Wednesday, August 10, 2016

नगरीय विकास का क्या कोई भारतीय मॉडल है?

नगरीय विकास का क्या कोई भारतीय मॉडल है?

भीलवाड़ा दिनांक 31 जुलाई 2016

आज यहाँ पर एक विचार गोष्ठी इस उपर्युक्त शीर्षक के साथ रखी गयी थी जिसमें में भी एक वक्ता या मुख्य वक्ता था। तत्काल कुछ स्फुट विचार जो मन में आये और जनसत्ता में स्मार्ट सिटी पर जो लेख पढ़ा, उसी को मिला जुला कर यह प्रस्तुति है। श्री भगवती लाल जगेटिया, पूर्व इतिहासाध्यक श्यामसुन्दर जी और प्रोफ राजकुमार जी भी वक्ता थे।

1.1 भारत की 38 करोड़ शहरी आबादी संयुक्त राष्ट्र के एक अनुमान के अनुसार, 2031 तक बढ़कर 60 करोड़ होने वाली है। जाहिर है, योजनाबद्ध शहरी विकास आज हमारी आवश्यकता है। बेहतर नागरिक के साथ-साथ प्रदूषण मुक्त शहरों के निर्माण में देश के सीमित संसाधनों का उपयोग किया जाए, यह शहरी निर्माण विशेषज्ञों के लिए चुनौती है। 
1.2  स्वदेशी जागरण मंच के नाते हमारी गाँव में श्रद्धा है, विकेन्द्रित अर्थ व्यवस्था की लघु इकाई है, और हम मानते है कि भारत वास्तव में गाँव में ही बसता है। लेकिन शहर भी हमारी संस्कृति का अंग रही है। प्रति सुबह हम बोलते है, अयोध्या, मथुरा माया, काशी कांची, अवंतिका, पूरी द्वारावती चैव, सप्तेयता मोक्षदायिका। नरक दायिका नहीं, मोक्षदायिका।
वैसे भी हम जानते है की भगवान कृष्ण पले-बढे तो नन्द गाँव में लेकिन बसाई नगरी जो अब समुद्र में है। मोहनजोदड़ो और हड़प्पा तो जितने विकसित है, उतनी आजकी नगर नगरी भी नहीं, ऐसा लगता है। हाँ, आज जब भी विकसित नगर की बात होती है तो पेरिस के मॉडल से होती है और हम भूल जाते है कि यहाँ उससे भी विकसित कोई पाटलिपुत्र भी था जिसे अभी पटना है। इंग्लैंड का जिक्र करेंगे परंतु इंद्रप्रस्थ भी था। बात सिंगापूर से शुरु होती है और पुराने मायापुरी कप भूल जाते। अग्रोहाधाम को भी स्मरण करना चाहिए जहाँ की गरीन कार्ड पॉलिसी क्या गज़ब थी की आने वाले को एक ईंट और एक स्वर्ण मुद्रा हर स्थानीय व्यक्ति दिया करते थे। टैक्स लेते नहीं थे। 
1.3. हमारे देश में ‘जवाहर लाल नेहरू अर्बन रिन्यूअल मिशन’ योजना पहले से जारी थी। इसका लक्ष्य सभी शहरों का विकास करना था। फिर नरेंद्र मोदी के सत्ता संभालने के एक माह के भीतर ‘स्मार्ट सिटी परियोजना’ की घोषणा करने से पता चलता है कि सरकार की प्राथमिकताएं बदल रही हैं।
इसकी घोषणा के फौरन बाद अमेरिका की ‘स्मार्ट सिटी काउंसिल’ की भारतीय शाखा ‘स्मार्ट सिटी कांउसिल ऑफ इंडिया’ का गठन किया जाना बतलाता है कि यह योजना मात्र हमारे देश तक सीमित नहीं है। इसकी अलग-अलग शाखाएं विभिन्न देशों में खुल चुकी हैं। 
1.4 अमेरिका के योजनाकारों की मानें तो विश्व भर में लगभग 5000 स्मार्ट सिटीज बनेंगी, जिनमें भारत को केवल 100 आवंटित की गई हैं।
आज नजर निवेशकों पर नजर
मई, 2015 में दिल्ली में हुई स्मार्ट सिटी कॉन्फ्रेंस ने इन 100 शहरों के निर्माण में अगले 20 वर्षों में एक लाख 20 हजार करोड़ डॉलर खर्च होने का अनुमान लगाया है। आज एक डॉलर लगभग 69 रुपये का है तो यह रकम लगभग 82 लाख 80 हजार करोड़ रुपये बैठती है, जो हमारे जीडीपी के 60 प्रतिशत के बराबर है। आज जब सरकार शिक्षा, महिला एवं बाल कल्याण, स्वास्थ्य, मनरेगा, स्वच्छ पानी इत्यादि पर अपने खर्चे कम कर रही है, तो सोचा जाना चाहिए कि इतना सारा खर्च सरकार कैसे कर पाएगी? 
1.5 उसे अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से उधार लेना पड़ेगा, जो जाहिर है उनकी शर्तों पर ही मिलेगा। संभव है कि सरकार को जन-कल्याण योजनाओं के खर्च में और अधिक कटौती करने के लिए कहा जाए। ग्रीस, स्पेन और अन्य कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं को विश्व बैंक और आईएमएफ ने अपने कर्ज में फांस कर उनका क्या हश्र किया, यह जगजाहिर है।
भारत सरकार के शहरी विकास मंत्रालय ने अपने ‘ड्राफ्ट कॉन्सेप्ट नोट ऑन स्मार्ट सिटी मिशन’ में स्मार्ट सिटी की विशेषताएं इस तरह गिनाई हैं- ‘यहां बहुत ही उच्च स्तर पर गुणवत्तापूर्ण जीवन होगा, जिसकी तुलना यूरोप के किसी भी विकसित शहर से की जा सकती है। स्मार्ट सिटी वह स्थान होगा जो निवेशकों, विशेषज्ञों और प्रफेशनल्स को आकर्षित करने में सक्षम होगा।’ ये निवेशक और विशेषज्ञ सूचना व संचार तकनीकों पर निर्भर होंगे।
2. क्या बहुत जरूए है इस विषय पर बोलना और स्मार्ट सिटी बनाने?
2 .1 अब जरा दूसरी तरफ देखिए तो आज दुनिया का हर तीसरा कुपोषित बच्चा भारतीय है। यहां स्वच्छ पानी केवल 34 प्रतिशत आबादी को उपलब्ध है। शौचालय की सुविधा अभी देश की आधी आबादी के पास नहीं हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार सिर्फ 2012 में 98 लाख 16 हजार लोग भारत में ऐसी बीमारियों से मर गए, जिनका इलाज सहज ही संभव था। ऐसी परिस्थितियों में हमारी प्राथमिकताएं शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और सस्ता भोजन होनी चाहिए, न कि स्मार्ट सिटी।
2 .2
2008 की मंदी ने बहुराष्ट्रीय निगमों की आर्थिक स्थिति पतली कर दी थी। इसकी मुख्य वजह यह थी कि उनके उत्पादन के लिए खरीदार नहीं मिल रहे थे। आज भी स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ है। उत्पादित माल गोदामों में पड़े हैं और उन्हें खरीद सकने वालों की जेबें खाली हैं।
2.3 स्मार्ट सिटी परियोजना का विश्व-व्यापी लक्ष्य महामंदी के दलदल में फंस चुकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को उबारना है। स्मार्ट सिटी के इस अभियान का नेतृत्व अमेरिका की आईबीएम और ऑप्टिकल नेटवर्क बनाने वाली कंपनी ‘सिस्को सिस्टम’ कर रही हैं। इनके साथ ही बिजली, गैस व पानी के स्मार्ट मीटर बनाने वाली इटरोन, जनरल इलेक्ट्रिक, माइक्रोसॉफ्ट, ओरेकल, स्विट्जरलैंड की एजीटी इंटरनेशनल और एबीबी, इंग्लैंड की साउथ अफ्रीका ब्रूअरीज जो बीयर के अलावा घरेलू उपभोक्ता सामान भी बनाती है, जापान की हिताची व तोशीबा, चीन की ह्वावेई जर्मन की सीमन्ज इत्यादि अपना माल बेचने की उम्मीद में इस स्मार्ट-सिटी अभियान में पूरे उत्साह के साथ शामिल हैं।
2.4 कोई आश्चर्य नहीं कि 17-18 फरवरी 2015 को इंडिया हैबिटेट सेंटर में आयोजित स्मार्ट सिटीज सम्मेलन के पहले सत्र में ही चर्चा का विषय था, ‘भारत में स्मार्ट सिटीज विकसित करने में अमरीकी कंपनियों के लिए अवसर।’ जिस तरह कोई बिल्डर अपनी हाउसिंग परियोजना के ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए एक मॉडल घर का निर्माण करता है, उसी तर्ज पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने दो प्रोटोटाइप स्मार्ट सिटीज का निर्माण किया है। उनमें एक शहर बार्सिलोना है और दूसरा अबूधाबी के निकट तैयार हो रहा शहर मसदर। जिन शहरों को स्मार्ट सिटी बनाने के लिए परियोजना के पहले चरण में चुना गया है, वहां के महापौर और नगर-निगम के मुख्य अधिकारियों को विडियो द्वारा इन शहरों की चकाचौंध दिखाई जा रही है।
खास खरीदारों के लिए
स्मार्ट सिटी को लेकर 16 फरवरी, 2015 को हमारे प्रधानमंत्री ने अमेरिका के मीडिया मुगल और वहां के दूसरे सबसे धनी व्यक्ति माइकल ब्लूमबर्ग से मुलाकात की और ‘सिटी चैलेंज प्रतियोगिता’ का प्रबंधन इन्हीं सज्जन की तथाकथित लोकोपकारी संस्था ब्लूमबर्ग फिलनथ्रॉपी को सौंप दिया। उपलब्ध सुविधाओं तथा मांग व आपूर्ति के हिसाब से इन स्मार्ट सिटीज में आवास की कीमतें ज्यादा होंगी। इसका नतीजा यह होगा कि भारत के आम लोगों के लिए इन शहरों में रहना काफी मुश्किल होगा, और अगर यहां किसी ने कोई झुग्गी-झोपड़ी डालने की कोशिश की तो बलपूर्वक उसे बाहर कर दिया जाएगा। ऐसा लगता है कि ये स्मार्ट शहर भारत के उभरते नव-धनाढ्य वर्ग के स्मार्ट लोगों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कारोबार के हित में बनाए जा रहे हैं।

