पर इसके दुष्परिणाम से पूरा देष अवगत है। इसका नकारात्मक प्रभाव विषेष तौर पर महाराष्ट्र, गुजरात और पंजाब में देखने को मिला है।
4. कृषि मंत्री पवार ने दुबारा खड़ा किया विवाद :
इसी क्रम में कृषि मंत्री षरद पवार ने अपने एक हालिया बयान में जीन सवंर्धित फसलों पर खेतों में किए जा रहे परीक्षण को जारी रखने की वकालत करके इस विवाद को फिर से जन्म दे दिया है। श्री पवार के इस बयान को इस लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि माकपा सांसद वासुदेव आचार्य की अगुआई वाली कृषि मामले की संसद की स्थायी समिति ने सरकार को ट्रांसजेनिक फसलों का परीक्षण तब तक प्रतिबंधित करने की सिफारिष की है, जब तक कि भारत में बेहतर निगरानी और देख-रेख की प्रणाली न विकसित हो जाए। इस समिति ने वर्ष, 2009 में बीटी बैंगन की खेती को अनुमति देने की सिफारिष की जाँच कराने के लिए भी कहा है। बावजूद इसके श्री पवार समिति की सिफारिषों से इत्तिफाक नहीं रखते हैं।
उन्होंने कहा कि जीएम फसलों पर षोध और खेतों में परीक्षण जारी रहना चाहिए। हाँ, उसकी वाणिज्यिक खेती में जरुर सतर्कता बरती जानी चाहिए। श्री पवार की राय में जीएम फसलों के परीक्षण पर प्रतिबंध के परिणाम खतरनाक हो सकते हैं। दूसरे षब्दों में कहा जाए तो जीएम फसलों के परीक्षण को रोकना भारतीय विज्ञान के लिए घातक होगा। इससे भारत जीएम फसल को विकसित करने वाले ब्राजील और चीन जैसे देषों से बहुत ज्यादा पिछड़ सकता है। गौरतलब है कि इस मामले में कृषि मंत्रालय की कार्रवाई रिपोर्ट संसद के आगामी सत्र में पेष की जा सकती है। फिलहाल सरकार ने बीटी कपास की वाणिज्यिक खेती की अनुमति दी है, जबकि बीटी बैंगन पर रोक है। निजी कंपनियों को कपास एवं मक्का जैसे जीएम फसलों का पंजाब, हरियाणा, आंध्रप्रदेष और गुजरात में खेतों में परीक्षण करने की अनुमति दी गई है।
5-
दुनिया में हो रहे विरोध के कारण:
जीएम फसलों की संकल्पना बहुत पुरानी नहीं है। सबसे पहले वर्ष, 1990 में मल्टीनेषनल कंपनी मोनसेन्टो की सहायक कंपनी कॉलजेन की अगुआई में टमाटर के जीन को परिवर्धित किया गया था। फसलों के जीन संवर्धन के पीछे तर्क है कि इससे फसलों की उत्पादकता एवं गुणवत्ता में इजाफा होगा।
उल्लेखनीय है कि जानवरों के जीन का भी संवर्धन किया जा सकता है। जानवरों के जीन पर इसतरह का परीक्षण सबसे पहले सूअरों पर किया गया था, पर उसके परिणाम उत्साहवर्धक नहीं रहे थे। परीक्षित कुछ सूअरों में आगे जाकर बांझपन के लक्षण दृष्टिगोचर होने लगे थे। इसके बरक्स फसलों पर किये गये अब तक के प्रयोग को भी पूरी तरह से सफल नहीं कहा जा सकता। विष्व के अनेकानेक देषों में इस तरह के परीक्षण पर पाबंदी लगाई जा चुकी है। स्वंय अमेरिका में भी इस मुद्दे पर जानकारों की एक राय नहीं है।
