Friday, December 3, 2021

मिलेट्स एवं तारना त्रयोदशी

भूमिका: 
17 नवंबर 21 को उदयपुर में तारना त्रयोदशी का कार्यक्रम 8 नगरों में हुआ और उसमें 2200 संख्या उपस्थित रही। संघ का पूरा सहयोग व सहभाग रहा। उसपर मेरा भी भाषण जहां हुआ वहां 400 से ऊपर संख्या रही। मुख्यतः तो मिलेट्स के महत्व पर भाषण हुआ।
1. विश्वास की ठीक जड़ी बूटियों से हुए।
2. कि कोरोनकाल में जो मरे वो पैनिक से ज्यादा मरे पान्डेमिक से कम।
3. कि सबसे कम मृत्युदर दुनिया मे भारत की थी।
4. पर्यावरण हमारे भारतीय ढंग से सुधरेगा गंगा मां, तुलसी, गंगा, गाय, 
मुख्य बिंदु:
1.  तीन लाभ: सेहत, पर्यावरण एवं अर्थव्यवस्था। 
2. Wheat belley नामक पुस्तक का 
3. 60 के दशक में जैसे ग्रीन रेवोलुशन के नाम पर प्राकृतिक वस्तुओं से दूर किया था, यह उसका उल्टा है। अतः प्रशंसनीय है।
4. सरकार को फ़ूड फोर्टीफिकेशन जैसे कृत्रिम उपायों का सहारा नहीं लेना पड़ेगा। 
5. 1. कुछ लुप्त चीजों को प्रारम्भ व पुनर्जीवित करने वाले उदाहरण। हिब्रू भाषा, संस्कृत, बालगंगाधर तिलक शिवाजी जयंती व गणेशोत्सव। वैसा ही काम तानना त्रयोदशी का है।
2. फ़ूड फोर्टीफिकेशन व जैव विविधता का मेलजोल।
3. जैव विविधिता से इसका तालमेल तथा 22 मई अंतराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस का क्या 2023 अंतरराष्ट्रीय मिनट वर्ष घोषित किया गया। उसके लिए क्या-क्या उपाय हो सकते हैं और उसके लिए देश की तैयारी। 
किस प्रकार से मां के दूध में से झलक दिखला दुनिया में पूतना अब सभी उतना । सत्यमेव जयते में दिखाया कि पाइजन इन द प्लेटर । सिक्किम कुछ और प्रदेश। मोटे अनाज या जय विविधता के लाभ। पानी कम लेना बीमारियां कम लगना पोषक तत्वों का भंडार। कोई आंकड़े और अर्थव्यवस्था पर इसका प्रभाव।विश्वजीत ज्याणी का फार्म, दक्षिण के तेलेंगाना के सह संयोजक। डॉ खदरवल्ली की कथा। बीजमाता को पद्मश्री।महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के एक छोटे से गाँव की राहीबाई सोमा पोपेरे। ये 'बीजमाता'/सीडमदर के नाम प्रसिद्ध है। 
आंकड़े जहर के बारे में: 2018 में 5438 करोड़ किलोग्राम

2019 में 5621 करोड़ किलोग्राम

2020 में 5988 करोड़ किलोग्राम ।इस रासायनिक ज़हर नें अरबों ₹ किसानों की जेब से निकाल लिए ।


इस ज़हर को अगर 130 करोड़ नागरिकों में देखें - तो प्रत्येक के हिस्से लगभग 4 किलो यह ज़हर हर महीने आया !   और एक साल में 46 किलो से अधिक, अर्थात सामान्य आदमी 45-50 किलो का होता है तो सालाना अपने वजन का तुलादान अपने ही शरीर को पेस्टिसाइड्स का।। जय श्रीराम!!