एफडीआई धोखा है - पस्तक पर मेरी प्रस्तावना

एफडीआई का विषय आज आम चर्चा का मुद्दा है। स्वदेशी जागरण मंच की औ से इस विषय पर अच्छे लेखों का संग्रह छप रहा है। उसकी भूमिका मुझे लिखने को कही गयी। मुझे लगा की कई बार लोग पुस्तक नही पढ़ते और केवल प्रस्तावना ही पढ़ लेते है, सो मैंने अपनी ओर से पूरा मंतव्य इसी में लिख दिया। देखे आपको कैसा लगता है।

प्रस्तावना

आज़ाद भारत की  दो तिथियों को  लोग हमेशा याद रखेंगे। एक 15 अगस्त 1947,  जब वर्षों की गुलामी के बाद हमने आज़ादी पायी । दूसरी उसके 44 साल बाद 24 जुलाई,1991 जब आर्थिक सुधारों के नाम से भारत को फिर गुलामी की ओर धकेलने का प्रयास हुआ। शेष, डंकल प्रस्ताव, विश्व व्यापार संगठन आदि आगे उसी की खरपतवार हैं। आजकल एक सवाल आम लोग  पूछ रहे हैं। इस जून 20 जून 2016 या इससे पूर्व, जिस प्रकार प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के दरवाजे भारत सरकार ने खोले हैं,  क्या यह इस श्रृंखला में तीसरी तिथि है ?
आओ देखे कि यह प्रश्न  लोगों की जुबान पर क्यों आया है?  2012 में जब एफडीआई इन रिटेल का स्वदेशी आंदोलन अपने चरम पर था, तो उस समय हर आदमी के जेहन में यह  "एफडीआई" शब्द  एक गाली की तरह घर कर गया। संसद में लगभग पूरा विपक्ष और सरकार के अधिकाँश सहयोगी दल यथा सपा, तृणमूल कांग्रेस आदि भी एक जुबान से  सभी " एफडीआई" को बुरी तरह कोस रहे थे। वर्तमान सरकार के अधिकाँश नेता डट कर एफडीआई का विरोध कर रहे थे। वे ट्वीट, और ब्यान आज  पर जिन्दा है जिसमे आज के सत्ताधारी राजनेताओं में वरिष्ठतम ने एफडीआई की मंजूरी देने के कृत्य की तुलना "कांग्रेस  का विदेशियों के हाथों राष्ट्र सौंपने" से की थी। ये बाते, और भाजपा के 2014 के मैनिफेस्टो में ये आश्वासन बड़े अच्छे ढंग दिए गए हैं। लोग परेशान है कि पिछले चार वर्षों में ऐसा क्या हुआ कि भाजपा को अपने पुराने इरादे से पीछे हटना पड़ा।
शायद एक स्पष्टीकरण सरकारी पक्ष का ये होगा  कि भले ही यहाँ सिर्फ शब्द 'एफडीआई' आया है, परंतु इसे सभी प्रकार की एफडीआई के बारे में नहीं बोला गया था। सिर्फ एफडीआई इन मल्टीब्रांड रिटेल के बारे में कहा था। ठीक है, ऐसा ही हुआ होगा। तो प्रश्न उठता है की खुदरा व्यापार में बहु ब्रांड को वापिस लेने का  आश्वासन क्या निभाया गया है? बिलकुल नहीं। अब,  जब वर्तमान सरकार ने ई-कॉमर्स में अमेज़न, अलीबाबा जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को खुली छूट प्रदान कर दी है, तो खुदरा व्यापार में बाकी  बचा क्या है? और जब साथ-साथ खाद्य प्रसंस्करण और कृषि उत्पादों के (भारत में निर्मित) के विपणन  में भी विदेशी कंपनियों को शतप्रतिशत निवेश की अनुमति मिल गयी तो इस मामले में "अंतिम सांस तक लड़ने " के अभयदान का क्या हुआ? इस लिये रिटेल बहुब्रांड पर यह यू-टर्न समझ से बाहर है।
परंतु साथ साथ ये भी बताते चलें कि स्वदेशी जागरण मंच प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के वर्तमान स्वरुप का शुरू से विरोध करता रहा है, आज भी करता है और आगे भी करता रहेगा।  हाँ, हम दुनिया से कतई अलग-थलग अर्थव्यस्था (आइसोलेशन) के समर्थक नहीं है। वसुधैव कुटुम्बकम् हमारी सोच और संस्कृति है। परंतु यह वर्तमान  'वैश्वीकरण' कोई परिवारवाद नहीं है, यह बाज़ारवाद है, उपभोक्तावाद है। भूमंडलीकरण के नाम पर दुनिया का भू-मंडी-करण है। उदारीकरण के नाम पर उधारी-करण है। कुल मिलाकार WTO की व्यवस्था उसी पुराने उपनिवेशवाद को नए ढंग से गरीब देशो पर थोपने की साजिश है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों की लूट का नया तरीका है।  इस मौलिक समझ को जागृत और विकसित किये बिना  एफडीआई की माया समझ पाना मुश्किल है।
प्रस्तुत पुस्तक ऐसे ही विद्वान लेकिन ज़मीन से जुड़े लेखको के कुछ लेखों का संग्रह है जो इस विषय की बारीकी को बखूबी समझते हैं। इन लेखों में से कुछ सिद्धान्तवादी व राष्ट्रवादी  -- किसान, मजदूर और लघु उद्योग आन्दोलनों से जुड़े - संगठनों द्वारा  प्रेषित लेख भी है। वे प्रस्तुतियाँ  उन संगठनों की इस विषय पर सोच को परिलक्षित करती हैं।आशा है पुस्तक पढ़ने के बाद आपको लगेगा कि एफडीआई के गोरखधंधे को समझने का यह एक ईमानदार और सार्थक प्रयास है।   आइये, एक बार सिलसिलेवार देखें कि  कौन-कौन से तर्क विभिन्न सरकारों द्वारा एफडीआई के पक्ष में दिए जाते है । यहाँ उनके खोखलेपन को भी आप स्वयं देख लेवें:
1. क्या एफडीआई से रोजगार बढेगा?
कहा जाता है की देश में रोजगार की कमी है। यदि बहुराष्ट्रीय कंपनियां यहां नए कारखाने शुरू करेगी तो रोजगार स्वाभाविक रूप से बढ़ेगा। पर सच्चाई इसके उल्ट है।
एफडीआई से रोजगार बढने की सम्भावना तलाशना महज एक मृग-मारिचिका है। पूरी दुनिया में इस समय रोजगार विहीन विकास का दौर चल रहा है । जब से भारत ने अपने यहां विदेशी निवेश को बढ़ाया है तभी से बेरोजगारी में और वृद्धि हुई है। गत 12 वर्षों में मात्र 1.6 करोड़ रोजगार सृजित हुए है जबकि 14.5 करोड़ लोगों को इसकी तलाश थी। यदि यू.एन.ओं की संस्था अंकटाड की माने तो दुनियाभर में 41 प्रतिशत एफ.डी.आई ब्राउन फील्ड में आयी है । अर्थात पुराने लगे उद्योंगों को ही बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने  हथियाया है, कोई नया उद्योग शुरू नहीं किया। ऐसे में नए रोजगार  सृजन की सम्भावना हो ही नहीं सकती। यह बात
भी कोई छुपी हुई नहीं है कि बहुराष्ट्रीय कम्पनीयों का जोर केवल स्वचालित या रोबोट प्रणाली द्वारा निर्माण व उत्पादन करने का रहता है। जिसके चलते बची खुची रोजगार की सम्भावनाएं और कम हो रही है। हमारे आज के सभी बड़े नेताओं की जुबान पर वाल्मार्ट का  एक क्लासिक उदाहरण बोलने के लिये सहज रहता था।  भारतीय मॉडल में जितना व्यापार करोड़ो हाथों तक पहुँचता था वही वालमार्ट के मॉडल में महज लाखों तक मिलता है। इसलिए विदेशी विकास के मॉडल में रोज़गार कम होंगे,  बिलकुल  बढ़ेंगे नहीं।
2. क्या एफडीआई से देश में अधिक पूँजी आएगी:
इसी प्रकार से विदेशी पूँजी  जितनी आती है उससे दुगुनी से भी अधिक पूंजी रायॅल्टी व लांभाश आदि द्वारा विकसित देश चली जाती है।। इसी लिए कहा गया एफडीआई द्वारा पूँजी "आधी आए,  दुगनी जाए, अंधी पीसेे, कुत्ता खाए।
