Saturday, June 2, 2018

संत नागार्जुन की जीवनी

संत नागार्जुन की जीवनी

पिछले दिनों मैं ओशो के महाकवि सुमित्रानंदन पंत से संवाद पढ़ रहा तब। भारत के धर्मकाश के 12 प्रमुख सितारे कौन से। ओशो ने राम का नाम नहीं लिया, पहला कृष्ण और बुध व महावीर के बाद सीधे नागार्जुन का नाम लिया। सच में दर्शन शास्त्र का विद्यार्थी जोन के बावजूद मुझे संत नागार्जुन का शून्यवादी के अतिरिक्त कोई चित्र नहीं उभर रहा था। जो सुना था वो बाबा नागार्जुन कवि के बारे ही सुना था। बाद में ओशो द्वारा बताया यह प्रसंग लिखा मिला तो अच्छा लगा, अतः शेयर कर रहा हूँ।

मैं तुम्हें नागार्जुन के जीवन से एक प्रसंग बताता हूं। भारत ने जो महान गुरु पैदा किए हैं, नागर्जुन उनमें से एक थे। वे बुद्ध, महावीर और कृष्ण की क्षमता रखते थे। और नागार्जुन एक दुर्लभ प्रतिभा थी। सच तो यह है कि बौद्धिक तल पर सारी दुनिया में वे अतुलनीयहैं। ऐसी तीक्ष्ण और प्रगाढ़ प्रतिभा कभी-कभी घटित होती है। नागार्जुन एक नगर से गुजर रहे थे। वह राजधानी है। और नागार्जुन सदा नग्न रहते थे। उस राज्य की रानी को नागार्जुन के प्रति बहुत प्रेम था, बहुत श्रद्धा थी, बहुत भक्ति थी। नागार्जुन भोजन मांगने राजमहल आए। उनके हाथ में लकड़ी का भिक्षापात्र था। रानी ने उनसे कहा कि आप कृपा कर मुझे यह भिक्षापात्र दे दें। मैं इसे आपकी भेंट समझूंगी और इसकी जगह मैंने आपके लिए दूसरा भिक्षापात्र निर्मित कराया है।नागार्जुन ने भेंट स्वीकार कर ली। दूसरा भिक्षापात्र सोने का बना था और उसमें बहुमूल्य रत्न जड़े हुए थे। वह बहुत कीमती था। लेकिन नागार्जुन ने कुछ नहीं कहा।सामान्यतः कोई संन्यासी उसे नहीं लेता, वह कहता कि मैं सोना नहीं छूता हूं। लेकिन नागार्जुन ने उसे ले लिया। अगर सच में सोना मिट्टी है तो भेद क्या करना? नागार्जुन ने उसे ले लिया। रानी को यह बात अच्छी नहीं लगी। उसने सोचा कि इतने बड़े संत हैं, उन्हें इनकार करना चाहिए था। स्वयं नग्न रहते हैं, पास में कुछ संग्रह नहीं रखते, फिर उन्होंने इतना कीमती भिक्षापात्र कैसे स्वीकार किया! और अगर नागार्जुन इनकार करते तो रानी उन पर लेने के लिए जोर डालती और तब उसे अच्छा लगता। लेकिन नागार्जुन उसे लेकर चले गए।एक चोर ने नगर से उन्हें गुजरते हुए देखा। उसने सोचा कि यह आदमी ऐसा बहुमूल्य भिक्षापात्र अपने पास नहीं रख सकेगा, कोई न कोई जरूर इसकी चोरी कर लेगा। एक नंगा आदमी कैसे उसकी रक्षा कर सकता है? और वह चोर नागार्जुन के पीछे हो लिया।नागार्जुन नगर के बाहर एक मठ में रहते थे और अकेले रहते थे। वह मठ जीर्ण-शीर्ण था। नागार्जुन उसके भीतर गए। उन्होंने अपने पीछे आते हुए इस आदमी की पदचाप सुनी। वे समझ गए कि वह किस लिए पीछे-पीछे आ रहा है, वह मेरे लिए नहीं इस भिक्षापात्र के लिए आ रहा है। अन्यथा इस जरा-जीर्ण मठ में कौन आता! नागार्जुन मठ के अंदर गए और चोर बाहर दीवार के पीछे खड़ा हो गया। यह देखकर कि चोर बाहर ताक में खड़ा है, नागार्जुन ने भिक्षापात्र को दरवाजे से बाहर फेंक दिया। चोर तो चकित रह गया, उसको कुछ समझ में नहीं आया। यह कैसा आदमी है! नंगा है, इसके पास इतना कीमती पात्र है और यह उसे बाहर फेंक देता है!तो चोर ने नागार्जुन से कहा कि क्या मैं अंदर आ सकता हूं, क्योंकि मुझे एक प्रश्न पूछना है। नागार्जुन ने कहा कि मैंने पात्र को इसीलिए बाहर फेंक दिया कि तुम अंदर आ सको। मैं अभी अपनी दोपहर की नींद लेने जा रहा हूं। तुम भिक्षापात्र लेने अंदर आते, लेकिन मुझसे तुम्हारी मुलाकात नहीं होती। तुम अंदर आ जाओ।