Friday, July 19, 2019

गांधी जी का पर्यावरण और विकास पर विचार

गांधी, पर्यावरण और विकास
सारांश: गांधीजी के शब्दकोश में विकास के लिए कोई जगह नहीं है। गांधी के अनुसार विकास के बिना भी सामाजिक परिवर्तन संभव है। सामान्यत: विकास शब्द ही विनाश का कारण है। हम विकास के नाम पर बड़ी-बड़ी परियोजनाओं को स्थापित करने की बात करते हैं, नदियों का रास्ता मोड़ देना चाहते हैं। नतीजा 2013 में उत्तराखंड में आई जल प्रलय के रूप में सामने है।

  वातावरण में इस तरह के आकस्मिक परिवर्तन के कारण क्या हैं? क्यों असंतुलित मौसम मानव सभ्यता के लिए मुसीबत बनता जा रहा है? पिछले दिनों जापान के शहर ओसाका में संपन्न जी-20 की बैठक में अमेरिका के विरोध के बावजूद पेरिस समझौते को लागू करने की बात हुई। अमेरिका और पश्चिमी देशों की हठधर्मिता की वजह से मौसम का मिजाज बिगड़ता जा रहा है। फ्रांस में इस बार तापमान पैंतालीस डिग्री के पार चला गया। अगर दुनिया के ताकतवर देश अपने स्वार्थों पर अड़े रहे तो मानव सभ्यता को विनाश का विकराल दृश्य झेलना पड़ेगा। भारत की स्थिति तो और बदतर है। चेन्नई का जल संकट बता रहा है कि आने वाले वर्षों में देश को किस भीषण जल संकट का सामना करना पड़ेगा। लेकिन विकास की अवधारणा की अबूझ पहेली भारत के लिए चुनौती बनी हुई है। सवाल तो यह है कि यह विकास आखिर है किसके लिए, क्या सिर्फ शहरों के वीआइपी इलाकों को हर तरह की सुविधाओं से युक्त बनाने के लिए? गांधी विकास की अवधारणा को ही नकराते थे। उनकी नजर में आधुनिक विकास की शैली और परिभाषा दोनों ही दूषित हैं। गांधीजी शहरों के नेटवर्क से भी क्षुब्ध थे। उन्होंने कहा था- कोलकाता, मुंबई और दिल्ली जैसे शहरों के जाल भारत के गले की फांस बन जाएंगे। गांधीजी ने अपने जीवन में ही नेहरू की विकासवादी अवधारणा से मुंह मोड़ लिया था। बाद में स्थिति बदतर होती चली गई। पर्यावरण को लेकर कोई बुनियादी सोच विकसित नहीं हो पाई है। हम राष्ट्र को सैन्य और आर्थिक रूप से तो मजबूत बना देंगे, लेकिन उसका आधार पोलियो ग्रस्त रहेगा जो अपने शरीर का भार भी उठाने में सक्षम नहीं होगा। वर्ष 2019 की गर्मी यादगार रहेगी। गर्मी के कारण किसी शहर में धारा 144 अभी तक नहीं लगी थी। बिहार सहित पूरे उत्तरी हिस्सों में तापमान पचास के करीब पहुंच गया था। यहां तक कि कश्मीर घाटी और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में इस गर्मी का असर दिखा। वातावरण में इस तरह के आकस्मिक परिवर्तन के कारण क्या हैं? क्यों असंतुलित मौसम मानव सभ्यता के लिए मुसीबत बनता जा रहा है? अगर इसकी विवेचना गांधी के नजरिए से की जाए तो कारण स्वत: ही स्पष्ट हो जाते हैं। गांधी कोई पर्यावरण के पुरोधा या विशेषज्ञ नहीं थे, न ही उन्हें पर्यावरण की कोई डिग्री हासिल थी। लेकिन दुनिया में उनसे बेहतर पर्यावरण का हितैषी कोई भी नहीं हुआ। उनकी सोच और सिद्धांत बिल्कुल व्यावहारिक सच्चाइयों पर टिकी हुई थी, जिसको एक अनपढ़ व्यक्ति भी समझ सकता है और अनुकरण कर सकता है। गांधीजी से जब एक पत्रकार ने पूछा कि आजादी के बाद क्या आप भारत की प्रगति अंग्रेजों के नक्शे कदम पर करना पसंद करेंगे, तो उनका जवाब था, ‘बिल्कुल नहीं’। गांधीजी ने कहा कि अंग्रेजों ने अपनी विलासिता की भूख मिटाने के लिए तकरीबन दुनिया के बड़े हिस्से को अपने कब्जे में कर लिया, इसके बाद भी उनकी तृप्ति नहीं हुई। अगर इसी नक्शे-कदम पर भारत चलता है तो पृथ्वी जैसे कई ग्रहों की जरूरत पड़ेगी। आज दुनिया के सामने खतरे की घंटी बज चुकी है। दुनिया जलवायु संकट को लेकर परेशान है। ओजोन परत का छेद बड़ा होता जा रहा है। समुद्र का जलस्तर बढ़ता जा रहा है और तटीय शहरों के डूबने की स्थिति बनती जा रही है। यह सब कुछ मानव जगत की जीवनशैली की वजह से हुआ है। गांधीजी ने कहा था कि अगर पर्यावरण को सुरक्षित रखना है तो अपनी जरूरतों को सीमित करना