समारोप: 
1. करणीय कार्य; पहला इन चीजों का प्रयोग पूरा वर्ष करेंगे।
2. अपना खाना खाते समय जीव जंतुओं, कीट पतंगों के बारे में भी सोचेंगे। पर्यावरण है तो हम हैं।
3. गरीब लोगों से खरीदेंगे, सीधा खरीदेंगे, ज्यादा भावताव नहीं करेंगे।
4. बच्चों को परिवारजनों को जहरमुक्त, जैविक खेती मोटे अनाज, रसोई में औषधियों के बारे में जागरूकता, अध्ययन आदि में रुचि पैदा करेंगे। 
5. नेशन फर्स्ट स्वदेशी मस्ट।
6. कहानी : गौमाता, तुलसी, अलवीरा आदि का ।
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1. दुनिया के 36% भारत में और चीन से पांच गुना।।Millet production – 2016
Country Production (millions of tonnes)
India 10.3
Niger 3.9
China 2.0
Mali 1.8
Nigeria 1.5
Burkina Faso 1.1
World 28.4
Source: FAOSTAT of the United Nations
In 2016, global production of millet was 28.4 million tonnes, led by India with 36% of the world total. 

2. Pearl millet (बाजरा)  is one of the two major crops in the semiarid, impoverished, less fertile agriculture regions of Africa and southeast Asia.  Millets are not only adapted to poor, droughty, and infertile soils, but they are also more reliable under these conditions than most other grain crops. This has, in part, made millet production popular, particularly in countries surrounding the Sahara in western Africa.
3.  ICAR-Indian Institute of Millets Research[33] in Telangana, India. इस पर और ज्यादा रिसर्च होनी चहियर।

5. नाम याद करना:  ,

1.  बाजरा, pearl millet,  ज्वार, sorgum,   रागी, (फिंगर मिलेट )भारतमें कर्नाटक और आन्ध्र प्रदेश में रागी का सबसे अधिक उपभोग होता है। इससे मोटी डबल रोटी, डोसा और रोटी बनती है। इस से रागी मुद्दी बनती है जिसके लिये रागी आटे को पानी में उबाला जाता है, जब पानी गाढा हो जाता है तो इसे गोल आकृति कर घी लगा कर साम्भर के साथ खाया जाता है। वियतनाम मे इसे बच्चे के जन्म के समय औरतो को दवा के रूप मे दिया जाता है। इससे मदिरा भी बनती है।

2. फोनियो,फोनियो एक अनुकूल स्वाद वाला पौष्टिक भोजन है । इसका सेवन मुख्य रूप से पश्चिम अफ्रीकी देशों में किया जाता है , जहां इसकी खेती भी की जाती है।  2016 में वैश्विक फोनियो बाजार 673,000 टन था। गिनी सालाना दुनिया में सबसे अधिक फोनियो का उत्पादन करती है, जो 2019 में दुनिया के उत्पादन का 75% से अधिक है।  नाम फोनियो (द्वारा उधार लिया गया) फ्रेंच से अंग्रेजी) वोलोफ फोनो से है । 

दिसंबर 2018 में, यूरोपीय आयोग ने नए खाद्य उत्पादों के निर्माण और विपणन के लिए इतालवी कंपनी ओबे फूड द्वारा प्रस्तुत करने के बाद, यूरोपीय संघ में एक नए भोजन के रूप में फोनियो के व्यावसायीकरण को मंजूरी दी । 

3. कोदो, कोदो या कोदों या कोदरा एक अनाज है जो कम वर्षा में भी पैदा हो जाता है। नेपाल व भारत के विभिन्न भागों में इसकी खेती की जाती है। धान आदि के कारण इसकी खेती अब कम होती जा रही है। (शायद जिसे महाराणा ने घास खाया, वह कोदो आदि ही हो। 14 साल भगवान राम के ऐसे ही कंदमूल व अनाज खाये होंगे। 

4. कुटकी: कुटकी का वैज्ञानिक नाम पनिकम अन्तीदोटेल है। यह मुख्य रूप से पंजाब, गंगा के मैदान तथा हिमालय में पाई जाती है, यह भी पनिकम परिवार की घास है। पंजाब में तथा संलग्न पाकिस्तान के क्षेत्र में  इसे 'घिरी' या 'घमूर' कहते हैं