एशियाई टाइगर कही जाने वाली अर्थव्यवस्थाओं की पोस्ट मार्टम रिपोर्ट भी यही कहती है। जरा आंकड़ो पर दृष्टि डालें तो बात और ज्यादा समझ आएगी।
2012-13 में भारत में 26 अरब डॉलर का विदेशी निवेश हुआ और 31.7 अरब डॉलर बाहर निकल गया। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के वेतन, मुख्यालय खर्च, व्याज, मुनाफा आदि की मदो में ये राशि बाहर साइफोन हो गयी। भारत को क्या मिला?  बस झूठे आश्वासन, एनरॉन जैसे घोटाले और भोपाल जैसी गैस त्रासदी!  क्या आगे भी हम यही चाहते है?
ग्लोबल फिनेंशल इंटीग्रिटी के आंकड़ो को देखें तो पूरी दुनिया में इसी तरह की लूट इन बहुराष्ट्रीय कपनियों ने की है। 2010 में पूरे विश्व् के विकासशील देशो में 506 अरब डॉलर का विदेशी निवेश प्राप्त हुआ। थोडा पीछे का आंकड़ा देखेगे तो पोल खुल जायेगी। 2006 में सारे विकासशील देशो में 858 अरब डॉलर गैर कानूनी ढंग से इन बहुराष्टीय कंपनियों ने बाहर निकाला था। सो मतलब साफ़ है कि किसी गरीब को एक बोतल खून देने की घोषणा करना और उल्टा उसी मरीज का दो बोतल खून निकाल लेना। बस यही है बहुराष्ट्रिय कंपनियो के तथाकथित रक्तदान शिविर का फण्डा! बात यहीं ख़त्म नहीं होती! ये लोग बेहोश गरीब का अंगूठा लगवा लेते है 'अंगदान' के फ़ार्म पर । ब्राउनफ़ील्ड इन्वेस्टमेंट, डिसइनवेस्टमेंट, अधिग्रहण, मर्जर, आदि ये सारे शब्द गरीबों के अंग निकालने के सामान है।
3,क्या उच्च श्रेणी की टेक्नोलॉजी देश में आएगी:
आज तक कोई उच्च तकनीक  किसी विकासशील देश को इन कंपनियों द्वारा नहीं दी गयी है। वैसे भी जिसे स्टेट-ऑफ़-आर्ट टेक्नोलॉजी कहा जाता है, उसको देने का अधिकार उस देश की सरकार का होता है, न कि वहां की कॉम्पनी को।  जरा विचार करें कि भारत द्वारा सुपर कंप्यूटर से लेकर चंद्रयान और नाविक जैसी उच्च तकनीक जो है वह सिर्फ स्वदेशी प्रयासों द्वारा अर्जित हुई है, दुनिया ने हमें नहीं दी।  ऐसे में कलाम साहिब की उस उदघोषणा को याद करना चाहिए की ' हमारे  वैज्ञानिक अपने भरोसे भारत को दुनिया के "फ्रंट रैंकिंग नेशन्स में बिठा सकते हैं। शर्त है कि 'इच्छा शक्ति' होनी चाहिए।'  उसी रास्ते को आगे बढ़ाना है। अन्वेषण पर खर्च बढ़ाना चाहिए। इस पुस्तक में श्री त्यागी जी के विचार पढ़ेंगे तो  इस विषय पर और अधिक जानकारी मिलेगी।
4.क्या इससे स्वस्थ प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी:
कोका-पेप्सी का भारत में काला इतिहास बताता है की ये कंपनियां एकाधिकार करती है और स्वस्थ प्रतियोगिता की संभावनाएं भी ख़त्म कर देती है। पूरी दुनिया का अनुभव है की ये कंपनियां पेटेंट द्वारा, कार्टेल द्वारा या अन्य हथकंडे अपना कर पूरे बाजार पर एकाधिकार करती है। ग्राहक को केवल उन्ही का सामान खरीदने को मजबूर करती है। हमारा दवा उद्योग दुनिया की जेनेरिक व सस्ती दवाईयों का कारखाना है। आज दुनिया भर के 35 प्रतिशत मरीज भारत की सस्ती दवाईयों  पर आश्रित है। ऐसे में यदि 74 प्रतिशत ब्राउन फील्ड निवेश ओटोमेंटिक रूट से, एवं 100 प्रतिशत सरकारी अनुमति के कारण से आता है,  भारत के इस दवा उद्योग हेतु अत्यंत ही खतरनाक है। यह  हमारे फार्मा सेक्टर को अपूरणीय क्षति पहुचायेंगा। बल्कि साथ ही साथ दुनिया की गरीब जनता का एक मात्र सस्ता व वहनीय विकल्प भी छिन जायेगा। निजी सुरक्षा अजेंसी को ये छूट जासूसी का जाल देश में बिछा देगी।डॉ अश्वनी जी व भगवती प्रकाश शर्मा जी के लेख इस पर पर्याप्त प्रकाश डालेंगे।
5.  क्या अत्यधिक उन्मुक्त अर्थव्यवस्था से अपनी संस्कृति खतरे में आएगी:
वैसे भी भारत दुनियां के सर्वाधिक परम्परागत देशों में से एक है। ऋषि मुनियों और मनीषियो द्वारा सिंचित इस परम्परा का समाज विज्ञान और अर्थशास्त्र से गूढ़ सम्बन्ध है। आज जिस सतत विकास, पर्यावरण रक्षा, घरेलू बचत आदि की खोज दुनिया में है, उसके जीवन्त मॉडल इसी स्वदेशी सोच की उपज है। इसे पश्चिम के उपभोगवादी मॉडल से नहीं समझ जा समझा जा सकता। इस प्रकार बेरोकटोक एफडीआई और कंपनियों की बाढ़ में इस सुगठित परिवार व्यवस्था और संस्कार व्यवस्था पर क्या  ग़लत असर पड़ेगा, इसका भी पूर्व आंकलन करना आवश्यक है। आज की भाषा में इसे सामाजिक प्रभाव आकलन या सोशल इम्पैक्ट असेसमेंट (SIA) कहा जाता है।
6. श्वेतपत्र जारी करना क्यों जरूरी हैं:
हम मान लेते है कि सरकार में आने के बाद कई प्रकार की व्यवहारिक बातें ध्यान आती है।  देश विदेश में भ्रमण से नई समझ विकसित होती होगी। तो पुरानी लकीर का फकीर बने रहना अच्छा नहीं होता। चलो, एक बार इस तर्क को मान लेते हैं। तो फिर इस नयी सोच पर इतना बड़ा यू-टर्न लेने से पहले क्या जनता  को विश्वास में लेना भी जरूरी नहीं था? और जो इतनी बड़ी नई समझ विकसित हुई है तो क्या इस एफडीआई के सम्बन्ध में एक श्वेतपत्र लाना क्या जरूरी नहीं बन जाता है। देश को बताया जाये कि अब तक के अनुभव के आधार पर एफडीआई से कितना लाभ हुआ और कितना नुक्सान। इस श्वेत पत्र से देश की भी समझ बढ़ेगी।
जाते-जाते तीन ताज़ा उदाहरण देना चाहूँगा। थॉमस पिकेटि की कुछ समय पूर्व प्रकाशित
अत्यंत चर्चित पुस्तक 'कैपिटल' ने इसी बात को समझाया है। बड़ी कंपनियां गरीब देशों में पूँजी लगाकर अपनी ही जेब भरती है, वहां का भला नहीं करती। एशिया के उभरते देशों का विश्लेषण कर बताया कि उनकी तरक़्क़ी मूलतः अपनी कंपनियों को उभारने व अपने संसाधनों के बल पर ही हुई है। आज पूरे विश्व के हर कोने से यही आवाज आ रही है। इसे बाबुओ, अफसरशाही, बहुराष्ट्रीय निगमो के गठजोड़ द्वारा परोसे तर्कों में अनसुना न किया जाये।
दूसरे, प्रसिद्ध गोल्डमैन सैश की रिपोर्ट न. 189 जो स्पष्ट कहती है कि 2020 तक जो धनराशि भारत को इंफ्रास्ट्रक्चर में 800 बिलियन डॉलर लगानी है वो भारत की घरेलू बचत से ही पूरी हो जायेगी। एक डॉलर भी बाहर से एफडीआई के माध्यम से लाने की जरूरत नहीं। इस रिपोर्ट का हवाला स्वदेशी के एक वरिष्ट नेता अनेक बार दे चुके हैं। तीसरे, पूज्य दत्तोपंत ठेंगडी जी अपने एक भाषण में बताते थे की 1991 में विकसित देशो की ओर से विकासशील देशों की ओर 49 बिलियन डॉलर का अनुदान भेज गया। समाचार पत्रों ने ये तो छापा। परन्तु ये नहीं छापा कि उसी दौरान व्याज आदि के रूप में 147 बिलियन डॉलर विकासशील देशों की ओर से विकसित देशों की ओर गया। मतलब की जितना आया तीन गुना ज्यादा वापिस गया। ओह!