भले ही भारत सरकार फसलों पर किये जा रहे परीक्षण को लेकर बहुत ज्यादा उत्साहित है, लेकिन स्वंय सरकार के दो मंत्रालयों (पर्यावरण एवं विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय का जैव तकनीक विभाग) के बीच इस मुद्दे को लेकर जबर्दस्त मतभेद है। जैव तकनीक विभाग फसलों पर किये जा रहे परीक्षण को सही मान रहा है, वहीं पर्यावरण मंत्रालय का मत इस मामले में भिन्न है। जैव तकनीक विभाग का कहना है कि भारत जैसे बड़ी आबादी वाले देष में सभी का पेट भरने के लिए फसलों का जीन संवर्धन करना जरुरी है, अन्यथा आने वाले दिनों में देष की आधी आबादी भूख से मर जाएगी।
इस संदर्भ में एक गैर सरकारी संगठन ‘पैरवी’ द्वारा किये गये पड़ताल में यह पाया गया है कि फसलों का जीन संवर्धन स्वास्थ के लिए घातक है। परीक्षण में प्रयुक्त रसायनों से विविध तरह की बीमारी होने की संभावना रहती है। जीन सवंर्धित फसलों के उपभोग से कई तरह की बीमारियों के फैलने के मामले विभिन्न देषों में पहले ही प्रकाष में आ चुके हैं। उच्च एवं सर्वोच्च न्यायालय के अवकाष प्राप्त न्यायधीषों के संघ ने भी फसलों के जीन संवर्धन पर गहरी चिंता जताई है। केरल सरकार का मानना है कि भारत को अगले 50 सालों तक फसलों के जीन संवर्धन से बचना चाहिए। यह बहुत जरुरी है कि किसी तकनीक को अपनाने से पहले हम उसके साइड इफेक्ट से अवगत हो जायें।
ज्ञातव्य है कि बीते दिनों मोनसेन्टो कंपनी ने ‘गोल्डन राइस’ के जीन को बेटा केरोटीन नामक रसायन की मदद से सवंर्धित करके चावल की एक नई किस्म को विकसित किया था। कहा जा रहा था कि इस नई किस्म से बच्चों में होनेवाले अंधेपन में कमी आयेगी, जबकि हुआ ठीक इसके उल्टा। इसी कंपनी के द्वारा वियतनाम में संतरे के जीन को सवंर्धित करके एक नई किस्म ‘एजेंट संतरा’ को विकसित किया गया, लेकिन उसको खाने से तकरीबन 4 लाख लोगों की मौत हो गई और बड़ी संख्या में लोग विकलांग भी हुए। विषेषज्ञों के अनुसार उसके सेवन से कैंसर के होने की भी संभावना थी।
अमेरिका में भी जीन सवंर्धित सोयाबीन खाने से लोगों के बड़ी आंत में संक्रमण हो गया और उसे ठीक करने के लिए डॉक्टरों को संक्रमित अंग को षरीर से अलग करना पड़ा। ब्रिटिष मेडिकल एसोसिएषन ने भी अपने एक बयान में फसलों के जीन पर किये जा रहे प्रयोग के खतरों के प्रति लोगों को आगाह किया है। एसोसिएषन का मानना है कि भविष्य में इससे और भी समस्याएँ बढ़ेगी। जानकारों का मानना है कि फसलों पर किये जा रहे लगातार परीक्षणों से प्रर्यावरण भी प्रदूषित होगा। रसायनिक तत्व टॉक्सिन और इसतरह के अन्य खतरनाक रसायनिक तत्वों के कारण इंसान का सांस लेना भी दुर्भर हो जाएगा। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि एक बार खतरनाक रसायनिक तत्वों के वायुमंडल में फैलने के बाद उसको रोकना या कम करना आसान नहीं होगा।
6.