 जैसे मोटे अनाज जिन्हें कदन्न भी कहते हैं, मोटे अनाजों की श्रेणी में आते है।
6. इनकी मांग के पीछे कई कारण उत्तरदायी माने जा सकते है –ये फसलें कम पानी में भी उग सकती है, साथ ही मौसम में आ रहे बदलावों को भी आसानी से झेल सकती है।
ये मिलेट फसलें पोषक तत्वों से भरपूर होती हैं। इनमें प्रोटीन, फाइबर, स्टार्च प्रतिरोधी बड़ी उच्च मात्रा में होते हैं| साथ ही इनका ग्लाइसेमिक इंडेक्स भी कम होता है जिस वजह से यह मधुमेह जैसे रोगों को रोकने में मदद कर सकते हैं। बाजरा में विटामिन बी और आयरन, जिंक, पोटैशियम, फॉसफोरस, मैग्नीशियम, कॉपर और मैंगनीज जैसे आहारीय खनिजों की उच्च मात्रा होती है। इसी तरह ज्वार भी पौष्टिक गुणों से भरा होता है।
7. मिलेट एक प्रकार का स्मार्ट्फूड है जो किसानों,  इसके उपभोक्ताओं और पृथ्वी के लिए फायदेमंद है। जो सतत विकास के लक्ष्यों तक पहुँचने में भी मददगार सिद्ध होगा।
8. संयुक्त राष्ट्र ने भी इनके महत्त्व को देखते हुए 2023 को अंतर्राष्ट्रीय कदन्न वर्ष (इंटरनेशनल ईयर ऑफ मिलेट्स-2023) घोषित किया है। जिसका उद्देश्य इन उपेक्षित फसलों को बढ़ावा देना है, जिससे लोगों में इसकी दिलचस्पी बढे और वो इनके पोषण से भरपूर गुणों को जान पाएं। साथ ही इनके उत्पादन को बढ़ाने के लिए नीतिगत तौर पर इनको समर्थन मिल सके। 👍👍हरित क्रांति के दौरान जिस प्रकार से गेहू और धान की फसलों को प्राथमिकता दी गयी थी और सरकारी नीतियां भी इन्ही फसलों के इर्द-गिर्द बनाई जा रही थी, उस से मोटे अनाजों की महत्व की अनदेखी की जा रही थी। लेकिन हाल के वर्षो में मोटे अनाजों के औषधीय गुणों के कारण इनके प्रति लोगो की जागरूकता बढ़ी है। इसके अलावा, जलवायु परिवर्तन और खाद्य सुरक्षा दूसरे ऐसे प्रमुख कारण है जिनसे मोठे अनाजों की अहमियत बढ़ी है।
एक प्रकार से देखे इसके लिए न केवल उत्पादन बल्कि इसकी मांग को बढ़ाना भी जरुरी है और साथ ही साथ इन फसलो के प्रति लोगो के नज़रिये को भी बदलना होगा। ऐसे अवसर पैदा करने होंगें जिससे किसानों को भी इनका बेहतर मूल्य मिल सके और उनके और बाजार के बीच की दूरी को मिटाना होगा साथ ही विकास के नए अवसर पैदा करने होंगें।

अब अमीरों की चाहत बना ‘गरीबों का अनाज’…सरकार ने बनाई मोटे अनाज को लेकर नई योजना
9. प्रधानमंत्री मोदी जी इसके पक्ष में बोले आयुष मंत्रालय के एक कार्यक्रम में 2019 में।  https://www.livemint.com/politics/policy/how-millet-revolution-in-india-will-ensure-nutritious-diet-1567175904866.html

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मुझे लगता है कि हम सबको इनके बारे में जानना चाहिए।

ये हैं महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के एक छोटे से गाँव की राहीबाई सोमा पोपेरे। ये 'बीजमाता'/सीडमदर के नाम प्रसिद्ध है। 

          ये देसी बीजों को बचाने व उनके संवर्धन को लेकर काम करती है। कभी स्कूल नहीं गई और एक जनजाति परिवार से संबंध रखने वाली है राहीबाई। इनके बीज के प्रति ज्ञान को वैज्ञानिक भी लोहा मानते हैं। अपनी जिद्द और लगन से ये देसी बीजों का एक बैंक बनाई है जो किसानों के लिए काफी फायदेमंद साबित हो रही है। ये देसी बीजों को बचाने व उसके समर्थन में तब आई जब इनका पोता जहरीली सब्जी खाने से बीमार पड़ गया। 

           यही कोई बीस साल पहले। तब से ये जैविक खेती के साथ-साथ देसी बीजों के प्रयोग व उनके संरक्षण को प्राथमिकता देने लगी। ये कहती है कि भले ही हाइब्रिड बीजों की तुलना में ये देसी बीज कम उपज देते हैं लेकिन ये आपका स्वास्थ्य खराब नहीं करती,आप बीमारियों के चपेट में नहीं आते।