अत: पूज्य ठेंगडी जी के सन् 2000 के वृन्दावन में कहे शब्द आज भी सार्थक हैं : "लोग नहीं जानते कि स्वतन्त्रता और संप्रभुता रहते हुए भी यदि हमारा आर्थिक जीवन विदेशियों के हाथों में जाता है, हमारी इंडस्ट्री, हमारी कृषि, हमारे लघु उद्योग, सारा आर्थिक आधार यदि विदेशियों के हाथ में जाता है, तो हमारी स्वतन्त्रता और सम्प्रभुता का कुछ मतलब नहीं रहेगा। यानी स्वदेशियत्व चला जाये तो फिर आप राजा बने रहें, इससे कुछ लाभ नहीं होने वाला।"
आशा है कि पं. दीनदयाल उपाध्याय एकात्म मानव दर्शन को अंगीकार करनेवाली ये सरकार इस सारे विषय पर उदारतापूर्वक विचारकर अपने एफडीआई संबंधी निर्णय पर पुनर्विचार करेगी। देश की जनता भी इस मामले में सरकार पर उचित दवाव बनाएगी और पूरी दुनिया की बहुराष्ट्रीय निगम भी भारत का ये कठोर सन्देश समझेगी। जनजागरण के लिए प्रकाशित पुस्तक में लिए लेखों के लिए लेखकवृन्द का भी और इन्हें एकत्र कर छपवाने वाली टोली का भी धन्यवाद।