चोर अंदर गया। उसने पूछा कि ऐसी बहुमूल्य वस्तु को आपने फेंक कैसे दिया? मैं चोरहूं। लेकिन आप ऐसे संत हैं कि आपसे मैं झूठ नहीं बोल सकता। मैं चोर हूं। नागार्जुन ने कहा कि चिंता मत करो, हर कोई चोर है। तुम अपनी बात निःसंकोच कहो। फिजूल की बातों में वक्त मत खराब करो।चोर ने कहा कि कभी-कभी आप जैसे व्यक्ति को देखकर मेरे मन में भी कामना उठती है कि काश, इस स्थिति को मैं भी उपलब्ध होता! लेकिन चोर हूं और यह स्थिति मेरे लिए असंभव है। लेकिन मेरी आशा और प्रार्थना रहेगी कि किसी दिन मैं भी ऐसी कीमती चीज फेंक सकूं। बड़ी कृपा होगी यदि आप मुझे उपदेश करें। मैं अनेक संतों के पास गया हूं। वे मुझे जानते हैं, क्योंकि मैं एक नामी चोर हूं। वे सब यही कहते हैं कि तुम पहले अपने धंधे को छोड़ो, तभी तुम्हें ध्यान में गति मिल सकती है। लेकिन यह मेरे लिए असाध्य मालूम होता है, मैं चोरी का धंधा छोड़ नहीं सकता। क्या मेरे लिए ध्याननहीं है?नागार्जुन ने उत्तर में कहा कि अगर कोई कहता है कि पहले चोरी छोड़ो और तब ध्यान करो, तो उसे ध्यान के बारे में कुछ भी पता नहीं है। ध्यान और चोरी के बीच संबंध क्या है? कोई संबंध नहीं है। तुम जो भी करते हो किए जाओ। और मैं तुम्हें विधि देता हूं, तुम उसका प्रयोग करो। तो चोर ने कहा कि ऐसा लगता है कि आपके साथ मेरा तालमेल बैठ सकता है। क्या सच ही मैं अपना धंधा जारी रख सकता हूं? कृपया जल्दी अपनी विधि बताएं।नागार्जुन ने कहा, तुम सिर्फ होश रखो, बोध बढ़ाओ। जब चोरी करने जाओ तो उसके प्रति भी सजग रहो, होशपूर्ण रहो। जब सेंध लगाओ तब जानते रहो कि मैं सेंध लगा रहा हूं, पूरे होश में रहो। जब खजाने से कुछ निकालो तब भी जागरूक रहो, होश के साथ निकालो। तुम क्या करते हो इससे मुझे लेना-देना नहीं है, लेकिन जो भी करो बोधपूर्वक करो। और पंद्रह दिन बाद मेरे पास आना। लेकिन यदि इस विधि का अभ्यास न कर सको तो मत आना। पंद्रह दिन निरंतर अभ्यास करो। जो भी जी में आए करो, लेकिन पूरे सजग होकर करो।चोर तीसरे ही दिन वापिस आया और उसने नागार्जुन से कहा, पंद्रह दिन का समय बहुत है, मैं आज ही आ गया। आप बड़े चालाक आदमी मालूम होते हैं। आपने ऐसी विधि बताई कि मेरा धंधा चलना मुश्किल है। पूरा होश रखकर मैं चोरी नहीं कर सकता हूं। पिछली तीनरातों से मैं राजमहल जा रहा हूं। मैं खजाने तक गया, उसे खोल भी लिया। मेरे सामने बहुमूल्य हीरे-जवाहरात थे, लेकिन मैं तभी पूरी तरह सजग हो गया। और सजग होते ही मैं बुद्ध की मूर्ति की तरह हो गया, मैं कुछ भी नहीं कर सका। मेरे हाथों ने हिलने से इनकार कर दिया और सारा खजाना व्यर्थ मालूम पड़ने लगा। तीन रातों से मैं लौट-लौटकर राजमहल जाता हूं। समझ में नहीं आता कि मैं क्या करूं! आपने तो कहा था कि इस विधि में धंधा छोड़ने की शर्त नहीं है, लेकिन ऐसा लगता है कि विधि में ही कोई छिपी प्रक्रिया है। नागार्जुन ने कहा, दुबारा मेरे पास मत आना। अब चुनाव तुम्हें करना है। अगर चोरी जारी रखना चाहते हो तो ध्यान को भूल जाओ। और अगर ध्यान चाहते हो तो चोरी को भूल जाओ। चुनाव तुम्हें करना है।चोर ने कहा, आपने तो मुझे बड़े धर्म संकट में डाल दिया। इन तीन दिनों में मैंने जाना कि मेरे भी आत्मा है, और जब मैं राजमहल में कुछ चोरी किए बिना वापिस आया तो पहली दफा मुझे लगा कि मैं सम्राट हूं, चोर नहीं। ये तीन दिन इतने आनंदपूर्ण रहे हैं कि मैं अब ध्यान नहीं छोड़ सकता। आपने मेरे साथ चालाकी की। अब आप मुझे दीक्षा दें और अपना शिष्य बना लें। और अधिक प्रयोग की जरूरत नहीं है, तीन दिन काफी हैं।कुछ भी विषय हो, यदि तुम सजग रहो तो सब कुछ ध्यान बन जाता है। तादात्म्य को जागरूक होकर प्रयोग में लाओ, तब वह ध्यान बन जाएगा। बेहोशी में किया गया तादात्म्य पाप है। ओशो Posted 12th July 2015 by vishal rastogi View comments Loading