होगा। उनके इस सिद्धांत के तीन शब्द हैं- साधारण जीवन, धीमी गति और छोटे कदम। तीनों शब्द गांधी के पर्यावरण चिंतन का सार हैं। अर्थात, जीवन विलासिता पूर्ण नहीं हो, अकूत संपति अर्जित करने की बेचैनी नहीं हो और छोटी-छोटी खुशियों को अर्जित कर उसे बेहतर और व्यापक बनाने की कोशिश होनी चाहिए। भौतिक सुख का कोई अंत नहीं है। गांधीजी ने पश्चिमी सभ्यता को कोसते हुए यह चेतावनी दी थी कि विश्व उनके विलासिता के दर्द से पीड़ित होगा। आज गांधीजी के शब्द सटीक और सही निकल रहे हैं। भारत की स्थिति सांप-छछूंदर वाली है। हम न पश्चिम के बन पाए और न अपने वजूद पर टिक पाए। आजादी के बाद विकास की नई परिभाषा रची गई। गांधीजी के शब्दकोश में विकास के लिए कोई जगह नहीं है। गांधी के अनुसार विकास के बिना भी सामाजिक परिवर्तन संभव है। सामान्यत: विकास शब्द ही विनाश का कारण है। हम विकास के नाम पर बड़ी-बड़ी परियोजनाओं को स्थापित करने की बात करते हैं, नदियों का रास्ता मोड़ देना चाहते हैं। नतीजा 2013 में उत्तराखंड में आई जल प्रलय के रूप में सामने है। केदारनाथ में बादल फटने के बाद हजारों लोग पानी की धार में बह गए, करीब तीन सौ पुल टूट कर बह गए, सड़कें टूट गर्इं। यह मनुष्य के लोभ और विलासिता के कारण ही हुआ है। 1929 में उत्तराखंड की यात्रा के दौरान गांधीजी ने कहा था कि पूरे उत्तर भारत की हरियाली हिमालय के पर्वतों पर टिकी है, अगर हिमालय की छाया नहीं होती तो पूरा उत्तर भारत सहारा के रेगिस्तान की तरह होता। उत्तराखंड की विभीषिका प्रकृति के साथ खिलवाड़ का नतीजा थी। नदियां अपने तटों को तोड़ती हुई प्रचंड रूप धारण कर चुकी थीं। गोरी गंगा, काली गंगा और मंदाकिनी जैसी नदियों ने विकराल रूप दिखाया था। जो पानी जीवनदायी होता है, उसका कहर जीवन भी ले सकता है। लेकिन आज भी हमने कोई सबक नहीं सीखा है। भारत महामारियों से त्रस्त है। बिहार में दिमागी बुखार से बच्चे मर रहे हैं। बीकानेर जाने वाली एक ट्रेन का नाम तो कैंसर एक्सप्रेस पड़ गया है। इस ट्रेन में हर दिन दो सौ से ज्यादा मरीज होते हैं जो कैंसर के सस्ते सुलभ इलाज के लिए बीकानेर जाते हैं। आखिर मालवा का यह क्षेत्र कैंसर से पीड़ित क्यों हुआ? इसके पीछे भी जो कारण है वह लालच और लोभ ही है। ज्यादा फसल उपजाने के लिए भारी मात्रा में रसायनों का प्रयोग किया जाने लगा है जो कैंसर जैसी बीमारियों का कारण बन गए हैं। ज्यादा फसल का मतलब ज्यादा पैसा, जिसका उपयोग भौतिक सुख-सुविधा के लिए किया जाएगा। आज हमारे देश में कैंसर रोगियों की जो तादाद बढ़ रही है, उसका कारण भी जीवन शैली ही है। गांधीजी के समय पर्यावरण की बड़ी त्रासदी नहीं आई थी। लेकिन गांधीजी चेता दिया था कि अगर बड़े-बड़े उद्योग लगेंगे, शहरीकरण बढ़ेगा, झुग्गी बस्तियां फैलेंगी तो पर्यावरण की समस्या निश्चित रूप से मानव सभ्यता के लिए मुसीबत बनेगी। गांधीजी बड़े शहरों के विरोधी थे। वे कहते थे कि बड़े शहर का मतलब बड़ी मुसीबत। गांधीजी का ग्राम स्वराज सिद्धांत इस मुसीबत से उबरने की रह दीखता है। आत्म संयम और अहिंसा भी पर्यावरण को अक्षुण्ण रखने में सार्थक साबित होगी। गांधीजी की पर्यावरण सोच जैन सिद्धांत और हिंदू धर्म से प्रभावित थी। सारे जीवों को इस धरती पर रहने का अधिकार एकसमान है। यह बात उन्होंने भाषण के द्वारा नहीं बल्कि अपनी जीवन शैली के द्वारा दुनिया को बताई थी। दक्षिण अफ्रीका में गांधी का आश्रम उसी अनुरूप बना हुआ था, जिससे पर्यावरण के साथ कोई छेड़छाड़ न हो सके। साबरमती आश्रम में भी यही व्यवस्था थी। यहां तक कि टैगोर का आश्रम भी पर्यावरण के स्वाभाविक नियमों के तहत ही बना था। आज अगर भारत की अस्मिता को सुरक्षित रखना है तो पश्चिमी सोच और भौतिक सुखों को नियंत्रित करना होगा, नहीं तो समस्या विकराल होती जाएगी और विकास विनाश का कारण बनता चला जाएगा।
(सतीश सिंह July 19, 2019 का जनसत्ता का लेख साभार)

