Friday, July 19, 2019

गांधी जी का पर्यावरण और विकास पर विचार

गांधी, पर्यावरण और विकास
सारांश: गांधीजी के शब्दकोश में विकास के लिए कोई जगह नहीं है। गांधी के अनुसार विकास के बिना भी सामाजिक परिवर्तन संभव है। सामान्यत: विकास शब्द ही विनाश का कारण है। हम विकास के नाम पर बड़ी-बड़ी परियोजनाओं को स्थापित करने की बात करते हैं, नदियों का रास्ता मोड़ देना चाहते हैं। नतीजा 2013 में उत्तराखंड में आई जल प्रलय के रूप में सामने है।

  वातावरण में इस तरह के आकस्मिक परिवर्तन के कारण क्या हैं? क्यों असंतुलित मौसम मानव सभ्यता के लिए मुसीबत बनता जा रहा है? पिछले दिनों जापान के शहर ओसाका में संपन्न जी-20 की बैठक में अमेरिका के विरोध के बावजूद पेरिस समझौते को लागू करने की बात हुई। अमेरिका और पश्चिमी देशों की हठधर्मिता की वजह से मौसम का मिजाज बिगड़ता जा रहा है। फ्रांस में इस बार तापमान पैंतालीस डिग्री के पार चला गया। अगर दुनिया के ताकतवर देश अपने स्वार्थों पर अड़े रहे तो मानव सभ्यता को विनाश का विकराल दृश्य झेलना पड़ेगा। भारत की स्थिति तो और बदतर है। चेन्नई का जल संकट बता रहा है कि आने वाले वर्षों में देश को किस भीषण जल संकट का सामना करना पड़ेगा। लेकिन विकास की अवधारणा की अबूझ पहेली भारत के लिए चुनौती बनी हुई है। सवाल तो यह है कि यह विकास आखिर है किसके लिए, क्या सिर्फ शहरों के वीआइपी इलाकों को हर तरह की सुविधाओं से युक्त बनाने के लिए? गांधी विकास की अवधारणा को ही नकराते थे। उनकी नजर में आधुनिक विकास की शैली और परिभाषा दोनों ही दूषित हैं। गांधीजी शहरों के नेटवर्क से भी क्षुब्ध थे। उन्होंने कहा था- कोलकाता, मुंबई और दिल्ली जैसे शहरों के जाल भारत के गले की फांस बन जाएंगे। गांधीजी ने अपने जीवन में ही नेहरू की विकासवादी अवधारणा से मुंह मोड़ लिया था। बाद में स्थिति बदतर होती चली गई। पर्यावरण को लेकर कोई बुनियादी सोच विकसित नहीं हो पाई है। हम राष्ट्र को सैन्य और आर्थिक रूप से तो मजबूत बना देंगे, लेकिन उसका आधार पोलियो ग्रस्त रहेगा जो अपने शरीर का भार भी उठाने में सक्षम नहीं होगा। वर्ष 2019 की गर्मी यादगार रहेगी। गर्मी के कारण किसी शहर में धारा 144 अभी तक नहीं लगी थी। बिहार सहित पूरे उत्तरी हिस्सों में तापमान पचास के करीब पहुंच गया था। यहां तक कि कश्मीर घाटी और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में इस गर्मी का असर दिखा। वातावरण में इस तरह के आकस्मिक परिवर्तन के कारण क्या हैं? क्यों असंतुलित मौसम मानव सभ्यता के लिए मुसीबत बनता जा रहा है? अगर इसकी विवेचना गांधी के नजरिए से की जाए तो कारण स्वत: ही स्पष्ट हो जाते हैं। गांधी कोई पर्यावरण के पुरोधा या विशेषज्ञ नहीं थे, न ही उन्हें पर्यावरण की कोई डिग्री हासिल थी। लेकिन दुनिया में उनसे बेहतर पर्यावरण का हितैषी कोई भी नहीं हुआ। उनकी सोच और सिद्धांत बिल्कुल व्यावहारिक सच्चाइयों पर टिकी हुई थी, जिसको एक अनपढ़ व्यक्ति भी समझ सकता है और अनुकरण कर सकता है। गांधीजी से जब एक पत्रकार ने पूछा कि आजादी के बाद क्या आप भारत की प्रगति अंग्रेजों के नक्शे कदम पर करना पसंद करेंगे, तो उनका जवाब था, ‘बिल्कुल नहीं’। गांधीजी ने कहा कि अंग्रेजों ने अपनी विलासिता की भूख मिटाने के लिए तकरीबन दुनिया के बड़े हिस्से को अपने कब्जे में कर लिया, इसके बाद भी उनकी तृप्ति नहीं हुई। अगर इसी नक्शे-कदम पर भारत चलता है तो पृथ्वी जैसे कई ग्रहों की जरूरत पड़ेगी। आज दुनिया के सामने खतरे की घंटी बज चुकी है। दुनिया जलवायु संकट को लेकर परेशान है। ओजोन परत का छेद बड़ा होता जा रहा है। समुद्र का जलस्तर बढ़ता जा रहा है और तटीय शहरों के डूबने की स्थिति बनती जा रही है। यह सब कुछ मानव जगत की जीवनशैली की वजह से हुआ है। गांधीजी ने कहा था कि अगर पर्यावरण को सुरक्षित रखना है तो अपनी जरूरतों को सीमित करना होगा। उनके इस सिद्धांत के तीन