Tuesday, April 10, 2018

परिवार छोटे करने का षड्यंत्र

बढ़ रही हे बिना पारिवारिक जीवन के अकेले रहने की प्रवृति - टाइम मैगजीन का खुलासा

हम काफी समाये से श्री गुरुमूर्ति जी जैसे कई लोगो के लेखो और भाषणों में पढ़ते रहते थे की बाहरी मुल्को में परिवार टूटते जा रहे हे. और ये भी की बिना मन बाप के बच्चों और ऐसे मन बाप जिनकी चिंता बच्चे नहीं करते बहुत बढ़ती जा रही हे. इस बात की पुष्टी प्रसिद्ध पत्रिका टाइम ने की हे एक खोजी लेख द्वारा. टाइम’ पत्रिका के ताजा अंक (12 मार्च 2012) में ऐसी दस बातों का ब्योरा दिया गया है जो ‘आपकी जिंदगी को बदल रही हैं।’इनमें पहली है- अकेले जीना। परिवार-परंपरा के बाहर ऐसा एकाकी जीवन, जिसमें किसी संतति का स्थान नहीं होता। अमेरिका समेत विभिन्न विकसित देशों के आंकड़ों के जरिए इसमें बताया गया है कि किस प्रकार दिन-प्रतिदिन ऐसे सभी आगे बढ़े हुए देशों के लोगों में बिना किसी परिवार के अकेले रहने की प्रवृत्ति जोर पकड़ती जा रही है। अमेरिका में 1950 में अकेले रहने वाले लोगों की संख्या जहां सिर्फ चालीस लाख, यानी वहां की आबादी का नौ प्रतिशत थी, वह 2011 की जनगणना के मुताबिक बढ़ कर तीन करोड़ तीस लाख, यानी अट्ठाईस फीसद हो चुकी है। इसमें दिए गए तथ्यों से पता चलता है कि ऐसे एकाकी लोगों की सबसे बड़ी तादाद
स्वीडन में, सैंतालीस प्रतिशत है। 16 गुना संख्या का ज्यादा प्रतिशत है
ब्रिटेन में चौंतीस, ग्यारह गुना
जापान में इकतीस,
इटली में उनतीस, दस गुना
कनाडा में
रूस में पच्चीस, 8 गुणा
दक्षिण अफ्रीका में चौबीस भारत से 8 गुना
और केन्या, ब्राजील और भारत
जैसे विकासशील देशों में क्रमश: पंद्रह, दस और तीन प्रतिशत है। आर्थात भर्स्ट से तीन गुना व पांच गुना है।
‘टाइम’ में आधुनिक दुनिया की इस नई सच्चाई को दुनिया के चरम आणवीकरण (अल्टीमेट एटमाइजेशन) का संकेत कहा गया है।
पहले आधुनिक जीवन को एकल परिवार से जोड़ा जाता था, अब इसका मतलब क्रमश: अकेला आदमी होता जा रहा है। इस उभरती हुई नई सच्चाई को समाजशास्त्रियों का एक हिस्सा समाज के ‘स्वास्थ्य और खुशियों’ के लिए हानिकारक मानता है और इसकी व्याख्या कुछ इस प्रकार करता है कि ‘यह इस बात का संकेत है कि हम कितने अकेले और असंलग्न हो गए हैं।’ इसके विपरीत दूसरी व्याख्याएं यह कहती हैं कि इस बात के कोई प्रमाण नहीं हैं कि अकेले रहना अमेरिकी आदमी को अधिक अकेला बना रहा है। खुद ‘टाइम’ पत्रिका के लेखक एरिक क्लिनेनबर्ग का मानना है कि ‘आखिरकार अकेले रहने से एक उद्देश्य की पूर्ति होती है। यह पवित्र आधुनिक मूल्यों- व्यक्ति स्वातंत्र्य, आत्म-नियंत्रण, और आत्मानुभव को अपनाने में हमारे लिए मददगार होता है जो किशोरावस्था से लेकर अंतिम दिनों तक हमारा साथ देते हैं।
अकेले रहना हमें इस बात की अनुमति देता है कि हम अपनी शर्तों पर अपनी मर्जी का जीवन जिएं, जब मन आए काम करें।’ दूसरी बात बहुत ही खतरनाक हे की ये प्रवृति इस बात की द्योतक हे की आदमी ज्यादा स्व-केन्द्रित और व्यक्तिवादी होता जा रहा हे. उसको एहसास हो रहा हे की लम्बे सम्बन्ध समझोता चाहते हे, मायने की त्याग चाहते हे. इसलिए वो लम्बे, गहरे और अन्तरंग सम्बन्ध बनाने के लिए जो कीमत चुकानी पड़ती हे उसको छोड़ कर आसान रिश्ते ढूंढने लगा हे, और उसका कहना हे,  आदमी फेसबुक के "मित्र" बनाने लग गए हे. हा हा हा .....
अगर ऊपर का पर पढेंगे तो एक आंकड़ा था की अभी ये प्रवृति भारत में सिर्फ तीन प्रतिशत ही हे जो अमरीका में अठाईस प्रतिशत,
ब्रिटेन में चोंतीस
और स्वीडन में सेंतालिस प्रतिशत हे. परन्तु जिस ढंग से यहाँ भी विदेशी अप-संस्कृति का प्रतिशत बढ़ रहा हे, मायने की LPG बढ़ रही हे उसी अनुपात में ये बिना परिवार के रहने की प्रवृति भी बढ़ेगे, ऐसा मानना चाहिए. मैंने यहाँ LPG गैस का जिक्र नहीं LIBRELISATION PRIVATISATION तथा GLOBALISATION - उदारीकरण, निजीकरण, भूमंदालिकरण आदि के लिए किया हे जिसके मॉडल के नाते अमरीका और यूरोप को देखा जाता हे.

अधिकांश टीवी के पारिवारिक सेरिअल्सअभी जितने भे पारिवारिक सीरिअल टीवी दिखा रहा हे उनमें से अधिकांश लिव इन रेलाशन को महिमामंडित करने वाले हे. एक चुटकला सुना था, पहले लोग विवाह करते हुए सोचते थे की आपनी जाती-बिरादरी में ही हो, फिर कहने लगे की जाती-बिरादरी की बात छोडो पर रिश्ता अपने इलाके में हो, फिर बोले की इसको भी छोडो, लड़की अच्छी होनी चाहिए और अब बोलते हे की वो भी कोई बात नहीं लड़के का लडकी से ही होना चाहिए. समलिंगी शादियों को जिस प्रकार से कोर्ट से मान्यता मिलनी शुरू हुई हे, ये चिंता बढ़ती जाती हे. में नीचे कुछ लिनक्स दे रहे हूँ जहाँ

Wednesday, February 21, 2018

पक्षियों का संसार

पिछले दिनों जनवरी 2018 में मुम्बई में स्वदेशी के विचार विभाग की एक कार्यशाला हुई जनवरी 2018 में। वहाँ डॉ कौशल किशोर जी जमशेदपुर वालों ने पर्यावरण पर बोलते हुए पक्षी जगत की बात की। वे पक्षियों  पर ही डॉक्टरेट किये हुए है और उनकी रूचि भी इस विषय में बहुत है । सामान्यतः कहा जाता है कि कुल दुनियाँ में 10135 प्रजातियां पक्षियों की है जिनमे से 12 प्रतिशत से अधिक अर्थात 1266 भारत मे पाई जाती हैं। मजे की बात है कि 61 तो सिर्फ भारत मे ही पाई जाती हैं और 134 near endemic यानी लगभग अधिकांश भारत मे पाई जाती है और थोड़ी अधिक आस पास के देशों में।1947 के बाद मात्र 4 प्रजातियां ही नई खोजी गयी हैं। zoothra salimaliii नया संगीतमय आवाज़ वाला पक्षी अरुणाचल में सबसे नवीनतम खोज है।

2016 में अमेरिका में नई खोज के मुताबिक 18000 प्रजातीय हैं क्योंकि कई एक जैसी प्रजातियों को एक नहीं दो मां है।

 गीध तो स्माप्त प्रायः जैसी ही है। वजह भी पशुओं में declophenac का प्रयोग मन जाता है। राजस्थान का राज्य पक्षी गोडावण (ग्रेट indian bustard) जो सामान्यतः 15 किलो वजन और एक मीटर ऊंचाई का होता है, बहुत कम रह गया है। पर्यावरण और पक्षियों का गहरा  सम्बन्ध है।
अतः मैं सोचने लगा कि मैं कितने पक्षियों के नाम जानता हूँ। गिनने बैठा तो निराशा सी हुई कि हम तो मात्र एक या दो प्रतिशत को ही जानते है।
1.एक पक्षी जिसे हम चिड़िया ही कहते है, उसका ठीक नाम ही नहीं पता। बाद में भीलवाड़ा के महेश नवहाल जी के भेजे चार्ट से जाना कि उसका नाम घरेलू गोरैया (common sparrow) है।
2. हम अभी तक बैया baya weawer को ही गोरैया कहते थे।
3,4. कबूतर और कौआ तो बिल्कुल जान पहचान के है।
5.एक अन्य पक्षी जिसे हम लाहली कहते थे और स्टेशनों पर रात को वही सबसे ज्यादा शोर मचाते है, अब पता चला कि वही मैना या common Myna है।