Wednesday, July 10, 2019

भारत के हित में नहीं है आरसीईपी

Resolution-2 (Madurai Sammelan

-H 13वां राष्ट्रीय सम्मेलन, 18,19,20 जनवरी 2019 (मदुरै, तमिलनाडू)
प्रस्ताव-2
भारत के हित में नहीं है आरसीईपी स्वदेशी जागरण मंच
रिजनल कंप्रिहेंसिव इकोनामिक पार्टनरशिप (आरसीईपी) यानि प्रस्तावित क्षेत्रीय विस्तृत आर्थिक साझेदारी समझौते के घटनाक्रमों को बहुत नजदीक से देख रहा है। अभी तक का भारत सरकार का रवैया इस समझौते की ओर सर्तकता से बढ़ने का रहा हैै। स्वदेशी जागरण मंच का राष्ट्रीय सम्मेलन यह मानता है कि आरसीपीए समझौता भारत के लिए एक बड़ा खतरा है और अवसर तो बिल्कुल नहीं है, जैसा सरकारी सूत्रों के हवाले से मीडिया में बताया जा रहा है। हालांकि 2012 से शुरू होकर अभी तक 24 वार्ताओं के दौर इस संदर्भ में हो चुके हैं लेकिन इन वार्ताओं में आगे नहीं बढ़ा जा सका, क्योंकि भारतीय वार्ताकारों ने विशेष तौर पर 2014 के बाद बड़ी सतर्कता से काम किया और आरसीईपी के अन्य सदस्य देशों के किसी भी दबाव में झुकने से इंकार कर दिया। भारत ही नहीं कई अन्य सदस्य देश भी आरसीपी समझौतों के प्रभाव के बारे में काफी आषंकित रहे हैं। आरसीईपी एक प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौता है जिसमें 16 देश शामिल है। इसमें 10 आसियान देश (इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस, सिंगापुर, थाईलैंड, वियतनाम, लाओस, कंबोडिया) एवं जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, चीन और भारत आते है। इस समझौते की व्यापकता इस बात से समझी जा सकती है कि आरसीईपी के 16 सदस्य देशों में 3.4 अरब लोग रहते हैं, जो कुल वैश्विक जनसंख्या का 45 प्रतिषत है, इनकी सम्मिलित क्रय शक्ति समता के आधार पर जीडीपी 49.3 डॉलर है, जो विश्व की कुल जीडीपी का 39 प्रतिशत है और विश्व के कुल विदेशी व्यापार का 30 प्रतिषत इन मुल्कों द्वारा होता है। यानि कहा जा सकता है कि यदि यह आरसीईपी समझौता हो जाता है तो यह विश्व व्यापार संगठन समझौते के बाद, दुनिया का सबसे बड़ा मुक्त व्यापार समझौता हो जाएगा और दुनिया का सबसे बड़ा मुक्त व्यापार ब्लॉक बन जाएगा। बाजार पहुंच इस प्रस्तावित आरसीईपी समझौते के केंद्र में है। समझौते होने के बाद भारत को एक सदस्य देश होने के नाते अपने अन्य सदस्य देशों से अधिकांश आयातांे पर आयात शुल्क को षून्य पर लाना होगा। आरसीईपी के मूल प्रस्तावों के अनुसार भारत को अन्य सदस्य देशों से आयातों में से 90 से 92 प्रतिषत आयातित वस्तुओं पर आयात शुल्क षून्य करना होगा। हालांकि भारत ने भी कई प्रस्ताव इस समझौते के संदर्भ में दिये है, जिसमें तीन स्तरीय टैरिफ घटाने का भी प्रस्ताव है। इस तीन स्तरीय टैरिफ घटाने के प्रस्ताव के अनुसार पहला वर्तमान आसियान समझौते में शामिल देशों के लिए है। दूसरा उन देशों के लिए है, जिनके साथ भारत का मुक्त व्यापार समझौता पहले से ही है, यानि जापान और दक्षिण कोरिया तथा तीसरा उन देशों के लिए है जिनके साथ भारत का मुक्त व्यापार समझौता अभी नहीं है