Sunday, August 7, 2016

गांधी जी और स्वदेशी

१. जन्म २ ऑक्टोबर १८६९, से लेकर ३० जून १९४८ तक, ७८ वर्ष की आयु
२. हिंद स्वराज १९०९, सारांश।
३. यात्राएँ अफ़्रीका में १८९३-१९१४
४. डांडी यात्रा १९३०,
५. भारत छोड़ो आंदोलन १९४२, 
६. स्वयं ka वेश पेंट क़मीज़, और टाई,  कोट छोड़ कर, आधी धोती कुर्ता आदि। 
उद्धरण: स्वदेशी की हमारी कल्पना में धर्म और अर्थ की रक्षा सन्निहित है। अपने ही पड़ोसियों की, अपने भाई बहनों की सेवा न करके, उनके मुंह का कौर छीन कर दूसरो के मुंह में डालना परमार्थ नहीं है। वह तो हमारे द्वारा अपना धर्मक्षेत्र त्याग देने के समान है। हम अपने कातने वाली बहनो को तथा अपने बुनकर भाइयों में प्रोत्साहन देने के लिए बंधे हुए हैं।इससे हम देश में भूख में मरते हुए लोगों के घरों में साठ करोड़ रुपया भेज सकें गे। इससे अर्थ की रक्षा होगी। एक साथ धर्म और अर्थ की रक्षा करने वाला यह स्वदेशी का व्रत है। इसे कठिन नहीं समझना चाहिए।" महात्मा गांधी
14 फरवरी 1916
बहुत सोचने के बाद मैंने स्वदेशी की एक ही परिभाषा निश्चित की है और शायद मेरा अभिप्राय इसके द्वारा सर्वाधिक स्पष्ट हो जाता है। स्वदेशी वह भावना है जो हमें दूर की बजाय अपने आसपास के परिवेश के ही उपयोग एवं सेवा तक सीमित रखती है। उद्धाहरण अपना पूर्वजो का  धर्म का पालन करना, राजनीति में स्थानीय संस्थाओ का उपयोग करना और उनके जानेमाने दोषों का परिमार्जन करना।
७. अच्छे उदाहरण: १९१७ में ५ बुनकर परिवार जो काम छोड़ चुके थे, दुबारा काम करना चाहते थे, उनको आश्रम की और से सूत दिया गया और बिक्री की व्यवस्था की गयी। 
  B. इधर एक दूक़ानदार नरंदास जेरजानि ने स्वदेशी वस्त्र की दूक़ान चलायी और घोषणा की कि वे केवल पाँच प्रतिशत ही मुनाफ़ा लेंगे। गांधी जी ने उनका सम्मान किया और बाक़ी लोगों को भी प्रेरित किया। 
  धीरे धीरे यह ही खादी आश्रम आंदोलन के रूप में परिवर्तित हुआ। 
फ़र्क़ भी पड़ा १९२०-२१ में १०२ करोड़ रुपय बिकने वाला विदेशी कपड़ा अगले वर्ष में ही ५७ करोड़ रुपए रह गया। १२९२ मिल्यन यार्ड्ज़ से ९५५ मिल्यन यार्ड्ज़ राह गया। 
८. ग़रीबी की परिभाषा और नीति बनाते समय क्या ध्यान रखना।
९. कार्यकर्ता कैसे खड़े किए। रचनात्मक काम करते हुए कार्यकर्ता तैयार किया । विनोबा भावे, जैसे लोगों को तैयार किया। 