सरकार ने बैठाया भट्ठा: जाहिर है विकासषील देष विकसित देषों के लिए महज प्रयोगषाला बनकर रह गये हैं। भारत की स्थिति भी इस मामले में अलग नहीं है। संयुक्त प्रगतिषील गठबंधन (सप्रंग) सरकार महज अमेरिकी आकाओं को खुष करने के लिए फसलों के जीन को संवर्धित करने की कवायद में मल्टीनेषनल कंपनियों को सहयोग दे रही है। आम लोगों की जान को जोखिम में डालकर अमेरिका के साथ गलबहियाँ करना समझ से परे है। वालमार्ट के भारत में स्टोर खुलवाने के लिए अमेरिका में जिस तरह से लाबीइंग की आड़ में पैसों का लेन-देन हुआ है, उसमें सप्रंग सरकार के षामिल होने का भले ही कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिला है, लेकिन मामले में सप्रंग सरकार की किरकरी जरुर हुई है।
फसलों के जीन संवर्धन के संबंध में सरकार का पक्ष संदेहास्पद है और उसके द्वारा अपने को सही साबित करने के लिए दिया जा रहा बयान हर दृष्टिकोण से गलत हैै, क्योंकि संवर्धित फसलों के उपभोग से होने वाले दुष्परिणाम तुरंत सामने नहीं आते हैं। अस्तु सरकार को इस मामले में तुरत-फुरत किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से बचना चाहिए।
Tuesday, June 11, 2013
शहीद राम प्रशाद बिस्मिल का आज जन्मदिन है.
शहीद राम प्रशाद बिस्मिल का आज जन्मदिन है.
unka जन्म 1897 में उत्तरप्रदेश में हुआ और बड़े ही गरीब घर में पलेबौर बढे भगत सिंह इनके जीवन और उनकी कवितायों का फेन था और ऐसे ही बहुत से क्रांतिकारी उनसे प्रेरणा पाते थे.
रोज की तरह उस दिन भी सुबह होती है, लेकिन वह ऐसी सुबह थी जो सदियों तक लोगों के जेहन में रहेगी । दिसंबर का वह दिंन तारीख 19 , फांसी दी जानी थी पंडित रामप्रसाद बिस्मिल को । बिस्मिल को गोरखपुर जेल में फांसी दी जानी थी । रोज की तरह बिस्मिल ने सुबह उठकर नित्यकर्म किया और फांसी की प्रतीक्षा में बैठ गए । निरन्तर परमात्मा के मुख्य नाम ओम् का उच्चारण करते रहे । उनका चेहरा शान्त और तनाव रहित था । ईश्वर स्तुति उपासना मंन्त्र ओम् विश्वानि देवः सवितुर्दुरुतानि परासुव यद्रं भद्रं तन्न आसुव का उच्चारण किया । बिस्मिल बहुत हौसले के इंसान थे । वे एक अच्छे शायर और कवि थे ,जेल में भी दोनों समय संध्या हवन और व्यायाम करते थे । महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती को अपना आदर्श मानते थे । संघर्ष की राह चले तो उन्होंने दयानन्द जी के अमर ग्रन्थों और उनकी जीवनी से प्रेरणा ग्रहण की थी । 18 दिसंबर को उनकी मां से जेल में भेट हुई । वे बहुत हिम्मत वाली महिला थी । मां से मिलते ही बिस्मिल की आखों मे अश्रु बहने लगे थे । तब मां ने कहा कहा था कि " हरीशचन्द्र, दधीचि आदि की तरह वीरता से धर्म और देश के लिए जान दो, चिन्ता करने और पछताने की जरुरत नही है । बिस्मिल हंस पड़े और बोले हम जिंदगी से रुठ के बैठे हैं" मां मुझे क्या चिंतन हो सकती, और कैसा पछतावा, मैंने कोई पाप नहीं किया । मैं मौत से नहीं डरता लेकिन मां ! आग के पास रखा घी पिघल ही जाता है । तेरा मेरा संबंध कुछ ऐसा ही है कि पास आते ही मेरी आंखो में आंसू निकल पड़े नहीं तो मैं बहुत खुश हूँ ।