यानि न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया और चीन। जानकारों के अनुसार भारत को कहा गया है कि वह अपने प्रस्तावों में बदलाव कर और टैरिफ को ज्यादा वस्तुओं के लिए घटाने हेतु सहमति दें। औद्योगिक वस्तुओं के संदर्भ में भारत को चीन से एक बड़ी चुनौती है। भारत के लगभग आधा व्यापार घाटा चीन के कारण है, यदि 74 प्रतिषत वस्तुओं पर भी आयात शुल्क घटाने हेतु हामी भरता है (जो वर्तमान में भारत का प्रस्ताव है) तो भी चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा कई गुना बढ़ सकता है। यही नहीं, यह भारत के मैन्युफैक्चरिंग ग्रोथ की संभावनाओं के लिए खतरा उत्पन्न करते हुए भारत के लोगों के अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लग सकता है। मुक्त व्यपापार समझौतों के संदर्भ में भारत का अनुभव बहुत उत्साहवर्धक नहीं रहा है, खासतौर पर इस क्षेत्र में। जब से भारत ने आसियान देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौता किया है, इन देशों के साथ हमारा व्यापार घाटा वर्ष 2009-10 में 7.7 अरब डॉलर से बढ़ता हुआ 2017-18 तक 13 अरब डालर तक पहुंच गया चुका है। इस कालखंड में मलेशिया और इंडोनेशिया जैसे मुल्कों से आयात 2 से 3 गुना बढ़ चुका है। लगभग यही अनुमान जापान और दक्षिण कोरिया के साथ भी रहा है, जहां हमारा व्यापार घाटा दुगने से ज्यादा हो चुका है। आज जब हमारा व्यापार घाटा अपनी चरम सीमा पर पहुंच रहा है। भारत के लिए अधिक आयात शुल्क रहित बाजार पहुंच की अनुमति देना देषहित में नहीं है। ऐसा करते हुए अपने उधोगों को बंद करने के लिए बाध्य कर देंगे। हमें नहीं भूलना चाहिए कि गेहूं, डेयरी उत्पादन और मांस उत्पादनों में ऑस्ट्रेलिया की प्रतिस्पर्धा शक्ति और वैश्विक डेयरी निर्यातक के नाते न्यूजीलैंड की भूमिका के मद्देनजर, हम इस समझौते के बाद भारतीय कृषि और डेयरी क्षेत्रों को पूरी तरह से दयनीय स्थिति में पहुंचा देंगे। भारत सरकार के वार्ताकारों का इस समझौते के संदर्भ में एक मात्र तर्क यह है कि हम अन्य सदस्य देशों से सेवाओं के व्यापार के बारे में कुछ रियायतें पा सकते हैं, जहां भारत का कुछ आक्रामक हित है। हालांकि यह बताया जा रहा है कि भारत को सेवाओं में उदारीकरण से कुछ लाभ हो सकता है, लेकिन इस संदर्भ में हमारा अभी तक का अनुभव बहुत उत्साहवर्धक नहीं है। जहां एक और भारत ने आसियान देशों के साथ अन्य देशों से आने वाले पेषेवरों के संदर्भ में खुले द्वार की नीति अपनाई हुई है, लेकिन अन्य देशों ने तमाम प्रकार के घरेलू नियम बनाए हुए हैं, जिनके कारण से भारतीय पेशेवरों को वहां रोजगार पाना संभव नहीं है। साथ ही साथ यदि आरसीईपी समझौता संपन्न हो जाता है तो कई संदर्भ में भारत सरकार के लिए नीति बनाने के विकल्प समाप्त हो सकते हैं। भारत को सेवाओं के संबंध में घरेलू विनिमय के बारे में ऐसे प्रावधानों को स्वीकार करने के लिए कहा जा रहा है, जिसके कारण केंद्र सरकार ही नहीं, राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों के पास भी