6. फाख्ता या जिसे हम घुघ्घी कहते है, भोली भाली कबूतर जैसी और अक्सर कार आदि से टकराने के भोलापन वही करती है।
7.  कभी कभी नीलकंठ भी कहीं दिखाई दे जाता है, और शुभ भी माना जाता है। 8,9,10. चील, मुर्गा, मोर भी देखे भाले है।
11.कभी कभी तीतर भी पाले जाते है, इस कारण दिख जाते हैं।
12.गीध तो पहले बढ के वृक्ष पर काफी दिख जाते थे, अब एकदम विलुप्त से जीव हैं।
14.पहले कठफोवड़ा तो जैसे विलुप्त ही हो गया है, जो अपनी तेज चोंच से लकड़ी फोड़ते नज़र आते थे। आज पढ़ा तो उसका नाम हुदहुद लिखा था।
15.
अरे, तोता तो भूल ही गये।
16.बतख भी पालतू जीव है और लोग उसके मुर्गी के अंडों की तरह खाते सुना है।
17.इस प्रकार बगुला भी जोड़ लें तो ये संख्या पंद्रह बनती है। यानी हमारी पक्षियों से मित्रता की लिस्ट बनाये तो ये 17. ही मुश्किल से बैठे गई।

18.अब देखे तो लंबी टांगो वाला सारस भी देखा ही होगा।
19.सर्दियों में तालाबो में तैरती हुई बीच-बीच मे मुर्गाबी teal भी थोड़ी जानी पहचानी है।
22.कभी कभी टटीहरि भी जरूर देखी थी।
23.  आम पर बैठी कोयल भी कूकती हुई देखी है।
24.और उल्लू को तो भूल ही गए, आने वालेदिनों में शायद उल्लू को तो शहर के बच्चे नहीं देखे होंगे, उल्लू के पठ्ठे की गाली जरूर जानते रहेंगे।
25. एक पक्षियों का जोड़ा इधर दिल्ली में जरूर कई बार देखा, और हमेशा उसे जोड़े में देखा है। लंबा और स्लेटी रंग का, अब पता चला उसका नाम धनेश है। इसकी चोंच बड़ी व मजबूत हैऔर इसे अंग्रेजी में hornbill के नाम से जानते है। दुनिया में 55 और भारत में 9 प्रजातियां इस पक्षी की है और भारत में 2 फीट लंबे आकार के पाए जाते हैं । इसकी मादा वृक्ष की कोटर में बच्चे देती है और 2 से 6 अंडे देती है और बाहरी जगत से थोड़ा सा सुराख से सम्पर्क रहता है। नर गनेश की जिम्मेवारी चोंच से खाना देने की होती है, और बच्चे बड़े होने पर मादा दीवार तोड़ बाहर आती है। सुना है आजकल इनकी संख्या कम होती जा रही है क्योंकि लोग इसका शिकार खूब करते है।

27.पपीहे को भी गानों में सुना है, परंतु पहचान में नही है। और नाच मेरी
28. बुलबुल, भी खूब सुनी, पर कम ही कभी देखी है। आज छत पे गया तो पीछे अम्बवा पर नए आये बूर पर एक बुलबुल का जोड़ा फुदकते देखा। अतः ये सूची 9 की  हो गयी। अर्थात कम हो या ज्यादा दोस्ती हो, परंतु कुल मिलाकर 28 पक्षी ही जान पहचान के है। दिल्ली के पक्षियों की सूची देखी तो, और देश की सूची तो और भी ज्यादा, और दुनियां में तो कुल पक्षियों की प्रजातियां है।

29. Roufus treepie रूफस ट्रिपि 9 नवंबर 20 को इस्से वास्ता पड़ा  पहली बार रनथम्बोर शेर सैंक्चुअरी में। मैना जैसी लेकिन पूंछ लंबी घनेश जैसी, मनुष्यों से घुलने मिलने वाली। लगभग भारत में पाई जाती है। कंधे पर बैठकर बिस्कुट आदि उठा ले जाती है। इसे टका चोर भी कहते हैं, क्योंकि इसे चमकीली वस्तुओं को उठा ले जाने का शौक है। अन्य हिंदी नाम भी होंगे।

इनका ग्रुप: श्री सतीश आचार्य की बड़ी बेटी ऋषिता आचार्य ने बहुत से फ़ोटो पक्षियों के घोंसलों के बनाये हैं। ऐसे ही प्रोफ कौशल और एक प्रोफ़ेसर रामकुमार चौधरी जी के कॉलेज का भी खूब जानकारियां रखते हैं। 

Tuesday, February 20, 2018

गीत: धीरे धीरे यहां का मौसम बदलने

https://youtu.be/Thz0hS3B_c

दुष्यंत कवि के प्रेरक गीतों में अति उत्साह देने वाला गीत है और स्वर जानने के लिए ऊपर के लिंक को को कॉपी पेस्ट करें:
फिर धीरे-धीरे यहां का मौसम बदलने लगा है,
वातावरण सो रहा था अब आंख मलने लगा है

1.पिछले सफ़र की न पूछो , टूटा हुआ एक रथ है,
जो रुक गया था कहीं पर ,फिर साथ चलने लगा है

2.हमको पता भी नहीं था , वो आग ठण्डी पड़ी थी,
जिस आग पर आज पानी सहसा उबलने लगा है

3.जो आदमी मर चुके थे , मौजूद है इस सभा में,
हर एक सच कल्पना से आगे निकलने लगा है
4.बातें बहुत हो रही है , मेरे-तुमहारे विषय में,
जो रासते में खड़ा था परवत पिघलने लगा है.
5.ये घोषणा हो चुकी है , मेला लगेगा यहां पर,
हर आदमी घर पहुंचकर , कपड़े बदलने लगा है।
6.जो ठेंगड़ी जी ने रोपा, स्वदेशी मंच अब युवा है,
देशी विदेशी डाकुओं का, दम अब उखड़ने लगा है।

Thursday, February 8, 2018

उम्र तो सिर्फ अंक है क्या?