56 की साल राहीबाई सोमा पोपरे आज पारिवारिक ज्ञान और प्राचीन परंपराओं की तकनीकों के साथ जैविक खेती को एक नया आयाम दे रही हैं।

             गुजरात और महाराष्ट्र में आज परंपरागत बीजों की मांग सबसे ज्यादा है।

और आज जो ये बीजों के माँग की आपूर्ति जो रही है तो बस इसलिए हो रहे हैं इनको जिंदा रखने के लिए राहीबाई जैसे लोग जीवित हैं। नहीं तो ज्यादा उपज और फायदा कमाने के चक्कर में देसी बीजों को लोग कहाँ पहुंचा दिए हैं वो सबको भलीभांति मालूम है। आज से 20-25 साल जिस बीमारी का अता पता नहीं था वो अब फैमिलियर होते जा रहा है।


ऐसे में 'पद्मश्री' बीजमाता राहीबाई जी को मेरा बारम्बार प्रणाम है।🙏🙏🙏

Makarand Kale

Updated On - 7:58 am, Wed, 22 September 21


साल 2023 को संयुक्त राष्ट्र ने मिलेट्स ईयर घोषित किया है. इसे लेकर भारत सरकार ने तैयारियां तेज कर दी हैं. केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने ग्वालियर में मीडिया से चर्चा के दौरान जानकारी दी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के मौके पर हैदराबाद में मिलेट्स इंस्टिट्यूट से मिलेट्स इयर की तैयारियां शुरू कर दी गई हैं. इसे लेकर हैदराबाद के मिलेट्स इंस्टिट्यूट में देशभर के कृषि वैज्ञानिकों और जानकारों से चर्चा की गई. भारत सरकार की कोशिश है की पोषक आहार के तौर पर मिलेट्स यानी मोटा अनाज ज्यादा से ज्यादा मात्रा में उपलब्ध कराया जा सके.सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को मोटा अनाज यहां से उपलब्ध कराया जा सके, सरकार इसकी तैयारी कर रही हैं.


अब क्या होगा

दुनिया ने सेहत के लिहाज से मोटे अनाजों के महत्व को समझा है, इसलिए किसानों के लिए इसे उगाना ज्यादा फायदेमंद हो गया है. ये अनाज कम पानी और कम उपजाऊ भूमि में भी उग जाते हैं और दाम भी गेहूं से अधिक मिलता है. इसके तहत्व को ऐसे समझा जा सकता है कि केंद्र सरकार ने 2018 को मोटा अनाज वर्ष के रूप में मनाया था.



हरित क्रांति के बाद आई खाद्य संपन्नता ने भारतीयों के खानपान से मोटे अनाजों को दूर कर दिया. गेहूं और चावल में ज्यादा स्वाद मिला और यह पौष्टिक अनाजों को रिप्लेस करता चला गया.


नब्बे के दशक के बाद इसमें ज्यादा तेजी आई. वैज्ञानिक समुदाय ने भी इस पर काम नहीं किया. इसलिए किसानों ने ऐसी फसलों को उगाना बंद कर दिया. लोगों ने इसे गरीबों का खाद्यान्न कहकर उपेक्षित कर दिया. हालांकि, आदिवासी क्षेत्रों में इसकी पैदावार होती रही है.


सरकार इसे बढ़ावा देने के लिए मोटे अनाजों की एमएसपी बढ़ा रही है. ज्वार का एमएसपी 118 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ाया है. इसका एमएसपी 2620 रुपये प्रति क्विंटल है.


बाजरा का एमएसपी 100 रुपये बढ़ 2250 रुपये प्रति क्विंटल है. रागी का एमएसपी 82 रुपये बढ़कर 3,377 रुपये हो गया है. पिछले साल इसकी कमत 3,295 रुपये प्रति क्विंटल थी. मक्के के एमएसपी में मात्र 20 रुपये की बढ़ोतरी हुई है . इसकी कीमत 1850 रुपये प्रति क्विंटल है.


कहां होता है उत्पादन?

