Friday, May 22, 2015

सासाराम में दिया प्रेस वक्तव्य (21.5.15)


स्वदेशी जागरण मंच।
सासाराम, बिहार।
श्री कश्मीरी लाल, राष्ट्रीय संगठक का सासाराम में पत्रकार वार्ता में दिया वक्तव्य। दिनांक 21-5-1....

स्वदेशी जागरण मंच की स्पष्ट मान्यता है कि पिछले लगभग ढाई दशकों से चल रही उदारीकरण की आर्थिक नीतियों के फलस्वरूप देश की जनता के कष्टों में भारी वृद्धि हुई है, समाज में असमानतायें बढ़ी हैं, रोजगार के अवसर क्षीण हुए हैं और देश का आर्थिक तंत्र छिन्न-भिन्न हुआ है। पिछली सरकार की पूंजीपतियों के साथ मिलीभगत के फलस्वरूप कुछ चुनिंदा पूंजीपतियों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लाभ देने में भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा दिखाई दी। नई आर्थिक नीतियों के नाम पर भ्रष्ट तरीकों से पूंजीपतियों को लाभान्वित करने के कृत्यों पर विराम लगाने और देश के आर्थिक तंत्र को पुनः पटरी पर लाने हेतु नयी सरकार को मिला जनादेश का मोदी
सरकार द्वारा वित्तीय समावेषन (विषेष तौर पर जनधन योजना और मुद्रा बैंक की स्थापना) सहित कई आर्थिक नीतियों का हम हार्दिक स्वागत करते हैं। परंतु साथ ही कई विषयों पर नयी केंद्रीय सरकार से पहल करने की उम्मीद करते है; जो अभी पूरी होती दिखाई नहीं दे रही।

पहला मुद्दा, जिसपर स्वदेशी जागरण मंच ने इस 5 मई 2015 के दिल्ली जंतर मंतर में आयोजित अपने जनसंसद में स्पष्ट मांग की कि भूमि अधिग्रहण बिल पर हम कुछ सुधर चाहते हैं
यद्यपि सरकार ने प्रत्येक प्रभावित परिवार में से न्यूनतम एक व्यक्ति को रोजगार, निजी शिक्षण संस्थाओं एवं अस्पतालों के लिए भूमि अधिग्रहित न करने व जनहित में 9 अन्य संशोधन किये है जो कि जनहित में सराहनीय कदम हैं।  इसके बावजूद भूमि अधिग्रहण बिल में आपत्तिजनक प्रावधान हैं, जो किसान, कृषि, खाद्य सुरक्षा और प्राकृतिक न्याय के विरूद्ध है।
जैसाकि सर्वविदित है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी परियोजनाओं के संदर्भ में यह स्थापित प्रक्रिया है कि उसकी निर्मिति से पहले उसके सामाजिक, पर्यावरणीय एवं अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभावों का भलीभांति आकलन किया जाए और उसी आलोक में भूमि की आवश्यकता का भी आकलन हो। इस सुस्थापित अंतर्राष्ट्रीय प्रक्रिया का अध्यादेष उल्लंघन करता है। और चाहे सरकार भी भूमि ले रही है, किसान की सहमति जरूरी है, ऐसा हमारी अपेक्षा है। इसके साथ हम चाहते है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् आज तक सरकारोें द्वारा अधिग्रहित भूमि, उसके वर्तमान उपयोग तथा खाली पड़ी शेष भूमि और बड़े उद्योगपतियों के पास पड़ी बेकार भूमि के बारे में एक श्वेत पत्र जारी किया जाए।