उम्र मात्र अंक मात्र है।
आज मैं आपको कुछ ऐसे तथ्य बताना चाहता हूं जिसके कारण लगेगा की उम्र बढ़ने के साथ आदमी कमजोर नहीं होता और ना ही होना चाहिए । उसके लिए एक कहानी सुनाई जाती है एक राजा के और उसका पुराना हाथी, जिसने बहुत युद्ध सफलतापूर्वक लड़े थे  और अब क्योंकि आयु बढ़ चुकी थी उसको आराम करने दिया जाता था। अचानक एक दिन वह तालाब के कीचड़ में फंस गया और बाहर नहीं निकल पाया उसकी स्थिति दयनीय हो गई । उसकी सहायता की गई लोगों ने बहुत जोर लगाया, चारो तरफ से  रस्सियां फेंकी गई, बांधी गई, खींची गई, पर बेकार । अंत में राजा ने एक पुराने मंत्री को बुलाया और उसने सलाह दी के आसपास युद्ध के नगाड़े बजाए जाए, दुंदभी भी बजाई।  जाए लोग हैरान अरे हाथी मर रहा है और यह युद्ध के साज, क्या मज़ाक है? लेकिन जैसे ही युद्ध के नगाड़े बजाए गए तो हाथी को लगा कि युद्ध होने वाला है, हो रहा है और वह पुराने रूप में आ गया और खुद जोर लगाता हुआ कीचड़ से बाहर। जोर-जोर से तालियां बजने लगी। मैन ऐसी ही कथा एक बूढ़े आदमी की सुनी जिससे पूछा गया कि इस बड़े वजन को उठा सकते हो क्या, तो वो बोला मुझे कुछ गांव से लोग बुलाने दो, जिन्हों उसके बुजुर्गों की गौरवशाली कथाएं सुनाई, विरदावली गाई, और वो व्यक्ति धीरे धीरे जोश में आता गया और, देखो,अरे,उस उत्साह में उस वजन को आश्चर्यजनक ढंग से उठा गया।आदमी बूढ़ा होने पर न,  हाथी बूढ़ा होने पर इतना कमजोर नहीं होता, जितना वो मानने लगे जाता है। हाथी को ढोल-नगाड़े बजाकर जगाना पड़ता है, आदमी को प्रेरक कथाओं, दृष्टांतो से ताक़तवर बनाया जा सकता है।  यही है हमारी आज की कथा का प्रारंभ।
उम्र एक सच्चाई है, परंतु उसमे दुःख ही दुख है, नया कुछ हो ही नहीं सकता ये एक झूठ है।
2. हम देखते हैं इस देश में भी 63 साल से ऊपर की उम्र में एक व्यक्ति प्रधानमंत्री बनता है प्रवास करता है ना दिन देखता है ना रात देखता है और सब लोग उसकी ऊर्जा की ऊर्जा की सराहना करते हैं , वो कभी छुट्टी नहीं लेता। और उसका नाम है नरेंद्र भाई मोदी
3. यह सामने वकील अभी 90 साल की कम उम्र का नहीं होगा परंतु आज भी उसकी चतुराई तर्कशीलता और चुस्ती देखकर बड़े-बड़े नौजवान लज्जित होते हैं इसका नाम है श्री राम जेठमलानी ।
अभी आपने देखा किस प्रकार श्री अरुण जेटली से सुप्रीम कोर्ट में भिड़ रहा था। किसी ने पूछा कि आप कैसे चुस्त रहते हो, बोला में जवानों के बीच रहता हूँ, उनकी तरह सोचता हूँ।
4.आगे देखें यह भी कोई कम फुर्ती लिए हुए नहीं है और आयु भी 90 से ऊपर है प्रधानमंत्री की दावेदारी पूरी थी और आज भी सक्रियता बरकरार है किसका नाम है लालकृष्ण आडवाणी।
5. दुनिया में अमिताभ बच्चन को ही देखना चाहिए आज 75 साल (1942) से ऊपर का है परंतु हर चीज में अति सक्रिय है ट्विटर पर Facebook पर। कौन बनेगा  करोड़पति में कितना समझदार लगता है, हर उत्तर ध्यान से सुनता है, तुरन्त मजाक बना लेता है, बिना किसी को छोटा बताए।
WhatsApp पर किस-किस में वह सक्रिय नहीं है उम्र को धत्ता बता रहा है शशि कपूर भी कम सक्रिय नहीं था 78  वर्ष (1938) की आयु में मैंने जब उसका ट्वीट पढ़ा था की किस प्रकार वह दुनिया की बड़ी कंपनियों में से एक मजाक उड़ा रहा था, ज़रा का, तो मैं हैरान रह गया धन्यवाद आगे देखिए
विदेशी उदाहरण:
6. आगे देखेंगे तो हमें हैरानी होगी की होगी एक व्यक्ति 70 साल तक व्यापार करता रहा और कभी छोटा सा चुनाव भी नहीं लड़ा पर अचानक अमेरिका की सबसे बड़ी लड़ाई लड़ता है और राष्ट्रपति चुना जाता है नाम आप जानते हैं श्री डोनाल्ड ट्रंप, कभी पागल बूढ़ा कहा जाता था, सीरियसली नहीं लिया जाता था,

7. दक्षणी अफ्रिका में रंगभेदी नीति के विरुद्ध 76 साल तक तो लड़ने वाले और तत्पश्चात राष्ट्रपति , 1994 से 1999बनने वाले महापुरुष, 2013 में स्वर्गवास। 1918 में जन्मे, मायने जलियावाला बाग़ घटना से भी पहलेजन्मे  से हैम प्रेरणा ले सकते है - नेल्सन मंडेला I am not a saint, unless you think of a saint as a sinner who keeps on trying.( 95 वर्ष में गए।)
6. इसी प्रकार पुरानी इतिहास में भी देखें तो कई व्यक्ति हमको बहुत ताज्जुब करने वाले लोग होते हैं एक हार्ट सर्जन जिनकी आयु 99 वर्ष की थी वह राष्ट्राध्यक्षों के भी त्रिदेव की शल्य चिकित्सा करते थे ,Michel DeBake डबैक, इससे पहले उसके अपने लड़के का देहावसान हार्ट अटैक से मारा, रोलर पंप उस की ईजाद है।