9. लेखक श्रीभगवान सिंह कहते है कि गांधीवादी चिंतक धर्मपाल ने आधुनिक सभ्यता को ‘मनुष्य केंद्रित सभ्यता’ कहा है। इसमें मुझे जोड़ना यह है कि यह ‘मनुष्य केंद्रित आधुनिक सभ्यता’ मुख्यतया ‘अहिंसक हिंसा की सभ्यता’ है। यह अहिंसक हिंसा है क्या, इसे समझने के लिए गांधीजी की पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ से एक उद्धरण काफी होगा: ‘‘हजारों साल पहले जो हल काम में लिया जाता था, उससे हमने काम चलाया। हजारों साल पहले जैसे झोंपड़े थे, उन्हें हमने कायम रखा। हजारों साल पहले जैसी हमारी शिक्षा थी, वही चलती आई। हमने नाशकारक होड़ को समाज में जगह नहीं दी। ऐसा नहीं कि हमें यंत्र वगैरह की खोज करना नहीं आता था। लेकिन हमारे पूर्वजों ने देखा कि लोग अगर यंत्र वगैरह की झंझट में पड़ेंगे, तो गुलाम बनेंगे और अपनी नीति को छोड़ देंगे। उन्होंने सोच-समझ कर कहा कि हमें अपने हाथ-पैरों से जो काम हो सके, वही करना चाहिए। हाथ-पैरों का इस्तेमाल करने में ही सच्चा सुख है, उसी में तंदरुस्ती है।’’
10. यह बात 1909 में कही गई थी, जिसमें गांधी ने भारतीय सभ्यता की हजारों वर्षों से चली आ रही स्थिरता, अविच्छिन्नता का चित्र उकेरा था। मगर हजारों वर्षों से चला आया परिदृश्य आज पूरी तरह बदल चुका है। आज खेतों में न हल-बैल हैं, न झोंपड़े, न प्राचीन शिक्षा। ‘यंत्रों की झंझट’ से मुक्त रहने वाले पूर्वजों के वंशधर आज यंत्रों की गिरफ्त में आते जा रहे हैं, उन्हें खुशी-खुशी गले का हार, जीवन का शृंगार समझ कर अंगीकार करते जा रहे हैं। आज खेतों में ट्रैक्टर, थे्रसर, जेसीबी जैसी मशीनें हैं। शहर तो शहर, गांव-गांव में कंकरीट के जंगल फैलते जा रहे हैं। अंगरेजी ढंग की शिक्षा देने वाले स्कूलों से गांव भी पटते जा रहे हैं। यानी जो चीजें गांधी की दृष्टि में भारतीय सभ्यता की हजारों वर्षों से चली आ रही अक्षुण्णता, स्थिरता का आधार स्तंभ थीं, महज सौ वर्षों के दरम्यान नष्ट हो चुकी हैं।
11. यह परिवर्तन चुपचाप आया : गौरतलब है कि इन सबका विनाश किसी हिंसक युद्ध, रक्तपात या तोप-तलवार के जरिए नहीं, बल्कि यूरोप की औद्योगिक क्रांति की कोख से जन्मी प्रौद्योगिकी की बदौलत हुआ है, जिसने हमें विकास, सुविधा, आराम का नशा चखाते हुए इस कदर मदहोश कर दिया कि हमने मशीनीकरण और शहरीकरण को वरदान समझ लिया, बगैर यह देखे कि इनसे कैसे हमारी मूल्यवान न्यामतों का संहार होता जा रहा है। यही है अहिंसक हिंसा, जो बगैर रक्तपात के दीमक की तरह हमारी सभ्यता को खोखली करती जा रही है। दरअसल, बगैर खून-खराबे के प्रकृति प्रदत और समाजकृत चीजों को उन्मूलित किए जाने का आरंभ औद्योगिक क्रांति की औरस संतान बन कर सामने आया। मशीनीकरण ने सुविधा, आराम, कार्यकुशलता, उत्पादकता-वृद्धि के नाम पर धीरे-धीरे अर्थ, उद्योग, व्यापार, जीवन-मूल्य आदि से संबद्ध अनेकानेक पारंपरिक चीजों को खत्म करना शुरू किया। पंूजी का केंद्रीयकरण होता गया, कृषि-सापेक्ष हस्तशिल्प का संहार होता गया। विडंबना यह है कि इस पूंजीवाद का विरोध करने वाले कार्ल मार्क्स को भी कृषि और कृषकों का बने रहना सर्वहारा क्रांति के मार्ग में अवरोध प्रतीत हुआ।
12. मशीनों की बढ़ती आमद ने मनुष्य को दूसरे प्रकार की गुलामी में जकड़ना शुरू किया और उस मशीनीकरण के फलस्वरूप बढ़ते शहरीकरण ने मिल कर सदियों से प्रकृति के साथ लय बना कर चले आ रहे जीवन को क्षत-विक्षत करना शुरू किया। दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि इस मशीनीकरण के गर्भ में पलने वाले जैविक विनाश के कीटाणुओं को वैज्ञानिकता का दंभ भरने वाला मार्क्सवादी दर्शन नहीं देख सका! देखा तो भाववादी दर्शन के लिए बदनाम गांधी ने, जिन्होंने 1909 में ही ‘हिंद स्वराज’ में यह चेतावनी दे दी कि ‘‘मशीनें यूरोप को उजाड़ने लगी हैं और वहां की हवा अब हिंदुस्तान में चल रही है।… मशीन की यह हवा अगर ज्यादा चली तो हिंदुस्तान की बुरी दशा होगी।’’
ऐसा संकेत करके गांधी ने दरअसल, मशीनों के जरिए होने वाली ‘अहिंसक हिंसा’ की ही विभीषिका को सामने रखा था। हथियारों से लड़े जाने वाले युद्धों में मानव-संहार तो होता था, लेकिन युद्धोपरांत फिर आबादी बढ़ती जाती थी, अर्थ, उद्योग, शिक्षा, सामाजिक जीवन और प्रकृति के साथ लयात्मक योग पूर्ववत चलते रहते थे। 
13. रवीन्द्रनाथ टेगोर क्या कहते है: ‘स्वदेशी समाज’ नामक निबंध में रवींद्रनाथ ठाकुर ने लिखा: ‘‘राजाओं में कितने युद्ध हुए, लेकिन हमारे वेणुकुंजों में, आम और कटहल के बागों में मंदिर बनते रहे, अतिथिशालाएं स्थापित होती रहीं, तालाब खोदे जाते रहे, संस्कृत पाठशालाओं में शास्त्र-शिक्षा चलती रही, चंडी-मंडपों में रामायण-पाठ कभी बंद नहीं हुआ, गांव के आंगन सर्वदा कीर्तन-ध्वनि से मुखरित रहे। समाज ने न तो कभी बाहर से सहायता मांगी और न बाहर के उपद्रव से उसकी अवनति हुई।’’
14. जॉन ज़ेरजों: यह सब इसलिए संभव था कि समाज चक्रीय विकास की गति से चलता रहा था, जिसमें थोड़ी देर के लिए ओझल हो जाती चीजों की वापसी हो जाया करती थी। लेकिन औद्योगिक क्रांति ने चक्रीय विकास को पीछे ठेलते हुए एकरेखीय विकास क्रम को सामने रखा, जिसमें वापसी संभव नहीं होती। निरंतर आगे बढ़ते जाना ही विकास का मानक माने जाने लगा। मार्क्स भी इस एकरेखीय विकास के प्रबल प्रवक्ता थे। आज इस एकरेखीय विकास से मोहाविष्ट होकर मनुष्य जल, जंगल, जमीन को नष्ट करता जा रहा है। जॉन जर्जन जैसे विख्यात अमेरिकी चिंतक, जिन्होंने ‘एलीमेंटस आॅफ रिफ्यूजल’, ‘फ्युचर प्रीमिटिव’, ‘वाई आई हेट स्टार ट्रेक’, ‘द फेल्योर आॅफ सिंबॉलिक थॉट’ जैसी विचारोत्तेजक किताबें लिख कर बौद्धिक जगत में हलचल मचा रखी है, इस एकरेखीय विकास की भयावह परिणति पर उनकी टिप्पणी गौरतलब है: ‘‘चक्रीय सभ्यता तो कम से कम मौसमों की लय से जुड़े होने के कारण प्रकृति से कहीं न कहीं जुड़ती थी। मगर सभ्यता के विकास के साथ चक्रीय समय की जगह एकरेखीय क्रमिक विकास ने ले ली। अगर समय एकरेखीय हो, तो इतिहास है, फिर तरक्की है, फिर भविष्य की मूर्तिपूजा है। अब हम प्रजातियों, संस्कृतियों और शायद पूरी की पूरी प्राकृतिक दुनिया को एक काल्पनिक भविष्य की वेदी पर कुर्बान करने को तैयार हैं।…’’
15.  बहुराष्ट्रीय कंपनियां : अब यह खाई में जाने की विश्वव्यापी दौड़ है। अंतरराष्ट्रीय कंपनियां प्रतियोगिता में हैं कि कौन कामगारों का सबसे अधिक शोषण और पर्यावरण को सबसे अधिक बर्बाद कर सकता है। विकास का अर्थ है पर्यावरण का विनाश और व्यक्ति का अमानवीकरण। इस अमानवीकरण का एक प्रत्यक्ष उदाहरण यही है कि हम मोबाइल फोन की सुविधाओं के पीछे पागल होकर टॉवर पर टॉवर लगाते जा रहे हैं, बगैर यह देखे कि कैसे इन टॉवरों से आए दिन पक्षी मौत का शिकार हो रहे हैं। एक समय वह था जब एक पक्षी की हत्या ने वाल्मीकि को आदि कवि बना दिया, और आज का समय है कि सैकड़ों पक्षियों की मौत का कोई असर हम पर नहीं होता। जर्जन ने हमारे समय में एकरेखीय विकास की ‘अहिंसक हिंसा’ का जो यथार्थ रखा है, उससे हम इंकार नहीं कर सकते। क्या यह सत्य नहीं है कि बड़ी-बड़ी परियोजनाओं के कारण लाखों-करोड़ों लोगों को पुश्तैनी आवास से विस्थापित होना पड़ा है।
उत्पादकता वृद्धि के नाम पर पारंपरिक जैविक खेती, जल-प्रबंधन, वन संपदा आदि की बलि देते हुए रासायनिक खादों और कीटनाशक दवाओं के बल पर जिस व्यावसायिक खेती और औद्योगीकरण को बढ़ावा दिया गया, उससे पर्यावरण का विनाश होने के साथ-साथ मनुष्य कई बीमारियों का शिकार होता गया है, अनेक पशु-पक्षियों की प्रजातियां समाप्त हो चली हैं। 👌वनों का विकल्प वृक्षारोपण के रूप में पेश किया जा रहा है, पर क्या इन वृक्षों के बीच शेर, बाघ, हाथी, हिरण जैसे वन्यजीव रह सकते हैं? सड़क, भवन, बांध आदि बनाने के लिए ‘भूधर’ कहलाने वाले पहाड़ों को जिस तरह तोड़ा जा रहा है, क्या फिर से पहाड़ खड़े किए जा सकते हैं? स्पष्टत: इस एकरेखीय विकास क्रम में समाप्त होती जा रही इन चीजों की वापसी संभव नहीं है। इस अहिंसक हिंसा ने हमें आज जिस मुकाम पर पहुंचा दिया है वह आदिवासी चिंतक बृजलाल के शब्दों में यों है: 👌‘आसमान फटा जा रहा है और हुक्मरान थिगड़े लगाने की बात कर रहे हैं।’
जाहिर है कि तथाकथित वैज्ञानिक और प्रौद्योगिक प्रगति बगैर किसी खून-खराबे के मनुष्य के सामने सुविधाओं का अंबार लगा कर विनाशकारी सुरंग में उसे धकेले जा रही है। न केवल मनुष्य और मनुष्यता की, बल्कि समस्त जड़-चेतन की बलि हो रही है इस विकास देवी की वेदी पर। ऐसे में विचारणीय है कि क्या रक्तरंजित हिंसा से अधिक संहारक इस ‘अहिंसक हिंसा’ को इसी तरह चलते रहने देना दिया जाए या फिर दुनिया को बचाने के लिए इस पर लगाम लगाई जानी चाहिए। 👌जॉन जर्जन ठीक ही कहते हैं: ‘‘व्यवस्था को पलट देने का आह्वान हास्यास्पद लग सकता है, लेकिन एकमात्र चीज, जो इससे भी अधिक हास्यास्पद है कि इस व्यवस्था को चलते रहने देना चाहिए।’’
16.👌👌👌यहां हमें फिर गांधी की याद आती है, जिन्होंने 5 अक्तूबर 1945 को पं. नेहरू को लिखे पत्र में यह चेतावनी दी थी: ‘‘मुझे कोई डर नहीं है कि दुनिया उल्टी ओर जाती दिखती है। यों तो पतंगा जब अपने नाश की ओर जाता है तब सबसे ज्यादा चक्कर खाता है और चक्कर खाते-खाते जल जाता है।… मेरे कहने का निचोड़ यह है कि मनुष्य जीवन के लिए जितनी जरूरत की चीज है, उस पर निजी काबू रहना ही चाहिए, अगर न रहे तो व्यक्ति बच ही नहीं सकता।’’ यक्ष प्रश्न यही है कि क्या ‘जरूरत की चीज’ और विकास के बीच हम संतुलन स्थापित कर इस अहिंसक हिंसा को रोकेंगे या इस मार्ग पर बढ़ते हुए पतंगे की तरह जल जाएंगे