-ज्वार: मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश

-बाजारा: राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र

-जौ: राजस्थान, उत्तर प्रदेश

-रागी: कर्नाटक, उत्तराखंड


जई (Oats) की खेती पहले आमतौर पर जानवरों के खाने के लिए चारे के रूप में की जा रही थी. लेकिन, अब इसका ओट्स और दलिया बनाकर लोग खा रहे हैं. यह जल्दी पचने वाला फाइबर एवं पोषक तत्व से भरपूर खाद्य सामग्री है. चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय (HAU) के वैज्ञानिकों ने जई की दो नई किस्मों ओएस-405 व ओएस-424 को विकसित किया है. इन किस्मों को कृषि मंत्रालय ने नोटिफाई कर दिया है.

3. 

ये मोटे अनाज क्यों हैं आपकी जिंदगी के लिए सुपरफूड

ये मोटे अनाज क्यों हैं आपकी जिंदगी के लिए सुपरफूड

मोटा अनाज (Coarse Grains) पौष्टिकता से भरपूर होता है. हमारे यहां ज्वार, बाजरा और रागी जैसे मोटे अनाज खाने की परंपरा थी. लेकिन धीरे-धीरे वो खत्म हो गई...


मोटा अनाज चावल गेहूं की तुलना में ज्यादा पौष्टिक होता है, SEPTEMBER 06, 2019, 11:53 IST


ज्यादा नहीं, आज से सिर्फ 50 साल पहले हमारे खाने की परंपरा (Food Culture) बिल्कुल अलग थी. हम मोटा अनाज (Coarse Grains) खाने वाले लोग थे. मोटा अनाज मतलब- ज्वार, बाजरा, रागी (मडुआ), सवां, कोदों और इसी तरह के मोटे अनाज. 60 के दशक में आई हरित क्रांति के दौरान हमने गेहूं और चावल को अपनी थाली में सजा लिया और मोटे अनाज को खुद से दूर कर दिया. जिस अनाज को हम साढ़े छह हजार साल से खा रहे थे, उससे हमने मुंह मोड़ लिया और आज पूरी दुनिया उसी मोटे अनाज की तरफ वापस लौट रही है.



पिछले दिनों आयुष मंत्रालय के एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी ने भी मोटे अनाज की खेती के लिए किसानों को प्रोत्साहित करने पर बल दिया. पीएम मोदी बोले, ‘आज हम देखते हैं कि जिस भोजन को हमने छोड़ दिया, उसको दुनिया ने अपनाना शुरू कर दिया. जौ, ज्वार, रागी, कोदो, सामा, बाजरा, सांवा, ऐसे अनेक अनाज कभी हमारे खान-पान का हिस्सा हुआ करते थे. लेकिन ये हमारी थालियों से गायब हो गए. अब इस पोषक आहार की पूरी दुनिया में डिमांड है.’

....कभी कभी एलोपैथी वाली अपने को भगवान मानने लग जाते हैं और हर विषय पर अपनी राय रखने के लिए खुले घूमते हैं, लेकिन अब एसनहीँ हैं:

आयुष दवाओं के खिलाफ सलाह देना पड़ा भारी: राष्ट्रीय होम्योपैथी आयोग की शिकायत पर एम्स के डॉक्टरों को मांगनी पड़ी माफी, परिसर में बांटे जा रहे थे पर्च, Thu, 03 Mar 2022 05:54 AM IST

सार

बीते माह एम्स के बालरोग विभाग में गुर्दे से जुड़ी एक बीमारी के खिलाफ लोगों में जागरूकता लाने के लिए पर्चे बांटे जा रहे थे। करीब 12 से 14 पन्नों में बीमारी के बारे में पूरी जानकारी दी गई, लेकिन यह भी कहा गया कि जो लोग इस बीमारी से पीड़ित हैं वे होम्योपैथी इत्यादि की चिकित्सीय सलाह से दूरी बनाकर रखें

Thursday, December 2, 2021

स्वदेशी की विकास यात्रा - एक प्रश्नोत्तरी



1. स्वदेशी जागरण मंच की स्थापना कहां, कब और किन परिस्थितियों में हुई?
उ. राष्ट्रऋषि दत्तोपंत ठेंगड़ी जी द्वारा नागपुर में 22 नवंबर 1991 को नये आर्थिक विदेशी हमले के प्रतिकार के लिया स्वदेशी जागरण मंच का गठन  किया गया। सात समविचारी  संगठनो की उपस्थिति में ये कार्य प्रारम्भ हुआ।
प्र.2.  नई आर्थिक नीतियों की वकालत करते हुए डाॅ. मनमोहन सिंह ने लोकसभा में क्या प्रस्ताव रखा था?
उ. श्री नरसिंह राव ने प्रधानमंत्री और डाॅ. मनमोहन सिंह के वित्तमंत्री के नाते भारतीय संसद में एक प्रस्ताव लाया गया और पूर्व की गलत नीतियों का उल्लेख करते हुए नई आर्थिक नीतियों की घोषणा 24 जुलाई  1991 में की गई। इन नीतियों को 1 अगस्त 1991 से लागू किया गया।