7. और यह सामने चित्र लगा है एक व्यक्ति का जो 91 वर्ष की आयु में अपने युवा लेखक को चिढ़ा रहा है कि अगर कल रात आप स्पेन लिए लिए 16 गए होते तो हमारी इस ऐतिहासिक पुस्तकों की श्रृंखला का नोवा संग्रह पूर्ण हो गया होता मेरे सामने उस समय पूरा पैनोरमा था जो एक दो घंटा और चलता तो संग्रह पूरा हो जाता युवा लेखक बोलता है सर अब कर लीजिए पूरा नहीं अब तो नहीं हो सकता क्योंकि मैं थक चुका हूं और जाने की तैयारी में हूं और उसी दिन वह प्राण पखेरू उड़ जाते हैं और 91 वर्ष की आयु में वह महान इतिहासकार जिसको आधुनिक प्रोफेशनल इतिहास का पिता कहा जाता है शरीर छोड़ जाता है । नाम है लेइपोल्ड वन रैंक leopold Von Ranke जो जर्मन का रहने वाला था।

8. कुछ कोट्स मेरे सामने हैं हम इसलिए खेलना छोड़ देते हैं क्योंकि हम बूढ़े नहीं हो जाते हैं बल्कि इसलिए बूढ़े हो जाते हैं क्योंकि हम खेलना छोड़ देते हैं अज्ञात लेखक का यह वाक्य अति सराहनीय है

एक बूढ़े आदमी की टी-शर्ट पर लिखा वाक्य उसके लिए भी था और हमारे सबके लिए भी है:
I am not 60. I am 16 with 44 years of experience. Think different, problems are common to all but attitude makes the difference.
  मास्टर नत्था सिंह,
तन की मशीनरी ने जब ढंग से चलना सीखा, इस बूढ़े तन के हर इक, पुर्जे पे जंग आया, जीवन निकल गया तो, जीने का ढंग आया, जब शमा बुझ गयी तो, जीने का ढंग आया।
दूसरा भी बूढ़े व्यक्तियों को चिढ़ाने के लिए मास्टर जी प्रायः बोलते थे:
खुर हिले, ते हाथ ढीले, और कंधा बोझ न ले, ऐसे बूढ़े बैल को कौन बांध भुस दे।
चुटकला, पत्थर और बूढ़ा आदमी, बुढ़ापे में
बूढ़े संतो की कथा, हमारा पंथ कब चलेगा।।।।

कुछ बाते,
1. सेहत के लिए समय लगाना, जैसे नहाने के लिए, शौच आदि के लिए, चार बातें, व्यायाम, आराम, भोजन, दवाई। अपने छोटे छीटे काम करते जाओ, एक एक कर बढ़ाते जाओ। दवाई डॉक्टर की लेते जाओ पर अपनी श्रद्धा की चीजें करते जाओ, तुलसी, अदरख, गिलोय, फल, त्रिफला, अजवाइन,आदि आदि।
2. बोलना कम, सुनना ज्यादा। अमिताभ जी जब कौन बनेगा करोड़पति में जब सु्नते है तो पूरा ध्यान से, एकाग्रता से, संवेदना से, एमपथी से,  न कि सिम्पथी से।
3. उसी परिवार के लिए नही, समाज के लिए। सभी बड़े काम ऐसे ही खड़े हुए है,
4. दिमागी फुर्ती बनाये रखें
5. पाजिटिविटी।
6. अपने पैरों पर खड़े रहे, परिवार पर भी निर्भर न रहे, कहानी इस घर को वृद्ध आश्रम बनाना है।
7.किसी ने ठीक ही लिखा

                  उम्र का बढ़ना तो

                   दस्तूरे-जहाँ है

                   महसूस न करो तो

                   बढ़ती कहां है ।

              उम्र को अगर

                   हराना है तो..  

                   शौक जिन्दा राखिए

                   घुटने चले या न चले

                   मन उड़ता परिंदा राखिए।।

                मुश्किलों का आना

                   'Part of life' है

   और उनमें से हँस कर बाहर आना

                  'Art of life' है ।।

वाजपेई जी की कविता उम्र की ऐसी तैसी

.. तजुर्बा एक ऐसी कंघी है जो भगवान तब देता है कि जब सिर के बाल उड़ जाते हैं यह विदेशी सोच है परंतु भारतीय सोच क्या है कि जब बच्चों के बाल बने होते हैं तो भगवान तजुर्बा रूपी कंगी दे देते हैं यह अपने बाल बांधने के लिए नहीं है यह बच्चों को सजाने संवारने के लिए क्योंकि मिली है। वाजपेई जी की कविता उम्र की ऐसी तैसी पढ़नी चाहिए।

चंद्रोदेवी व प्रकाशो देवी, गांव जोहड़ी, ज़िला बागपत शूटर की कहानी। कुल 55 साल की उम्र में शुरू किया, फिर दोनों देवरानी, जेठानी ने शुरू किया अभ्यास। फिर हेरोइन बनी। सांड की आंख में इन्ही का चित्रण।



Sunday, January 14, 2018

स्वामी विवेकानंद की 5 शिक्षाएं

1. अच्छा स्वास्थ्य
2. एकाग्रता से ध्यान
3. आत्मविश्वास
4.जाति-पाति के विरुद्ध,
5. स्वमुक्ति नहीं, सर्वमुक्ति( देशभक्ति)

1. स्वास्थ्य,
A.शरीर-शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्
शरीर धर्म पालन का पहला साधन है ।
2.पिता ने मुझे क्या दिया, माँ से पूछा, 3.फुटबाल खेलना व गीता ज्ञान,
4.ट्रैन में अंग्रेज व शरीर सौष्ठव का प्रदर्शन,
5. पूरे भारत का भृमण, विदेश में सर्दी में रुकना,
Practical, चाउमीन, फास्टफूड, कोकाकोला, नशीले पदार्थ,
B. एकाग्रता, व ध्यान,
A. बचपन मे सकूल में ध्यानावस्था,
2.पुस्कालय से दो पुस्तक खरीदना, शब्द, वाक्यांश, वाक्य, पैरा, फिर पूरा पेज पढ़ने,
3.पंडित जी को उन्ही का श्लोक सुनाना, बाद में यही ध्यान अवस्था।
एकाग्रता, जोड़ना, दोहराना, concentration, association एंड repetition,

C. आत्मविश्वास, self confidence:
1.बचपन मे किश्ती में नाविक , उल्टी आना, साफ करने को कहना,
2.मनुष्य तूं बड़ा महान है,
3. बदमाशो में भाषण, गोली चली,
4. परमहंस से पूछा क्या तूने भगवान देखा
5. नास्तिक वो नही जिसे भगवान पँर, बल्कि अपने पँर विश्वास नहीं।

D. जाति-पाति में विश्वास नही, सबका पिता एक,
1.बचपन मे कई हुक्के, सबको पिया
2. चिलम हरिजन की पीना।
3. अंतिम दिनों में संथाल की पत्तल उठाई
(भगतसिंह की समानांतर कथा)
4. हमारा धर्म रसोई ने ही घुस रहता है, 
जाति होना और जातिवाद में अंतर ।