अब जिंदगी से हमको मनाया न जायेगा। यारों है अब भी वक्त हमें देखभाल लो, फिर कुछ पता हमारा लगाया न जाएगा । बह्मचारी रामप्रसाद बिस्मिल के पूर्वज ग्वालियर के निवासी थे । इनके पिता श्री मुरली धर कौटुम्बिक कलह से तंग आकर ग्वालियर छोड़ दिया और शाहजहाँपुर आकर बस गये थे । परिवार बचपन से ही आर्थिक संकट से जूझ रहा था । बहुत प्रयास के उपरान्त ही परिवार का भरण पोषण हो पाता था । बड़े कठिनाई से परिवार आधे पेट भोजन कर पाता था । परिवार के सदस्य भूख के कारण पेट में घोटूं देकर सोने को विवश थे । उनकी दादी जी एक आदर्श महिला थी , उनके परिश्रम से परिवार में अच्छे दिंन आने लगे । आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ और पिता म्यूनिसपिल्टी में काम पर लग गए जिन्हे १५ रुपए मासिक वेतन मिलता था और शाहजहाँपुर में इस परिवार ने अपना एक छोटा सा मकान भी बना लिया । ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष ११ (निर्जला एकादशी) सम्वत १९५४ विक्रमी तद्ननुसार ११ जून वर्ष १८९७ में रामप्रसाद बिस्मिल का जन्म हुआ । बाल्यकाल में बीमारी का लंबा दौर भी रहा । पूजारियों के संगत में आने से इन्होंने ब्रह्मचर्य का पालन किया । नियमित व्यायाम से देह सुगठित हो गई और चेहरे के रंग में निखार भी आने लगा । वे तख्त पर सोते और प्रायः चार बजे उठकर नियमित संध्या भजन और व्यायाम करते थे । केवल उबालकर साग, दाल, दलिया लेते । मिर्च खटाई को स्पर्श तक नहीं करते । नमक खाना छोड़ दिया था । उनके स्वास्थ्य को लोग आश्चर्य से देखने लगे थे । वे कट्टर आर्य समाजी थे, जबकि उनके पिता इसके विरोधी थे जिसके चलते इन्हे घर छोड़ना पड़ा । वे दृढ़ सत्यवता थे । उनकी माता उनके धार्मिक कार्यों में और शिक्षा मे बहुत मदद करती थी । उस युग के क्रान्तिकारी गैंदालाल दीक्षित के सम्पर्क में आकर भारत में चल रहे असहयोग आन्दोलन के दौरान रामप्रसाद बिस्मिल क्रान्ति का पर्याय बन गये थे । उन्होंने बहुत बड़ा क्रान्तिकारी दल (ऐच आर ए) हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसियेसन के नाम से तैयार किया और पूरी तरह से क्रान्ति की लपटों के बीच ठ गए । अमरीका को स्वाधीनता कैसे मिली नामक पुस्तक का उन्होनें प्रकाशन किया बाद मे ब्रिटिश सरकार नेजब्त कर लिया । बिस्मिल को दल चलाने लिए धन का अभाव हर समय खटकता था । धन के लिए उन्होंने सरकारी खजाना लूटने का विचार बनाया । बिस्मिल ने सहारनपुर से चलकर लखनऊ जाने वाली रेलगाड़ी नम्बर ८ डाऊन पैसेंन्जर में जा रहे सरकारी खजाने को लूटने की कार्ययोजना तैयार की । इसका नेतृत्व मौके पर स्वयं मौजूद रहकर रामप्रसाद बिस्मिल जी ने किया था । उनके साथ क्रान्तिकारीयों में पण्डित चन्द्रशेखर आजाद, अशफाक उल्ला खां , राजेन्द्र लाहिड़ी, मन्मनाथ गुप्त , शचीन्द्रनाथ बख्शी, केशव चक्रवर्ती, मुरारी लाल, बनवारी लाल और मुकुन्दीलाल इत्यादि थे । काकोरी ट्रेन डकैती की घटना की सफलता ने जहां अंग्रजों की नींद उड़ा दी वहीं दूसरी ओर क्रान्तिकारियों का इस सफलता से उत्साह बढ़ा । इसके बाद इनकी धर पकड़ की जाने लगी । विस्मिल, ठा़ रोशन सिंह , राजेन्द्र लाहिड़ी, मन्मनाथ गुप्त, गोविन्द चरणकार, राजकुमार सिन्हा आदि गिरफ्तार किए गए । सी. आई. डी की चार्जशीट के बाद स्पेशल जज लखनऊ की अदालत में काकोरी केस चला । भारी जनसमुदाय अभियोग वाले दिन आता था । विवश होकर लखनऊ के बहुत बड़े सिनेमा हाल 'रिंक थिएटर को सुनवाई के लिए चुना गया । विस्मिल अशफाक , ठा़ रोशन सिंह व राजेन्द्र लाहिड़ी को मृयुदंड तथा शेष को कालापानी की सजा दी गई । फाँसी की तारीख १९ दिसंबर १९२७ को तय की गई । फाँसी के फन्दे की ओर चलते हुए बड़े जोर से बिस्मिल जी ने वन्दे मातरम का उदघोष किया । राम प्रसाद बिस्मिल फाँसी पर झूलकर अपना तन मन भारत माता के चरणों में अर्पित कर गए । प्रातः ७ बजे उनकी लाश गोरखपुर जेल अधिकारियों ने परिवार वालो को दे दी । लगभग ११ बजे इस महान देशभक्त का अन्तिम संस्कार पूर्ण वैदिक रीति से किया गया । स्वदेश प्रेम से ओत प्रोत उनकी माता ने कहा " मैं अपने पुत्र की इस मृत्यु से प्रसन्न हूँ दुखी नहीं हूँ ।" उस दिन बिस्मिल की ये पंक्तियां वहाँ मौजूद हजारो युवकों-छात्रों के ह्रदय में गूंज रही थी---------- यदि देशहित मरना पड़े हजारो बार भी , तो भी मैं इस कष्ट को निजध्यान में लाऊं कभी । हे ईश ! भारतवर्ष मे शत बार मेरा जन्म हो कारण सदा ही मृत्यु का देशोपकारक कर्म हो