प्र.3. 1991 की नई आर्थिक नीतियों का सारांश क्या था?
उ. विदेशी निवेश को खुला निमंत्रण, कस्टम डयूटी घटाई गई, विदेशियों के लिए प्रतिबंधित क्षेत्रों को खोला गया, और कुल मिला  कर आर्थिक स्वावलम्बन को खत्म किया गया।

प्र.4.  स्वदेशी जागरण मंच को मंच क्यों कहा गया, संगठन क्यों नहीं?
उ. क्योंकि किसी भी विचारधारा का व्यक्ति जिसे आर्थिक स्वतंत्रता का विषय प्रिय है, वह इसमें भाग ले सकता है। संगठन के खांचे में डालने की अपेक्षा हरेक के लिए इसे खुला रखा गया। 
प्र.5.ठेंगड़ी जी ने स्वजाम को क्या संज्ञा  दी थी?
उ. ठेंगड़ी जी ने इसे ‘ आर्थिक स्वाधीनता का दूसरा युद्ध’ कहा है। अर्थात 1947 में राजनीतिक स्वतंत्रता तो मिली परन्तु आर्थिक निर्णय GAT, IMF, WORLD बैंक आदि करते हैं। उन पर अपना निर्णय रहे, ऐसा भाव है आर्थिक स्वतंत्रता का। वैसे इस शब्द का  प्रयोग उन्होंने 1982 में और भारतीय मजदूर संघ के राष्ट्रीय अधिवेशन (1984) में किया था। 
6. प्र: मंच के दो उद्देश्य प्रारम्भ से कौन से बताए गए है?
पहला स्वदेशी भाव का जागरण तथा दूसरा विदेशी आर्थिक आक्रमण तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियों के षड्यंत्रों का भंडाफोड़ करना।
प्र.7. कौन-कौन से प्रमुख महानुभाव स्वदेशी के प्रारंभिक काल में ही मंच से जुड़ गये थे?
उ. (क) 2-5 सितंबर 1993 के प्रथम सम्मेलन में जस्टिस वी.आर. कृष्ण अय्यर ने उद्घाटन किया।
(ख) कभी प्रसिद्ध मार्क्स वादी रहे डाॅ. बोकरे मंच के प्रथम संयोजक बनाये गए। जो बाद में ‘हिन्दू इकोनोमिक्स’ गं्रथ लिखा।माधव गोबिंद बोकरे जो नागपुर विश्विद्यालय के कुलपति थे। 
(ग) चन्द्रशेखर जैसे समाजवादी, जाॅर्ज फर्नांडीज, अहसान कुलकर्णी (P&T के अध्यक्ष) आदि ऐसे महानुभाव जुड़े।

प्र.8.  श्री निखिल चक्रवर्ती स्वदेशी जागरण मंच की किस बात से प्रभावित हुए?
उ. श्री निखिल चक्रवर्ती एक बड़े साम्यवादी विचारक थे तथा मेनस्ट्रीम पत्रिका के सम्पादक थे। एक स्थान पर उन्होंने हमारे कार्यकर्ताओं को पत्रक स्वदेशी-विदेशी वस्तुओं के बांटते हुए देखा और पढ़ने लगे। जीप का नाम हमारी स्वदेशी-विदेशी सूचि पत्रक था। उन्होंने स्वदेशी वस्तुओं में जीप बैटरी को इंगित करते हुए पूछा कि इसके निर्माता को जानते हो? हाँ,जीप सेल् व बैटरी को हैदराबाद के अमनभाई नामक मुसलमान उत्पादक बनाते थे। यह उत्तर सुन वे बहुत प्रभावित हुए। उन्हें लगा कि हम सांप्रदायिकता से उपर उठकर राष्ट्रव्यापी विचार करते है। उन्होंने इस पर एक लंबा काॅलम अपनी पत्रिका में लिखा। बाद में कईं स्वदेशी के कार्यक्रमों में भी वक्ता के नाते उपस्थित रहे।