शब्द हैं- साधारण जीवन, धीमी गति और छोटे कदम। तीनों शब्द गांधी के पर्यावरण चिंतन का सार हैं। अर्थात, जीवन विलासिता पूर्ण नहीं हो, अकूत संपति अर्जित करने की बेचैनी नहीं हो और छोटी-छोटी खुशियों को अर्जित कर उसे बेहतर और व्यापक बनाने की कोशिश होनी चाहिए। भौतिक सुख का कोई अंत नहीं है। गांधीजी ने पश्चिमी सभ्यता को कोसते हुए यह चेतावनी दी थी कि विश्व उनके विलासिता के दर्द से पीड़ित होगा। आज गांधीजी के शब्द सटीक और सही निकल रहे हैं। भारत की स्थिति सांप-छछूंदर वाली है। हम न पश्चिम के बन पाए और न अपने वजूद पर टिक पाए। आजादी के बाद विकास की नई परिभाषा रची गई। गांधीजी के शब्दकोश में विकास के लिए कोई जगह नहीं है। गांधी के अनुसार विकास के बिना भी सामाजिक परिवर्तन संभव है। सामान्यत: विकास शब्द ही विनाश का कारण है। हम विकास के नाम पर बड़ी-बड़ी परियोजनाओं को स्थापित करने की बात करते हैं, नदियों का रास्ता मोड़ देना चाहते हैं। नतीजा 2013 में उत्तराखंड में आई जल प्रलय के रूप में सामने है। केदारनाथ में बादल फटने के बाद हजारों लोग पानी की धार में बह गए, करीब तीन सौ पुल टूट कर बह गए, सड़कें टूट गर्इं। यह मनुष्य के लोभ और विलासिता के कारण ही हुआ है। 1929 में उत्तराखंड की यात्रा के दौरान गांधीजी ने कहा था कि पूरे उत्तर भारत की हरियाली हिमालय के पर्वतों पर टिकी है, अगर हिमालय की छाया नहीं होती तो पूरा उत्तर भारत सहारा के रेगिस्तान की तरह होता। उत्तराखंड की विभीषिका प्रकृति के साथ खिलवाड़ का नतीजा थी। नदियां अपने तटों को तोड़ती हुई प्रचंड रूप धारण कर चुकी थीं। गोरी गंगा, काली गंगा और मंदाकिनी जैसी नदियों ने विकराल रूप दिखाया था। जो पानी जीवनदायी होता है, उसका कहर जीवन भी ले सकता है। लेकिन आज भी हमने कोई सबक नहीं सीखा है। भारत महामारियों से त्रस्त है। बिहार में दिमागी बुखार से बच्चे मर रहे हैं। बीकानेर जाने वाली एक ट्रेन का नाम तो कैंसर एक्सप्रेस पड़ गया है। इस ट्रेन में हर दिन दो सौ से ज्यादा मरीज होते हैं जो कैंसर के सस्ते सुलभ इलाज के लिए बीकानेर जाते हैं। आखिर मालवा का यह क्षेत्र कैंसर से पीड़ित क्यों हुआ? इसके पीछे भी जो कारण है वह लालच और लोभ ही है। ज्यादा फसल उपजाने के लिए भारी मात्रा में रसायनों का प्रयोग किया जाने लगा है जो कैंसर जैसी बीमारियों का कारण बन गए हैं। ज्यादा फसल का मतलब ज्यादा पैसा, जिसका उपयोग भौतिक सुख-सुविधा के लिए किया जाएगा। आज हमारे देश में कैंसर रोगियों की जो तादाद बढ़ रही है, उसका कारण भी जीवन शैली ही है। गांधीजी के समय पर्यावरण की बड़ी त्रासदी नहीं आई थी। लेकिन गांधीजी चेता दिया था कि अगर बड़े-बड़े उद्योग लगेंगे, शहरीकरण बढ़ेगा, झुग्गी बस्तियां फैलेंगी तो पर्यावरण की समस्या निश्चित रूप से मानव सभ्यता के लिए मुसीबत बनेगी। गांधीजी बड़े शहरों के विरोधी थे। वे कहते थे कि बड़े शहर का मतलब बड़ी मुसीबत। गांधीजी का ग्राम स्वराज सिद्धांत इस मुसीबत से उबरने की रह दीखता है। आत्म संयम और अहिंसा भी पर्यावरण को अक्षुण्ण रखने में सार्थक साबित होगी। गांधीजी की पर्यावरण सोच जैन सिद्धांत और हिंदू धर्म से प्रभावित थी। सारे जीवों को इस धरती पर रहने का अधिकार एकसमान है। यह बात उन्होंने भाषण के द्वारा नहीं बल्कि अपनी जीवन शैली के द्वारा दुनिया को बताई थी। दक्षिण अफ्रीका में गांधी का आश्रम उसी अनुरूप बना हुआ था, जिससे पर्यावरण के साथ कोई छेड़छाड़ न हो सके। साबरमती आश्रम में भी यही व्यवस्था थी। यहां तक कि टैगोर का आश्रम भी पर्यावरण के स्वाभाविक नियमों के तहत ही बना था। आज अगर भारत की अस्मिता को सुरक्षित रखना है तो पश्चिमी सोच और भौतिक सुखों को नियंत्रित करना होगा, नहीं तो समस्या विकराल होती जाएगी और विकास विनाश का कारण बनता चला जाएगा।
(सतीश सिंह July 19, 2019 का जनसत्ता का लेख साभार)

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