इस महान वीर सपूत को शत्-शत् नमन ।
2006, February 11 - 13:37 — sgoyal
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
- By Ram Prasad Bismil
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है ।
करता नहीं क्यों दुसरा कुछ बातचीत,
देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफिल मैं है ।
रहबर राहे मौहब्बत रह न जाना राह में
लज्जत-ऐ-सेहरा नवर्दी दूरिये-मंजिल में है ।
यों खड़ा मौकतल में कातिल कह रहा है बार-बार
क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है ।
ऐ शहीदे-मुल्को-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार
अब तेरी हिम्मत का चर्चा ग़ैर की महफिल में है ।
वक्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमां,
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है ।
खींच कर लाई है सब को कत्ल होने की उम्मींद,
आशिकों का जमघट आज कूंचे-ऐ-कातिल में है ।
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है ।
__
रहबर - Guide
लज्जत - tasteful
नवर्दी - Battle
मौकतल - Place Where Executions Take Place, Place of Killing
मिल्लत - Nation, faith
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Many people have asked me about the lyrics used in the movie 'Rang De Basanti'. Here it goes -- though remember these lines are not part of the original poem written by 'Ram Prasad Bismil'.
है लिये हथियार दुश्मन ताक मे बैठा उधर
और हम तैय्यार हैं सीना लिये अपना इधर
खून से खेलेंगे होली गर वतन मुश्किल में है
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
हाथ जिनमें हो जुनून कटते नही तलवार से
सर जो उठ जाते हैं वो झुकते नहीं ललकार से
और भडकेगा जो शोला सा हमारे दिल में है
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
हम तो घर से निकले ही थे बांधकर सर पे कफ़न
जान हथेली में लिये लो बढ चले हैं ये कदम
जिंदगी तो अपनी मेहमान मौत की महफ़िल मैं है
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
दिल मे तूफानों की टोली और नसों में इन्कलाब
होश दुश्मन के उडा देंगे हमे रोको न आज
दूर रह पाये जो हमसे दम कहाँ मंजिल मे है
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
Saturday, June 1, 2013
छतीसगढ़ में नक्सलियों की पाषविकता से ठिठका जन जीवन
छतीसगढ़ में नक्सलियों की पाषविकता से ठिठका जन जीवन
पिछले दो-तीन दिन से में छत्तीसगढ़ में हूँ और उस से पहले भी 25-26 मई को में बस्तर के साथ लगते और नक्सलवाद से प्रभावित महाराष्ट्र के गढ़ चिरोली जिले में घूमा. हर जगह नकसल वाद की चर्चा है और अखबार इस विषय को लेकर भरे पड़े हैं और एक दल के नेता दूसरे दल पर दोषारोपण कर रहे है. जियादातर लोग श्री जोगी को शक की सुई लगाते नज़र आ रहे हैं. में परसों राजनांदगांव में पुराने विधायक श्री मुदालियर के घर अफ़सोस करने गया जो इस घटना में शहीद हुए. वहां के कांग्रेस के युवा शहीद नेता अल्ला नूर के घर भी बैठने गए. पर हर और लोग श्री जोगी की और इशारा करते हैं. पर नीचे लिखा लेख मुझे काफी सच्चाई के निकट लगा. वैसे लेखक श्री अंजनी झा मेरे पुराने मित्र हैं.
