Monday, October 28, 2019

SAVERS

SAVERS 6
1. Silence: meditation, prayers, connecting to unconscious, POWER OF NOW.
2. AFFIRMATION: written reading, four steps: what on health, relations. Organisations, lifestyle, b. WHY, C. IMPORTANCE, D. HOW 
3. Visualisations : whatever wanted, achieved 
4. EXERCISE PRANAYAMA, यJUMPING, STREACHINH, SURYANAMASKARS,
5. Reading what ever I have already prepared.
6. SCRIBE, NEXT DAY MOVE. WHOM TWO BEST P ERSONS I HAVE MET YESTERDAY, WHOM I AM GOING TO MEET TODAY.


Kashmiri Lal, Shiv Shakti Mandir, RK Puram sector 8 M
New Delhi 110022.

Tuesday, October 22, 2019

क्या बहुमत से ही सच्चाई जानेंगे?

श्री ठेंगड़ी जी कहते हैं की हरियाणा के एक स्कूल में एक शाखा में मैंने बालकों से प्रश्न पूछा की संघ किसने शुरू किया? एक बच्चे ने डॉक्टर हेडगेवार का नाम लिया और दूसरे ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी का क्योंकि उसी वर्ष श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी की शहादत हुई थी और उनका नाम प्रसिद्ध था। उसके बाद पूरी शाखा में कई बच्चों ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी का नाम लिया। संदर्भ ध्यान रहे कि 53 में मुखर्जी का बलिदान हुए थे और 'मुखर्जी अमर रहे', ऐसे उद्घोष उस समय हवा में तैरते थे। तब ठेंगड़ी जी ने मजाक- मजाक में कहा कि कैसे निर्णय होगा कुछ डॉक्टर हेडगेवार बोल रहे हैं कुछ श्यामा प्रसाद मुखर्जी सही कैसे पता लगेगा? तो एक लड़के ने हाथ हिलाते हुए कहा वोटिंग करा लीजिए । तो पूरी शाखा में वोटिंग हुई 8 ऐसे थे जो डॉक्टर हेडगेवार जी के पक्ष में, उससे दुगने 16 श्यामा प्रसाद मुखर्जी के पक्ष में, और आठ ऐसे समझदार थे वह चुप रहे किसी और भी नहीं बोले यानी नोटा! तब ठेंगड़ी जी ने कहा अब यह समस्या और गड़बड़ हो गई क्योंकि कुछ इधर बोल रहे हैं कुछ इधर बोल रहे हैं, सच्चाई कैसे पता चलेगी ? फिर उस चतुर लड़के ने कहा कि निर्णय हो तो गया! क्योंकि 16 वोट श्यामा प्रसाद मुखर्जी को पड़े हैं इसलिए संघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी ही कहलाएंगे!!!!
ऐसे ही आजकल हम सोचते हैं क्योंकि ज्यादा वोट जिस पार्टी को पड़े हैं उसकी हर बात सच्ची, दूसरों की हर बात गलत, इसको वर्डिक्ट मिला, जनादेश मिला है, और यही सच्चा है, बाकी झूठे हैं या नहीं, इस पर अलग से  जरूर चर्चा होनी चाहिए।

Friday, October 11, 2019

क्या मानसिक अवसाद सबसे बड़ी बीमारी है?

दुनिया की बड़ी समस्या मानसिक रोग व आत्महत्या
  क्या आपने सुना या कहीं पढ़ा कि कल 10 अक्टूबर को 'विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस था'?इसका उद्देश्य ये था कि मानसिक बीमारियां बहुत बढ़ रही हैं, उसके लिए जनजागरण करना। क्या आप जानते हैं कि
1. चार में से एक व्यक्ति को अपने जीवन में मानसिक रोग का सामना करना पड़ता है।
2. एक साल में आठ लाख लोग मानसिक रोग से पीड़ित होकर करते हैं आत्महत्या करते हैं. यह सड़क हादसों में मौतों के बाद दूसरा बड़ा मरने का कारण है।
3. मानसिक रोग की वजह से 15 साल के किशोर भी कर ले रहे हैं आत्महत्या। ग्लोबल बर्डेन ऑफ डिजीज स्टडीज के अनुसार सालाना दो लाख यंग एडल्ट हर साल आत्महत्या करते हैं.
4. इस वर्ष की थीम के द्वारा आत्महत्या रोकथाम पर फोकस किया जा रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रत्येक 40 सेकंड में एक व्यक्ति की मृत्यु आत्महत्या के कारण होती है।
5. भारत में आत्महत्याएं
लांसेट पब्लिक हेल्थ जर्नल के मुताबिक 2018 में भारत में आत्महत्या के कारण 2.30 लाख मौतें हुईं। 2016 में नेशनल क्राइम ब्यूरो के अनुसार 131,008 लोगों ने आत्महत्या की।, और 2015 में 1,33,623 ने। 
इस हिसाब से एक घण्टे में 15, और हर चार मिनुट्स बाद एक व्यक्ति कहीं न कहीं भारत मे आत्महत्या कर रहा है।
गौरतलब है कि भारत में अभी भी आत्महत्या की रोकथाम के लिए कोई मज़बूत नीति नहीं है। 1990 में चीन में आत्महत्या की दर सबसे अधिक थी। चीन सरकार द्वारा कीटनाशक की पहुँच सीमित किये जाने के बाद आत्महत्या की दर में काफी कमी दर्ज की गयी थी।
मैंने सेपियन्स नामक किताब में से कुछ इसी प्रकार की बात पढ़ी थी, ज्यों का त्यों उद्धरित कर रहा हूँ:
In year 2000, total of 3,10,000 (three lakh 10 thousand ) individuals were killed in wars, and violent crime killed another 5,20,000. Each and every victim is a world destroyed, a family ruined, friends and relatives scarred for life. Yet from a macro perspective these 8,30,000 victims comprised only 1.5 per cent of the 56 million (5 crore sixty lakh) people who died in 2000. That year 1.26 million (12 lakh 60 thousand people died in car accidents (2.25 per cent of total mortality) and 8,15,000 people committed suicide (1.45 per cent).