E. स्वमुक्ति नहीं, सर्वमुक्ति:
1. सारे देवी देवताओं को भूल भारतमाता की पूजा
2. काशी के पंडित से शास्त्रार्थ,
3. विदेश में गद्दे से उतर कर रो पड़ना
4.संगठन कार्य का महत्व,
अपने लिए नहीं, औरों के लिए जिये वही महापुरुष। रॉकफेलर प्रसंग।

F. संगठन कौशल्य: कैसे कैसे व्यक्ति चुने, देश विदेश में संगठन खड़ा किया, राम कृष्ण मिशन। 1000 आइल नामक स्थान पर उन्होंने कुछ शिष्यों के साथ कुछ दिन का प्रशिक्षण दिया। सारी दुनिया मे वेदांत का नाम फैला दिया।

Saturday, January 6, 2018

11वी मंत्रीय विश्व व्यापार संगठन

सारांश: खाद्य सुरक्षा पर रस्साकशी
विकसित देश अपनी कृषि सबसिडी को बहुत ऊंचे स्तर पर बनाए रखते हुए भी विकासशील देशों के लिए सबसिडी पर कृषि के सकल घरेलू उत्पाद के दस फीसद की अधिकतम सीमा थोपने में कामयाब रहे हैं। उनका शुरू से दबाव रहा है कि कोई भी विकासशील देश अपनी कृषि उपज के दस फीसद से ज्यादा रकम सबसिडी के रूप में न दे। साथ ही अमीर देश जो e -commerce को अमेज़ॉन जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दबाव में WTO की परिधि में लाना चाहते थे, वो अस्वीकार हुआ।

।।।।।।

इसबार भी हर बार की भांति स्वदेशी जागरण मंच का प्रतिनिधित्व WTO की बैठक में अच्छा रहा। डॉ अश्वनी महाजन ने वहां की बैठक में शामिल होने के बाद बताया किअर्जेंटीना के ब्यूनस आयर्स में आयोजित विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) की ग्यारहवीं मंत्रिस्तरीय बैठक बिना किसी नतीजे के समाप्त हो गई। इसमें हिस्सा ले रहे देश खाद्य व कृषि सबसिडी को लेकर आम राय नहीं बना सके।
1. बेनतीजा रही बैठक क्योंकि विकसित देश अपने वायदे से गये मुकुर, गरीब देश देखते रहे टुकर-टुकर:
अर्जेंटीना के ब्यूनस आयर्स में आयोजित विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) की ग्यारहवीं मंत्रिस्तरीय बैठक बिना किसी नतीजे के समाप्त हो गई। इसमें हिस्सा ले रहे देश खाद्य व कृषि सबसिडी को लेकर आम राय नहीं बना सके। क्योंकि अमेरिका व अन्य विकसित देश बहुपक्षीय व्यापार संस्था के सदस्यों द्वारा सार्वजनिक खाद्य भंडारण के मसले का स्थायी समाधान खोजने की अपनी प्रतिबद्धता से मुकर गए। भारत और उसके साथ खड़े डब्ल्यूटीओ के बहुसंख्यक सदस्य-देश चाहते हैं कि सार्वजनिक भंडारण, न्यूनतम समर्थन मूल्य और खाद्य सुरक्षा पर उन प्रतिबद्धताओं का पालन किया जाए, जो 2013 में बाली में और 2015 में नैरोबी के मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में व्यक्त की गई थीं। बाली सम्मेलन में शामिल किए गए ‘शांति अनुच्छेद’ के तहत अगर सरकार सार्वजनिक खरीद के दस प्रतिशत के स्थापित मानक से ज्यादा जमा करती है तो भी उस पर कार्रवाई नहीं की जाएगी। दूसरी तरफ अमेरिका को इस पर कड़ी आपत्ति है। खाद्य सुरक्षा का यह विवाद उस समय और भी बड़ा हो जाता है जब अफ्रीका के कई देश मुख्य अनाजों के साथ खाद्य के अन्य पदार्थों की खरीद की छूट मांग रहे हैं और अमेरिका जैसे देश उसे सीमित करना चाह रहे हैं। इसलिए सवाल यह भी है कि सार्वजनिक खरीद सिर्फ गेहूं और चावल की होनी चाहिए या दूसरे खाद्य पदार्थों की भी।

2. क्यों नहीं अमीर देश अपनी अन्धधुन्ध दी गयीं कृषि पर सब्सिडी घटाए:

मौजूदा विवाद में विकासशील देशों की मांग है कि धनी देश खेती पर अपनी सबसिडी घटाएं, जबकि अमेरिका, यूरोपीय संघ, जापान, कनाडा और आस्ट्रेलिया चाहते हैं कि ई-कॉमर्स और निवेश-सुविधा को बढ़ावा दिया जाए। विकासशील देश इसे अमीर देशों की तरफ से उठाया गया नया मुद्दा छोटे विक्रेताओं के विरुद्ध एमेजॉन जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हित में उठाया गया कदम मानते हैं। बता दें कि भारत 2013 के खाद्य सुरक्षा अधिनियम से भी बंधा हुआ है और वह खाद्य भंडारण में होने वाले भारी खर्च के बावजूद इसकी राजनीतिक अहमियत को समझता है। यह प्रणाली सूखा, अकाल और दूसरी प्राकृतिक आपदाओं की स्थिति में नागरिकों का जीवन तो बचाती ही है, विश्व व्यापार को स्थिरता प्रदान करती है। जाहिर है, कोई भी वैश्विक प्रणाली बहुजन हिताय और बहुजन सुखाय पर ही चल सकती है और अगर वह केवल स्वजन हिताय पर जोर देगी तो अपने ही बोझ तले दब जाएगी।
भारत अन्य विकासशील देशों के साथ चाह रहा था कि दोहा दौर की फिर से पुष्टि की जाए। इसमें जी-33, कम विकसित देश (एलडीसी), अफ्रीकी समूह भी शामिल थे। ये समूह दोहा दौर का सफल निष्कर्ष चाहते हैं। जबकि विकसित देश कन्नी काटते रहे हैं।
गौरतलब है कि दोहा वार्ता में शामिल सभी मुद््दे भारत समेत सभी विकासशील देशों के लिए महत्त्वपूर्ण हैं। दोहा वार्ता में कृषि उपज पर सबसिडी देने के मुद््दे पर भारत और अमेरिका में बने टकराव के कारण बातचीत की प्रक्रिया रुकी हुई है। जबकि दोहा वार्ता का उद््देश्य विश्व व्यापार को सहज और सरल बनाना है। भारत का कहना है कि दोहा वार्ता लंबे समय से चल रही है तथा जटिल मुद््दों और हितों से संबंधित है। अत: इसके लिए समय-सीमा तय नहीं की जा सकती। दोहा वार्ता वर्ष 2001 में शुरू हुई थी। खाद्य सुरक्षा के मसले के स्थायी समाधान के लिए भारत ने प्रस्ताव किया था कि या तो 10 प्रतिशत खाद्य सबसिडी सीमा की गणना का फार्मूला बदला जाय जो 1986-88 की कीमतों पर आधारित है या विकासशील देशों की सरकारों की इस तरह की योजनाओं को सबसिडी की सीमा के दायरे से बाहर रखा जाए।
3. खाद्यान्न का बफर स्टॉक मुद्दा:
भारत का यह भी कहना है कि उसकी एक बड़ी आबादी अब भी गरीबी रेखा से नीचे है। इस आबादी को भोजन उपलब्ध कराने के लिए खाद्यान्न का बफर स्टॉक जरूरी है। हालांकि इस एग्रीमेंट के तहत बफर स्टॉक के अधिक होने की स्थिति में भारत इसका निर्यात नहीं कर सकता। जबकि विकसित देशों का कहना है कि यह खाद्यान्न सबसिडीयुक्त है और इससे बाजार-कीमत गलत तरीके से प्रभावित होती है। इतना ही नहीं, विकसित देश भारत द्वारा किसानों को दिए जा रहे न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की भी एक सीमा तय करना चाहते हैं, जबकि भारत इसके खिलाफ है। भारत पहले भी यह मसला उठा चुका है।