नीति निर्माण के विकल्प सीमित हो जाएंगे। साथ ही साथ ऐसे संकेत हैं कि जापान और दक्षिण कोरिया के प्रस्ताव हैं कि विश्व व्यापार संगठन में संपन्न टिप्स व्यापार संबंधी बौद्धिक संपदा अधिकार समझौते से आगे बढ़कर बौद्धिक संपदा के संदर्भ में प्रतिबद्धता इस समझौते में हो, जिसे ‘टिप्स-प्लस’ कहा गया है। इन प्रावधानों के अनुसार फार्मा कंपनियों के पेटेंट सामान्य 20 वर्ष से आगे बढ़ाना और ‘डाटा एक्लूसिविटी’ आदि से प्रतिस्पर्धा सीमित हो जायेगी। ये प्रावधान और इनके साथ-साथ अन्य प्रस्तावति प्रावधान, जन स्वास्थ्य के संदर्भ में अन्य चिंता का विषय है, क्योंकि दवाईयों की सर्वसुलभता पर इसका प्रभाव पड़ सकता है। बौद्विक संपदा अध्याय में भारत को कहा जा रहा है कि वह नई पादप किस्मों के अंतरराष्ट्रीय संघ (यूपीओवी) 1991 समझौते को स्वीकार कर ले, जिससे हमारे किसानों की बीज उत्पादन, रखरखाव, विनिमय और बिक्री की संभावना ही समाप्त हो जाएगी। इसलिए इस प्रस्ताव को सिरे से नकारने की जरूरत है, क्योंकि यदि यूपीओवी 1991 को अपनाने वाले किसी भी समझौते पर हामी भरी जाती है तो यह भारतीय किसानों की रोजी रोटी को समाप्त करने वाला होगा। हमने देखा है कि वैष्विक निवेश समझौतों से कंपनियों के हाथ में सरकारों पर मुकदमा दायर करने की ताकत आ जाती है अब वे सरकारों को कंपनियों को विनिमय करने की क्षमता को चुनौती देने लगती है। इसके कारण न केवल मुआवजा देने में भारी राजस्व का नुकसान होता है बल्कि सरकार के पास नीति बदलने की संभावना भी नहीं बचती। भारत सरकार को आदर्श द्विपक्षीय निवेश समझौते के प्रारूप पर अडिग रहना चाहिए और अपने नीतिगत विकल्पों को क्षरित करने वाले किसी भी प्रस्ताव को नहीं मानना चाहिए। यह भी सुना जा रहा है कि भारत सरकार ई-कॉमर्स के अध्याय में कुछ प्रावधानों पर सहमति देने वाली है। भारत डिजिटल अर्थव्यवस्था में कदम रख रहा है। इस समझौते का डिजिटल अर्थव्यवस्था में नीतिगत और विनिमय की संभावनाओं पर विपरीत असर पड़ेगा। यह भारी भूल होगी। आज जब ई-कॉमर्स और डिजिटल अर्थव्यवस्था की नीति पर देष में बहस चल रही है और इस दिशा में स्पष्ट नीति के बारे में विचार चल रहा है, हमें किसी अंतरराष्ट्रीय समझौते पर हामी भर कर अपने हाथ बांधने नहीं देना चाहिए। हम पहले से ही देख रहे हैं कि बड़ी ई-कॉमर्स और डिजिटल कंपनियां एकाधिकार शक्ति के बलबूते कैसे भारत का शोषण कर रही है, उनके एकाधिकारी ताकत को बढ़ाना किसी भी हाल में सही नहीं है। स्वदेशी जागरण मंच का मानना है कि आरसीईपी भारत के लोगों के हित में नहीं है। अर्थव्यवस्था का कोई क्षेत्र अथवा वर्ग इस समझौते से लाभान्वित होने वाला नहीं है। 2019 के चुनाव होने के नाते भी भारत सरकार के लिए समझौते पर सहमति देना अथवा आरसीईपी सदस्य देशों को कोई रियायत देना घातक हो सकता है। मंच का राष्ट्रीय सम्मेलन सरकार से आग्रह करता है कि राष्ट्रीय हितों, विशेष तौर पर मैन्युफैक्चरिंग, किसान, डेयरी और जन स्वास्थ्य संरक्षण के मद्देनजर आरसीपी वार्ताओं में आगे न बढ़े।

