Tuesday, July 25, 2017

रोहतक में सद्भावना रैली


रोहतक में सद्भावना रैली

तीन एप्रिल को रोहतक में एक विशाल सद्भावना रैली का आयोजन हुआ। जाट आरक्षण आंदोलन की कड़वाहट समाप्त करने, भाईचारा बना रहे और  आगे कभी ऐसे गड़बड़ी ना हो, इसका संकल्प लेने के लिए एक विशाल कार्यक्रम का आयोजन  अनाज मंडी में हुआ । एक शब्दावली चली जो हमने तो कभी बोली नहीं पर  समाज में  चलती है, और पिछले दिनो कुछ ज़्यादा ही चली, छत्तीस जात! और आपसी विरोध को बोलते है छत्तीस का  आँकड़ा! ३६ जाति के समाज को ' छत्तीस का आँकड़ा' नहीं बनाकर बल्कि तीन और जोड़कर " नो मत का एकमत होगा"  ऐसा कुछ कार्यक्रम संचालक स्वामी ज्ञानानंद जीने प्रस्तावना में कहा।  ध्यान रहे कि यह एक देसी खेल का नाम है जिसमें नौ व्यक्ति एक-एक ऊँगली लगाकर, एक लेटे हुए आदमी को आसानी से उठा लेते है। यही करना आयोजन का उद्देश्य बताया गया

कितनी संख्या कार्यक्रम में आई? आयोजकों के हिसाब किताब के अनुसार भी एक लाख से अधिक संख्या में  लोग उपस्थित हुए ।
आम लोगों की  राय भी यही है । सभी लोग बड़े अनुशासित ढंग से - सारे या अधिकांश कार्यक्रम को - सुन रहे थे और साथ साथ एक उत्तर को तलाश रहे थे। ये लूटपाट क्यों हुआ, और आगे ऐसा ना हो इसकी क्या गारंटी है? अपने समाज का  भाईचारा बना रहेगा या नहीं? ये सवाल सबके जहन में दिखा। वास्तव में तो इन प्रश्नों का कितना उत्तर उनको मिला,  ये उत्तर अभी हमको भी ढूँढ़ना है? फिर भी, ज़्यादातर लोगों ने कार्यक्रम को बहुत ही  सफल आयोजन माना।

मेरे हिसाब से तो कार्यक्रम प्रारम्भ होने से पहले ही काफ़ी कुछ सफल हो गया था।  कैसे? क्योंकि प्रदेश भर में कार्यकर्ताओं ने जो दम मार कर सद्भावना के लिए गली गली और गाँव की चौपाल चौपाल में जो बात चीत रखी, औपचारिक और अनौपचारिक ढंग से लोगों के ज्वलंत सवालों का जो जवाब दिया - वो अपने आप में एक बहुत बड़ी मशक्कत ही नहीं बल्कि  दमदारी की बात थी। मैंने जितने भी कार्यक्रम को सफल बनाने में जुटे ज़मीनी कार्यकर्ताओं से बात की, सबने माना कि बेशक काफ़ी लोग शुरू में पूरी तरह कड़वाहट से भरे थे, लेकिन बात चीत के अंत में बहुत-कुछ हमारे से सहमत से होते दिखे। मुझे लगता है, ये कार्यक्रम के प्रारम्भ होने से पहले ही सफलता का ये बहुत बड़ा  पैमाना था। 5000 गाँवों और नगरों की बस्तियों में ये कार्यक्रम सम्पन्न होना क्या छोटी बात है?

दूसरी कामयाबी थी नौजवानों की शिरकत। बिना किसी राजनीतिक हस्ती के आकर्षण और बिना किसी चुनावी माहौल के इतने बड़ी संख्या का कार्यक्रम में आना भी हमें कम कर के नहीं आँकना चाहिए। समाज के हर वर्ग से और हर  आयु वर्ग के लोग यहाँ गर्मी की परवाह किये यहाँ आये थे। महिलायें भी किसी से पीछे नहीं थी! 

एक बहुत बड़ी बात थी मंच पर ग़ैर राजनीतिक लोगों का होना। बहुत बड़ी संख्या में हर पंथ और संप्रदाय के संत, साध्वी एक अलग से बनाये मंच पर विराजमान थे। एक तरफ़ स्वामी ज्ञानानंद, अवधेशानंद, बाबा रामदेव जैसे लोग थे और दूसरी और चेतन शर्मा क्रिकेटेर , योगेश्वरदत्त ओलम्पियन पहलवान, चेस चैम्पीयन अनुराधा बेनीवाल, पहलवान संग्राम सिंह और रणदीप हुड्डा फ़िल्म हीरो आदि तो थे ही, लेकिन आकर्षण का केंद्र सबसे छोटा सिलेब्रिटी कोटिल्या जैसा मेधावी बालक था। सँतो में जैन संत तरुण सागर मुनि जी की संप्रेषण कला और विषयवस्तु ग़ज़ब की  लगी। बड़ी अछी शैली में उन्होंने सद्भावना की बात रखी। वैसे पूरे कार्यक्रम के हीरो तो बाबा रामदेव जी थे। बहुत जानदार ढंग से उन्होंने  विषय प्रस्तुति की। ' भाई, आरक्षण और नोकरियो के पीछे तुम भाग रहे हो। तुम्हारे से कम पढ़ा लिखा हूँ,  लेकिन फिर भी लाखों लोगों को नौकरी दे रहाँ हूँ,... बड़ी बड़ी मल्टीनैशनल कम्पनीज़ को हमने शीर्षासन करवा दिया है.... इस जैसी बातें लोगों को छू रही थी,  विशेषकर युवा वर्ग को। ' अरे, देश में पैदा हो कर भी कोई बोलता है कि भारतमाता कि जय नहीं बोलूँगा, और  इस विषय पर उसके समर्थन में फ़तवे जारी हो रहे है....। ऐसेलोगों को तो ..... आदि  बातें कह  कर बाबा ने देश की अन्य चुनौतियों की और समाज को संकेत किया। एक से बढ़कर एक वक़्ता थे।  कमाल की बात थी कि अगर कोई उलटापलटा सवाल आदि भी बोली या बोला, तो 'कभी ठीक कभी ख़राब और ठीक कहीं ख़राब' माइक सिस्टम उसकी बात को भी छुपा गया। " मेरा हरियाणा - सब का हरियाणा, " ये नारा लोगों के दिमाग़ में घर कर रहा था। गुड़गाँव के पिछले दिनो  कि सफल अंतर्राष्ट्रिया इन्वेस्टर मीट पहले ही एक बढ़िया शुरुआत हो चुकी है।