स्वदेशी के हुतात्मा वीर बाबू गेनू

स्वदेशी के हुतात्मा वीर
बाबू गेनू
निकी स्मृति में आर.के.पुरम्, सेक्टर-8 और 9 के बीच के मार्ग का नाम रखा
गया है। उनका जीवन परिचय 8 प्रश्नों मेें .....

1. बाबू गेनू क्यों प्रसिद्ध हुआ?
बाबू गेनू मुंबई का एक साधारण मिल मजदूर था। परंतु 22 वर्ष की आयु में
‘स्वदेशी’ के लिए अपने प्राणों को न्योछावर करने वाला वह देश का पहला व
एकमात्र शहीद था। इस कारण वह पूज्य बन गये।

2. बाबू के जन्म स्थान आदि के बारे में बतायें?
बाबू गेनू सईद महाराष्ट्र प्रांत के पूणे जिले के छोटे से गांव महालुंगे
पड़वल का रहने वाला था। बाबू का जन्म वर्ष 1908 था।

3. बाबू के परिवार के बारे में बताओं?
बाबू अत्यंत गरीब किसान परिवार में जन्मे थे। जब गेनू 2 वर्ष की आयु के
थे, तो उनके पिता स्वर्ग सिधार गये। माता मुंबई आकर एक कपड़ा मिल में
मजदूरी करने लगी। बहन कुछ घरों में बर्तन मांजने व सफाई आदि का काम करने
लगी। दो अन्य छोटे भाई गांव में मजदूरी कर पेट पालते थे। अतः चारों भाई
अत्यंत गरीबी में पले व बढ़े।

4. मुंबई आकर गेनू ने देशभक्ति के संस्कार कैसे प्राप्त किये?
उसका एक मित्र प्रहलाद नाई उसे देशभक्ति की बातंे सुनाता था और वह स्वयं
भी उस समय के आंदोलनों में हिस्सा लेता था। उसने ही प्रथम रुचि गेनू के
मन में पैदा की। दूसरे, एक मुस्लिम शिक्षक जिन्हें गेनू प्यार से ‘चाचा’
कहता था, उन्होंने भी गेनू को देशभक्ति के पाठ पढ़ाये। उसी चाचा ने बाबू
गेनू की हर तरह से सहायता भी की और अच्छे देशभक्ति के संस्कार दिए। बालक
गेनू उन्हें गुरू व पिता, दोनों मानता था।

5. गेनू के मन पर किन घटनाओं का ज्यादा असर हुआ?
1919 में जलियावाले बाग के भीषण हत्याकांड के वर्णन को सुनकर उसके मन पर
बड़ा असर हुआ। दूसरे, 1928 में साइमन कमीशन को प्रतिकार करते हुए लाला
लाजपतराय की हत्या का भी उस पर बहुत प्रभाव पड़ा। स्वयं भी गेनू ने साइमन
कमीशन का विरोध करने के लिए एक बड़ा जुलूस आयोजित किया।
तीसरे, भगतसिंह, सुखदेव व राजगुरू को दी गई फांसी का भी उस पर गहरा
प्रभाव पड़ा। विशेषकर क्रांतिकारी राजगुरू का गांव गेनू के गांव के बहुत
निकट था। अतः उसे राजगुरू के बलिदान से बहुत प्रेरणा मिली। चैथे, महात्मा
गांधी जी के प्रति उसे अगाध श्रद्धा थी। वह कांग्रेस पार्टी का सक्रिय
कार्यकत्र्ता था और उसका पंजीयन क्रमांक 81941 था।