Tuesday, July 9, 2019

कोका कोला की भयावह कथा

कोका कोला की भयावह कथा
आज जो तकिया कलाम 'ठंडा मतलब कोकाकोला' हमारी जुबान पर चढ़ गया है, इसके पीछे एक भयावह कहानी है। पार्ले कंपनी का 80% हिस्सा सॉफ्ट ड्रिंक्स में था। वैसे भी उस समय हमारे देश में साफ्ट ड्रिंक्स के करीब 62 ब्रांड्स विभु, सुनौला, थम्स अप, लिम्का, कैम्पा कोला और बहुत सारे, पूरे देश भर में प्रचलित थे।   अब दो विदेशी ब्राण्ड ही बच गये सारी साफ्ट ड्रिंक्स कम्पनियाँ या तो बंद हो गई या विदेशियों द्वारा अधिग्रहीत (टेकओवर) कर ली गई। जैसे पारले प्रोडक्ट का साफ्ट ड्रिंक का जो 600 करोड़ रुपये (60 मिलियन्स) वार्षिक का साफ्ट ड्रिंक्स का व्यवसाय था, वह कारोबार कोका कोला ने अधिग्रहित (टेकओवर) किया। पार्ले प्रोडक्ट्स के शीतल पेय व्यवसाय के अधिग्रहण की इस कहानी को बताने से थोड़ा सा समय ज्यादा लगेगा। लेकिन, इससे यह स्पष्ट होगा कि भारत में उत्पादन के नाम पर 1990 के दशक में चलते हुये उद्यमों को अधिग्रहीत करने का षड़यंत्र था। कान्सपिरेन्सी किस तरह की होती रही है यह समझ आएगा। जब कोका कोला कम्पनी आई तो उसमें सबसे पहले पारले प्रोडक्ट्स लगेगा थम्स अप लिम्का के बॉटल बाजार से गायब होनी शुरू हो गयी। दुकानदारों को पार्ले के ब्राण्डों के खाली क्रेट के बदले कोका कोला के भरे क्रेट मिलने लग गये।
उस समय शीतल पेय काँच की बोतलों में आता था जो बॉटल मेन्यूफेक्चरर था। पारले प्रोडक्ट्स के बाॅटल निर्माता को भी अनुबन्धित कर लिया कि हम तुमसे इतनी बोतल खरीदेंगे शर्त यह है कि इस अवधि में तुम किसी दूसरे के लिए बोतल नहीं बनाओगे। अब पार्ले प्रबन्धन को लगा कि हमारी बोतल मार्केट से वापस री-सरकुलेट होकर नहीं आ रही है कि उनको धोकर वापस भरें, तब अपने मेन्युफेक्चरर को कहा कि इतनी बोतल बना दो तो उसने कहा नहीं अब तो मैं टाई-अप हूँ, मैं नहीं करूँगा। इसके अतिरिक्त हाइवे पर व अन्यत्र रेस्टोरेण्टों को भी अनुबन्धित कर लिया कि जैसे मान लो बनारस से दिल्ली तक हाइवे पर आपने उस समय देखा होगा कि जो ढाँबे वाले या रेस्टोरेंट वाले होते थे उनको एक छोटा फ्रिज मुफ्त देती थी कम्पनी और कहती थी अपना पूरा परिसर हमारे ब्राण्ड के नाम से पेंट करवा लो और एक या दो साल तक किसी दूसरे का साफ्ट ड्रिंक नहीं रखना तो यह फ्रिज मुफ्त देंगे। यानी कि बाजार पर अपना एकाधिकार करना। जैसा मैंने पूर्व में कहा कि हमारे यहाँ इनकम टैक्स रेट बहुत ऊंची थी, पूंजी निर्माण कठिन था। किसी भी कम्पनी का सार्वजनिक निर्गम (Public Issue of Shares) आता तो पूंजी निर्गमन नियन्त्रक अनुमोदन आवश्यक था। इसलिये हिन्दुस्तान में किसी भी कम्पनी में प्रवर्तकों (Promoters) के शेयर 10-20 प्रतिशत ही होते थे। 40 प्रतिशत के करीब शेयर्स फाइनेन्शियल इन्स्टीट्यूूशन्स के पास होते थे। उन दिनों ऐसे भी समाचार थे कि शेयर बाजार से पार्ले के शेयर कुछ कोका कोला कम्पनी ने खरीदने प्रारम्भ किये थे। इसलिये पार्ले के मालिकों को लगा कि कहीं ऐसा ना हो कि वो 10-12 प्रतिशत शेयर स्टाक मार्केट से खरीद कर उसका हास्टाइल टेकओवर (बलात अधिग्रहण) न हो जाए। ऐसे में पार्ले कम्पनी पूरी हाथ से निकल सकती थी, और सेप्टेम्बर 1993 आते-आते रमेश चौहान को लगा कि अब कोका कोला से लड़ना संभव नहीं।  इसलिए 600 करोड़ के टर्नओवर वाली कम्पनी जिसके थम्स अप, लिम्का, गोल्ड स्पॉट  जैसे अत्यन्त लोकप्रिय ब्राण्ड थे बिक गयी। 24 अक्टूबर1993 को जब आगरा में ताजमहल के पास से शानोशौकत से कोका कोला ने बड़ा प्रदर्शन किया तो यह एक प्रकार से भारतीय उद्योगों पर ईस्ट इंडिया कंपनी की विजय जैसी ही थी। इस तरह से पिछले दिनों एफ.डी.आई. को खोलने से देश के एक कर उद्योग विदेशी स्वामित्व में गये हैं। अब तक देश के वे ही उत्पाद भारतीय उद्यम बनाते थे, वे अब भारत में विदेशी उद्यम बना रहे हैं।
(यह लेख श्री भगवती प्रकाश शर्मा की पुस्तिका "मेड बाई इंडिया" पर आधारित है)
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श्री गुरुप्रसाद जी ने अन्य ढंग से अपने ब्लॉग में इसे लिखा है।
Part 13: Thums Up Story: Ramesh Chauhan sells Parle brands to Coca Cola

Previously, we had seen how Coca Cola managed to get its plan approved within a few months, thanks to economic reforms by Dr Manmohan Singh under PV Narasimha Rao Govt:
http://guruprasad.net/posts/part-12-thums-up-story-coca-cola-enters-india/

In order to get a foothold in India, Coca Cola had 3 options:

Gradually expand operations by building its own plants throughout India. This process would take several years.

Poach bottlers (franchises) of other cola brands by offering them irresistible benefits.

Acquire a company which already has all the facilities in place, so that Coca Cola can reach out to every nook and corner of India from day one.