छतीसगढ़ में नक्सलियों की पाषविकता से ठिठका जन जीवन-- डा0 अंजनी कुमार झा
कांग्रेस की परिवर्तन मात्रा के दौरान बस्तर (छतीसगढ़) के निकट सुकमा क्षेत्र में 25 मई को नक्सलियों ने घात लगाकर छतीछतीसगढ़ में नक्सलियों की पाषविकता से ठिठका जन जीवन-- डा0 अंजनी कुमार झा
कांग्रेस की परिवर्तन मात्रा के दौरान बस्तर (छतीसगढ़) के निकट सुकमा क्षेत्र में 25 मई को नक्सलियों ने घात लगाकर छतीसगढ़ प्रदेष कांग्रेस के अध्यक्ष नंद कुमार पटेल और पार्टी के वरिष्ठ नेता महेन्द्र कर्मा समेत 29 लोगों को गोलियों से भून डाला। पूर्व केंन्द्रीय मंत्री विद्या चरण शुक्ल की हालत गंभीर है। प्रदेष में तीन दिन का राजकीय शोक है। पहले कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी, फिर राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कार्यकर्ताओं को ढांढस बंधाया। सभी ने कानून व व्यवस्था की धज्जियां उड़ायीं।
सवाल उठता है कि क्या इसके लिये केवल प्रदेष सरकार जिम्मेदार है ? इस राजनीतिक यात्रा की सुरक्षा के लिये सरकार ने पर्याप्त पुलिस उपलब्ध कराये थे। हां हजारों की तादात में बढ़ रहे हथियारबंद नक्सलियों को रोक पाना एक दर्जन पुलिस के बूते से बाहर है। अंतिम सांस तक पुलिसकर्मी लड़ते रहे। बीस से पच्चीस बर्ष के डेढ़ हजार पुरूष-महिला नक्सलियों का जंगल में दिन की तेज रोषनी में चहलकदमी करना क्या केन्द्रीय सुरक्षा बलों और खुफिया एजेंसी को नहीं दिखा ? बडी संख्या में सीआरपीएफ, बी.एस.एफ,आई.टी.बी.पी. के फोर्स तैनात हैं। फिर ऐसी घिनौनी वारदात कैसे? कई अनुत्तरित सवालों का जवाब केन्द्र के पास भी नहीं है। नक्सल प्रभावित छतीसगढ़ में आज और कल भी नक्सल ही एक मुद्दा रहा। केन्द्र से लगातार गुहार के बाद भी आपरेषन नाकाफी साबित हो रहे हैं। कुछ वर्षों पूर्व अचानक नक्सली वरदातों में बढ़ोतरी को रोकने के बजाय तत्कालीन गृह मंत्री षिवराज पाटिल ने इसे राज्य की समस्या बताकर पल्ला झाड़ लिया। अलग-अलग पार्टी की केन्द्र और राज्य में सरकार बनने के कारण निहित स्वार्थ निर्दोष लोगों की बलि ले रहा है।
राजनैतिक विष्लेषकों का अभिमत है कि यह ‘खेल’ आपसी प्रतिद्वंद्विध़ता का हो सकता है। परिवर्तन यात्रा में उमड़ रही भीड़ कहीं जनादेष में परिवर्तित हो जाये तो मुख्यमंत्री को लेकर दौड़ बढ़ जायेगी, शायद षड्यंत्रपूर्वक इसे समाप्त कर दिया गया। दो दिग्गज रेस से बाहर और एक जीवन और मृत्यु से संघर्षरत है। ऐसे में कुछ समीक्षकों ने तो अजीत जोगी की ओर भी बातों बातों में इषारा किया है।