प्र.8.  1992 व 1994 के जन-जगारण अभियानों का सारांश क्या था?
उ. 1992 में देश भर में स्वदेशी-विदेशी वस्तुओं की सूचि बांटी गई। 1994 में जल, जमीन, जंगल और जानवर का बड़ा सर्वेक्षण हुआ। 3 लाख गांवों में कार्यक्रम आदि के लिए गये। श्री चन्द्रशेखर जी ने पांच स्थानों पर इसका उद्घाटन किया और खुलकर  भाषण भी दिया।

प्र.9. पहला बड़ा संघर्ष कौन सा था और उस संघर्ष का सरांश क्या था?
उ. विदेशी एनराॅन बिजली कंपनी के खिलाफ एक प्रपत्र तैयार किया। (सन) महाराष्ट्र में शरद पवार की सरकार के खिलाफ आंदोलन चलाया गया। ऐसे 7-8 फास्ट ट्रेक परियाजनाओं का विरोध किया। उससे विदेशी निवेश की रफ्तार धीमी हो गई। किसानों ने इस कंपनी को जमीन देने का विरोध किया, लेकिन इस आंदोलन में कुछ कष्टदायक पहलु भी है, अर्थात् जो राजनेता इस आंदोलन में पहले साथ चले, सत्तासीन होने पर वे इस कंपनी के साथ हो गये। 13 दिन की राजग की सरकार ने इस कंपनी के साथ समझौते को पारित किया, लेकिन जीत सच्चाई की ही हुई और कंपनी एनराॅन को भागना पड़ा।

प्र.10. पशुधन संरक्षण आंदोलन की मुख्य बातें क्या थी?
उ. अलकवीर यात्रा - सेवाग्राम से अलकवीर तक 750 किमी. की यात्रा हुई। 15 नवंबर 1995 से 6 दिसंबर तक 1 बड़ी जनसभा और गिरफ्तारियां भी हुई।

प्र.11.  सागर यात्रा क्या है?
उ. 12 जनवरी 1996 से 8 फरवरी 1996 तक  वैश्वीकरण के दौर में विदेशी कंपनियों को ‘मेकेनाइज्ड फिशिंग’ के लाईसंेस दिये गये, लेकिन हमने विरोध किया। सरकारी मुरारी कमेटी ने भी रिपोर्ट हमारे हक में दी। दो हिस्सों में त्रिवेन्द्रम के पास व काकीनाडा के समुद्र में विशाल जनसभा की गई। लड़ाई तो पहले से थाॅमस कोचरी व मजदूर नेता कुलकर्णी लड़ रहे थे हमने इसे उभार दिया। दोनों यात्राओं के कारण देश-विदेश में बहुत जागृति हुई और मछुआरों का व्यवसाय और समुद्री जीव के साथ साथ फ्लोरा एवं फौना भी बच गया।

प्र.13 बीड़ी रोजगार रक्षा आंदोलन क्या है?
उ. जून 1996 में तेंदुपत्ता उद्योग और बीड़ी उद्योग में लगे लोगों का रोजगार समाप्त हो रहा था। छोटी विदेशी सिगरेट को भारत में बनाने की अनुमति दी गयी। अंततः जीत हमारी ही हुई।

प्र.14 मीड़िया को विदेशी हाथों में पड़ने से कैसे बचाया?
उ. 1995 की केबिनेट चर्चा में कहा गया कि सूचना का अधिकार अपने नागरिकों हेतु है। अतः विदेशियों को यहां अखबार चलाने का अधिकार नहीं है। फिर 26 प्रतिशत विदेशी निवेश आया। इसलिए कुल सकल मीडिया में 26 प्रतिशत से ज्यादा विदेशी चैनल नहीं है। हर प्रांत में अपने चैनल है। 

प्र.15 विदेशी हाथों से टेलिकाॅम्यूनिकेशन कैसे बची?
उ. इसके कारण से वोडाफ़ोन छोड़कर शेष भारतीय कंपनियों का प्रभुत्व रहा। यह भी प्रभावी कदम था।