Coca Cola started with the 2nd option i.e Poaching bottlers.
Altough Parle was the market leader with more than 80% of the market-share catered by 62 bottlers across India, it was a fragile business model because Parle owned only 4 bottlers while the rest (58 bottlers) were owned by franchises. Most of these franchises were not happy with Ramesh Chauhan’s autocratic leadership style and they preferred to work for foreign brands like Coke. Hence, it was very easy for Coca Cola to hunt down the top bottlers and poach them. Ramesh Chauhan was helpless because almost every week, there would be news of one more bottler switching to Coca Cola. If this continued, then Parle would end up with less than 10 bottlers (since 4 were its own and few were still very loyal to it), thereby losing significant marketshare and dying a natural death.

By September 1993, Ramesh Chauhan realized that there was no point fighting with the giant which was on a poaching spree and decided to “surrender”. It was a very tough decision to make because these brands (Thums Up, Limca, Gold Spot) were carefully nurtured by Chauhan like his own children and now he had to sell them off!!

With a heavy heart, he bid goodbye to his brands and sold them to Coca Cola. During the signing of the contract, Ramesh Chauhan turned emotional & cried incessantly.
Alतhough the details of the deal were confidential, it was speculated that it was a $60 million deal and there were mixed reactions from industry pundits since most of them could have never expected Chauhan to call it quits. However, considering the situation (bottlers being poached) & the practicality, everyone agreed that Chauhan did the best thing.

It was double-bonanza for coca cola because firstly, it managed to instantaneously reach out to every part of India, and secondly, there was no significant competition (because the leader itself was acquired). On 24th October 1993, Coca Cola launched its drink with a bang symbolically in front of the Taj Mahal, Agra and distributed millions of coke bottles all over India for free.

While Coca Cola was celebrating its grand entry into India, Ramesh Chauhan, despite severing links with his brands was anxious about what would happen to them. His sources within Coca Cola had told him that the company was planning to kill his brands and promote its own brands instead. Although Ramesh Chauhan tried his best to convince Coca Cola that all his brands were catering to Indian customer tastes (and hence must be treated on par with their global brands), at the end of the day, it was in Coca Cola hands to take the final call.

Monday, July 8, 2019

कोका कोला ने पार्ले का कैसे अधिग्रहण किया?

कैसे कोका कोला ने पार्ले का कैसे अधिग्रहण किया?

हमारे देश में साफ्ट ड्रिंक्स के करीब पचास-साठ ब्रांड्स विभु, सुनौला, थम्स अप, लिम्का, कैम्पा कोला बहुत सारे पूरे देश भर में अनेक ब्रांड थे और अब दो विदेशी ब्राण्ड ही बच गये सारी साफ्ट ड्रिंक्स कम्पनियाँ या तो बंद हो गई या विदेशियों द्वारा अधिग्रहीत (टेकओवर) कर ली गई। जैसे पारले प्रोडक्ट का साफ्ट ड्रिंक का जो 600 करोड़ रुपये वार्षिक का साफ्ट ड्रिंक्स का व्यवसाय था, वह कारोबार कोको कोला ने अधिग्रहित (टेकओवर) किया। पार्ले प्रोडक्ट्स के शीतल पेय व्यवसाय के अधिग्रहण की इस कहानी को बताने से थोड़ा सा समय ज्यादा लगेगा। लेकिन, इससे यह स्पष्ट होगा कि भारत में उत्पादन के नाम पर 1990 के दशक में चलते हुये उद्यमों को अधिग्रहीत करने का षड़यंत्र था। कान्सपिरेन्सी किस तरह की होती रही है। जब कोका कोला कम्पनी आई तो उसमें सबसे पहले पारले प्रोडक्ट्स लगेगा थम्स अप लिम्का के बॉटल बाजार से गायब होनी शुरू हो गयी। दुकानदारों को पार्ले के ब्राण्डों के खाली क्रेट के बदले कोका कोला के भरे क्रेट मिलने लग गये।
उस समय शीतल पेय काँच की बोतलों में आता था जो बॉटल मेन्यूफेक्चरर था। पारले प्रोडक्ट्स के बाॅटल निर्माता को भी अनुबन्धित कर लिया कि हम तुमसे इतनी बोतल खरीदेंगे शर्त यह है कि इस अवधि में तुम किसी दूसरे के लिए बोतल नहीं बनाओगे। अब पार्ले प्रबन्धन को लगा कि हमारी बोतल मार्केट से वापस री-सरकुलेट होकर नहीं आ रही है कि उनको धोकर वापस भरें, तब अपने मेन्युफेक्चरर को कहा कि इतनी बोतल बना दो तो उसने कहा नहीं अब तो मैं टाई-अप हूँ, मैं नहीं करूँगा। इसके अतिरिक्त हाइवे पर व अन्यत्र रेस्टोरेण्टों को भी अनुबन्धित कर लिया कि जैसे मान लो बनारस से दिल्ली तक हाइवे पर आपने उस समय देखा होगा कि जो ढाँबे वाले या रेस्टोरेंट वाले होते थे उनको एक छोटा फ्रिज मुफ्त देती थी कम्पनी और कहती थी अपना पूरा परिसर हमारे ब्राण्ड के नाम से पेंट करवा लो और एक या दो साल तक किसी दूसरे का साफ्ट ड्रिंक नहीं रखना तो यह फ्रिज मुफ्त देंगे यानी कि बाजार पर अपना एकाधिकार करना। जैसा मैंने पूर्व में कहा कि हमारे यहाँ इनकम टैक्स रेट बहुत ऊंची थी, पूंजी निर्माण कठिन था। किसी भी कम्पनी का सार्वजनिक निर्गम (Public Issue of Shares) आता तो पूंजी निर्गमन नियन्त्रक अनुमोदन आवश्यक था। इसलिये हिन्दुस्तान में किसी भी कम्पनी में प्रवर्तकों (Promoters) के शेयर 10-20 प्रतिशत ही होते थे। 40 प्रतिशत के करीब शेयर्स फाइनेन्शियल इन्स्टीट्यूूशन्स के पास होते थे। उन दिनों ऐसे भी समाचार थे कि शेयर बाजार से पार्ले के शेयर कुछ कोका कोला कम्पनी ने खरीदने प्रारम्भ किये थे। इसलिये पार्ले के मालिकों को लगा कि कहीं ऐसा ना हो कि वो 10-12 प्रतिशत शेयर स्टाक मार्केट से खरीद कर उसका हास्टाइल टेकओवर (बलात अधिग्रहण) न हो जाए। ऐसे में पार्ले कम्पनी पूरी हाथ से निकल सकती थी, इसलिए 600 करोड़ के टर्नओवर वाली कम्पनी जिसके थम्स अप, लिम्का जैसे अत्यन्त लोकप्रिय ब्राण्ड थे बिक गयी। इस तरह से पिछले दिनों एफ.डी.आई. को खोलने से देश के एक कर उद्योग विदेशी स्वामित्व में गये हैं। अब तक देश के वे ही उत्पाद भारतीय उद्यम बनाते थे, वे अब भारत में विदेशी उद्यम बना रहे हैं।
Part 13: Thums Up Story: Ramesh Chauhan sells Parle brands to Coca Cola