बहरहाल, जनाक्रोष में लगी चिंगारी लपटों में सरकार को न लपेट ले, इसको लकर राजनीतिक दुराग्रह को समझने की जरूरत है। पूरे प्रांत में चुनाव के निकट आते ही लाषों को बिछाने का ‘खेल’ बढ़ जाता है। केन्द्र इसे राज्य का मामला बताकर चुप्पी साध लेता है, जबकि राज्य अपने सीमित संसाधनों का रोना रोता है। तत्कालीन गृहमंत्री पी.चिदम्बरम के कार्यकाल मे सुकमा के कलेक्टर ऐलिस का दिनदहाडे आहरण समेत सी.आर.पी.एफ के दर्जनों जवानों की नृषंस हत्या जैसी कई वारदातों के बाद भी दिल्ली से केवल ‘वायदों’ का पुलिंदा रायपुर आता रहा। कभी प्रभावित और पीडि़त जिलों को सेना के हवाले तेा कभी विषेष दर्जा देकर विषेष निगरानी की बातें केवल की जाती रहीं। हां, बेकसूर जवानों और निर्दोष नागरिकों का कत्लेआम नरसंहार की तर्ज पर जरूर होता रहा, जो आज भी बदस्तूर जारी है।
सलवा जुडूम के जनक और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता महेन्द्र कर्मा की उग्रवाद की बलिवेदी पर शहादत होना बेहद दुखद अध्याय है। गरीबी और भूख से तड़पते आदिवासियों को नौकरी का प्रलोभन देकर नक्सली उन्हें अपना समर्थक फिर वेतन पर रखकर पुलिस,सरकार, ठेकेदार, उद्योगपति,नेता आदि को निषाना बनाते हैं। सरकार की बेबसी और पूरे सिस्टम में अनगिनत छेद ही नक्सलियों की ताकत को बढ़ाने में यूरिया खाद का काम करती है। भ्रष्ट तंत्र ने पूरे नक्सल प्रभावित क्षेत्र को बेकारी और विवषता की अंधी गली में धकेल दिया है। अकूत प्राकृतिक खनिज संपदा को लूटने में नक्सली भी बड़े हिस्सेदार हैं। गरीबों का मसीहा बनने का नाटक कर अरण्य क्षेत्र पर नक्सलियों का कब्जा उनकी रणनीति है। विचार और सिद्वांत की खुली पोल ने उन्हें भी लुटेरों की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया है। ऐसे में सरकार को व्यूह रचकर नक्सली ताकतों को नेस्तनाबूद करने में पूरी ताकत झोंकनी चाहिये।
सितंबर , 2012 में चतरा (झारखण्ड) मं घायल सी.आर.पी.एफ जवानों के राहत और बचाव मिषन को लेकर वायुसेना और गृह मंत्रालय आमने-सामने थे। वहीं जनवरी 2013 में वायुसेना हेलीकाॅप्टर पर गोलीबारी मामले पर भी दोनों के विवाद खुलकर सामने आये थे। नक्सल प्रभावित क्षेत्रांे में विभिन्न केन्द्रीय सुरक्षा बलों, राज्य पुलिस और खुफिया अधिकारियों के बीच तालमेल का नितांत अभाव के कारण दर्जनों निर्दोष पुलिस और नागरिकों की जानें जाती रही हैं। सुरक्षा अभियान के तालमेल के लिए बतौर सलाहकर सेना के सेवानिवृत मेजर जनरल रैंक में भी कोई प्रगति नहीं हुई। रिटायर्ड सैन्य अफसरों के नामों का पैनल भी गृह मंत्रालय में धूल फांक रहा है।