4. नए विषय पर झगड़ा:
साथ ही, खाद्य सुरक्षा, कृषि सबसिडी, खाद्यान्न भंडारण, किसानों के हित समेत व्यापार उदारीकरण और बाजार खोलने जैसे बेहद अहम विषयों पर विकसित और विकासशील देशों के बीच सीधा टकराव है। विकसित देशों द्वारा मुक्त व्यापार और पर्यावरण समेत कई नए मुद््दों को सम्मेलन में शामिल करने पर बल देने से भारत जैसे विकासशील देशों के लिए यह करो या मरो की स्थिति हो गई है। अमेरिका और अन्य विकसित देश भारत के सबसिडी कार्यक्रम पर लगाम लगाने की कोशिश कर रहे हैं। इसके विरोध में अन्य विकासशील देश भी लामबंद हैं। दरअसल, सबसिडी पर होने वाले व्यय का मूल्यांकन 1986-88 की कीमतों के आधार पर किया जाता है, जबकि उत्पादन की वास्तविक लागत उस आधार-मूल्य से कहीं ज्यादा बड़ी है। इसीलिए एक समूह के रूप में विकासशील देश व्यापार वार्ताओं में शुरू से विकसित देशों की ऊंची कृषि सबसिडी का मुद्दा उठाते रहे हैं।
लेकिन विकसित देश अपनी कृषि सबसिडी को बहुत ऊंचे स्तर पर बनाए रखते हुए भी विकासशील देशों के लिए सबसिडी पर कृषि के सकल घरेलू उत्पाद के दस फीसद की अधिकतम सीमा थोपने में अब तक कामयाब रहे हैं। विकसित देशों का शुरू से यह दबाव रहा है कि भारत समेत कोई भी विकासशील देश अपनी कुल कृषि उपज के दस फीसद से ज्यादा रकम अपने किसानों को सबसिडी के रूप में न दे। उनका माना है कि ऐसा करने पर बाजार में अनावश्यक विकृति पैदा होती है।
हालांकि विकसित देश अपने कृषि सेक्टर को सत्तर-अस्सी फीसद तक सबसिडी दे रहे हैं। विकसित देशों का यह भी कहना है कि भारत अगर उनसे कृषि सबसिडी कम करने की मांग करता है तो उसके एवज में उसे अपनी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की एक अधिकतम सीमा तय करनी होगी, और ऐसा नहीं करने पर उसे जुर्माना भरना पड़ सकता है। विकसित देश एक तरफ जहां भारत समेत विकासशील देशों के खाद्य कार्यक्रम को नियम-कायदों के खिलाफ बता रहे हैं, वहीं वे कई अंतरराष्ट्रीय खाद्य कार्यक्रम चला रहे हैं और उनका वित्तपोषण कर रहे हैं। भारत का कहना है कि ये कार्यक्रम भी खाद्यान्न की अंतरराष्ट्रीय कीमतों को प्रभावित करते हैं और विकासशील देशों को इसका नुकसान उठाना पड़ता है। यही वजह है कि 2001 में शुरू हुए दोहा दौर से ही कई मुद्दों पर विकासशील और विकसित देशों के बीच टकराव है।
भारत समेत विकासशील देशों द्वारा खाद्यान्न के सार्वजनिक भंडारण के अलावा किसानों को खाद, बीज, कीटनाशक और सिंचाई से जुड़ी सबसिडी देने का मामला विवाद का एक प्रमुख विषय है। अमेरिका, यूरोपीय संघ समेत सभी विकसित देशों का कहना है कि भारत और अन्य विकासशील देशों का यह रवैया मुक्त बाजार व्यवहार के सिद्धांतों के खिलाफ है। जबकि भारत का कहना है कि 2014 में हुए व्यापार सुगमता समझौते के तहत उसे तब तक के लिए खाद्यान्न का बफर स्टॉक बनाए रखने का अधिकार है, जब तक कि इसका कोई स्थायी समाधान नहीं निकाल लिया जाता।
बहरहाल, भारत सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि किसानों को पर्याप्त मुआवजा मिले और सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए पर्याप्त मात्रा में खाद्यान्न हो। भारत यह भी चाहता है कि पहले उन मामलों पर सहमति बने, जो विकासशील और गरीब देशों के लिए ज्यादा अहमियत रखते हैं। डॉ अश्वनी महाजन ने बताया कि 2018 फरवरी में वाणिज्य मंत्री श4ई सुरेश प्रभु विकासशील देशों के प्रतिनिधियों को भारत निमंत्रित करके एक जनमत तैयार करेगा, और स्वदेशी जागरण मंच भी अपनो प्रोएक्टिव भूमिका द्वारा इन देशों के अच्छे गैर सरकारी एक्टिविस्ट्स से संपर्क कर समानांतर सत्र करेगा।
यह लेख जनसत्ता में छपे श्री रविशंकर के लेख पर आधारित है; सधन्यवाद।