दुसरे, हम चाहते है कि जी.एम. फसलों के जमीनी परीक्षणों पर रोक लगे।अगस्त 2013 में कृषि पर संसदीय स्थाई समिति ने कहा था कि जीएम फसलों के सभी जमीनी परीक्षणों को रोकना  चाहिए, जब तक कि मानव, धरती और जैव विविधता पर इनके प्रभाव पता नहीं लग जाते। सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित तकनीकी विषेषज्ञ समिति ने संबंधित ने भी जी.एम. फसलों के खुले में परीक्षणों में निहित खतरों के बारे में कहा था और भारतीय जनता पार्टी के चुनाव घोषणा-पत्र में भी यही बात रखी गई कि मानव एवं उर्वरा पर दीर्घकालिक प्रभावों का पूरा वैज्ञानिक मूल्यांकन नहीं हो जाता तब तक जी.एम. बीजों की अनुमति नहीं दी जाएगी। इस लिए हमारा मानना है क़ि भारत को आसान बाजार मानकर ये कम्पनियां देष के खाद्य तंत्र पर एकाधिकार चाहती है, जो की हरगिज नहीं होना चाहिये।

तीसरा बिंदु है कि सरकारी प्रतिबंध के बावजूद ई-काॅमर्स में विदेशी कंपनियां अपना कारोबार फैला रही है। हम ई कॉमर्स के विरोधी नहीं पसर विदेशी रिटेल कंपनिया इसे चोर दरवाजा बनाकर न घुसे। वे अपने विशाल संसाधनों का उपयोग करते हुए भारी डिस्काउंट के नाम पर हिंसक (predatory) कीमतों के द्वारा ये विदेशी कंपिनयां देश से प्रतियोगिता समाप्त कर रही हैं। इससे एक ओर छोटे और मझले दुकानदारों का कारोबार चौपट हो रहा है, तो दूसरी ओर इन कंपनियों द्वारा करों की चोरी से सरकारों की आय भी प्रभावित हो रही है।  विदेषी कंपनियां कानूनों की अस्पष्टता का भी दुरुपयोग कर रही ह बात की है कि उपभोक्ता और छोटे कारोबारियों के व्यापक हितों की सुरक्षा का ध्यान रखते हुए विदेषी कंपनियों द्वारा ई-काॅमर्स के माध्यम से कारोबार करने पर तुरंत प्रभावी प्रतिबंध लगाया जाए। साथ ही सरकार को बहुब्रांड में खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश को तुरंत रोकना चाहिए।
चौथी बात कि पिछले समय में सामारिक साझेदारों को सार्वजनिक उद्यमों को बेचने (जैसे माॅर्डन फूड इंस्ट्रीज लिमिटेड, बालकों, हिन्दुस्ताान जिंक लिमिटेड इत्यादि) के दुष्परिणाम देष देख चुका है। अतः बजट 2015-16 में सामरिक विनिवेश की घोषित नीति का परित्याग किया जाए।  पांचवा मुद्दा है कि आर्थिक नीतियों में आंतरिक उदारीकरण को प्रोत्साहन देने के साथ लघु उद्योगों को संरक्षण प्रदान किया जाए और लघु उद्योगों की परिभाषा को यथावत रखा जाए। इसलिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश कि बजाये भारतीय उद्योगों को बढ़ावा देना चीन के बाजार में आक्रमण को रोकने का स्थायी हल है। हम इसे 'मेक इन इंडिया ' नहीं बल्कि 'मेड बॉय इंडिया' कह कर अपना अंतर समझाते है। और छठा अंतिम मुद्दा चिंता का ये है की दुनिया भर की दवा कंपनिया पेटेंट और बौद्धिक सम्पदा अधिकार के नाम पर न केवल जनता को लूट रही है, बल्कि मौत के मुंह में धकेल रही है। सरकार ने पेटेंट एक्ट में सेक्शन 3D जो रखा है, अंतर्राष्ट्रीय दवाव में हरगिज हरगिज नहीं हटाना चाहिए। जैसे स्टैंड सरकार नें विश्व व्यापार संगठन कि बैठक मे दृढ़ता पूर्वक वा सफलतापूर्वक रखा; वैसा ही दवा उद्योग की सुरक्षा में रखना चाहिए। दुनिया भर के गरीब व विकासशील देश भारत की रहनुमाई की इस मामले में सापेक्ष रखते है।
इन सब बातो पर अपनी अगली रणनीति पर विस्तृत चर्चा करने मंच की अगली राष्ट्रिय परिषद 27-28 जून को विजय वाड़ा में होगी जिसमे देशभर के चुने हुए कार्यकर्ता भाग लेंगे।

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