6. क्या बाबू गेनू को देशभक्ति के कारण कभी जेल भी हुई?
हां, वे दो बार जेल गये। पहली बार महात्मा गांधी जी के नमक आंदोलन के समय
अपने ताना जी पथक (वाहिनी) के साथ वे जेल में रहे। इन्हीं दिनों उसे अपनी
माता व अपने प्रिय शिक्षक चाचा की मृत्यु का समाचार मिला। माता जी की
मृत्यु का समाचार पाकर वह बहुत दुःखी हुए परंतु उन्होंने कहा -
‘‘मित्रों, अब मैं पूरी तरह मुक्त हो गया हूं। भारत माता को मुक्त करवाने
के लिए अब मैं कुछ भी कर सकता हूं।’’
दूसरी बार भी न्यायमूर्ति दस्तूर ने उन्हें छः माह की सश्रम कारावास की
सजा सुनाई। लेकिन जेल से लौटने पर वह पहले की तरह की घर-घर जाकर स्वदेशी
का प्रचार करने लगा।

7. और 12 दिसंबर की घटना कैसे हुई?
12 दिसंबर 1930 को शुक्रवार का दिन था। मुंबई के कालकादेवी इलाके में एक
गोदाम विदेशी माल से भरा था। उसे दो व्यापारियों ने खरीद लिया। उन्होंने
तय किया इसे लारियों से भरक मुंबई की कोट मार्केट में ले जायेंगे। इस काम
को रोकने (पिकेटिंग) की जिम्मेदारी कांग्रेस पार्टी ने बाबू गेनू व उसके
‘तानाजी पथक’ को दी और उसकी तैयारी हुई। हनुमान रोड पर इसे रोकने की
योजना बनी। इस सत्याग्रह को देखने लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी।
अंग्रेज अधिकारी मिस्टर फ्रेजर को इस सत्याग्रह की जानकारी पहले से थी और
उसने भारी संख्या में पुलिस बल को पहले ही बुलवा लिया। प्रातः साढ़े सात
बजे सत्याग्रही व दर्शक भारत माता की जय के नारे लगा रहे थे। उधर विदेशी
माल से भरी गाड़ी आ रही थी। बाबू के आदेश पर पहले एक-एक करके उनके साथी
आगे बढ़े। पुलिस ने खींचकर उन्हें परे कर दिया और उनकी जमकर पिटाई की।
अंततः जब स्वयं बाबू गेनू की बारी आई तो अंग्रेज अफसर काफी चिढ़ गया था।
उसने लारी ड्राईवर बलवीर सिंह को कहा, ‘‘लारी चलाओ। ये हरामखोर अगर मर भी
गया तो कोई बात नहीं।’’ बलबीर सिंह गाड़ी रोके खड़ा रहा, नारे लगते रहे।
इतने में अंग्रेज सार्जेन्ट गुस्से से भारतीय ड्राईवर को पीछे धकेल स्वयं
लारी चलाने लगा। और लो..... उसने बाबू गेनू की खोपड़ी से गाड़ी गुजार दी।
सड़क खून से पट गई। यह घटना 11 बजे की है। 12.30 बजे तक बाबू को अस्पताल
लाया गया और 4.50 सायंकाल बाबू गेनू के प्राण पखेरू उड़ गये। सब और
‘‘बाबू गेनू-अमर रहे’ के नारे रूंधे गलों से लग रहे थे। एक अनाम मजदूर
जन-जन का श्रद्धेय बन गया।
अगले दिन एक भारी जनसमूह शवयात्रा के साथ था। श्री कन्हैया लाल मुंशी,
लीलावती मुंशी, जमनादास मेहता जैसे बड़े-बड़े नेता श्रद्धांजलि सभा में
उपस्थित थे। 13 दिसंबर को पूरा मंुबई शहर बंद रहा।

8. बाबू गेनू के बलिदान से क्या शिक्षा मिलती है?
किसी के पेशे व आर्थिक स्थिति से उसकी देशभक्ति को आकंना ठीक नहीं। गरीब
से गरीब व्यक्ति भी देश के लिए सर्वस्व न्यौछावर कर सकता है। दूसरे
‘‘स्वदेशी का स्वीकार एवं विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार’’ बाबू गेनू का
नारा उनके जीवन का सार था। जिस उद्देश्य के लिए बाबू गेनू ने प्राण
न्यौछावर किए उस ‘स्वदेशी’ के प्रचार-प्रसार के लिए हमें डटकर काम करना
चाहिए। यह उस वीर को सच्ची श्रद्धांजलि है।

9. क्या आज भी बाबू गेनु की परम्परा चल रही है?
जी, जगह जहाँ चलने वाले स्वदेशी आंदोलनों के प्रारम्भ करने वाले एर चलने वाले लोग उसी राह पर ही चल रहे है, चलते रहे है।। वृक्ष बचाने के लिए आंदोलन चलाने वाली राजस्थान की अमृतादेवी और उनके साथ बोलकर  पोने तीन सो शहीद उसी परम्परा के द्योतक है,  सिर दिए जो ..... बचे, तो भी सस्ता जान. अफ़्रीका में जो हुआ, १५० व्यक्तियों की जान गयी। ऐसी सूची। 



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Suraj Bhardwaj
9899225926

Dattopant thengadi :Man and Mission

Main facts
10 nov 1920 to 14 oct 2004, 
A combinational of impossibilities,
1, Third way, more than two thousand mistakes, misprints, bapu saheb tendulkar wrote a letter, oh, you should reedit it., so many references,  so asked thengadi ji to please give exact informations of bibliography. 
After a few days thengadi ji wrote back that I have a problems of remembering most of the things which i have read but that I am not a scholar who sits down and writes, some body gives me some books, or a paper and due to my habit of remembering I only remember but references are not with me. So please you write the references. Thengadi ji answered atwelve page letter, starting from  bengalooru and ends at the arrival of Nagpur station. Has written about 220 books or booklets. 
2. He was a mahamanav. P parmeshwaran ji giving an interview about thengadi ji, and four times tears trickle down from his eyes.
3. Second war of independence, he uttered in BMS state adhiveshan. SJM is product of that ghoshaṇa.
4. He experience of an example. Sarvangmitr. Even with those with whom he had to fight even physically. Kechua wants nagrajs daughter because they are of th e same clan. Marriage is accepted but date of marriage be announced by us and date will be in June. Happily returned, told the story to Rajah of kechua. Oh we will not be there. In the month of June. The same is the ultimate fight between communists and sangh. Example style.
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Globalisaction and workers.
1. Baba saheb Ambedkar most of the rules in families or works when he became the first labour laws. Even eighth hour. 
2. LPG policy was brought without the prior content of parliament.
3. 1442 items reserved for small entrepreneurs. Even then clamoured for quality goods to the consumer and one by one all the reserved items are now no more. 
4. There are things that require quality control of big companies product but if a ru our spreads against a small oil producer that he is mixing inferior into it then it's is a automatic punishment for him.  
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