प्र.16 विनिवेश की लड़ाई क्या हुई?
उ. रिलायंस का पेट्रोलियम उत्पादक का एकाधिकार एनडीए सरकार के समय हुआ। सरकारी होटल भी औने-पौने दामों में बेचे गये। सरकारी उपक्रमों को घाटे का उपक्रम या बीमार उपक्रम घोषित करके निजी हाथों में सस्ते भाव से बेचना, विनियोग कहलाता है। श्री अरूण शौरी के मंत्री काल में इनको बेचा गया और मजदूर भी निजीकरण का शिकार हुए। स्वदेशी जागरण मंच ने इसका डटकर इसका विरोध किया। 

प्र.17 आयोडीन नमक का गौरखधंधा क्या है?
उ. आयोडीन युक्त नमक को अनिवार्य किया जा रहा था। इससे गरीबों की एक जरूरी चीज की बड़ी कंपनियों की इच्छा पर मूल्य बढ़ाने की इजाजत मिल जाती। हमारे आंदोलन की बहुत चर्चा बनी। अभी तक वो मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है। गांधी जी ने दांड़ी नमक आंदोलन छेड़ा था, हमें भी वहीं करना पड़ा। इसपर एक पुस्तक भी लिखी गयी "दूसरा नमक आंदोलन".

प्र.18 बौद्धिक संपदा अधिकार की लड़ाई का क्या इतिहास है?
उ. ठेंगडी जी की प्ररेणा से श्री बी.के. कैला ने ‘वर्किंग ग्रुप ओन पेटेंट’ बनाया। धीरे-धीरे कई सांसदों को इसके साथ जोड़ा गया। Forum of parliamentarian or working group on Public Sectors बना।

प्र.19 खुदरा व्यापार की लड़ाई में स्वदेशी जागरण मंच का क्या योगदान है?
उ. बहुत ही अहम्। मंच और व्यापारिक संगठनो के आह्वान पर देशव्यापी बंध हुआ। यद्यपि बिल तो संसद में पारित हुआ परंतु विदेशी कंपनियां आने से कतरा रही है। इससे दवाइयों के रेट कई गुना कम हो गए।

प्र.20 बीटी कपास का मुद्दा और बीटी बैंगन को कैसे रोका गया?
उ. श्री जयराम रमेश ने बी टी बेंगन के लिए सात जगह जन सुनवाई करवाई वहां हमारी उपस्थिति प्रभावी रही और अभी तक अनुमति रुकी हुई है। यह बात 2010 की है।

प्र.21 प्रदेशों के स्तर पर विभिन्न आंदोलन कौन-कौन से हुए?
उ. 1. वेदांता विश्वविद्यालय विरुद्ध सफलआंदोलन, 2. प्लाचीमाड़ा, 3. आलूचासी बेंगाल 4. हल्दी आंदोलन, तेलंगाना 5. हिमाचल प्रदेश में स्की विलेज, 6. 

प्र.22  स्वदेशी मेलें - सीबीएमडी, लघु ऋण वितरण योजना
उ.  ये सब हमारे रचनात्मक काम है।

प्र.23 ठेंगडी जी उद्धरण में से प्रश्न बनता है कि उन्होंने किन-किन विदेशी अर्थशास्त्रियों ने भूमंडलीकरण की निंदा की है, ऐसा उल्लेख किया है
उ: जोसेफ स्टिग्लिट्ज़, एलबुग् डेविसन, आदि का।
निष्कर्ष: 
1. विकास हुआ है अभिप्राय: सिर्फ जीडीपी वृद्धि नहीं बल्कि रोजगार वृद्धि, पर्यावरण सुरक्षा व अंतिम व्यक्ति का विकास आदि हैं।
2. सरकार के प्रति दृष्टिकोण: responsive cooperation का अर्थ। उदाहरण।
3. तीन आयाम:  अध्ययन व शोध (वाचडॉग), आंदोलन व संघर्ष, तथा रचनात्मक, ( स्वदेशी मेले व माइक्रो फाइनेंस आदि, cbmd, स्वदेशी स्टोर को प्रोत्साहनआदि)
4. सभी केंद्रित कार्य नहीं, प्रान्त अनुसार भी और जिला अनुसार भी।
5. मंच का मर्म समझना: अम्ब्रेला आर्गेनाईजेशन। जिसका मुद्दा, उसकी अगुआई, हमारा संवाद, सहयोग व सहकार।