Previously, we had seen how Coca Cola managed to get its plan approved within a few months, thanks to economic reforms by Dr Manmohan Singh under PV Narasimha Rao Govt:
http://guruprasad.net/posts/part-12-thums-up-story-coca-cola-enters-india/

In order to get a foothold in India, Coca Cola had 3 options:

Gradually expand operations by building its own plants throughout India. This process would take several years.

Poach bottlers (franchises) of other cola brands by offering them irresistible benefits.

Acquire a company which already has all the facilities in place, so that Coca Cola can reach out to every nook and corner of India from day one.

Coca Cola started with the 2nd option i.e Poaching bottlers.
Altough Parle was the market leader with more than 80% of the market-share catered by 62 bottlers across India, it was a fragile business model because Parle owned only 4 bottlers while the rest (58 bottlers) were owned by franchises. Most of these franchises were not happy with Ramesh Chauhan’s autocratic leadership style and they preferred to work for foreign brands like Coke. Hence, it was very easy for Coca Cola to hunt down the top bottlers and poach them. Ramesh Chauhan was helpless because almost every week, there would be news of one more bottler switching to Coca Cola. If this continued, then Parle would end up with less than 10 bottlers (since 4 were its own and few were still very loyal to it), thereby losing significant marketshare and dying a natural death.

By September 1993, Ramesh Chauhan realized that there was no point fighting with the giant which was on a poaching spree and decided to “surrender”. It was a very tough decision to make because these brands (Thums Up, Limca, Gold Spot) were carefully nurtured by Chauhan like his own children and now he had to sell them off!!

With a heavy heart, he bid goodbye to his brands and sold them to Coca Cola. During the signing of the contract, Ramesh Chauhan turned emotional & cried incessantly.
Alतhough the details of the deal were confidential, it was speculated that it was a $60 million deal and there were mixed reactions from industry pundits since most of them could have never expected Chauhan to call it quits. However, considering the situation (bottlers being poached) & the practicality, everyone agreed that Chauhan did the best thing.

It was double-bonanza for coca cola because firstly, it managed to instantaneously reach out to every part of India, and secondly, there was no significant competition (because the leader itself was acquired). On 24th October 1993, Coca Cola launched its drink with a bang symbolically in front of the Taj Mahal, Agra and distributed millions of coke bottles all over India for free.

While Coca Cola was celebrating its grand entry into India, Ramesh Chauhan, despite severing links with his brands was anxious about what would happen to them. His sources within Coca Cola had told him that the company was planning to kill his brands and promote its own brands instead. Although Ramesh Chauhan tried his best to convince Coca Cola that all his brands were catering to Indian customer tastes (and hence must be treated on par with their global brands), at the end of the day, it was in Coca Cola hands to take the final call.