मेरी मुश्किल थी कि जहाँ पर मैं 'आगे-आगे' के चक्कर में सादर बिठाया गया वहाँ से ना तो वक्तावृंद साफ़ दिखायी दे रहा था और ना सुनायी ही!  सीधी धूप की तो मैं कोई परवाह नहीं करता। ख़ैर, इतने में मेरा घुमकड़ीपन जागृत हुआ। पूरे पंडाल में दो एक चक्कर लगाए। पानी के स्टालों के पास भी ठहरा। सच में आनंद आ गया। बहुत पुराने परिचित इस मेले में मिल गए।  कई बीस साल बाद तो कोई कोई तीस पेन्तीस साल बाद भी मिले। नदी नाँव संयोगी मेला, पंक्तियाँ याद आ रही थी ! बहुत अच्छा लगा! कोई पुरानी खोई एफ-डी जैसे मिल गई हो! और कई तो पहली बार मिले थे, पर वैसे बताया कि 'हम आपके काफ़ी समय से मित्र हैं'-  क्या कहते है उनको..... फ़ेसबुक फ़्रेंड! 
लोगों के चेहरों को पढ़ना शुरू किया, आम अजनबियों से भी पूछना चालू किया कि भाई कैसा लगा कार्यक्रम, क्या ठीक लगे कुछ भाषण-वाशन? लोग खुल कर बोल रहे थे। कार्यक्रम और व्यवस्था के तो गुण गा रहे थे। कुछ बातों के उत्तर ताल भी रहे थे। देखो आगे, की शैली में। उस सारे से एक मोटा अंदाज़ा आया कि ज़ख़्म काफ़ी गहरे है, चोटें अभी ताज़ी हैं। केवल मल्हम, मालिश से काम नहीं चलेगा, लगातार दवाई उपचार की जरूरत है। मतलब कि इस कार्यक्रम के बाद  भी गाँव-गाँव जाकर इस विषय को आगे बढ़ाना होगा। सरकार को अपने ढंग से काम करना होगा। आम तौर पर खाप के प्रतिनिधियों कि सफ़ाई तो निदा फ़ाज़ली की  उन पंक्तियों में प्रगट होती है, 
                              मेरे चूल्हों में तो      इतनी         आग नहीं थी,
                               जिससे सारा शहर जला था, कोई परचम होगा

परंतु ऐसे परचम यानी झंडे का एक प्रतीक बने प्रफ़ेसर विरेंदर सिंह जैसे लोगों और उनके राजनीतिक संरक्षकों पर अदम गोण्डवी का नीचे का शेयर ज़रूर लागू होता है,
                              शहर के दंगों में जब भी मुफ़लिसों के घर जले,
                               कोठियों के लॉन का मंज़र सलोना हो गया ।
ऐसे षड्यंत्रकारी तत्वों को सजा मिलनी भी चाहिए। लोगों को ना  तो सरका को माफ़ करना चाहिए ना समाज को। चौरासी के दंगो के दोषियों को तीस साल में भी ठीक से सज़ा नहीं मिली, इस बार ऐसे देरी ना हो ये भी ज़रूर देखना होगा। विकास की ब्यार और भाईचारे की फोहार आनी ही चाहिए। हरियाणा के लोगों ने बेटी बचाओ, और विकास-रोज़गार वृद्धि की जो गति पकड़ी है, उसे किसी की नज़र नहीं लगे, ये भी देखना है।  पिछले दिनो जो पढ़े लिखे युवा युवतियाँ पंच सरपंच बनी है, वो प्रगति के  नए राजदूत गाँव गाँव में बनकर उभरे रहे है। प्रदेश का ईमानदार नेतृत्व जिस प्रकार लोगों का विश्वास जीतता जा रहा है, बहुत से स्वार्थी  तत्वों के पेट में मरोड़ पैदा कर सकता है। इस सारे मन्हूस वातावरण के बावजूद गुड़गाँव के इन्वेस्टर मीट में  कोई अस्सी लाख एक करोड़ रुपए के अनुबंध देश विदेश से हुए। मतलब ये है कि देश और दुनिया यहाँ की  पुरानी बातों को भुलाकर नयी इबारत लिखने को तैयार है। और आइए दुष्यंत के शब्दों में गुनगुनायें: 
               फिर धीरे धीरे यहाँ का,    मौसम बदलने लगा है, 
                वातावरण सो रहा था, फिर आँख मलने लगा है।
                                     ..........       पिछले सफ़र की ना पूछो, टूटा हुआ एक रथ था,
                                                      जो परबत रास्ते में खड़ा था, अब वो पिघलने लगा है,
                    ये घोषणा हो चुकी है, कि मेला लगेगा यहीं पर, 
                   हर आदमी घर जाकर ,    कपड़े बदलने लगा है।

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Kashmiri Lal, Shiv Shakti Mandir, RK Puram sector 8 M
New Delhi 110022.






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