The figures for 2002 are even more surprising. Out of 57 million dead, only 172,000 people died in war and 569,000 died of violent crime (a total of 741,000 victims of human violence). In contrast, 8,73,000 people committed suicide. It turns out that in the year following the 9/11 attacks, despite all the talk of terrorism and war, the average person was more likely to kill himself than to be killed by a terrorist, a soldier or a drug dealer."

फिल्म से जागरूकता की पहल : हाल के दिनों में कंगना रनाउत और राजकुमार राव की फिल्म ‘जजमेंटल है क्या’ ने लोगों का ध्यान खिंचा था. जबकि मनोचिकित्सक बताते हैं कि इस तरह केस सामान्य है. अवसाद में ज्यादा समय तक रहने और समय पर इलाज न होने से बीमारी बढ़ जाती है. इससे लोग सेवियर डीप्रेशन विद साइकॉटिक सिप्टम में पहुंच जाते है, जहां आत्महत्या करने की इच्छा प्रबल हो जाती है.
 इसमें लोगों को कासव, अस्तु, आइ एम जीजा और अ ब्यूटीफूल माइंड जैसी फिल्में दिखायी गयी।  थी. जिनमें  अल्जाइमर्स, डिमेंशिया, डिप्रेशन, सिजोफ्रेनिया, ऑटिज्म, फोबिया जैसे मेंटल हेल्थ इस्यू से ग्रसित व्यक्ति के लक्षण को दिखाने की कोशिश की गयी थी.

बड़ी समस्या व समाधान: इसके लिए आमतौर पर लोग झाड़फूंक वालों पर या पीरों की मज़ारों पर जाते है, नशों व ड्रग का प्रचलन भी इसी कारण बढ़ रहा है, और जिनसे बात कर सके ऐसे पक्के मित्र भी होते नहीं, हैं तो फेसबुकिया दोस्त जो मरने की खबर पर भी लाइक मार देते हैं।

किसी ने ठीक ही लिखा

                  उम्र का बढ़ना तो

                   दस्तूरे-जहाँ है

                   महसूस न करो तो

                   बढ़ती कहां है


                   उम्र को अगर

                   हराना है तो..  

                   शौक जिन्दा राखिए

                   घुटने चले या न चले

                   मन उड़ता परिंदा राखिए।।

                मुश्किलों का आना

                   'Part of life' है

   और उनमें से हँस कर बाहर आना

                  'Art of life' है । ।




Thursday, October 10, 2019

पीटर ड्रकर व उसकी उक्तियाँ

पीटर ड्रकर (Peter Ferdinand Drucker ; 19 नवम्बर 1909 – 11 नवम्बर 2005) एक अमेरिकी प्रबन्धन सलाहकार, शिक्षक एवं लेखक थे। वे मूलतः आस्ट्रिया के निवासी थे। प्रबन्धन शिक्षा के विकास के क्षेत्र में उन्होने नेतृत्व किया। उन्होने 'लक्ष्यों द्वारा प्रबन्धन' (management by objectives) नामक कांसेप्ट दिया। पीटर ड्रकर की कुछ उक्तियाँ संपादित करें प्रभावशाली नेतृत्व भाषण देने या पसन्द किये जाने से सिद्ध नहीं होता; नेतृत्व परिणाम से दिखता है, गुणों से नहीं। काम को सही तरीके से करना ही दक्षता (एफिसिएन्सी) है; सही काम करना ही प्रभाविकता (इफेक्टिवनेस) है। 'लक्ष्य द्वारा प्रबन्धन' अवश्य काम करेगा यदि आप लक्ष्य जानते हैं। सौ में ९० बार आप लक्ष्य ही नहीं जानते। 'निर्णय लेने' से सम्बन्धित अधिकांश चर्चाओं में यह मान्यता दिखती है कि केवल सिनियर इक्सक्युटिव ही निर्णय लेते हैं या उनके द्वारा लिए गये निर्णयों का ही महत्व है। ऐसा मानता बहुत बड़ी गलती है। लक्ष्य, दिशा हैं भाग्य नहीं। लक्ष्य कोई आदेश नहीं हैं। लक्ष्य भविष्य का निर्धारण नहीं करते बल्कि वे भविष्य के निर्माण के लिए संसाधन एवं ऊर्जा जुटाने के साधन हैं। भविष्य के पूर्वानुमान का सबसे अच्छा तरीका भविष्य का निर्माण करना है। संचार में सबसे महत्वपूर्ण चीज उस बात को सुनना है जो कही ही नहीं जाती। जिस काम को किया ही नहीं जाना चाहिए था, उसे अत्यन्त दक्षतापूर्वक करने से बढ़कर बेकार काम नहीं हो सकता। समय ही सबसे दुर्लभ संसाधन है और जबतक समय का समुचित प्रबन्धन नहीं किया जाता, किसी अन्य चीज का भी प्रबन्धन नहीं हो सकता। जहाँ भी आपको एक सफल व्यवसाय दिखायी पड़ता है, अवश्य ही वहाँ कभी किसी ने साहसपूर्ण निर्णय लिया होगा