नक्सली धड़ल्ले से लेवी (रंगदारी टैक्स) औद्योगिक घरानों , सरकारी अफसरों, ठेकेदारों से वसूलते हैं और सरकार उनके दुस्साहस के सामने बौनी साबित हो रही है। एक गैर सरकारी संस्था के सर्वे के मुताबिक, ये 60 प्रतिषत हिस्से को संगठन को मजबूत करने में व्यय करते हैं। इनका मकसद हिंसा को तेज करना, राष्ट्रविरोधी तत्वों से गठजोड़ कर भय का साम्राज्य फैलाना है। बेरोजगारों को रोजगार उपलब्ध कराकर वे अपने गिरोह को संगठित करते हैं। वायदों और वायदों से केवल अलोकप्रिय होती सरकार से बनी नाउम्मीदी ने नक्सलियों को काफी सषक्त बना दिया है।
नक्सलियों ने भाजपा की ‘विकास यात्रा’और कांग्रेस की ‘परिवर्तन यात्रा’ का विरोध किया है।
नक्सलियों से जुड़ी हिंसक घटनाएं
साल घटनाएं
2003 1597
2004 1533
2005 1608
2006 1509
2007 1565
2008 1591
2009 2258
2010 2213
2011 1760
2012 1412
सूबे में 30 साल से नक्सली समस्या एक नासूर बन गई है। 16 जिले पूरी तरह इनके कब्जे में हैं। उनके मजबूत होते पांव ने नागरिकांे का जीना मुहाल कर दिया है। इस बढ़ती विषबेल को रोकने में प्रषासन अक्षम है। पष्चिम बंगाल से लकर आंध्रप्रदेष तक नक्सली ने सक बड़ा काॅरिडोर बना लिया है। आठ राज्यांे में इनकी और समर्थकांे की संख्या तेजी से बढ़ रही है। लम्बे अर्से से सरकार ने जिन उपेक्षित वर्गों की अनदेखी की, उन्हंे ये अपना समर्थक बना रहे हैं। ये संख्या बल में ज्यादा हैं। इस कारण सरकार को ज्यादा चुनौती मिल रही है। अनेक सरकारी योजनाओं के बावजूद आदिवासी, और हरिजन नक्सली-नेता -नौकरशाह - ठेकेदार के अत्याचार के षिकर हैं। हमेषा ठगे रहने के कारण वे उपेक्षित होकर बगावत पर उतारू हैं। ऐसे में नक्सली को उन्हें सरकार के खिलाफ करने में ज्यादा मषक्कत नहीं करनी पड़ती है।
छतीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा0 रमन सिंह से पांच सवाल
प्रश्न: नक्सलवाद पर नियंत्रण पाने में आप क्यांे विफल हुए ?
उत्तर: इसके लिये कांग्रेस की नीतियां जिम्मेदार हैं। अब तक कोई इंटीग्रेटेड प्लान
तैयार न हो पान से स्थिति अनियंत्रित हो गई है। केन्द्र सरकार को राष्ट्रीय
स्तर पर बातचीत करनी चाहिये।
प्रष्न: क्या केन्द्र से मदद नहीं मिल रहा है ?
उत्तर: पिछले 9 साल में हमारे राज्य में एक भी नई रेल लाईन को मंजूरी नहीं दी
गई। एन.एच.आई. के लिए फंड चाहिए लेकिन निर्णय नहीं हो सका।
प्रष्नः क्या केन्द्र व राज्य के बीच तालमेल का अभाव है ?
उत्तरः हां, केन्द्र से हमें अपेक्षित मदद नहीं मिल पाता है। बड़े हादसे के बाद नियंत्रण
के लिये जरूर वायदे किये जाते हैं, किन्तु वे कभी पूरे नहीं हो पाते।
प्रष्न: नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास की गति धीमी क्यों है ?
उत्तर: विकास के लिये राषि तो काफी व्यय हो रहे हैं, किन्तु नक्सली निर्माण कार्य के
साथ सड़कों को ध्वस्त कर देते हैं, इसलिए विकास की गति धीमी है।
प्रष्न: क्या यह सरकार की विफलता है ?
उत्तर: नहीं, प्रयास जारी है। विकास के लिये कई योजनायें चल रही हैं।






